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Author: dipanshu

मलूटी

मलूटी


मलूटी
झारखंड के दुमका जिले का ऐतिहासिक गांव है मलूटी। यह गांव टेरिकोटा के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां 300 साल पहले 108 मंदिर बनाए गए थे। वर्तमान में इनमें से 72 मंदिर ही सुरक्षित बचे हैं।अधिकांश मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं। मंदिरों की दीवारों पर रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के दृश्य उकेरे गए हैं। इन मंदिरों को अनूठी स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है। पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा मलूटी छोटा नागपुर पठार के सिरे पर है। यह इलाका घने जगंलों, नदियों और जंगलों से भरा है। मलूटी रांची से 370 किलोमीटर दूर है।

मैक्लुस्कीगंज

मैक्लुस्कीगंज


मैक्लुस्कीगंज
इतिहास की अनोखी धरोहर है झारखंड का मैक्लुस्कीगंज।यह छोटा सा कस्बा एंग्लो-इंडियन बस्ती हुआ करता था। इसे 1930 के आसपास कोलकाता के अर्नेस्ट टिमोथी ने बसाया था। एक समय यहां 400 एंग्लो-इंडियन परिवार रहा करते थे। उस दौर को बयान करते विशाल विक्टोरियन बंगलें आज भी यहां देखे जा सकते हैं। अब यहां कुछ ही एंग्लो-इंडियन परिवार बचे हैं। लेकिन बीत वक्त की महक को यहां महसूस किया जा सकता है। साल के जंगलों और पहाड़ी आबोहवा वाला मैक्लुस्कीगंज इतिहास तलाशने वाले के लिए बढिया जगह है। यह कस्बा रांची से 60 किलोमीटर दूर है।

हिमाचल प्रदेश की 10 खूबसूरत जगहें

हिमाचल प्रदेश की 10 खूबसूरत जगहें

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है। इस देवभूमि में पर्यटकों के देखने के लिए ना जाने कितने जगहें हैं। आराम से समय बिताने के साथ पहाड़ों पर चढ़ने तक यहां सब कुछ किया जा सकता है। हिमाचल की दस जगहें इस लेख में शामिल की गई हैं। हिमाचल प्रदेश जाने पर आप इन जगहों को शामिल कर सकते हैं।

1- मनाली

हिमाचल प्रदेश का सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशन है मनाली। यहां के बर्फ से ढके पहाड़ों, देवदार के पेड़ों और फलों के बगीचों को देखने लोग खिचें चले आते हैं। गर्मियों में यहां मैदानों की गर्मी से राहत मिलती है तो सर्दियों में यहां बर्फबारी का मजा लिया जा सकता है। मनाली का पौराणिक महत्व भी है। माना जाता है इसका मनाली का नाम ऋषि मनु के नाम पर पड़ा। यहां के हिडम्बा देवी मंदिर की बहुत मान्यता है। रोमांचल खेलों को पसंद करने वालों के लिए भी मनाली पंसदीदा जगह है। मनाली दिल्ली से करीब 530 किलोमीटर दूर है।

2- कुल्लू घाटी


हिमाचल को देवभूमि कहा जाता है।समुद्र तल से 1230 मीटर की ऊंचाई पर बसे कुल्लू को देवताओं की घाटी माना जाता है। कुल्लू में कई प्राचीन मंदिर हैं । ये मंदिर हिमाचल की पहाड़ी वास्तुकला का शानदार उदाहरण है। कुल्लू का दशहरा तो विश्वप्रसिद्ध है। इसे देखने दुनिया भर से लोग यहां आते हैं। व्यास नदी से बनी यह घाटी बेहद सुन्दर है। व्यास नदी का साफ पानी, फलों के बगीचे और घने जंगल इस घाटी को अनोखा बनाते हैं। यहां से ट्रेकिंग के लिए भी कई रास्ते जाते हैं। कुल्लू चंडीगढ से 280 किलोमीटर दूर है।

3- नग्गर
By Akshat Sharma – https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=59590375
कुल्लू घाटी का ऐतिहासिक कस्बा है नग्गर । यह कुल्लू की प्राचीन राजधानी था। उस दौर के भव्यता को याद दिलाता यहां का शानदार किला । नग्गर का किला हिमाचल की काठकोडी वास्तुकल का उत्तम उदाहरण है।आधुनिक समय में नग्गर को प्रसिद्ध मिली रूसी चित्रकार निकोलस रोरिक के घर के रूप में। निकोलस लंबे समय तक यहां रहे। घर को अब संग्राहलय में बदल दिया गया है। उनके घर, उनसे जुडी चीजों और चित्रों को आज भी नग्गर के उनके घर में देखा जा सकता है। नग्गर की प्राकृतिक सुन्दरता भी अद्भुत है। नग्गर कस्बा मनाली से 21 किलोमीटर दूर है।

4- रोहतांग दर्रा

भारत का सबसे प्रसिद्ध दर्रों में से एक है रोहतांग दर्रा। समुद्र तल से 3979 मीटर ऊंचाई वाले इस दर्रे पर पूरे साल बर्फ बिछी रहती है। यहां से बर्फ से ढके पहाडों का सुन्दर नजारा दिखाई देता है। यह दर्रा मनाली से लेह जाने वाले रास्ते पर है। मौसम ऐसा कि साल में मुश्किल से पांच महीने के लिए यह रास्ता खुलता है। मनाली आने वाला हर पर्यटक यहां जरूर आना चाहता है। यह पर्यावरण की समस्या को देखते हुए यहां आने वाली गाडियों की संख्या पर पाबंदी भी लगाई गई है।यह दर्रा मनाली से 50 किलोमीटर दूर है।

5-कसोल

source- By Alok Kumar – https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=51709183

हिमाचल की पार्वती घाटी में बसा है छोटा सा कस्बा कसोल। पार्वती नदी के किनारे बसा यह कस्बा विदेशी सैलानियों में बहुत लोकप्रिय है। कसोल में प्रकृति के सुरम्य नजारे दिखाई देते हैं। पार्वती नदी का सफेद रेत का किनारा इसे और भी खास बनाता है।यहां इसराइली पर्यटक बहुत आते हैं।इसलिए इसे मिनी इसराइल भी कहा जाने लगा है।यहां बढिया इसराइली खाने का मजा लिया जा सकता है।कसोल से कई जगहों जैसे खीरगंगा और मलाना के लिए ट्रेक भी किया जा सकता है। कसोल कुल्लू से करीब 40 किलोमीटर दूर है।

6- डलहौजी
धौलाधार की पहाडियों के बीच बसा है हिमाचल प्रदेश का खूबसूरत शहर डलहौजी। अंग्रेजों के समय बने इस हिलस्टेशन को पांच पहाड़ियों पर बसाया गया था। 2036 मीटर की ऊंचाई पर बसे डलहौजी ने औपनिवेशिक समय की विरासत के साथ प्राकृतिक सुन्दरता को आज भी बनाए रखा है। अंग्रजी दौर में बनाए गए चर्च और इमारतें यहां देखी जा सकती हैं। करीब 150 साल पुराना सेंट जॉन यहां का सबसे पुराना चर्च है। चीड़, देवदार और बुरांश के पेड़ डलहौजी सुन्दरता को और भी बढ़ा देते हैं।यह शहर पठानकोट से 80 किलोमीटर दूर है।

 
 
7-बीड बिलिंग

आसमान में पंछियों की तरह उड़ने की इच्छा हो तो हिमाचल के बीड बिलिंग में चले आइए।  बीड बिलिंग  पैराग्लाइडिग के खेल में दुनिया भर में पहचान बना रहा है। बिलिंग की चोटी से उड़ान भरने के बाद पैराग्लाइडर बीड के खूबसूरत हरे भरे मैदान में उतरते हैं। यहां आसमान में मंडराते रंग बिंरगें पैराग्लाइडर इंद्रधनुषी समा बांधते हैं। यहां तिब्बती शरणार्थियों की बस्ती भी है जहां बौद्ध संस्कृति को देख सकते हैं। बीड बिलिग में चाय के बागानों के बीच घूमने का अलग ही मजा है। यहां का गुनहेड गांव अपने आर्ट मेले के लिए प्रसिद्ध है
 

8-मसरूर रॉक कट टेंपल

 हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में बना मसरूर मंदिर वास्तुशिल्प और स्थापत्य कला का अद्भभुत संगम हैं । पूरे पहाड़ को काट कर मंदिर में ढाल देना प्राचीन कारीगरी और विज्ञान का बेमिसाल नमूना है। 8वीं शताब्दी में बने इन मंदिरों का निर्माण बलुआ चट्टानों को तराश कर किया गया । उत्तर भारत में यह अपनी तरह का अकेला मंदिर है। यहां बलुआ चट्टानों को तराश कर करीब 15 मंदिर बनाए गए थे। इसे हिमाचल का एलोरा भी कहा जाता है। हालांकि ये मंदिर एलोरा से भी पुराने हैं।

9- पालमपुर


चाय के बागानों, हरे भरे जंगलों और धौलाधार के ऊंचे पहाड़ों के बीच बसा है हिमाचल प्रदेश का प्यारा सा कस्बा पालमपुर। पालमपुर अपने चाय बागानों के लिए प्रसिद्ध है। पहाडी ढलानों पर दूर दूर तक फैले बागान बड़े ही खूबसूरत दिखाई देते हैं। पालमपुर की खासियत है यहां का मौसम जो साल पर सुहावना बना रहता है।सर्दियों के मौसम में यहां आने पर बर्फ से ढके धौलाधार के पहाड़ों का शानदार नज़ारा दिखाई देता है। पालमुपर के आसपास देखने के लिए कई प्राचीन मंदिर हैं ।अंग्रेजी दौर की इमारतें, चर्च भी देखे जा सकते हैं।

10-बरोट


देवदार के घने पेड़ों से घिरी घाटी , शांत बहती नदी , अंग्रेजों के जमाने का पुराना बांध,  और झरने, बरोट में वह सब कुछ है जो शांति में कुछ दिन बिताने वाले पर्यटक को चाहिए। हिमाचल प्रदेश में मंडी जिले की चौहार घाटी में बसा बरोट हिमाचल प्रदेश का एक अनजाना हिल स्टेशन है । यहां पहुंच कर समय में पीछे आने का एहसास होता है। बडा भंगाल और छोटा भंगाल जैसे अंदरूनी इलाकों के लिए यहां से ट्रेक भी किया जा सकता है।  अंग्रजों के समय ऊहल नदी पर बना बांध यहां का प्रमुख आकर्षण है।

(2017 में दुनियादेखो पर पूरे वर्ष ट्रेवल पोस्टकार्ड सीरीज चलाई गई। इस लेख में शामिल जगहों को उन्ही पोस्टकार्ड से एक जगह जमा करके यहां लिखा गया है।)
 

रांची

रांची

रांची
झारखंड राज्य की राजधानी है रांची। छोटा नागपुर के पठार का हिस्सा होने के कारण यहां प्राकृतिक सुन्दरता भी बहुत है। रांची को झरनों का शहर भी कहा जाता है।रांची के पास देखने के लिए कई खूबसूरत झरने हैं।यहां पास ही कांची नदी 144 फीट की ऊंचाई से गिरते हुए दशम झरने का निर्माण करती है।वहीं स्वर्णरेखा नदी पर बना हुंडरू झरना 320 फीट ऊंचा है।मानसून में इन झरनों का देखने का अलग ही मजा है। देश के हर इलाके से आसानी से रांची पहुंचा जा सकता है।

नेतरहाट

नेतरहाट


नेतरहाट
झारखंड का प्यारा सा हिल स्टेशन है नेतरहाट। इसे छोटा नागपुर की रानी भी कहा जाता है। समुद्र तल से 3700 फीट की ऊंचाई पर स्थित नेतरहाट प्राकृतिक सुन्दरता से भरी जगह है। नेतरहाट आकर शांति का अहसास होता है। जंगलों से घिरे नेतरहाट का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने लोग यहां आते हैं। यहां आस-पास कई सुन्दर झरने देखे जा सकते हैं। इनमें लोध झरना प्रसिद्ध है 466 फीट की ऊंचाई से गिरता यह झरना बहुत शानदार नजर आता है। नेतरहाट अपने आवासीय विद्यालय के लिए प्रसिद्ध है। नेतरहाट झारखंड की राजधानी रांची से 156 किलोमीटर दूर है।

निज़ामाबाद

निज़ामाबाद


निज़ामाबाद
निज़ामशाही के दौर में निज़ामाबाद शहर का बहुत विकास हुआ। निज़ामाबाद का किला यहां की सबसे लोकप्रिय इमारत है। इस किले को 10वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजाओं ने बनवाया। किले के भीतर ऊंची पहाड़ी पर रामुलवारी मंदिर है जिसे छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाया था। निज़ामाबाद के पास ही डोमाकोंडा गांव में डोमाकोंड़ा किला है । 18वीं सदी में बना यह किला मुगल और पश्चिमी वास्तुकला का मेल है। किले में एक सुन्दर महल और काकतीय राजवंश के समय का शिव मंदिर देखा जा सकता है। निज़ामाबाद हैदराबाद से 175 किलोमीटर दूर है।

जम्मू-कश्मीर की 10 खूबसूरत जगहें

जम्मू-कश्मीर की 10 खूबसूरत जगहें

भारत के सबसे उत्तर में है जम्मू-कश्मीर। हिमालय के पहाड़ों पर बसे इस राज्य में कश्मीर घाटी से हरे-भरी घाटियों और पानी से भरी झीलों से लेकर लद्दाख के बर्फीले रेगिस्तान तक देखने के लिए बहुत कुछ है। लद्दाख इलाके में प्राचीन बौद्ध मठ देखने को मिलते हैं तो जम्मू और कश्मीर में प्राचीन मंदिर और मस्जिदें देखी जा सकती हैं। जम्मू-कश्मीर की दस चुने हुए जगहों को मैंने इस लेख शामिल किया है ।

1- मार्तण्ड सूर्य मंदिर

कश्मीर घाटी के अनंतनाग के पास मटन गांव में है मार्तण्ड सूर्य मंदिर। इस विशाल सूर्य मंदिर को करीब 1300 साल पहले कश्मीर के राजा ललितामदित्य मुक्तपीड ने बनवाया था। मंदिर हालांकि काफी टूट चुका है लेकिन उस समय के स्थापत्य और मूर्तिकला को आज भी यहां देखा जा सकता है। विशाल पत्थरों और खंभों पर की गई नक्काशी अद्भुत है । माना जाता है कि मंदिर के निर्णाण में कश्मीरी स्थापत्य के साथ यूनानी स्थापत्य की झलक भी मिलती है। यह प्राचीन मंदिर मटन गांव के नए सूर्य मंदिर से करीब 2 किलोमीटर दूर है।

2-अवन्तिस्वामी मंदिर


कश्मीर के अनंतनाग के अवन्तिपुर में है अवन्तिस्वामी मंदिर। विष्णु भगवान के इस मंदिर को नौ वीं शताब्दी में राजा अवन्तिवर्मन ने बनवाया था। अवन्तिवर्मन उत्पल वंश के संस्थापक थे। उस समय की कला के निशान दीवारों पर उकेरी मूर्तियों में देखे जा सकते हैं। बीच में ऊंचे चबूतरे पर मुख्य मंदिर था। मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर बने थे। झेलम के किनारे बना यह मंदिर अपने समय में काफी भव्य रहा होगा। माना जाता है कि झेलम नदी की बाढ में यह मंदिर नष्ट हुआ। मंदिर श्रीनगर से पहलगांव जाने वाली सड़क पर ही है।

3-गुलमर्ग


कश्मीर घाटी का गुलमर्ग प्रकृति की सुन्दरता का खजाना है। सर्दियों में गुलमर्ग सफेद बर्फ से ढक जाता है तो गर्मियों में हरी घास का लिहाफ ओढ लेता है। मौसम कोई भी हो इसकी खूबसूरती कम नहीं होती। गुलमर्ग का मौसम कुछ दिन शांति से बिताने के लिए बेहतरीन है। यहां आकर गोंडाला की सवारी का मजा उठायें या कुछ समय यूं ही प्रकृति के साथ बितायें। गुलमर्ग दुनिया के सबसे अच्छे स्की रिजोर्ट में शामिल किया जाता है तो सर्दियों में इस खेल को भी यहां सीखा जा सकता है।गुलमर्ग श्रीनगर से करीब 50 किलोमीटर दूर है।

4-डल झील


श्रीनगर शहर की पहचान है डल झील।डल के चारों तरफ दिखाई देते हरे-भरे ऊंचे पहाड और झील में चलते रंग-बिरंगे शिकारे इसकी सुन्दरता को और भी बढ़ा देते हैं। डल सिर्फ एक झील नहीं बल्कि तैरता शहर है। जहां हजारों लोग रहते हैं। डल में अपना बाजार और स्कूल भी हैं।तैरते खेत डल की सबसे बडी खासियत हैं जिन्हें शिकारे से बांध कर कहीं भी ले जाया जा सकता है । डल का पूरा मजा लेना है तो कुछ दिन हाउसबोट में बिताना जरूरी है। ये हाउस बोट अंग्रेजों के जमाने से ही डल में हैं।

5-मुगल गार्डन

श्रीनगर के मुगल बगीचे कश्मीर की खूबसूरती से होड करते लगते हैं। इन बगीचों को फारसी वास्तुकला की चारबाग शैली के आधार पर बनाया गया था। समकोण पर काटते रास्ते, बगीचों में बहती नहरें, पानी उलीचते फव्वारे एक अलग ही दुनिया रच देते हैं। बगीचों में लगे चिनार के पेडों के नीचे बैठने का मजा यही आकर लिया जा सकता है। मुगल बादशाहों ने करीब चार सौ साल पहले इन बगीचों को बनवाया था। श्रीनगर में शालीमार बाग, निशात बाग, चश्मेशाही ये तीन मुगल बगीचे आज भी मौजूद हैं।

6-पहलगाम

कश्मीर घाटी का जाना-पहचाना हिलस्टेशन है पहलगाव। ऊंचे पहाडों और हरे-भरे चारागाहों से घिरे पहलगाम में आकर प्रकृति की गोद में आने का अहसास होता है। बगल से बहती लिद्दर नदी इसकी खूबसूरती को और भी बढ़ा देती है। पहलगाम के पास देखने के लिए कई घाटियां हैं जिनमें अरू घाटी सबसे लोकप्रिय है। पहलगाम किसी भी मौसम में आया जा सकता है। पहलगाम भगवान शिव की अमरनाथ यात्रा का भी प्रमुख पडाव है।पारम्परिक अमरनाथ यात्रा का रास्ता पहलगाम से ही होकर जाता है। पहलगाम श्रीनगर से करीब 90 किलोमीटर दूर है।

7-सोनमर्ग

मर्ग का मतलब होता है घास का मैदान। इन्हीं हरे भर घास के मैदानों से भरा है कश्मीर घाटी का सोनमर्ग। सोनमर्ग के पास कई ग्लेशियर हैं जिनमें पूरे साल बर्फ जमा रहती है। इसके साथ ही सोनमर्ग से बहुत से ट्रेंकिग रास्तों की शुरूआत भी होती है। कश्मीर की ऊंचाई पर बनी गद्सर, कृष्णासर, सत्सर और गंगाबल जैसी झीलों के लिए भी ट्रेंकिग सोनमर्ग से ही होती है। सोनमर्ग नाला सिंध नदी के किनारे बसा है। इस नदी के तेज बहते पानी पर राफ्टिंग भी की जा सकती है। सोनमर्ग श्रीनगर से 80 किलोमीटर दूर है।

8-लेह


 जम्मू कश्मीर राज्य का एक खूबसूरत शहर है लेह । यह ठंडा रेगिस्तान कुदरत की कारीगरी का अद्भुत नमूना है। घाटी में बिखरी थोड़ी सी हरियाली, भूरे पहाड़, पहाडों की बर्फीली चोटियां और सबसे ऊपर साफ नीला आसामान रंगों का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं कि कुदरत की कलाकारी पर नाज़ होता है। यहां की धरती में भले ही रंगों की कमी हो लेकिन चटख लाल और पीले रंगों से सजे बौद्ध मठ उसका अहसास नहीं होने देते। लेह में 17वीं शताब्दी का बना किला  इस शहर पर एक मुकुट की तरह नजर आता है।
लेह शहर बसा है सिंधु नदी के किनारे।  वही  सिंधु नदी जिसके  नाम से इस महान देश का अपना पहचान मिली। 
 
 
9-नुब्रा घाटी

 समुद्र तल से 10,000 फीट का ऊंचाई पर ठंडे, रूखे पहाडों के बीच रेत के टीलों की कल्पना की है आपने? लद्दाख की नुब्रा घाटी का हुन्डर इलाका प्रकृति का अजूबा ही है। यहां आकर लगता है जैसे रेत के टीलों से भरे राजस्थान में आ गए हों। इसी रेगिस्तान में दो कूबड वाले अनोखे बैक्ट्रीयन ऊंट भी पाये जाते हैं । सूखे – बंजर लद्दाख से अलग नुब्रा में काफी हरियाली नजर आती है। इसके साथ ही 350 साल पुराना डिस्किट बौद्ध मठ नुब्रा की पहचान है।

10-पैगोंग झील

प्रकृति का एक अजूबा है पैंगोग झील। लद्दाख में 14000 फुट की ऊंचाई पर 135 किलोमीटर लंबी नमकीन पानी की झील है पैगोंग। यह झील भारत और चीन की सीमा रेखा भी बनाती है । झील का दो तिहाई हिस्सा चीन में और एक तिहाई भारत में है। झील का पानी सूर्य की रोशनी के साथ पल-पल रंग बदलता है इसके अद्भुत रंगों की छटा देखते ही बनती है। पैंगोंग के रास्ते में चांग-ला से गुजरने वाली दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची सड़क देखने का मौका भी मिलेगा

(2017 में दुनियादेखो पर पूरे वर्ष ट्रेवल पोस्टकार्ड सीरीज चलाई गई। इस लेख में शामिल जगहों को उन्ही पोस्टकार्ड से एक जगह जमा करके यहां लिखा गया है।)

धुलिकट्टा

धुलिकट्टा

धुलिकट्टा
तेंलगाना के बौद्ध इतिहास से जुड़ी अहम जगह है धुलिकट्टा। करीब दो हजार वर्ष पहले धुलिकट्टा में महास्तूप और विहार का निर्माण किया गया था। उस समय के अवशेष यहां देखे जा सकते हैं। यहां से रोमन और सातवाहन काल के सिक्के और चांदी के आभूषण भी मिले हैं। स्तूप को बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए चूना पत्थरों पर बौद्घ धर्म से जुड़ी आकृतियां उकेरी गई हैं। मेगस्थनीज ने भी धुलिकट्टा का जिक्र किया है। शहर इतना महत्वपूर्ण था कि इसकी रक्षा के लिए किलेबंदी की गई थी। धुलिकट्टा करीमनगर से 25 किलोमीटर दूर है।

करीमनगर

करीमनगर


करीमनगर
तेंलगाना के इस इलाके में पाषाण काल से ही मानव के रहने के सबूत मिले हैं। सातवाहन और चालुक्य राजवशों के समय यह एक महत्वपूर्ण शहर था। एलगंदल किला यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है । इसे करीब एक हजार साल पहले काकतीय शासन के समय बनवाया गया था। करीमनगर के पास ही जैगटियल किला है जिसे यूरोपियन इंजिनियरों ने यूरोप के किलों की तर्ज पर बनाया था। यहां का धुलिकट्टा एक बौद्ध स्थल है जहां सातवाहन काल के स्तूप मिले हैं। करीमनगर चांदी पर की गई बारीक कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है।करीमनगर हैदराबाद से 165 किलोमीटर दूर है।

खम्मम

खम्मम


खम्मम
मुन्नेरू नदी के किनारे बसा है तेलंगाना का खम्मम। खम्मम का किला यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है जिसे काकतीय राजाओं ने 950 ईस्वी में बनवाया था। इस किले में कई राजवंशों के समय का स्थापत्य नजर आता है।खम्मम के पास ही नेलाकोंडापल्ली एक ऐतिहासिक जगह है। यहां मिट्टी की किलेबंद दीवार के साथ तीसरी से चौथी शताब्दी के बौद्ध विहार, स्तूप और भगवान बुद्ध की कांस्य प्रतिमा मिली है। नेलाकोंडापल्ली के पास महाभारतकालीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। खम्मम में कई प्राचीन मंदिर भी देखे जा सकते हैं।खम्मम हैदराबाद से करीब 200 किलोमीटर दूर है।