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Author: dipanshu

भारतीयों के लिए दुबई वीज़ा

भारतीयों के लिए दुबई वीज़ा

काँच और स्टील से बनी ऊँची इमारतें, चमक-दमक से भरे शॉपिंग माॉल्स और घूमने के लिए एक सुरक्षित ठिकाना होने के कारण दुबई दुनिया में सबसे ज्यादा घूमे जाने वाले शहरों की सूची में अगले नंबर पर आता है। दुबई जाने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या भी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। मुझे ये शहर बहुत पसंद है और पिछले कुछ वर्षों में मैं तीन बार यहाँ जा चुका हूँ। मैं दुबई घूमने के अपने अनुभव साझा करूँ उससे पहले इस लेख में दुबई वीज़ा कैसे मिले इस बारे में बता रहा हूँ।

कैसे लें दुबई वीज़ा

दुबई वीज़ा के लिए आवेदन करने से पहले मुझे यही पता था कि दुबई दुनिया के उन कुछ देशों में से है जो भारतीयों को आसानी से वीज़ा देता है। मैंने जब तलाश करने की कोशिश की तो पता चला कि यह बात सही है तो है लेकिन पूरी तरह नहीं। जानने कि कोशिश करते हैं कि ऐसा कैसे हैं।
दरअसल बात यह है कि दुबई के लिए वीज़ा नियम आसान तो हैं लेकिन वे एक जैसे नहीं है। आप पर कैसे नियम लागू होंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहाँ से वीजा के लिए आवेदन कर रहे हैं। आप को आसान ज़रिया भी मिल सकता है और थोड़ा मुश्किल भी। मुश्किल से मेरा मतलब है कि आपको बैंक डिटेल, इनकम टैक्स रिटर्न या अपनी नौकरी से जुड़े दस्तावेज जमा करने पड़ सकते हैं।

संयुक्त अरब अमीरात का भारतीय दूतावास सीधे वीज़ा की सुविधा नहीं देता । दुनिया भर में आधिकारिक रूप से अधिकतर देशों के लिए वीज़ा देने का काम देखने वाली कंपनी VFS भारत में केवल उन्हीं लोगों को दुबई वीज़ा देती है जो दुबई की आधिकारिक एयरलाइन्स एमिरेट्स या फ्लाईदुबई के जरिए यात्रा करते हैं। दूसरे लोगों को एयरलाइन्स या एजेंट्स के ज़रिए वीज़ा लेना होता है।

दुबई या संयुक्त अरब अमीरात के लिए ई-वीज़ा की सुविधा है।आप चाहे किसी भी तरीके से वीज़ा लें, आपको किसी ऑफिस या दूतावास में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बस ईमेल से अपने ज़रूरी दस्तावेज़ भेजने के बाद आपको ई-वीज़ा मिल जाता है।

भारतीयों को निम्नलिखित 4 प्रमुख तरीकों से दुबई का पर्यटन वीज़ा मिल सकता है।

1- वीजा ऑन अराइवल
2- एयरलाइन्स के ज़रिए
3- वीज़ा एजेंट्स के ज़रिए
4- ट्रांजिट वीज़ा ( अभी घोषणा लेकिन लागू नहीं)

अब मैं एक-एक करके सभी तरीकों के बारे में आपको बताऊंगा जिसके आपको अंदाजा हो जाएगा कि आपके लिए कौनसा तरीका आसान रहेगा।

1- वीज़ा ऑन अरावल –
इसका मतलब है दुबई एयरपोर्ट पहुँचने पर आपको आसानी से वीज़ा मिल जाएगा। लेकिन इसमें एक शर्त यह है कि भारतीय पासपोर्ट धारकों के पास पहले से अमेरिका का वैध विजिटर वीज़ा या ग्रीन कार्ड होना चाहिए। इसके साथ ही ब्रिटेन या यूरोपियन यूनियन का रेजिडेंसी वीजा रखने वाले भारतीय भी इस वीज़ा ऑन अराइवल की सुविधा का फायदा उठा सकते है। भले ही यह सबके लिए नहीं लेकिन फिर भी काफी भारतीय इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं।

फीस- इस सुविधा को लेने के लिए आपको 100 दिरहम का शुल्क चुकाना होगा। साथ में 20 दिरहम का सर्विस चार्ज भी देना होगा।

अवधि- एक बार में 14 दिन का वीज़ा लिया जा सकता है। जिसे 250 दिरहम का शुल्क चुकाकर अगले 14 दिन तक बढ़वाया जा सकता है। वीज़ा बढ़वाने की सुविधा एक ही बार मिलेगी।

2- एयरलाइन्स के ज़रिए-
भारत से दुबई जाने वाली लगभग सभी हवाई कंपनियां अपने ग्राहकों के लिए दुबई वीज़ा दिलवाती हैं। इसके लिए आपको संबंधित एयरलाइन की वेबसाइट के जरिए आवेदन करना होता है। वीज़ा फीस चुकाने के बाद आपको ईमेल के जरिए ई-वीज़ा मिल जाता है।
अगर आप दुबई की आधिकारिक एयरलाइन्स , एमिरेट्स या फ्लाई दुबई से यात्रा कर रहे हैं तो फिर VFS के जरिए आप दुबई वीजा के लिए आवेदन कर सकते हैं। VFS केवल एमिरेट्स या फ्लाई दुबई से रिटर्न टिकट खरीदने वालों को वीज़ा सुविधा देता है।
इसके अलावा भारत से जाने वाली दूसरी एयरलाइन्स जैसे एयरइंडिया, इंडिगो, स्पाइस जेट, जेट एयरवेज़, एतिहाद और एयर एरेबिया भी वीज़ा की सुविधा देती हैं। इसके लिए नियम यह है कि आप जिस एयरलाइन के ज़रिए वीज़ा का आवेदन कर रहे हैं आपके पास उस एयरलाइन का रिटर्न टिकट होना चाहिए।

लेकिन यहीं आकर दुबई वीज़ा लेने की दुविधा शुरु होती हैं। एयरलाइन्स के जरिए वीज़ा का आवेदन करने पर आपको अपने बैंक डिटेल के साथ दो साल का आटीआर या फिक्सड डिपोजिट या पैन कार्ड की जानकारी देनी पड़ती है। अलग -अलग एयरलाइन्स के हिसाब से इनमें कुछ अंतर हो सकता है। जब दूसरे आसान उपाय मौजूद हैं जहां बिना किसी तरह की जानकारी दिए दुबई वीज़ा मिल जाता है ( उसका जिक्र आगे ) तो एयरलाइन्स के ज़रिए वीजा लेने में मुश्किल नियम क्यों रखें गए हैं यह समझ नहीं आया।

अगर आप एमिरेट्स या फ्लाई दुबई के टिकट से यात्रा कर रहे हैं तो इतनी आसानी जरूर मिलती है कि अगर आपने आवेदन करने के पिछले पांच वर्ष के भीतर दुबई की यात्रा की है या आपके पास अमेरिका , ब्रिटेन, यूरोप, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा या स्विटज़रलैंड का वैध वीज़ा है तो आपको किसी तरह की बैंक या आटीआर की जानकारी नहीं देनी पड़ती।

दुबई वीज़ा के लिए इतने अलग नियम क्यों रखे हैं यह समझ नही आता? एक देश जो पर्यटन में दुनिया का अगुआ बनने की इच्छा रखता है वहां एक जैसे नियम होना बेहतर रहता है।

3- वीज़ा एजेन्ट्स के ज़रिए —
दुबई का वीज़ा लेने का सबसे आसान ज़रिया हैं वीज़ा एजेंट्स जो बिना किसी परेशानी के आपको वीज़ा दिला देते हैं। बस आप ईमेल से अपना पासपोर्ट और पासपोर्ट साइज फोटो ( सफेद बैंकग्राउन्ड के साथ ) उनको भेज दीजिए और 2-3 दिन में आपको ईमेल पर वीज़ा मिल जाएगा। हालांकि हर एजेन्ट की वीज़ा फीस में अंतर हो सकता है। मुझे अलग- अलग वीज़ा एजेन्ट की फीस में 500 रूपये तक का अंतर मिला। मोटे तौर पर फिलहाल 6000 रूपये में आप दुबई का वीज़ा ले सकते हैं।

एजेन्ट से वीज़ा लेना आसान तो है लेकिन एजेंट्स भी अपने हिसाब से दस्तावेज मांगते हैं। मैने पहले वीज़ा के लिए Musafir से बात की और उन्होंने केवल पासपोर्ट और फ़ोटो ही मांगा। जबकि अकबर ट्रेवल ने पहले तो केवल पासपोर्ट और फ़ोटो देने को कहा लेकिन बाद में मुझसे नौकरी से जुड़ा और पहचान पत्र मांगा। इसलिए आप अपने हिसाब से कुछ एजेन्टस से बात कर लें। मैंने आखिर में travel2dubai से वीज़ा लिया।

4- मुफ्त ट्रांजिट वीज़ा –
मुफ्त ट्रांजिट वीजा के इस नियम की घोषणा हाल ही में की गई है। इसे लागू करने की तारीख़ के बारे में अभी कुछ नहीं कहा गया है। उम्मीद है कि जल्द ही यह नियम लागू हो जाएगा। अगर आप भारत से दुनिया के किसी देश में जा रहे हैं और उस दौरान आपको बीच में दुबई से अपनी फ्लाइट बदलनी है तो आप इस सुविधा का फायदा ले सकते हैं। इसके तहत आपको 48 घंटे के लिए दुबई का मुफ्त ट्रांजिट वीजा एयरपोर्ट पर ही दिया जाएगा । इसके लिए शर्त यह है कि आपको आपके पास आपके पास किसी तीसरे देश में जाने का वैध हवाई टिकट होना चाहिए। ये सुविधा पूरी तरह से मुफ्त हैं। आप चाहें तो इसे 96 घंटे के लिए भी यह वीज़ा ले सकते हैं जिसके लिए आपको 50 दिरहम की फीस चुकानी होगी। अगर आप दुबई के रास्ते कहीं जा रहे हैं तो इस आसान और मुफ्त सुविधा का लाभ उठाकर बहुत कम खर्च में दुबई घूम सकते हैं। क्योंकि ध्यान रखिए दुबई के सामान्य टूरिस्ट वीज़ा के लिए आपको ख़ासी रकम खर्च करनी पड़ती है।

OTB ( Ok to Board) – दुबई वीज़ा से जुड़ी एक जरूरी बात है OTB। ध्यान रखिए कि टूरिस्ट वीज़ा पर दुबई जाने वालों को अब OTB की जरूरत नहीं होती। हां, अगर आपके पासपोर्ट पर ECR स्टैम्प है तो आपको टूरिस्ट वीज़ा लेने पर भी OTB करवाना होगा।

जरूरी बेवसाइट-
दुबई वीज़ा से जुडी आधिकारिक जानकारी के लिए यूएई इमिग्रेशन की वेबसाइट- https://government.ae/en/information-and-services/visa-and-emirates-id
यहाँ सभी जरूरी जानकारियाँ आपको मिल जाएंगी। इसके अलावा सभी एयरलाइन्स की वेबसाइट्स और VFS की बेवसाइट पर भी जानकारी मिल जाएगी।

दुबई वीज़ा के लिए कुछ एजेंट्स – musafir.com, akbartravels.com, travel2dubai.com

कोहका विल्डरनर्स कैंप ( Kohka wilderness camp) – जंगल में बना शांत कोना..

कोहका विल्डरनर्स कैंप ( Kohka wilderness camp) – जंगल में बना शांत कोना..

कोहका विल्डरर्नस कैंप तक पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया था। फरवरी के शुरूआती हफ्ते में हल्की ठंड बनी हुई थी इसलिए गांव के रास्ते में भी कोई खास हलचल दिखाई नहीं दी। पेंच नेशनल पार्क का सफर मेरे लिए खास था क्योंकि पिछले साल में मध्य प्रदेश के दो प्रसिद्ध नेशनल पार्क कान्हा और बांधवगढ़ को देख चुका था और इस साल के सफर की शुरूआत मध्य प्रदेश के ही एक और लोकप्रिय नेशनल पार्क पेंच से होने जा रही थी।

सबसे पहली चीज़ जो कोहका में ध्यान खींचती है वह है यहां की असीम शांति । पेंच के बफर ज़ोन से लगे इस रिजॉर्ट में दूर-दूर तक कोई आवाज नहीं थी। कोहका पहुंचते ही सबसे पहले सौरभ से मुलाकात हुई।
सौरभ ने कुछ साल पहले संजय के साथ मिलकर कोहका रिजॉर्ट की शुरूआत की थी।कहा जाता है कि दुनिया के कुछ बेहतरीन बिजनेस आइडिया यूं ही किसी बातचीत से शुरू हुए हैं। कोहका का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा। सौरभ और संजय दोनों की मुलाकात किसी जंगल के एक सफर के दौरान हुई। वहीं दोनों को किसी जंगल में रिजॉर्ट बनाने का ख्याल आया। एक जैसी सोच के कारण उन्होंने बात को आगे बढ़ाया और पेंच में कोहका की शुरूआत की। इसे शुरू करने के समय सौरभ आयरलैंड के एक लक्जरी होटल में अच्छी नौकरी कर रहे थे और संजय मुंबई में चार्टड अकाउंट थे। लेकिन जंगल का प्यार दोनों को पेंच ले आया।इन्होंने इसे एक ईको-फ्रेंडली रिजॉर्ट के तौर पर विकसित किया। कोहका गावं में बना होने के कारण इसे कोहका नाम दिया गया।

ईको- फ्रेंडली है कोहक

कोहका को एक ईको फ्रेंडली तरीके से बनाने और चलाने की कोशिश की गई है। यहां कुल तीन एकड़ के इलाके में केवल 12 कॉटेज बनाई गई हैं। इसलिए यहां कभी भी आयें भीड़ का अहसास नहीं होगा। रिजॉर्ट को बनाते समय वहां लगे किसी पेड़ को काटा नहीं गया। कुछ जगहों पर निर्माण को पेड़ के हिसाब से ही आकर दिया गया है।

रिजॉर्ट में बिजली की जरूरत को पूरा करने के लिए 7 किलोवॉट का सोलर सिस्टम लगाया है जिससे दिन हो या रात कैंप की ज्यादातर जरूरत पूरी हो जाती है।

कैंप को बनाने में जहां तक हो सके सारा सामान स्थानीय स्तर से ही जुटाने की कोशिश की गई है। यहां बहुतायात से मिलने वाली बांस जैसी चीजों का काफी इस्तेमाल किया गया है। कैंप को सजाने और रोशनी के लिए पुरानी कांच की बोतलों से लैंप बनाए गए हैं तो रास्तों पर रोशनी देने के लिए लगी छोटी एलईडी लाइटों को खुद सौरभ ने कैंप में ही तैयार किया है। यहां तक कि बाथरूम में नहाने का शॉवर भी बांस से ही बनाया गया है।

कमरों में गर्म पानी देने के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाला गीजर लगाया गया है।मैं वहां पांच दिन था । पांच दिनों में से एक दिन सुबह से शाम तक बरसात होती रही और दूसरे दिन भी बादलों में पीछा नहीं छोड़ा लेकिन उसके बाद भी तीसरे दिन इस्तेमाल के लायक गर्म पानी मौजूद था।

जैविक खेती
Organic farming at Kohka

यहां रिजॉर्ट के काफी बड़े हिस्से में जैविक खेती की जाती है। रिजॉर्ट में इस्तेमाल की जाने वाली सब्जियों का बड़ा हिस्सा इस खेती से पूरा किया जाता है। जरूरत पड़ने पर सामान को पास के गांव से ही खरीदा जाता है। इस लिए आप निश्चिंत होकर यहां ऑर्गेनिक खाने का मजा उठा सकते हैं।

कोहका का खाना
कोहका के खाने में भी आपको एक सादगी और अलग सा स्वाद मिलेगा। यह स्वाद कुछ तो यहां की ऑर्गेनिक सब्जियों के कारण है और कुछ उस प्यार के कारण जिससे यहां खाना बनाया जाता है। पहले की दाल, सब्जी और रोटियों का स्वाद जुबान पर थी कि अगली सुबह पोहा, इडली के नाश्ते ने तो रंग ही जमा दिया। अगले चार दिनों तक अलग – अलग तरह की सब्जियां और दालें खायीं। सभी में स्वाद और देसीपन था। एक दिन दोपहर में खासतौर से महाराष्ट्र का खाना बनाया गया जिसमें झुमका, भाकर और पूरन पोली शामिल था। सौरभ से मैंने पूछा कि विदेशी मेहमानों के लिए क्या कॉन्टीनेन्टल खाने की व्यवस्था भी है तो उन्होंने कहा कि वे सभी मेहमानों को भारतीय खाना ही खिलाते हैं और सभी इसे प्यार से खाते हैं।

कोहका के कमरे

कोहका के कॉटेज

यहां कुल 12 कमरे हैं जिन्हें कॉटेज की तरह बनाया गया है। कमरों में आपकी जरूरत का फर्नीचर रखा गया है। बांस के बनीं लैंप से कमरे को सजाया गया है जिन्हें स्थानीय कारीगरों से ही तैयार करवाया गया है।
कमरे में सोने के लिए लकड़ी के पलंग लगाने की बजाए सीमेंट से एक चबूतरा बनाया गया है जिस पर गद्दा लगाया गया है। कमरे में पेंच में पाये जाने वाले जानवरों और पक्षियों की तस्वीरें लगी हैं।


कमरों के बाहर बैठने के लिए बरामदा है जहां रिजॉर्ट की हरियाली और यहां के पक्षियों को देखते हुए समय बिताया जा सकता है।
कमरे में आराम का सारा सामान है और सब कुछ बहुत सरल तरीके से सजाया गया है।

समय बिताने की जगहें


तीन एकड़ के इस रिजॉर्ट काफी पेड़ पौधे हैं और अगर आपको तितलियों और पक्षियों को तलाश करने का शौक है तो यह समय बिताने का सबसे अच्छा जरिया है।
यहां एक लाइब्रेरी और टीवी रूम है जहां काफी किताबें और मासिक पत्रिकाएं रखी गई हैं। खेलने के लिए कैरमबोर्ड और लूडो जैसी चीजें भी हैं। मैंने भी दोस्तों के साथ कैरम बोर्ड पर हाथ आजमाया। कैरम खेलते हुए घंटो कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।

लाइब्रेरी और टीवी रूम

यहां एक बड़ा स्विमिंग पूल भी है। गर्मी के मौसम में यहां आ रहे हैं तो शाम के समय स्विंमिग पूल के ठंड़े पानी में समय बिताया जा सकता है।

क्या क्या कर सकते हैं

पेंच नेशनल पार्क की सफारी तो यहां का मुख्य आकर्षण है लेकिन उसके अलावा भी यहां काफी कुछ किया जा सकता है। कोहका पेंच के बफर ज़ोन से लगा है। यहां पास के जंगल में नेचर वॉक की जा सकती है। पहुंचने के अगले दिन सुबह 6 बजे हम लोग जंगल में नेचर वॉक के लिए निकले। कैंप के नेचर गाईड अनिल हमारे साथ थे। पास के गांव के रहने वाले अनिल को जंगली जानवरों, पेड़ पौधों और पक्षियों की बहुत अच्छी जानकारी है। वे हर चीज की जानकारी देते हुए चलते हैं। भले ही लंबा चलना था लेकिन उनसे बातें करते हुए और जंगल की सुन्दरता को देखते हुए पता ही नहीं चला कि समय कब बीत गया। हमें तो जंगल में एक दहाड़ भी सुनाई दी हालांकि अनिल ने उसे नहीं सुना इसलिए कहा नहीं जा सकता कि वहां बाघ था या नहीं । हमारी नेचर वॉक पास की कोहका झील पर खत्म हुई।

कोहका झील..

कोहका कैंप से कुछ ही दूरी पर कोहका झील है बहुत साल पहले इसे आसपास के इलाके की पानी की जरूरत पूरा करने के लिए बनाया गया था। कोहका से जंगल के रास्ते झील तक जाकर लंबा समय बिता सकते हैं। आज यह झील पक्षियों को देखने की सबसे बढ़िया जगह है। फरवरी का महीना होने का कारण काफी प्रवासी पक्षी भी यहां थे। मैंने यहां दो दिन में करीब 30-35 तरह के पक्षियों को देखा।इस नेचर वॉक में आदिवासी गांव की जिंदगी को भी करीब से देखा जा सकता है।

शाम को कोहका झील पर चाय और पकौडे़ो का साथ..

एक दिन बाद हम शाम को फिर से झील की सैर पर गए और इस बार सैर के साथ कोहका कैंप ने वहां शाम के चाय और नाश्ते का इंतजाम भी किया था। शाम के ढलते सूरज के साथ झील के किनारे चाय पीने का अलग ही मजा है। मन करता है कि वहीं बैठे रहें। शाम की सैर में संजय भी हमारे साथ थे। उन्हें भी फोटोग्राफी और पक्षियों की बढिया जानकारी है। उनसे पता चला कि कैंप से पास ही एक पेड़ पर उड़न गिलहरी (Flying Squirrel) का बसेरा है। अंधेरा होने पर उसे देखने का मौका मिल सकता है। अंधेरे में काफी देर इंतजार करने पर हमें वह दिखाई दे ही गई। घने अंधेरे और उसके तेजी से उड़ने के कारण उसका फोटो ले पाना संभव नहीं हुआ।

कोहका के पास पचधार नाम का गांव है। यह कुम्हारों का गांव है। यहां मिट्टी के बर्तन और दूसरे समान बनाये जाते हैं। यहां जाकर मिट्टी के बर्तन बनाने में हाथ आजमाया जा सकता है। टेरिकोटा का सामान पंसद करते हैं तो यहां की यादगार के तौर पर सजावटी सामान भी खरीद सकते हैं।

जंगल सफारी —
पेंच आने का असली मकसद तो जंगल सफारी ही होता है। यहां कैंप के पास पेंच नेशनल पार्क का तूरिया गेट है। जहां से सुबह और शाम की सफारी की जा सकती है। यह जंगल बाघ के लिए जाना जाता है लेकिन बाघ ना भी मिले तो दूसरे जानवरों और प्रकृति की सुन्दरता का मजा उठाइये। मुझे भी इस बार बाघ नहीं दिखाई दिया। सफारी आप मध्य प्रदेश वन विभाग की वेबसाइट से बुक कर सकते हैं या पहले से रिजॉर्ट के बता दें तो वे भी इसमें मदद कर सकते हैं।

साथी ट्रेवल ब्लागर- अभिनव, मंजूलिका और स्वाति के साथ पेंच सफारी पर

पेंच नेशनल पार्क का एक गेट है खुरसापार। यह गेट पेंच नेशनल पार्क के महाराष्ट्र वाले हिस्से में पड़ता है। यहां के लिए सफारी की जा सकती है।
पेंच नेशनल पार्क दो राज्यों मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर है। इसका इलाका दोनों ही राज्यों में बंटा हुआ है। दोनों ही राज्यों के इलाकों में सफारी उपलब्ध है।

कोहका विल्डरनर्स कैंप एक फाउन्डेशन भी चलाता है। जिसके जरिए पास के आदिवासी गावों की शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए काफी काम किया जाता है। फाउन्डेशन गांव के सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्षा लगाकर उन्हें पढ़ाने और कंप्यूटर शिक्षा देने का काम भी करता है।
कोहका फाउन्डेशन गांव की महिलाओं के साथ मिलकर ऑर्गेनिक उत्पाद जैसे अचार, पापड, जैम,मुरब्बे , साबुन , शैंपू भी बनाता है। कोहका की रसोई और यहां कॉटेज में यहीं के बने सामान, शैंपू और साबुन इस्तेमाल किए जाते हैं।
इस तरह कोहका कैंप पर्यटकों की जरूरतों को पूरा करने के साथ स्थानीय समाज के विकास में भी योगदान करने की कोशिश कर रहा है। कोहका में काम करने वाले सभी लोग भी आसपास के गावों से ही हैं।

कैसे पहुंचे —-

पेंच नेशनल पार्क नागपुर से करीब 90 किलोमीटर दूर है। नागपुर देश के सभी हिस्सों से रेल और हवाई सेवा से जुड़ा है। नागपुर से पेंच के लिए टैक्सी की जा सकती है।

कब जायें —-
भारत में आमतौर पर सभी नेशनल पार्क मानसून के समय जुलाई से सितम्बर के बीच बंद रहते हैं। इसके अलावा किसी भी समय यहां आया जा सकता है। वैसे गर्मी में अप्रेल से जून का समय जंगली जानवरों के देखने के लिए बेहतर माना जाता है। अगर पक्षियों और खासतौर से प्रवासी पक्षियों को देखना चाहते हैं तो सर्दियों के मौसम में यहां आइये।

( This trip was organised by Kohka wilderness camp )

कुछ तस्वीरें….

उत्तराखंड की 10 जगहें जो आपको देखनी चाहिए

उत्तराखंड की 10 जगहें जो आपको देखनी चाहिए

देवभूमि उत्तराखंड का प्राकृतिक सुन्दरता में कोई मुकाबला नहीं है। बर्फ से ढ़के पहाड़े, देवदार के घने जंगल, नदियां और झीलें आपका मन मोह लेते हैं । उत्तराखंड की अनगिनत जगहों में से चुनी हुई 10 जगहें में आपके सामने रख रहा हूँ।

1- जागेश्वर

Source- https://en.wikipedia.org/wiki/Jageshwar_Temples,_Uttarkhand#/media/File:Image_ank.JPG

ऊंचे पहाडों, देवदार के घने जंगलों और जटागंगा नदी के किनारे बसा है उत्तराखंड का जागेश्वर शिव धाम। अलमोड़ा से करीब 35 किलोमीटर दूर घने जंगल में मौजूद जागेश्वर पहुंचते ही असीम शांति का एहसास होता है। जागेश्वर की गणना भगवान शिव के बारह ज्योर्तिलिंगों में की जाती है। यहां 7वीं शताब्दी से 18 वीं शताब्दी के बीच करीब 125 मंदिर बनाए गए हैं ।मान्यता है भगवान शिव के लिंग रूप की पूजा जागेश्वर से ही शुरू हुई। जागेश्वर को ‘कुमाऊँ का काशी’ भी कहा जाता है। जागेश्वर प्राचीन कैलाश मानसरोवर मार्ग पर स्थित है। ये अल्मोड़ा से करीब 35 किलोमीटर दूर है।

2- बिनसर


प्रकृति का अनुछुआ सौंदर्य देखना चाहते हैं तो बिनसर जरूर जाइए। उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पास का बिनसर एक वन्य प्राणी विहार भी है। बांज और बुरांस के जगलों वाले बिनसर में तेंदुए पाए जाते है। जंगल भी इतना घना कि कुछ इलाकों में सूर्य की रोशनी भी शायद ही पहुंचती हो। बिनसर से हिमालय की नंदा देवी, त्रिशुल, पंचाचुली, नंदाकोट, मृगधूनी जैसी बर्फीली चोटियों का 300 किलोमीटर लंबा अद्भुत नजारा दिखाई देता है। आधुनिक सुविधाओं से दूर यहां कुछ दिन बिताने का अनुभव जिंदगी भर नहीं भुलाया जा सकता। बिनसर अल्मोड़ा से करीब 30 किलोमीटर है।

3- रामगढ़

गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर ने यहां रहकर गीतांजली का कुछ हिस्सा लिखा था। हिन्दी कवियित्री महादेवी वर्मा ने भी यहां के शान्त और सुकून भरे माहौल में लेखन किया । उत्तराखंड के रामगढ़ कस्बे का यह इतिहास इसे खास बनाता है। इसके साथ यहां हिमालय की बेजोड़ खूबसूरती को जोड़ दे तो फिर इस जगह का कोई मुकाबला नहीं। समुद्रतल से 1729 मीटर ऊंचाई पर बसे रामगढ़ की आबोहवा फलों की खेती के भी माकूल है। आडू, खुमानी, सेब जैसे फलों के बगीचों की यहां कमी नहीं इसलिए इसे  ‘कुमाऊँ का फलों का कटोरा’ भी कहा जाता है। रामगढ़ नैनीताल से करीब 34 किलोमीटर दूर है।

4- मुक्तेश्वर

उत्तराखंड की सबसे खूबसूरत जगहों में मुक्तेश्वर का नाम लिया जाता है। नैनीताल जिले का यह छोटा का कस्बा कुछ दिन शांति से बिताने वाले पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। 2286 मीटर की ऊंचाई इसके मौसम को खास बनाती है। इस जगह का नाम यहां भगवान शिव के मंदिर के नाम पर पड़ा जिसे मुक्तेश्वर धाम कहा जाता है। 1893 में यहां इडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई जहां आज भी जानवरों से जुडें मामलों पर रिसर्च किया जाता है। मुक्तेश्वर रामगढ़ से 30 किलोमीटर है।
 

5- रानीखेत

रानीखेत को प्रकृति प्रेमियों का स्वर्ग माना जाता है। रानीखेत की खूबसूरती को शब्दों में नहीं उतारा जा सकता इसे यहां आकर ही महसूस किया जा सकता है। अंग्रेजों के समय इसे सैनिक छावनी बनाया गया। सैनिक छावनी होने के कारण इसका रखरखाव देखते ही बनता है। साफ सुथरी सड़कें, देखने के लिए एक प्यारा सा गोल्फकॉर्स , सेना का म्यूजियम, फलों के बगीचे और प्राचीन मंदिर इसे और भी खास बनाते हैं। यहां का चौबटिया फल उद्यान देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

6- शीतलाखेत
जब बस जंगल के बीच रहने का मन करे , आप चाहें कि आस पास घूमते हिरण आपको दिखाई देते रहें, सुबह चिड़ियों के चहचहाने से आपकी नींद खुले और साथ में पहाडी मौसम का आनंद भी मिले तो बस शीतलाखेत चले आएं। रानीखेत के पास बसा यह छोटा सा गांव बस आराम करने के लिए ही है। कुछ करना चाहें तो  करीब तीन किलोमीटर की चढाई करके पहाड़ की चोटी पर बने मंदिर तक जाएं और मंदिर की चोटी से उत्तराखंड के शानदार नजारों का मजा लें। ये रानीखेत से शीतलाखेत करीब 30 किलोमीटर है।
 

7-नैनीताल

एक बड़ी सी झील, उसमें तैरती रंग-बिरंगी नावें, पानी में दिखाई देता शहर का अक्स,   किनारे बनी माल रोड, पुराने चर्च और इमारतें। अंग्रेजी दौर की खनक और आधुनिकता का अजब मेल है नैनीताल। अंग्रेजों ने आराम करने के लिए उत्तराखंड के इस हिल स्टेशन को बसाया था । खास बात यह है कि उस दौर की खूबसूरती को नैनीताल ने आज भी संजो कर रखा है। कहा जाता है मां सती की आंख ( नैन) यहां गिरी थी जिसके आधार पर इसका नाम नैनीताल पड़ा। झील के किनारे नैयना देवी का प्राचीन मंदिर भी है जो 64 शक्तिपीठों में से एक है।  

8-चौकोरी
ऊंचे बर्फीले पहाडों और घनों जगलों से घिरा है उत्तराखंड का छोटा सा कस्बा चौकोरी। यहां से पंचाचूली और नंदा देवी की बर्फ से ढकी चोटियों का अद्भुत दृश्य नजर आता है। ऐसा लगता है कि हम बिल्कुल इन पहाडों के सामने खडे हैं। यह अनजाना कस्बा प्रकृति प्रेमी पर्यटकों के बीच धीर-धीरे लोकप्रिय हो रहा है। चौकोरी समुद्र तल से 2010 मीटर की ऊंचाई पर है। प्रकृति की अनछुई सुन्दरता को करीब से महसूस करने के लिए चौकोरी बढिया जगह है। यह कस्बा नैनीताल से 173 किलोमीटर की दूरी पर है।

9- मुनस्यारी
उत्तराखंड के चीन से लगते जिले पिथौरागढ का खूबसूरत कस्बा है मुनस्यारी। यह इलाका इतना खूबसूरत है कि इसे छोटा कश्मीर भी कहा जाता है। मुनस्यारी रोमांचक खेल और प्राकृतिक सुन्दरता पसंद करने वाले के बेहतरीन है। मुनस्यारी से ऊपरी हिमालय के कई ट्रेकिंग रास्तों की शुरूआत होती है। यहां से मिलन और रालम ग्लेशियर की चढ़ाई शुरू की जाती है। नंदा देवी चोटी की चढाई का आधार भी मुनस्यारी ही है।यहां से भी पंचाचूली, त्रिशूल और नंदा देवी की बर्फीली चोटियों का मनभावन नजारा दिखाई देता है। मुनस्यारी अल्मोड़ा से 200 किलोमीटर दूर है।

10- अल्मोड़ा

उत्तराखंड का प्राचीन और ऐतिहासिक शहर है अल्मोड़ा।1650 मीटर की ऊँचाई पर बसा अल्मोड़ा एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। यह कुमाऊं के चंद राजाओं की राजधानी रहा। अल्मोड़ा को उत्तराखंड का सांस्कृतिक केन्द्र कहा जाता है। यहां के बाजार की पतली सड़कों पर घूमें तो लगता है पुराने समय में आ गये हैं। लकड़ी की बनी छोटी-छोटी दुकानें इस शहर को अनोखा रुप देती हैं। इस शहर के पास कई प्राचीन मंदिर हैं जो देखे जा सकते हैं। अल्मोड़ा की होली भी बहुत लोकप्रिय है। अल्मोड़ा आएं तो यहां कि प्रसिद्ध बाल मिठाई खाना ना भूलें। अल्मोड़ा नैनीताल से 60 किलोमीटर दूर है।

नोट- ये जगहें मेरे ब्लॉग पर पिछले साल के ट्रेवल पोस्टकार्ड सीरीज में शामिल की गई थी।

पटनीटॉप

पटनीटॉप

पटनीटॉप
जम्मू- कश्मीर का बहुत प्रसिद्ध हिल स्टेशन है पटनीटॉप। समुद्रतल से 2024 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस कस्बे में पहुंचते ही देवदार के घने जंगल आपका स्वागत करते हैं। यहां चारों तरफ प्राकृतिक सुन्दरता फैली हुई है। गर्मियों के मौसम में यहां ठंड का अहसास होता है तो सर्दियों में बर्फबारी का मजा लिया जा सकता है। यहां पर ट्रेकिंग के लिए कई रास्ते हैं जिनसे इन पहाडों में घूमा जा सकता है। यहां कई प्राचीन मंदिर भी देख सकते हैं। पटनीटॉप जम्मू से करीब 112 किलोमीटर दूर है।

वेरीनाग

वेरीनाग

वेरीनाग
कश्मीर घाटी की लोकप्रिय और खूबसूरत जगह है वेरीनाग। कश्मीरी भाषा में नाग का मतलब होता है पानी का स्रोत। वेरीनाग को ही झेलम नदी का मुख्य स्रोत माना जाता है। यहां बादशाह जहांगीर ने इस झरने के चारों तरफ अष्टकोणीय तालाब बनवाया। बाद में शाहजहां के समय यहां मुगल बगीचा बनवाया गया। कहा जाता है कि यहां का साफ नीला पानी कभी नहीं सूखता। श्रीनगर से जम्मू जाने वाले रास्ते पर वेरीनाग देखा जा सकता है।यह श्रीनगर से 78 किलोमीटर दूर है।

ट्यूलिप गार्डन

ट्यूलिप गार्डन

ट्यूलिप गार्डन
ट्यूलिप शब्द सुनते ही हालैंड का नाम दिमाग आता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन कश्मीर के श्रीनगर में है। डल झील के पास बने इस बगीचे में दूर-दूर तक रंगबिरंगे ट्यूलिप खिले नजर आते हैं। बगीचे के पीछे ऊंचे पहाड़ इसको और भी खूबसूरत बना देते हैं। यहां करीब 60 तरह के ट्यूलिप देखे जा सकते हैं। ट्यूलिप साल में केवल कुछ दिनों के लिए अप्रेल के आस पास ही खिलते हैं। श्रीनगर में होने वाला वार्षिक ट्यूलिप उत्सव अब यहां की पहचान बन चुका है।

नगिन झील

नगिन झील


नगिन झील
श्रीनगर का एक खूबसूरत हिस्सा है नगिन झील। चारों तरफ से चिनार और विलो के पेड़ों से घिरी साफ पानी की यह झील बहुत शांत और सुरम्य है। डल झील की तुलना में छोटी मगर भीड़ से दूर इस झील में आकर शांति का एहसास होता है। नगिन झील में काफी शानदार हाउस बोट हैं जहां रहा जा सकता है।यह झील एक छोटे से रास्ते से जरिए डल झील से जुड़ी है।नगिन से लेकर डल झील तक बोटिंग करने का अलग ही मजा है। नगिन डल झील से करीब 6 किलोमीटर दूर है।

युसमर्ग

युसमर्ग


युसमर्ग
कश्मीर घाटी के बड़गाम जिले में है खूबसूरत युसमर्ग। कश्मीरी में मर्ग का मतलब होता है घास का मैदान। युसमर्ग में जहां तक देखो हरी घास के मैदान नजर आते हैं। मैदानों का साथ देते हैं चीड़ के पेड़ और उन पेड़ों के पीछे से दिखाई देती हैं हिमालय की बर्फ से ढ़की चोटियां। यहां दूर-दूर तक टहलने का मजा लिया जा सकता है। युसमर्ग से एक नदी बहती है जिसे दूधगंगा कहा जाता है। युसमर्ग के पास ही निलनाग झील भी देखी जा सकती है। युसमर्ग श्रीनगर से करीब 50 किलोमीटर दूर है।

दूधपत्री

दूधपत्री

दूधपत्री
कश्मीर घाटी में पीर-पंजाल की पहाड़ियों पर 2700 मीटर की ऊंचाई पर है दूधपत्री। दूधपत्री एक अनजानी सी खूबसूरत जगह है।यहां के दूर-दूर तक फैले हरे घास के मैदान पहली ही नजर में मन मोह लेते हैं। ऐसा लगता है जैसे मखमली गलीचा बिछा हो। दूधपत्री के पास ही एक नदी बहती है। दूर से देखने से इसका साफ पानी दूध जैसा सफेद नजर आता है। घने देवदार के जंगल के बहती यह नदी बहुत सुन्दर नजर आती है। दूधपत्री श्रीनगर से करीब 40 किलोमीटर दूर है।

बेतला राष्ट्रीय उद्यान

बेतला राष्ट्रीय उद्यान

बेतला राष्ट्रीय उद्यान
देश के पहले नौ टाईगर रिजर्व में से एक है झारखंड का बेतला राष्ट्रीय उद्यान। इसे 1974 में टाईगर रिजर्व में शामिल किया गया था। यहां बाघ और हाथी समेत बहुत तरह के जानवर देखे जा सकते हैं। यहां गर्म पानी के स्रोत और झरने भी हैं। इसी जगंल में ऐतिहासिक पलामू किला भी है। यह किला झारखंड की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। इसे 16वीं सदी में चेरो राज्य के मेदिनी राय ने बनवाया था। इस किले पर पास एक अधबना किला भी है। बेतला राष्ट्रीय उद्यान रांची से 156 किलोमीटर दूर है।