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Author: dipanshu

शेख़ ज़ायद मस्जिद, अबू धाबी

शेख़ ज़ायद मस्जिद, अबू धाबी

संयुक्त अरब अमीरात(UAE) की राजधानी है अबू धाबी। संयुक्त अरब अमीरात सात अमीरातों से मिल कर बना है और अबू धाबी उनमें सबसे महत्वपूर्ण अमीरात है। आमतौर से संयुक्त अरब अमीरात में घूमने के लिए दुबई सबसे लोकप्रिय जगह है। लेकिन दुबई के पास के दूसरे शहरों जैसे शारजाह और अबू धाबी में भी देखने के लिए काफी कुछ है। मेरी दुबई यात्रा के दौरान मैंने एक-एक दिन इन दोनों शहरों के लिए रखा था। आज बात करते हैं अबू धाबी की। अबू धाबी दुबई से करीब 150 किलोमीटर दूर है। अबू धाबी सबसे अमीर अमीरात है लेकिन फिर भी दुबई के मुकाबले यहां हर तरफ सादगी दिखाई देती है। यहां पर्यटकों की वैसी भीड़ नहीं नज़र आती है जैसी आप दुबई में देखते हैं। लेकिन अब अबू धाबी भी बदल रहा है। यहां बनी शेख़ ज़ायद मस्जिद को देखने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं। इसके साथ ही यहां पास के यास आइलैंड पर बना एडवेंचर पार्क फरारी वर्ल्ड भी लोगों को आकर्षित कर रहा है। फ़रारी वर्ल्ड में F1 रेसिंग ट्रेक भी देखा जा सकता है। हाल ही में अबू धाबी में पेरिस का प्रसिद्ध लूवर म्यूज़ियम भी खुला है। हालांकि मैं बस यहां की विशाल शेख़ ज़ायद मस्जिद देखना चाहता था। यह दुनिया की कुछ सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। मुझे केवल मस्जिद ही देखनी थी इसलिए एक दिन का समय काफी था।

दुबई से अबू धाबी कैसे जाएं

दुबई से आबुधाबी की लक्जरी बस

आबू धाबी पहुंचने के लिए मैंने दुबई की पब्लिक बस को चुना। दुबई से अबू धाबी जाने के लिए बस सबसे सही और सस्ता साधन है। दुबई के अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन से आबुधाबी सेंट्रल बस स्टेशन के लिए सीधी बस मिलती है। आबूधाबी के लिए अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) से बस नंबर E100 और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन बस नंबर E101 मिलेगी। एक तरफ का किराया 25 दिरहम है। इन एयरकंडीशन आरामदायक बसों में आपको सफर का पता भी नहीं चलता। टिकट के लिए इन बसों में आपको Nol सिल्वर कार्ड लेना होगा। सिल्वर कार्ड 25 दिरहम का आता है जिसमें 19 दिरहम का ट्रैवल क्रेडिट मिलता है। ये बस हर बीस मिनट में अबू धाबी के लिए निकलती हैं। करीब दो घंटे में आप अबू धाबी पहुंच जाते हैं।

अबू धाबी बस स्टेशन से शेख जायद मस्जिद

अबू धाबी सेन्ट्रल बस स्टेशन

अबू धाबी सेन्ट्रल बस स्टेशन वेटिंग एरिया

बस से आप अबू धाबी के सेंट्रल बस स्टेशन पर पहुंचते हैं। इस बस स्टेशन के अंदर या ठीक बाहर बने स्टॉप से आपको अबू धाबी की बहुत सी जगहों पर जाने के लिए सिटी बस मिल जाएगी। अबू धाबी का बस स्टेशन साधारण सा है। बस स्टेशन में बड़ा सा हॉल है जहां वेटिंग एरिया , खाने-पीने की कुछ दुकानें और पूछताछ काउंटर बने हैं। मैंने पहले यहां कुछ खाया। मुझे यहां के अबू धाबी की शेख़ ज़ायद मस्जिद जाना था इसलिए मैंने पूछताछ काउंटर से वहां जाने वाली बस के बारे में पता किया। मुझे पता चला कि 54 नंबर की बस मुझे सीधे मस्जिद तक पहुंचा देगी। हालांकि पूछताछ पर बैठे व्यक्ति ने मुझे बस कहां से मिलेगी इसकी गलत जानकारी दी। बस स्टेशन के अंदर बहुत से प्लेटफार्म बने हैं जहां से सिटी बसें चलती हैं। लेकिन मेरी बस अंदर से नहीं बल्कि सड़क पर बने बस स्टॉप से मिलनी थी। कुछ देर इधर-उधर से पता करने पर मुझे पता चला की बस स्टेशन से बाहर निकल कर सड़क पर जाना होगा जहां से मुझे बस लेनी होगी।

बस रूट के बारे में बस स्टॉप पर दी गई जानकारी

टिकट वेंडिंग मशीन

बस का टिकट लेने के लिए बस स्टेशन पर वेंडिंग मशीन लगी थी। वहां टिकट के लिए कोई काउंटर नहीं था। बस वेंडिग मशीन में अपना आखिरी स्टेशन लिखिए, पैसे डालिए और आपका टिकट आपको मिल जाएगा। वेंडिग मशीन अगर इस्तेमाल ना कर पाएं तो कोई बात नहीं वहां खड़े गार्ड इसमें आपकी मदद कर देंगे। खैर टिकट लेकर मैं सड़क पर पहुंचा और वहां अपनी बस का इंतजार करने लगा। कुछ देर में बस आई उसका नंबर देख में बस में चढ़ गया। बस में कोई कंडेक्टर नहीं होता। आप पीछे के दरवाजे से बस के अंदर जाते हैं। दरवाजे के बाहर एक बटन लगा होता है उसे दबाने पर दरवाजा खुल जाता है। अंदर जाने पर आप दरवाजे के पास लगी मशीन पर अपनी टिकट छुआते हैं जिससे आपकी यात्रा दर्ज हो जाती है।

बस स्टॉप से दिखाई देती मस्जिद

पर्यटकों के लिए गोल्फ कार्ट

करीब 40-45 मिनट के सफर के बाद बस ने मुझे मस्जिद के पिछले गेट से कुछ दूरी पर उतारा। यहीं के मस्जिद की ख़ूबसूरती नज़र आने लगी थी। दोपहर का समय था इसलिए गर्मी बहुत थी। जहां उतरा वहां से गेट से होते हुए मस्जिद तक की दूरी काफी थी और तेज़ गर्मी में चलना मुश्किल लग रहा था लेकिन तभी मैंने देखा की गेट का पास एक गोल्फ कार्ट खड़ी थी। उसका ड्राइवर देखते ही समझ गया कि मैं मस्जिद देखने आया हूँ। उसने बैठने का इशारा किया। मैंने पूछा तो पता चला कि यह गोल्फ कार्ड गेट से मस्जिद के अंदर तक ले जाने के लिए चलाई जा रही है । इस सेवा के लिए कोई पैसा नहीं देना होता। मेरे पीछे कुछ दूसरे लोग भी मस्जिद की तरफ आ रहे थे। ड्राइवर ने उनको प्यार से बोला कि अगर वे पैदल ना चलना चाहें तो वे बस 5 मिनट इंतजार करें वह उनको लेने वापस आ रहा है। पांच मिनट में उसने मुझे मस्जिद के बाहर पहुंचा दिया। वहां सुरक्षा जांच के बाद आप मस्जिद में जा सकते हैं।

शेख़ ज़ायद मस्जिद

सुरक्षा जांच से निकलते ही दिखाई देती मस्जिद

मस्जिद के अहाते के आगे का मुख्य दरवाज़ा

सुरक्षा जांच से बाहर निकलते ही आपको पूरी मस्जिद दिखाई देती है। यहां से आप पूरी मस्जिद को कैमरे में कैद कर सकते हैं। सफेद संगमरमर से बनी मस्जिद दिन की रोशनी में बहुत खूबसूरत दिखाई देती है। मैंने कुछ फ़ोटो लिए और आगे बढ़ गया। पैदल रास्ते से होते हुए मस्जिद के मुख्य बरामद तक पहुंच सकते हैं। पैदल ना चलना चाहें तो यहां भी गोल्फ कार्ट की सुविधा उपलब्ध है। मुख्य बरामदे के बाहर पानी से भरे तालाब बने हैं जो ख़ूबसूरत लगने के साथ यहां की गर्मी में ठंडक देने का काम भी करते है। मुख्य बरामदा बहुत विशाल है और इसमें बने गुम्बज में शानदार कारीगरी की गई है। बरामदे से मस्जिद का विशाल अहाता दिखाई देता है। नमाज के समय भीड़ ज्यादा होने पर लोग यहां से भी नमाज पढ़ते हैं। अहाता इतना विशाल है कि इसमें 31000 लोग एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं। इसके फर्श को रंग बिरंगे संगमरमर से बने डिज़ाइनों से सजाया गया है। मस्जिद के अहाते से ही 4 बड़ी मीनारें दिखाई देती हैं। हर मीनार 106 मीटर ऊंची है। इस मस्जिद को बनाने में दुनिया भर की सभी प्रमुख इस्लामी वास्तुकला के डिज़ाइनों का प्रयोग किया गया है।

मुख्य अहाता और फ़र्श पर की गई कारीगरी

मस्जिद के बारे में बताने के लिए यहां फ्री गाइडेड टूर चलाए जाते हैं। मैं शुक्रवार को वहां पहुंचा था। शुक्रवार को दिन में मस्जिद पर्यटकों के लिए बंद रहती है और शाम 4.30 बजे के बाद ही पर्यटक अंदर जा सकते हैं। यहां बरामदे में एक बोर्ड लगा है जिस पर गाइडेड टूर से जुड़ी जानकारी लिखी गई है। अगर आप गाइडिड टूर का हिस्सा बनना चाहते हैं तो उस बोर्ड के पास खड़े हो जाएं। बोर्ड में लिख समय पर गाइड वहां पहुंच जाएंगें। शुक्रवार का पहला टूर शाम पांच बजे से था। ठीक पांच बजे कुछ गाइड वहां आए और मेरा टूर शुरू हुआ। गाइड मस्जिद के बनने की कहानी बताना शुरू करते हैं। गलियारे में आगे बढ़ते हुए वहां बनी की गई कलाकारी के बारे में बताते हैं। इस मस्जिद को बनाने में इटली, भारत, ग्रीस, ईरान, मौरक्को, चीन, ब्रिटेन, जैसे बहुत से देशों की चीजों का इस्तेमाल किया गया है। मस्जिद को पूरा बनने में करीब 11साल का समय लगा। मस्जिद को बनाने में भारत के संगरमर का भी इस्तेमाल किया गया है। गाइड एक-एक कर सभी चीजों की जानकारी देता है। आप उससे प्रश्न भी पूछ सकते हैं।

गलियारे के खंभें

खंभों पर “पीट्रा ड्यूरा” का काम

मस्जिद के गलियारे में संगमरमर के खंभे लगे हैं। इन खंभों को कीमती और अर्ध-कीमती पत्थरों जैसे लाजवर्त (lapis lazuli), लाल गोमेद ( red Agate), ऐमेथिस्ट (amethyst) से सजाया गया है। इन खंभों का डिज़ाइन अरब में बहुतायत से पाए जाने वाले ख़जूर के पेड़ों से लिया गया है। इसके गलियारों में कुल 1096 खंभे बनाए गए हैं। कीमती पत्थरों से खंभों को सजाने के लिए “पीट्रा ड्यूरा” का इस्तेमाल किया गया है।

Trivia – “पीट्रा ड्यूरा” पत्थरों में कीमती पत्थरों को जड़ने की कला है। इटली में जन्मी इस कला का इस्तेमाल ताजमहल को सजाने में भी किया गया है।

गुम्बज पर लिखी कुरान की आयतें

गलियारे के गुम्बजों पर कुरान की आयतें लिखी गई है। इन्हें लिखने के लिए कैलिग्राफी का इस्तेमाल किया गया है। कैलिग्राफी को हिन्दी में सुलेखन कहा जाता है। यहां गुम्बजों पर कैलिग्राफी की कई शैलियों को देखा जा सकता है। पूरी मस्जिद में कुल 82 गुम्बज बने हैं। मुख्य हॉल के बीच बना गुम्बज सबसे विशाल है।

Trivia- कैलिग्राफी की शुरुआत पश्चिम एशिया में ही हुई थी। यहां हाथ से कुरान लिखने के लिए इस कला का विकास किया गया।

मुख्य पूजा हॉल में टंगे झाड़ फ़ानूस

मस्जिद के मुख्य पूजा हॉल की बहुत की विशेषताएं हैं। यहां की छत पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा झाड़ फ़ानूस टंगा है। स्वरोस्की क्रिस्टल से बने इन झाड़ फ़ानूसों की ख़ूबसूरती देखते ही बनती है। मस्जिद में कुल 7 झाड़ फ़ानूस लगाए गए हैं। सबसे बड़े फ़ानूस का वजन 12 टन है। फ़ानूसों में 40 किलो शुद्ध सोने का इस्तेमाल किया गया है। मुख्य हॉल में दुनिया का सबसे बड़ा हाथ से बना गलीचा बिछाया गया है। 1200 कारीगरों ने दो साल की मेहनत से इसे तैयार किया है।

मुख्य पूजा हॉल

गाइड टूर की एक ख़ासियत है कि आप यहां के गाइड से इस्लाम से जुड़ा कोई भी सवाल कर सकते हैं। वे खुले दिल से आपके सवालों के जवाब देते हैं। मैं दूसरी बार यह मस्जिद देख रहा था। जब मैं पिछली साल यहां आया था तो गाइड एक महिला थीं। टूर के दौरान उन्होंने कहा था नमाज ध्यान और योग का मिश्रण है। मैंने उनसे पूछा कि आप क्या कह रही हैं- उन्होंने बात दोहराई कि मैं सही कह रही हूँ, नमाज, ध्यान और योग का मेल ही है। तब मैंने उन्हें कहा था कि काश आपकी यह बात भारत तक भी पहुंचती।

रोशनी से नहाई मस्जिद

मस्जिद देख कर बाहर आने तक शाम होने लगी थी। मैने आने का यह समय जानबूझ कर चुना था ताकि लौटते समय अंधेरा हो जाए और कृत्रिम रोशनी में मस्जिद को देखा जा सके। सैंकड़ों बल्बों की रोशनी में नहाई मस्जिद बहुत शानदार दिखाई देती है। यहां आने के लिए ऐसा समय चुनें की शाम की रोशनी का अांनद ले सकें। मस्जिद पर की जाने वाले रोशनी की ख़ासियत यह है कि इसकी रोशनी चांद की रोशनी के हिसाब से घटती-बढ़ती है। इसलिए हर दिन इसकी रोशनी में फर्क दिखाई देता है। चांद के बढ़ने के साथ ही यहां के गुम्बजों पर रोशनी भी बढ़ती चली जाती है।

पर्यटकों के लिए मस्जिद खुलने का समय –
शनिवार से गुरूवार- सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक
शुक्रवार – शाम 4.30 से रात 10 बजे तक

गाइडेड टूर का समय –
रविवार से गुरूवार- सुबह 10, 11 और शाम 5 बजे
शुक्रवार – शाम 5 और 7 बजे
शनिवार- सुबह 10, 11, दोपहर 2, शाम 5 और 7 बजे

– ध्यान रखें कि रमज़ान के महीने में पर्यटकों के लिए मस्जिद खुलने का समय बदल जाता है। रमज़ान में शुक्रवार के दिन मस्जिद पर्यटकों के लिए बंद रहती है। बाकि के दिनों में सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच पर्यटकों के लिए खोली जाती है। गाईड टूर केवल सुबह 10 और 11 बजे किए जा सकते हैं।

दुबई म्यूज़ियम

दुबई म्यूज़ियम

किसी शहर को जानना समझना चाहते हैं तो उसके इतिहास को समझना भी बहुत ज़रूरी है। इतिहास को जानने के लिए म्यूज़ियम एक सही जगह है। दुबई शहर में भी ऐसा ही म्यूज़ियम है जिसे दुबई म्यू़ज़ियम कहा जाता है। कुछ दशकों पहले तक दुबई मछुआरों, घूमंतू कबीलों और समुद्री किनारे के व्यापार करने की छोटी सी बस्ती हुआ करती थी। लेकिन पिछले 100 वर्षों में दुबई ने तरक्की की नई ऊंचाईयों को छुआ है। रेत से सोना बनाने की दुबई की इस कहानी को समझना चाहते हैं तो आपको दुबई म्यूज़ियम आना होगा।

दुबई म्यूज़ियम

दुबई की सबसे पुरानी बस्ती अल-फ़हीदी इलाके में यह म्यूज़ियम बना है। इसे 200 साल से भी ज़्यादा पुराने अल-फ़हीदी किले में बनाया गया है।यह किला इस इलाके की सबसे पुरानी इमारत है। दुबई खाड़ी के किनारे बना यह छोटा सा किला दुबई की रक्षा के लिए बनाया गया था। यहां का राजपरिवार भी इसी किले में रहा करता था। बाद में दुबई के शहर के विकिसित होने के बाद किले को संरक्षित करके म्यूज़ियम में बदल दिया गया। यहां किले के साथ दुबई के इतिहास को भी संजोया गया है। यहां यह जानकर ताज्जुब होगा कि दुबई के रेगिस्तान में मानव की 5000 हजार साल पुरानी बस्तियां भी मिली हैं। यानि दुबई शहर भले ही नया हो लेकिन यहां कि सभ्यता बहुत पुरानी है।

म्यूज़ियम में जाने के लिए 3 दिरहम का टिकट लगता है। म्यूज़ियम दो हिस्सों में बना है। एक हिस्सा जमीन के ऊपर है । किला छोटा होने के कारण शायद ऊपर इतनी जगह नहीं थी दुबई के पूरे इतिहास को दिखाया जा सके इसलिए बाद में किले की ज़मीन के नीचे म्यूज़ियम के दूसरे हिस्से को बनाया गया। किले के नीचे वाले हिस्सों में पिछले कुछ सौ सालो में दुबई में हुए विकास को विस्तार से समझाया गया है।

ऊपर वाले हिस्से की बात करें तो जैसे ही दुबई म्यूज़ियम के मुख्य दरवाजे के अंदर आते हैं आपको टिकट काउंटर मिलता है। टिकट लेने का बाद आप चौकोर अहाते में पहुंचते हैं। यह अहाता चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा है। दीवार के साथ ही दो तरफ लंबे कमरे बने हैं जो शायद रहने के काम आते होंगे। दीवार के तीन कोनों पर तीन बुर्ज़ बने हैं जो सुरक्षा के काम आते होंगे। देखने में किला बहुत छोटा है। अगर भारत के किलों से तुलना करें तो इसे एक तरह की सुरक्षा चौकी कहा जा सकता है। लेकिन 300 साल पुराने छोटे से दुबई के लिए यह काफी कहा जा सकता है। अहाते में दुबई में रहने के पुराने तरीके को दिखाया गया है। यहां घर मुख्यत खजूर की पत्तियों और तने के इस्तेमाल से ही बनाया जाते थे। ये घर गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते थे। इन घरों में एक मीनार भी बनी होती थी जिसे बरजील कहते थे। यह मीनार गर्मियों में घरों को ठंडा रखने का काम करती थी। बरजील के बारे में जानने के लिए मेरा पुराना लेख- अल-फ़हीदी -दुबई का झांकता इतिहास पढ़ सकते हैं। इसके अलावा अहाते में लकड़ी की नावों को रखा गया था। ये छोटी नावें ही पुराने जमाने में समुद्र में जाने के काम आती थी।

खजूर की पत्तियों से बने पारंपरिक घर

साथ ही ऊपर के कमरों में यहां इस्तेमाल होने वाले संगीत के वाद्ययंत्रों और हथियारों को भी दिखाया गया है। यहां दुबई के कुछ मॉडल रखे गए हैं जिन्हें देख कर पता चलता है कि 200 या 300 साल पहले दुबई कैसा रहा होगा।

सन् 1822 का दुबई

दूसरा हिस्सा ज़मीन के नीचे बना है।यहां दुबई के इतिहास को विस्तार से समझायाा गया है। इसे देखकर पता चलता है कि दुबई की तरक्की में केवल तेल का ही योगदान नहीं है बल्कि तेल की ख़ोज होने से काफी पहले 19 वीं शताब्दी के आखिरी वर्षो में ही दुबई ने व्यापार को बढ़ाने के लिए नीतियां बनानी शुरू कर दी थी। 1894 में ही यहां विदेशी व्यापारियों को टैक्स में रियायत दी जाने लगी थी। लगभग इसी समय दुबई खाड़ी के दोनों किनारों पर बर और देरा इलाके का विकास भी शुरू हो गया था। 1908 में देरा में 350 और बर दुबई के इलाके में 50 दुकाने बन चुकी थी। इस दुकानों में व्यापरी भारतीय मसालों, कपड़ों और सोने की बिक्री किया करते थे। देरा और बर के इन बाज़ारों को आज भी देखा जा सकता है।


दुबई के पास हत्ता में 5000 साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इसके बाद के वर्षों में भी दुबई के इलाके में हमेशा लोगों के रहने के अवेशष मिले हैं। हत्ता से मिली चीज़ों को भी इस म्यूज़ियम में दिखाया गया है। दुबई में मिले कुछ अवशेष तो यहां की सभ्यता को करीब 7000 साल पीछे ले जाते हैं। सब देखने के बाद म्यूज़ियम में बनी दुकान से आप दुबई से जुड़ी चीजों की खरीदारी करते हुए यहां से बाहर निकल सकते हैं।


इस म्यूज़ियम ने दुबई को लेकर मेरी समझ को काफी बढ़ाया। म्यूज़ियम जैसी जगहों का काम भी यही होता है वे आपको कुछ ऐसा दिखाते हैं जो या तो आपको पता नहीं होता या जो आपको कभी बताया नहीं जाता।

दुबई ट्रैवल गाइड

दुबई ट्रैवल गाइड

अपनी चमक-दमक से दुबई सबको लुभाता है। पिछले कुछ वर्षों में दुबई ने खुद को दुनिया के ट्रैवल नक्शे पर मज़बूती से जमा लिया है। दुनिया भर से लोग यहां घूमने के लिए आते हैं। विदेश घूमने की इच्छा रखने वाले भारतीयों के लिए भी दुबई सही ठिकाना है। दुबई में घूमने से जुड़ी ज़रूरी जानकारी को मैंने इस लेख में समेटने की कोशिश की है।

दुबई वीज़ा-
विदेश जाने के लिए सबसे पहली ज़रूरत होती है उस देश का वीज़ा लेना। बिना वीज़ा के आप किसी दूसरे देश में नहीं जा सकते हैं। भारतीय पार्सपोर्ट रखने वालों के लिए दुबई वीज़ा के नियम आसान हैं। भारत में दुबई का वीज़ा दो तरह से लिया जा सकता है।
1- एयरलाइन्स के ज़रिए- जिस एयरलाइन्स से आप भारत से दुबई जाने का टिकट बुक करते हैं उन्हीं से आपको वीज़ा भी मिल जाएगा। इनके ज़रिए वीजा लेने के लिए कुछ ज़्यादा दस्तावेज़ जमा कराने पड़ते हैं। जैसे की बैंक डिटेल, पिछले 2 साल का आटीआर और फिक्सड डिपोजिट की जानकारी आदि।
2- ट्रैवल एजेंट्स के ज़रिए- इनसे वीज़ा लेना आसान है। आमतौर पर पासपोर्ट की कॉपी और फ़ोटो देने से ही वीज़ा मिल जाता है।
दुबई वीज़ा की ज़्यादा जानकारी के लिए दुबई वीज़ा पर लिखा मेरा पुराना ब्लॉग- भारतीयों के लिए दुबई वीज़ा पढ़ सकते हैं।

कैसे जाएं-
भारत से बहुत सी फुल सर्विस और लो-कॉस्ट एयरलाइन्स दुबई के लिए उड़ान भरती हैं। इनमें एमिरेट्स, एयरइंडिया, जेट एयरवेज़ जैसे फुल सर्विस और फ्लाईदुबई, स्पाइसजेट, इंडिको, एयरइंडिया एक्सप्रेस जैसी लो-कॉस्ट एयरलाइन्स शामिल हैं। अमूमन एयरलाइन्स के हिसाब से 12000 से लेकर 20000 रूपये के बीच भारत के अलग-अलग शहरों से आपको दुबई का रिटर्न टिकट मिल जाता है।
इसके अलावा एयरअरेबिया और एतिहाद जैसी एयरलाइन्स भी हैं जिनसे दुबई के पास के शहरों जैसे शारजहा और अबुधाबी तक पहुंचा जा सकता है। वहां से फिर टैक्सी या बस लेकर आप आसानी से दुबई आ सकते हैं।

अब भारत के कई छोटे शहरों से भी दुबई जाने के लिए सीधी उड़ान मिल जाती है। अपने पास के इंटरनेशनल एयपोर्ट के दुबई के लिए उड़ान की जानकारी ले लें।

होटल-
दुबई दुनिया का जाना-माना पर्यटन स्थल है। इसलिए यहां हर बजट के लोगों के लिए रहने के ठिकाने मिल जाते हैं। यहां दुनिया के सबसे मंहगे होटलों से लेकर डोरमैट्री तक सब कुछ उपलब्ध है। जहां एक मंहगे होटल में आपको कुछ लाख रूपये एक दिन के चुकाने पड़ सकते हैं वहीं डोरमैट्री में आपको 1000-1500 रूपये के बीच सोने के लिए बिस्तर मिल सकता है। आप कैसा होटल चुनना चाहते हैं ये आपको बजट पर निर्भर करता है। वैसे 3000-4000 रूपये प्रतिदिन के बजट में आपको एक अच्छा साफ सुथरा होटल दुबई में मिल सकता है। दुबई में घूमने की अधिकतर जगहें मैट्रो लाइन के आस-पास हैं इसलिए अगर कम बजट में घूमने की इच्छा रखते हैं तो कोशिश करें कि आपका होटल मैट्रो लाइन से पास हो।
बर दुबई ( Bur Dubai) या देरा ( Deria) का इलाका रूकने के लिए एक अच्छा विकल्प है। यहां आपको पांच सितारा से लेकर सस्ते तक हर तरह के होटल मिल जाते हैं और साथ ही ये दोनों इलाके मैट्रो लाइन से भी जुड़े हैं। अगर देरा या बर में आपका होटल काफी सस्ता है तो इस बात का पता कर लें कि कहीं होटल में कोई डांस एरिया तो नहीं है। अक्सर इस तरह के होटल सस्ते मिल जाते हैं । इन होटलों में देर रात तक लोगों का आना जाना और शोर शराबा बना रहता है। अगर आपका कमरा होटल की निचली मंजिल पर हो तो परेशानी हो सकती है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट –

बाहर से दुबई का एक मैट्रो स्टेशन

दुबई में घूमने का सबसे बढ़िया और आसान तरीका है दुबई मैट्रो। मैट्रो लाइन को इस तरह से बनाया गया है कि यह दुबई में घूमने वाली सभी जगहों के आस-पास से निकलती है। अगर जगह कुछ दूरी पर भी है तो उसके नज़दीकी मैट्रो स्टेशन से टैक्सी या लोकल बस ली जा सकती है। दुबई में दो मैट्रो लाइन हैं। इन्हें रेड और ग्रीन लाइन कहा जाता है। रेड लाइन रशिदिया से यूएई एक्सचेंज के बीच चलती है। ग्रीन लाइन एतिसलात से क्रीक स्टेशन के बीच चलती है। दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट रेड लाइन पर पड़ता है। एयरपोर्ट के टर्मिनल 1 और 3 मैट्रो लाइन से जुड़े हैं। अगर आप टर्मिनल 2 पर हैं तो वहां से टर्मिनल 1 या 3 के मैट्रो स्टेशन के लिए बस या टैक्सी ले सकते हैं। हर मैट्रो रेल में चार डिब्बे हैं जिसमें पहले डिब्बे का आधा हिस्सा गोल्ड क्लास और आधा हिस्सा महिलाओं और बच्चों के लिए आरक्षित है।
इसके अलावा दुबई में पब्लिक बस, ट्राम, टैक्सी और वॉटर बस से भी सफर किया जा सकता है। दुबई की रीजनल ट्रांसपोर्ट अथोरिटी इस सभी पब्लिक ट्रांसपोर्ट को चलाती है।

आपकी यात्रा का किराया इस बात से निर्धारित होता है कि आपने उस यात्रा के दौरान कितने ज़ोन पार किए हैं। दरअसल दुबई को यात्रा के हिसाब से कुल 7 ज़ोन में बांटा गया है। एक ही ज़ोन के भीतर यात्रा करने पर किराया कम है और जैसे ही आप दूसरे ज़ोन में जाते हैं किराया बढ़ जाता है।

यहां की मैट्रो,बसों, ट्राम में टिकट नहीं होता बल्कि इसके लिए आपको nol card का इस्तेमाल करना होता है। ये कार्ड आप कुछ मैट्रो स्टेशनों, बस स्टेशनों या वेंडिंग मशीन से खरीद सकते हैं।

दुबई के पब्लिक ट्रांसपोर्ट की पूरी जानकारी के लिए मेरा लेख- पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दुबई कैसे घूमें पढ़ें…

लोकल सिम कार्ड –
दुबई में एतिसलात(Etisalat) और ड्यू (DU) दो कंपनियां हैं जो मोबाइल सर्विस देती हैं। दुबई एयरपोर्ट पर ही दो कंपनियों के काउंटर हैं जहां से सिम कार्ड लिया जा सकता है। दोनों ही कंपनियों में खास पर्यटकों के लिए बने प्रीपेड प्लान आपको मिल जाएंगें।
मैंने दुबई एयरपोर्ट से एतिसलात का पर्यटकों के लिए जारी किया गया विजिटर लाइन प्रीपेड ( टॉक, टेक्सट, सर्फ) प्लान लिया। मुझे 14 दिन के प्लान के लिए 105 दिरहम ( 100 दिरहम प्लान+ 5% वैट) चुकाने पड़े। जिसमें मुझे 40 मिनट का लोकल और इंटरनेशनल कॉल टाइम, 40 एसएमएस, 700 एमबी डेटा और 5 घंटे का फ्री वाई-फाई ( एतिसलात अपने ग्राहकों के लिए दुबई में कई जगह फ्री वाई-फाई की सुविधा देती है, हालांकि मैं इस सुविधा का इस्तेमाल नहीं कर पाया या तो मुझे इसे इस्तेमाल करना नहीं आया या फिर फ्री वाई-फाई सही से काम नहीं कर रहा था। आप इसके बारे में किसी भी एतिसलात स्टोर से जानकारी ले सकते हैं। ) । एतिसलात के सिम के साथ पर्यटकों को कुछ अतिरिक्त फायदे भी मिलते हैं। जैसे मुझे एक कूपन बुक मिली है जिसमें दुबई के बहुत से रेस्टोरेंट्स, थीम पार्क, एडवेंचर पार्क आदि से जुड़े डिस्काउंट कूपन थे जिनका इस्तेमाल करके पैसे बचाए जा सकते हैं । साथ ही सिम के साथ दुबई की करीम टैक्सी सर्विस से 100 दिरहम तक की एक मुफ्त राइड भी मिली। हालांकि मैं इस टैक्सी सर्विस का इस्तेमाल नहीं कर पाया लेकिन 105 दिरहम के प्लान के साथ 100 दिरहम की मुफ्त टैक्सी राइड बेहतरीन सौदा है। पर्यटकों के लिए बने ये प्लान 14 दिनों के लिए वैध हैं , इससे ज़्यादा दिन होने पर आप फिर से प्लान रिचार्ज करवा सकते हैं। ऊपर बताया 14 दिन का प्लान रिचार्ज करवाने के लिए 75 दिरहम देने होंगे।

अगर एतिसलात की तुलना ड्यू के प्लान से करें को ड्यू के प्लान थोड़े मंहगें हैं। ड्यू में 14 दिन की वैधता वाला पर्यटक प्लान 165 दिरहम का है । जिसके साथ 2 जीबी डेटा और 40 मिनट टॉक टाइम मिलता है। ड्यू के साथ कोई अतिरिक्त फायदा भी नहीं मिलता । इसलिए ड्यू की बजाए एतिसलात ही लेना सही है। लेकिन ये प्लान बदल भी सकते हैं इसलिए आप जब जाएं तो दोनों ही कंपनियों के स्टोर से प्लान की जानकारी लेकर ही सिम खरीदें।

सिम लेने से पहले एक बात पर ध्यान ज़रूर दें कि अब भारत के मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर भी सस्ते इंटरनेशनल रोमिंग प्लान देने लगें हैं। जैसे उदाहरण के लिए एयरटेल की बात करें तो आपको 2999 रूपये में आपको 10 दिन के लिए दुबई रोमिंग प्लान मिल सकता है। जिसके साथ 250 का इनकमिंग कॉल, 250 मिनट कॉल ( भारत में कॉल करने और लोकल कॉल के लिए), 100 फ्री एसएसएस और 3 जीबी डेटा मिलता है। अगर एतिसलात से इसकी तुलना करें तो यह करीब 900 रूपये ज़्यादा बैठता है लेकिन इसमें करीब 6 गुना ज़्यादा कॉल टाइम और चार गुना से ज़्यादा डेटा आपको मिल रहा है। साथ ही आप अपना भारत का नंबर भी चालू रख सकते हैं। इस हिसाब से देखा जाए को यह कोई ज़्यादा कीमत नहीं है।

करेंसी —
संयुक्त अरब अमीरात की मुद्रा है – दिरहम। इसे AED भी लिखा जाता है। जाने से पहले इसे भारत से ही लेकर जाएं या वहां दुबई के एटीएम के इस्तेमाल से भी इसे निकाल सकते हैं। कुछ एटीएम भारतीय एटीएम कार्ड से पैसे निकालने पर अतिरिक्त शुल्क लेते हैं। एटीएम कार्ड इस्तेमाल करते समय आपको एटीएम की स्क्रीन पर इस बारे में जानकारी दी जाएगी कि आपको कितना शुल्क चुकाना होगा। मुझे एक बार 25 दिरहम अतिरिक्त चुकाने पड़े थे। लेकिन कुछ एटीएम से पैसा निकालने का शुल्क नहीं लगता इसलिए अलग-अलग एटीएम में कार्ड लगाकर इसका पता कर लें।
दुबई में डेबिट और क्रेडिट कार्ड लगभग सभी जगह चलते हैं।

क्या देखें-

बुर्ज़- खलीफा- दुनिया की सबसे ऊची इमारत

दुबई आज दुनिया का जाना-माना पर्यटन स्थल है। यहां विशाल मॉल्स, थीम पार्क , एडवेंचर पार्क, रोमांचक खेल, नाइट लाइफ, समुद्री तटों जैसी चीज़ों का मज़ा लिया जा सकता है। अगर खरीदारी का शौक है तो यहां दुबई मॉल, मॉल ऑफ एमिरेट्स और इब्नबतूता मॉल देखे जा सकते हैं। वैसे तो दुबई में मॉल्स की कोई कमी नहीं है। लेकिन ये तीन मॉल्स पर्यटकों की लिस्ट में हमेशा शामिल होते हैं। दुनिया का हर बड़ा ब्रांड आपको यहां मिल जाएगा। दुबई मॉल में ही दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज़-खलीफा भी है। साथ ही दुनिया का सबसे बड़ा म्यूजिकल फाउन्टेन और सबसे ऊंचा कृत्रिम झरना भी दुबई मॉल में बना है।
दुबई में बहुत से वाटर पार्क, थीम पार्क और एडवेंचर पार्क बने हैं जिन्हें आप अपनी रूचि के हिसाब देख सकते हैं।
सर्दियों में जा रहे हैं तो दुबई मिरेकल गार्डन ज़रुर जाएं।
रोमांचक खेलों का शौक रखते हैं तो दुबई में समुद्री गोताखोरी से लेकर स्काइडाइविंग तक का मज़ा लिया जा सकता है।
समुद्री तटों में यहां का जुमेरिया समुद्री तट बहुत लोकप्रिय है। यही तट के पास ही बुर्ज-अल- अरब होटल भी देखा जा सकता है।
दुबई के पुराने बाज़ार देखना चाहते हैं तो बर दुबई और देरा की तरफ चले जाइए। देरा में आपको गोल्ड सूक, स्पाइस सूक जैसे पुराने बाज़ार देखने को मिलेंगे।
इतिहास में रूचि रखते हैं तो बर दुबई में बना दुबई म्यूजियम और अल-फ़हीदी का इलाका ज़रूर देखें। अल-फ़हीदी दुबई का करीब 150 वर्ष पुराना इलाका है। यहां उस दौर की इमारतों को संरक्षित किया गया है।
अल-फ़हीदी के बारे में जानने के लिए मेरा ब्लॉग – अल-फ़हीदी दुबई का झांकता इतिहास पढ़ें।

दुबई के पास ही आबुधाबी और शारजहा जैसे शहर भी देखे जा सकते हैं। दोनों ही शहरों तक जाने के लिए बस आसानी से मिल जाती है। बस से शारजहा पहुंचने में मुश्किल से एक घंटा लगता है और आबुधाबी 2-2.5 घंटे में पहुंच सकते हैं।

कब जाएं-
दुबई में साल के अधिकतर समय बहुत गर्म रहता है।दिन में तापमान 40 डिग्री सेंटीग्रेड के पार ही मिलेगा। दुबई जाने के लिए सबसे अच्छा समय नवम्बर से लेकर फरवरी तक का है। इस समय मौसम कुछ ठंडा होता है और दिन के समय पैदल भी घूमा जा सकता है। लेकिन नवम्बर से फरवरी तक दुबई में होटल मंहगे हो जाते हैं । कुछ कम खर्च में दुबई घूमना चाहते हैं तो कम गर्म महीनों जैसे मार्च, सितम्बर और अक्टूबर में जा सकते हैं। मैं सितम्बर के आखिरी हफ्ते में दुबई गया था। उस समय मौसम गर्म तो था लेकिन फिर भी दिन में पैदल चलने में ज़्यादा परेशानी नहीं हुई।

क्या खाएं-

दुबई में बाकानेरवाला की दुकान का डोसा

दुबई दुनिया का अनोखा देश है जहां लगभग पूरी दुनिया के लोग रहते और काम करते हैं। इसलिए यहां आपको हर जगह का खाना मिल जाता है। चाहे आप किसी बेहतरीन रेस्टोरेंट में खाएं या किसी सड़क किनारे की छोटे सी दुकान पर खाना स्वादिष्ट और साफ-सफाई से बना मिलता है। भारतीय बड़ी संख्या में दुबई में रहते हैं इसलिए भारतीय खाने की यहां भरमार है। किसी अच्छे रेस्टोरेंट में दो लोगों के लिए शाकाहारी भारतीय खाना 50-60 दिरहम में खाया जा सकता है। छोटी दुकानों में आप 15-20 दिरहम प्रति व्यक्ति के बजट में शाकाहारी खाना खा सकते हैं।

इलेक्ट्रिक प्लग –

Type G Socket

दुबई में Type G ( three pin) – प्लग और सॉकेट का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ जगह पर two pin सॉकेट भी मिल जाते हैं। जाते समय अपना ट्रेवल अडैप्टर साथ लेकर जाएं। दुबई में किसी जनरल स्टोर से भी आप यह अडैप्टर खरीद सकते हैं। कुछ होटलों में भी आपको अडैप्टर मिल सकता है।

दुबई से जुड़ी इस जानकारी में आप कुछ जोड़ना चाहें तो ज़रूर बताएं।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दुबई कैसे घूमें ?

पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दुबई कैसे घूमें ?

किसी नई जगह घूमने जाएं तो एक दुविधा होती है कि वहां घूमा कैसे जाए? किस साधन का इस्तेमाल किया जाए? अगर आप कम बजट में सफ़र करना चाहते हैं तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से अच्छा कुछ और नहीं हो सकता। जिन शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट अच्छा नहीं होता वहां घूमने में काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। दुबई इस मामले में बेहतर शहर है। दुबई का पब्लिक ट्रांसपोर्ट काफी विकसित और व्यवस्थित है। मेरी हाल की दुबई यात्रा में मैंने घूमने के लिए पूरी तरह से पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ही इस्तेमाल किया। इससे ना केवल मैं आराम से घूम पाया बल्कि मेरा बजट भी काबू में रहा।
दुबई में रोड्स एंड ट्रांसपोर्ट अथोरिटी ( RTA) पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को चलाती है। इसमें मैट्रो, ट्राम, बस, वॉटर बस, अबरा(लकड़ी की नाव) और टैक्सियां शामिल हैं। दुबई समुद्र के किनारा बसा है और शहर के भीतर तक दुबई खाड़ी आने के कारण वॉटर ट्रांसपोर्ट भी यहां विकसित किया गया है। इन सभी के बारे में एक-एक करके बात करेंगे पर पहले बात करते हैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट के टिकट सिस्टम की।

किराया कैसे निर्धारित किया जाता है-
आपकी यात्रा का किराया इस बात से निर्धारित होता है कि आपने उस यात्रा के दौरान कितने ज़ोन पार किए हैं। दरअसल दुबई को यात्रा के हिसाब से कुल 7 ज़ोन में बांटा गया है। एक ही ज़ोन के भीतर यात्रा करने पर एक समान किराया है और एक से दूसरे ज़ोन में जाने पर किराया बढ़ता है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का टिकट कैसे लें-
यहां की मैट्रो,बसों और ट्राम में सफ़र करने के लिए आपको नोल कार्ड (Nol card) का इस्तेमाल करना होता है। ये कार्ड आप मैट्रो स्टेशन, बस स्टेशन या वेंडिंग मशीन से खरीद सकते हैं।
नोल कार्ड (Nol Card) चार तरह के होते हैं – रेड टिकट ( Red ticket) , सिल्वर कार्ड ( Silver card) , गोल्ड कार्ड ( Gold card), ब्लू कार्ड ( Blue card)। पर्यटक अपनी ज़रूरत के हिसाब से रेड टिकट, सिल्वर कार्ड या गोल्ड कार्ड (मैट्रो के गोल्ड कोच में बैठने के लिए) का इस्तेमाल कर सकते हैं। ब्लू कार्ड का इस्तेमाल दुबई में रहने वाले लोग ही कर सकते हैं।

रेड टिकट –
पर्यटकों के लिए सबसे सही है रेड टिकट। यह कागज़ के सामान्य टिकट की तरह ही होता है। रेड टिकट की कीमत 2 दिरहम होती है।इसमें एक ज़ोन का 4 दिरहम किराया लगता है। यानि अगर आप सिर्फ एक ज़ोन के लिए रेड टिकट चाहते हैं तो आपको कुल 6 दिरहम ( 2 दिरहम टिकट + 4 दिरहम ज़ोन का किराया) चुकाना होगा। आप चाहें तो पूरे दिन का डे पास (Day pass) ले सकते हैं जिसमें 22 दिरहम ( 20 दिरहम डे पास + 2 दिरहम रेड टिकट की कीमत) में आप एक दिन में दुबई के किसी भी ज़ोन में किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का जितना चाहे उपयोग कर सकते हैं। इसमें मैट्रो, बस, वॉटर बस और ट्राम शामिल है।अगर पूरे दिन कई जगह जाने का सोच रहे हैं तो डे पास (Day pass) लेना सही रहेगा।
मैं अपनी हर यात्रा के बाद नया रेड टिकट लिया करता है। इस तरह हर बार मुझे टिकट के 2 दिरहम चुकाने पड़ते थे। मुझे बाद में पता चला कि एक रेड टिकट में अधिकतम 10 सिंगल ट्रिप या 5 डे पास रिचार्ज करवाए जा सकते हैं। अगर आप रेड टिकट का इस्तेमाल कर रहें हो तो इस बात की जानकारी टिकट काउंटर से ज़रूर ले लें। इससे आप कुछ दिरहम बचा सकेंगे।

सिल्वर कार्ड-
इसके अलावा पर्यटक सिल्वर कार्ड भी ले सकते हैं। यह प्लास्टिक का कार्ड है।यह कार्ड 25 दिरहम का आता है जिसके साथ 19 दिरहम ट्रिप क्रेडिट मिलता है। इसका मतलब की सिल्वर कार्ड की असल कीमत करीब 6 दिरहम पड़ती है। अगर कुछ लंबा जैसे 7-10 दिन रूकने का सोच रहे हैं तो सिल्वर कार्ड बेहतर रहेगा। सिल्वर कार्ड में घूमने का किराया रेड कार्ड की तुलना में कम है। रेड कार्ड में एक ज़ोन का किराया 4 दिरहम तो सिल्वर कार्ड में यह किराया 3 दिरहम है। दो ज़ोन के बीच यात्रा करने पर रेड कार्ड में 6 तो सिल्वर कार्ड में 5 दिरहम चुकाने होंगे। दो से ज़्यादा ज़ोन होेने पर रेड कार्ड में 8.5 और सिल्वर कार्ड में 7.5 दिरहम का किराया लगेगा। हालांकि सिल्वर कार्ड में डे पास की सुविधा नहीं है। सिल्वर कार्ड 5 साल के लिए वैध होता है इसलिए आप बाद में कभी दुबई जाएं तो अपने खरीदे कार्ड का इस्तेमाल कर सकते हैं।

गोल्ड कार्ड –
दुबई मैट्रो में एक गोल्ड क्लास होती है। इसमें सीटें कुछ बेहतर होती हैं इसलिए किराया भी ज्यादा है। गोल्ड क्लास के लिए आपको या तो गोल्ड कार्ड लेना होगा या फिर गोल्ड क्लास रेड टिकट लेना होगा। ऊपर उदाहरण के लिए जो किराए बताए गए हैं वे मैट्रो के सामान्य डिब्बे या लोकल बस के लिए हैं।

एक जगह से दूसरी जगह जाने के दौरान आप मैट्रो, बस, ट्राम या वॉटर बस में से किसी भी साधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। इनके लिए अलग टिकट लेने की ज़रूरत नहीं है और ना ही अलग से किराया लगेगा। ध्यान रखें कि एक ही यात्रा के दौरान दो अलग-अलग साधनों का इस्तेमाल करने के बीच 30 मिनट से ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए और साथ ही आपका कुल सफ़र 3 घंटे में पूरा हो जाना चाहिए। किराया इस पर निर्भर करेगा कि आपने कुल कितने ज़ोन में यात्रा की है।

अब दुबई के पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साधनों- मैट्रो, बस, ट्रैक्सी, अबरा, ट्राम और मोनो रेल की बात करते हैं।

1- दुबई मैट्रो-

बाहर से दुबई का एक मैट्रो स्टेशन

दुबई में घूमने का सबसे बढ़िया और आसान तरीका है दुबई मैट्रो। मैट्रो लाइन को इस तरह से बनाया गया है कि यह दुबई में घूमने वाली लगभग सभी जगहों के आस-पास से निकलती है। अगर कोई जगह थोड़ी दूरी पर भी है तो उसके नज़दीकी मैट्रो स्टेशन से टैक्सी या लोकल बस ली जा सकती है। दुबई में दो मैट्रो लाइन हैं। इन्हें रेड और ग्रीन लाइन कहा जाता है।
रेड लाइन रशिदिया(Rashidia) से यूएई एक्सचेंज ( UAE Exchange) के बीच चलती है।
ग्रीन लाइन एतिसलात (Etisalat) से क्रीक ( Creek) स्टेशन के बीच चलती है।

दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट रेड लाइन पर पड़ता है। एयरपोर्ट के टर्मिनल 1 और 3 मैट्रो लाइन से जुड़े हैं। अगर आप टर्मिनल 2 पर हैं तो वहां से टर्मिनल 1 या 3 मैट्रो स्टेशन के लिए बस या टैक्सी ले सकते हैं। हर मैट्रो रेल में चार डिब्बे हैं जिसमें पहले डिब्बे का आधा हिस्सा गोल्ड क्लास और आधा हिस्सा महिलाओं और बच्चों के लिए आरक्षित है।

रेड लाइन पर आने वाली लोकप्रिय जगहें- दुबई मॉल, बुर्ज़ अल अरब, मॉल ऑफ एमिरेट्स, दुबई फ्रेम, इब्नबतूता मॉल, दुबई मरीना

ग्रीन लाइन पर आने वाली लोकप्रिय जगहें- अल-फ़हीदी, बुर्ज़मान, अल-सीफ, अल-घुबाईबा, दुबई म्यूज़ियम, देरा

2 – लोकल बस-
दुबई में घूमने का दूसरा तरीका है लोकल बस का इस्तेमाल करना। लगभग पूरे दुबई में जाने के लिए आपको बस मिल जाती हैं। हालांकि पर्यटकों के लिए कुछ दिन में इसे समझना मुश्किल हो सकता है। इसलिए मैट्रो बेहतर है। लेकिन कहीं-कहीं जाने के लिए बस का इस्तेमाल किया जा सकता है। किसी स्थानीय व्यक्ति या इंटरनेट से अपना बस नंबर पता कर लें और बस स्टेंड से अपनी बस पकड़ लें। बस में टिकट देने के लिए कोई कंडेक्टर नहीं होता। बस में दरवाजे से अंदर जाते समय अपना कार्ड वहां लगी मशीन पर लगा दें जिससे आपकी यात्रा दर्ज़ हो जाती है फिर निकलते समय फिर कार्ड लगा दें और आपकी यात्रा का पैसा कट जाएगा।

अल घुबाईबा बस स्टेशन
दुबई से आबुधाबी की लक्जरी बस

अगर दुबई से आबुधाबी या शारजाह जैसे शहरों में जाना हो तो बस सबसे अच्छा साधन है। दुबई के अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन से आबुधाबी सेंट्रल बस स्टेशन के लिए सीधी बस मिलती है। आबूधाबी के लिए अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) से बस नंबर E100 और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन बस नंबर E101 मिलेगी। एक तरफ का किराया 25 दिरहम है। इन एयरकंडीशन आरामदायक बसों में आपको सफर का पता भी नहीं चलता। टिकट के लिए इन बसों में आपको सिल्वर कार्ड लेना ही होगा क्योंकि इनमें रेड टिकट नहीं चलता। तो अगर दुबई में घूमने के दौरान आबुधानी जाने का प्लान है तो दुबई जाते ही सिल्वर कार्ड ले लें और जरूरत के हिसाब से उसे रिचार्ज करवाते रहें।

अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) से शारजाह के अल जुबैल बस स्टेशन के लिए बस नंबर E306 से जाया जा सकता है। इसके अलावा दूसरे स्टेशनों से भी शारजाह के लिए बस ली जा सकती है।

दुबई के एयरकंडीशन बस स्टॉप

आप दुबई की बस में सफर करें या ना करें पर एक बार दुबई के बस स्टाप पर ज़रूर जा कर देखे। यहां बसों का इंतज़ार करने के लिए एयरकंडीशन बस स्टॉप बनाए गए हैं। दुबई की गर्मी में इस तरह बस स्टॉप बहुत सुकून देते हैं।

3- टैक्सी-
दुबई में टैक्सी की भी बेहतरीन व्यवस्था हैं । अब इन टैक्सियों को एप के ज़रिए भी बुक किया जा सकता है। वैसे सड़क पर किसी भी टैक्सी को हाथ देकर आप उसमें बैठ सकते हैं। टैक्सी में मीटर 5 दिरहम से शुरू होता है और उसके बाद हर किलोमीटर के करीब 1.75 दिरहम देने होते हैं। कम से कम 12 दिरहम का बिल आएगा। अगर आपका टैक्सी बिल 12 दिरहम से कम है तो भी आपको 12 दिरहम को चुकाने ही होंगें। ट्रैफिक में इंतजार करने का भी कुछ पैसा जोड़ा जाता है। यात्रा खत्म होने पर ड्राइवर आपको स्क्रीन पर आपका फाइनल बिल दिखाएगा और आपको कागज की रसीद भी दी जाएगी। बिना स्क्रीन देखे और रसीद लिए ड्राइवर को पैसे नहीं दें। एक बार ड्राइवर ने बहाना बनाकर मुझे बिल नहीं दिया और ना ही स्क्रीन पर देखने दिया। जब मैंने वापस उसी जगह से टैक्सी ली तो मुझे पता चला की उसने मुझसे करीब 10 दिरहम ज़्यादा ले लिए। हालांकि मेरे साथ ऐसा एक बार ही हुआ लेकिन आप जब भी टैक्सी लें इस बात का ध्यान ज़रूर रखें कि ड्राइवर आपको फाइनल बिल दिखाए।
एयरपोर्ट टैक्सी का मीटर 25 दिरहम से शुरू होता है और उसमें हर किलोमीटर के करीब 2 दिरहम लगते हैं। इसके अलावा दुबई में उबर टैक्सी भी उपलब्ध है।

4- अबरा ( लकड़ी की नाव)-

दुबई की पारम्परिक लकड़ी की नाव- अबरा

दुबई कई सैकड़ों वर्षों से अबरा का चलन है। लकड़ी की बनी पारम्परिक नावों को यहां अबरा कहा जाता है। अबरा यहां के पारम्परिक जीवन को देखने का भी बेहतरीन जरिया है। लकड़ी के पुराने अबरा दुबई खाड़ी में बर दुबई से देरा के बीच चलते हैं। इस सफर में मुश्किल से 4-5 मिनट का ही समय लगता है लेकिन यह सफर आपको फिर से पुराने दौर में पहुंचा देगा।
पुराने अबरा बर दुबई से देरा के बीच दो रूट्स पर चलते हैं।
1- बर दुबई अबरा स्टेशन से देरा ओल्ड सूक अबरा स्टेशन
2- दुबई ओल्ड सूक अबरा स्टेशन से देरा के अल सबकहा अबरा स्टेशन

देरा का अबरा स्टेशन

देरा के पुराना बाज़ारों ( ओल्ड सूक) को देखने के लिए बर दुबई अबरा स्टेशन से अबरा लिया जा सकता है। इन अबरा में 1 दिरहम का टिकट लगता है। अबरा का चलाने वाला ही खुद आकर आपसे पैसे ले लेगा। मुझे ये पुराने अबरा बहुत सुरक्षित नहीं लगे। इन अबरा में मुझे सुरक्षा के लिए लाइफ जैकेट जैसा भी कुछ दिखाई नहीं दिया। लेकिन सफर इतना छोटा है कि डर नहीं लगता।

RTA का अबरा

अगर सुरक्षित अबरा का मज़ा लेना चाहते हैं तो RTA के द्वारा चलाए जा रहे अबरा से जा सकते हैं। इनसे अल घुबाईबा, दुबई ओल्ड सूक ( Dubai old souk) और अल सीफ ( Al Seef) जैसे स्टेशनों से देरा के बनियास (Baniyas) स्टेशन जा सकते हैं। ये पारम्परिक अबरा से तेज़ और सुरक्षित हैं। इनमें आपको लाइफ जैकेट भी मिलती है। इनका टिकट 2 दिरहम है। मैंने अल सीफ से बनियास जाने के लिए अबरा का इस्तेमाल किया।
दुबई मरीना में एयरकंडीशन अबरा भी चलते हैं।

5- ट्राम –

ट्राम का नेटवर्क

ट्राम

दुबई में ट्राम सेवा कुछ वर्ष पहले शुरू की गई है। ट्राम अल सुफोह रोड ( Al Sufouh road) स्टेशन से जुमेरिया बीच रोड ( Jumeirah beach road) स्टेशन के बीच चलती है। दुबई मरीना का इलाका देखने के लिए ट्राम सबसे सही साधन है। ट्राम दुबई मैट्रो के दमाक ( Damac Metro station) और जुमेरिया लेक टॉवर्स मैट्रो स्टेशन ( Jumeirah lake towers metro staion) से जुड़ी है। इसलिए मैट्रो से आसानी से ट्राम में जाया जा सकता है। ट्राम के लिए अलग से कोई टिकट नहीं है। आप अपने मैटो में लिए टिकट या कार्ड का ही इस्तेमाल कर सकते हैं।

6- पाम जुमेरिया मोनो रेल-

मोनो रेल स्टेशन
मोनो रेल

दुबई के पाम जुमेरिया आईलैंड के लिए मोनो रेल शुरू की गई है। मोनो रेल को एक निजी कंपनी चलाती है। मोनो रेल कृत्रिम रूप से बनाए गए पाम आईलैंड को देखने और आईलैंड के आखिर छोर पर बने अटलांटिस होटल और एडवेंचर पार्क तक जाने के लिए बिल्कुल सही है। निजी कंपनी की होने के कारण इसमें Nol card नहीं चलते। आपको अलग से टिकट लेना होता है। मोनो रेल के गेटवे स्टेशन ( Gatewat Station) से अटलांटिस स्टेशन ( Atlantis Staion) तक जाने के लिए एक तरफ का टिकट 20 दिरहम और रिटर्न टिकट 30 दिरहम का है। मोनो रेल का गेटवे स्टेशन ट्राम के पाम जुमेरिया ट्राम स्टेशन से जुडा है। ट्राम से पाम जुमेरिया ट्राम स्टेशन पहंच कर वहां से मोनो रेल ली जा सकती है।

ऊपर बताए इन सभी साधनों का इस्तेमाल करके आप आसानी से दुबई घूम सकते हैं। अगर आप भी दुबई के पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ी कोई जानकारी जोड़ना चाहते हैं तो ज़रूर बताएं।

अल फ़हीदी- दुबई का इतिहास झाँकता है जहाँ….

अल फ़हीदी- दुबई का इतिहास झाँकता है जहाँ….

मिट्टी,पत्थर,लकड़ी के इस्तेमाल से बनी एक मंजिला या दुमंजिला इमारतें। इमारतों के बीच से निकलती पतली सड़कें। इमारतों को ठंडा रखने के लिए बनी ऊंची पुरानी मीनारें किसी भी तरह से दुबई में होने का आभास नहीं देती। जिसने भी आज की आधुनिक दुबई को तस्वीरों या असल में देखा हो अगर उसे आँखें बंद करके इस इलाके में छोड़ दिया जाए तो वह कभी यह नहीं बता पाएगा कि यह दुबई का इलाका है। यही बात अल-फ़हीदी को ख़ास बनाती है। दुनिया के हर विकसित देश की तरह दुबई ने भी सीधे आज के दौर में कदम नहीं रखा। दुबई का भी अपना एक अतीत रहा है और इस अतीत को जानने समझने का एक ज़रिया है- दुबई का अल-फ़हीदी इलाका। यह जगह दुबई के इतिहास से आपको रूबरू करवाती है। मुझे इतिहास से लगाव रहा है इसलिए अपनी हाल की दुबई यात्रा में मैं भी अल-फ़हीदी जा पहुंचा।

क्या है अल-फहीदी—-

अल-फ़हीदी दुबई की शुरूआती बसावटों में से एक है जिसे दुबई खाड़ी के किनारे करीब 150 वर्ष पहले बसाया गया था। उस वक्त दुबई मछुआरों की एक छोटी सी बस्ती हुआ करता था। यहाँ रहने वाले लोग मछलियां पकड़ने और समुद्र से मोती निकालने का काम करते थे। खाड़ी से निकले पत्थरों, जिप्सम और मिट्टी के इस्तेमाल से इन इमारतों को बनाया गया था। क्रीक के किनारे बसे होने के कारण यहां से नावों के जरिए समुद्र में आना-जाना आसान था। फिर दुबई में तेल मिलने में और समुद्री व्यापार में तरक्की होने पर यह जगह पीछे छूट गई।अब दुबई अमीरों की दुनिया थी जहां हर कोई आना चाहता था। इसके साथ ही अल-फ़हीदी में रहने वाले लोगों ने भी इस इलाके को छोड़ दिया। काफी समय तक यूँही पड़ा रहने के बाद दुबई सरकार ने अपने इतिहास की इस धरोहर को संभाला और आज का अल-फ़हीदी हिस्टोरिकल नेबरहुड सामने आया।

अल-फ़हीदी की गलियां

1980 के दशक में अल फ़हीदी के संरक्षण का काम शुरू किया गया था। उस समय इस इलाके को नए सिरे से संवारा गया। आज यहाँ पुराने दौर के करीब 50 घर हैं जिन्हें पुराने तरीके से मरम्मत करके तैयार किया गया है। धीरे-धीरे और भी घरों को ठीक करने का काम किया जा रहा है। यहां के पुराने घरों में आर्ट गैलरी, कैफे, म्यूजियम, हेरिटेज होटल आदि खोले गए हैं जो हर वक्त मेहमानों का स्वागत करने के लिए तैयार रहते हैं। यहां आप दुबई के पुराने जीवन, संस्कृति और रहन-सहन के तरीकों को करीब से देख सकते हैं।

अल-फहीदी में क्या देखें

अल-फ़हीदी में घुसते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है शेख़ मोहम्मद सेंटर फॉर कल्चर अंडरस्टैंडिंग ( Sheikh Mohammed Centre for Cultural Understanding ) पर। इस केन्द्र को दुबई की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से अल-फहीदी की एक पुरानी इमारत में खोला गया है। सेन्टर की टैग लाइन है “ओपन डोर्स, ओपन माइंड्स ( Open doors, Open minds)”। इस लाइन का मतलब है कि यहां आपका खुले दिल से स्वागत है और आप यहां दुबई की संस्कृति , सभ्यता, रहन-सहन और खान-पान से जुड़े कोई भी सवाल बिना किसी झिझक के पूछ सकते हैं।

मैं सितम्बर के आखिरी हफ्ते में दुबई गया था और वहां खासी गर्मी थी। गर्मी की वजह से सेन्टर का मुख्य दरवाजा बंद था। जैसे ही में दरवाज़ा खोल कर अंदर दाखिल हुआ पारम्परिक कपड़े पहने एक व्यक्ति ने मुस्करा कर मेरा स्वागत किया और तुरंत ठंडा पानी पीने को दिया। उसके बाद उसने मुझे बताया कि इस केन्द्र में क्या- क्या किया जाता है। इस केन्द्र से पर्यटकों के लिए हैरिटेज वॉक चलाए जाते हैं । इन हैरिटेज वॉक के जरिए आप अल-फ़हीदी के इतिहास को समझ सकते हैं। करीब 1.5 घंटे के हैरिटेज वॉक के लिए 100 दिरहम की राशि ली जाती है। इसके साथ ही यहां पारम्परिक अमीराती भोजन भी किया जा सकता है। यहां आप स्थानीय अमीराती भोजन जैसे, सुबह का नाश्ता, दोपहर या रात का खाना और शाम की चाय का मज़ा ले सकते हैं। इसके लिए आपको 120 से लेकर 150 दिरहम के बीच राशि चुकानी होगी।

मैं जब तक यहाँ पहुंचा तब तक हैरिटेज वॉक का समय खत्म हो चुका था इसलिए यहाँ से अल-फ़हीदी के इलाके की जानकारी लेकर मैं खुद ही आगे घूमने के लिए निकल गया। सेन्टर से मुझे अल-फ़हीदी का एक नक्शा दे दिया गया जिसमें यहां के हर घर के बारे में जानकारी और वहां तक पहुंचने का रास्ता समझाया गया था। सेन्टर पर मिले व्यक्ति ने बताया कि हर घर देखने के लिए खुला है, जिसका घर का दरवाजा भी खुला मिले उसमें जाया जा सकता है। घरों में म्यूजियम, आर्ट गैलरी, कैफे, म्यूजियम और होटल जैसी चीजें खोली गई हैं। हां, किसी भी घर में कोई परिवार नहीं रहता। हर घर के आगे नंबर लिए हुए हैं, नक्शे में उस नंबर के घर को खोजते हुए आप आराम से मनचाही जगह पर पहुंच सकते हैं।

दुबई की पारंपरिक नाव डाउ( Dhow)

सेन्टर से आगे बढ़ने पर मैं आस-पास की इमारतों को देखते हुए यहां खाड़ी के किनारे पहुँचा। खाड़ी के किनारे पर दुबई में चलने वाली लकड़ी की नाव को यहां दिखाया गया है। इस लकड़ी की नाव को डाउ (Dhow) कहा जाता है। इन्हीं लकड़ी की नावों के सहारे करीब एक-डेढ़ सदी पहले दुबई में व्यापार की शुरूआत हुई थी। भारत और आस-पास के देशों से इन्हीं नावों के सहारे माल समुद्री रास्ते से दुबई पहुँचता था।


यहीं घूमते हुए एक घर के बाहर मुझे दिखाई दिया आर्किटेक्चरल हेरिटेज एंड एंटिक्वटीज़ डिपार्टमेंट ( Architectural Heritage and Antiquities Department) लिखा दिखाई दिया। नाम से लग रहा था कि यह प्राचीन वस्तुओं की देखभाल से जुड़ी जगह है। यहां अंदर जाने पर मेरी मुलाकात अब्दुल्लानाज़री से हुई। अब्दुल्ला ने मुझे देखते ही हिन्दी में कहा, ‘आप हिन्दुस्तान से हैं। आप तो हमारे भाई जैसे हैं।’

अब्दुल्लानाज़री के साथ मेरा फ़ोटो

अब्दुल्लानाज़री यहां वालंटियर गाइड के तौर पर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि उनका बचपन इसी अल-फ़हीदी की गलियों में बीता है। दुबई के वर्तमान शेख भी उनके ही पड़ोसी थे। बाद में सब लोगों की तरह अब्दुल्लानाज़री का परिवार भी यहां से चला गया। लेकिन अब वे लोगों को यहां के बारे में बताने के लिए वालंटियर गाइड के तौर पर काम करते है जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती है। उनके पुराने घर में अब अरेबियन कॉफी सेंटर चलता है जो काफी मशहूर कैफे है। अब्दुल्ला इस पूरे इलाके को दिखाने के लिए मेरे साथ चल दिए। अब्दुल्ला अपने शौक के लिए गाइड का काम करते हैं और इसके लिए कोई फीस नहीं लेते। सबसे पहले उन्होंने एंटिक्वटीज़ डिपार्टमेंट की इमारत के बारे में ही बताया। समुद्र के किनारे बनी इस इमारत में दुबई के पुराने घरों में बनी सबसे लंबी बालकनी है। बालकनी से खाड़ी का शानदार नजारा दिखाई देता है।

पुराने घरों में सबसे लंबी बालकनी
दुबई खाड़ी के किनारे बसा अल-फ़हीदी

बरजील या कमरा ठंडा करने वाली मीनारें

बरजील- घर ठंडा करने की मीनार

मैं इमारतों के ऊपर बनी मीनारें के बारे में जानना चाहता था। अब्दुल्ला ने बताया कि ये मीनारें पुराने समय के एयरकंडीशन की तरह हैं। इन मीनारों को बरजील (Barjeel) कहा जाता है। इन चौकोर मीनारों में बने खांचों से गर्म हवा बाहर निकलती है और चारों तरफ की ठंडी हवा कमरे के अंदर जाती है और उसे ठंडा रखती है।। आज भी यह सिस्टम बखूबी काम करता है। पुराने समय में खाड़ी देशों में गर्मी के समय इस तरह के मीनारों वाले कमरे और सर्दी के समय मिट्टी, लकड़ी और पत्तियों से बनी छत वाले कमरों का इस्तेमाल किया जाता था। हर घर में इसी तरह दो अलग-अलग तरह के कमरे बनाए जाते थे। घर ठंडा करने के लिए इस तरह की इमारतों को पूरे खाड़ी देशों में बनाया जाता था। दुबई और बहरीन से लेकर ईरान और अफगानिस्तान तक इन्हें बनाया जाता था । प्रचीन मिस्त्र में करीब 5000 वर्ष पहले भी इन्हें बनाने के सबूत पाए गए हैं। दुबई के इलाके में शुरूआत में इन मीनारों और घरों को खजूर की पत्तियों से बनाया जाता था। जिसे बेट अरीश ( Bait Areesh) कहा जाता था। दुबई के देरा इलाके में वर्ष1894 में लगी एक आग में घरों के जल जाने के बाद पत्थर और मिट्टी जैसी आग प्रतिरोधी और ज़्यादा मजबूत चीजों का इस्तेमाल घरों और मीनारों को बनाने में होने लगा।

कॉइन म्यूजियम

अब अब्दु्ल्ला मेरे साथ हो गए थे इसलिए नक्शे को देखने की जरूरत नहीं थी। वे मुझे यहां के कॉइन म्यूजियम में ले गए। इस म्यूजियम में दुबई में चलने वाले प्राचीन सिक्कों को सहेजा गया है। इस तरह के कई म्यूजियम पूरे इलाके में बने हैं। कॉइन म्यूजियम के बाद हमने कॉफी म्यूजियम देखा। कॉफी पीना अरब की संस्कृति का हिस्सा है। इसे दर्शाने के लिए यहाँ एक घर में कॉफी म्यूजियम बनाया गया है। इसमें कॉफी से जुड़ी पुरानी मशीनों और कॉफी बनाने की जानकारी को समेटा गया है। यहां आप कई तरह की कॉफी को पीने का मज़ा भी ले सकते हैं।

कॉफी म्यूजियम

Coffee trivia – कॉफी पीना अरब की संस्कृति का अहम हिस्सा है। यहां किसी के यहाँ जाने पर मेहमानों को कॉफी पेश की जाती है। किसी की पेश की गई कॉफी के लिए मना करना अच्छा नहीं माना जाता है। इसलिए आप अरब में किसी के यहाँ जाएं तो कॉफी पेश करने पर उसके लिए मना ना करें।

XAV आर्ट कैफे

दो सौ साल पहले बनी किले की सुरक्षा दीवार

इसके बाद मैंने कई घरों को देखा जिनमें आर्ट कैफे , आर्ट गैलरी और हेरिटेज होटल खुले हैं। यहां अंदर जाने पर आपको सभी तरह की आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी लेकिन बाहर से देखने पर ऐसा ही लगेगा जैसे अरेबियन नाइट्स के दौर में घूम रहे हैं।
अगर आप दुबई आ रहे हैं और इतिहास में रूचि रखते हैं तो अल-फहीदी आपके लिए बढ़िया जगह हो सकती है। अल-फ़हीदी से ही लगा है दुबई म्यूजियम । दुबई म्यूजियम को अल-फहीदी किले में बनाया गया है। इस म्यूजियम की बात अगले ब्लॉग पोस्ट में।

कैसे पहुंचे— अल-फ़हीदी दुबई के बर दुबई इलाके में पड़ता है। बर दुबई एक महत्वपूर्ण रिहायशी और व्यवसायिक इलाका है। यहां दुबई मैट्रो से आसानी से पहुंचा जा सकता है। अल-फहीदी दुबई मैट्रो के अल-फहीदी स्टेशन से 10 मिनट की पैदल दूरी पर है। अल-फहीदी दुबई मैट्रो की ग्रीन लाइन पर पड़ता है। वैसे रेड लाइन पर पड़ने वाला बुर्ज़मान स्टेनश भी अल-फहीदी के पास ही है। बुर्ज़मान स्टेशन से भी पैदल यहां तक पहुंचा जा सकता है।

क्या देखें– कॉफी म्यूजियम, कॉइन म्यूजियम, आर्ट गैलेरी और आर्ट कैफे। पुराने शहर की गलियों में घूमें। पास ही दुबई म्यूजियम देखना ना भूलें।

कहां ठहरें– अगर हेरिटज होटल में रूकने का मन है तो अल-फ़हीदी में रूका जा सकता है। यहां फिलहाल दो हेरिटेज होटल चलाए जा रहे हैं। एक्सएवी (XAV) यहां का मशहूर हेरिटेज होटल है।

बाली भारतीयों के लिए क्यों है बेहतर जगह ?

बाली भारतीयों के लिए क्यों है बेहतर जगह ?

इंडोनेशिया का एक द्वीप है बाली। अपनी प्राकृतिक सुन्दरता, अनोखी हिन्दु संस्कृति, सफेद रेत से भरे समुद्र तटों और नाइट लाइफ के लिए इसे दुनिया भर में जाना जाता है। दुनिया भर से पर्यटक घूमने के लिए बाली आते हैं। पर बाली में कुछ बाते हैं जो इसे भारतीयों के लिए खास बनाती हैं। यहां मैंने उन्हीं को बताने की कोशिश की है।

1- भारतीयों के लिए वीजा फ्री


कहीं बाहर जाने से पहले मेरा पहला ध्यान जाता है उस देश के वीजा लेने की प्रक्रिया पर। आप सबका ध्यान भी सबसे पहले वीजा पर ही जाता होगा क्योंकि किसी दूसरे देश में जाने से लिए सबसे पहले वीजा लेना जरूरी होता है। वीजा लेना आसान काम नहीं है लेकिन बाली इस मामले में भारतीयों के लिए एक आसान जगह है।
बाली इन्डोनेशिया का हिस्सा है और इन्डोनेशिया में भारत का पासपोर्ट रखने वालों के लिए वीजा ऑन अराइवल की सुविधा उपल्बध है। इसका मतलब है कि बाली जाने से पहले आपको वीजा के लिए किसी ऑफिस या दूतावास के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है। बस टिकट लीजिए और सैर पर निकल जाइये। वीजा ऑन अराइवल की यह सुविधा भारतीयों के लिए पूरी तरह से मुफ्त भी है।

2- हवाई सेवा-


भारत से बाली जाने के लिए हवाई सेवाओं के ढेरों विकल्प उपल्बध हैं। अपनी पसंद और बजट के हिसाब से हवाई सेवा का चुनाव किया जा सकता है। इसमें मलेशिया एयरलाइन, इन्डोनिया की गरूड़ एयरलाइन, सिंगापुर एयरलाइन जैसी फुल फेयर और एय़र एशिया और मलिन्डो एय़र जैसे कुछ सस्ती हवाई सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं। दिल्ली से बाली का टिकट औसत 25000 से 30 हजार के बीच खरीदा जा सकता है। अगर कुछ महीने पहले योजना बनाकर टिकट खरीदें तो इसे 19-20 हजार के बीच भी खरीदा जा सकता है। बाली जाने में एक ही कमी है कि फिलहाल भारत से मुंबई को छोड़कर किसी दूसरे शहर से बाली के लिए सीधी उड़ान उपल्बध नहीं है । मुंबई से भी हाल ही में इन्डोनेशिया की गरूड़ एय़रलाइन ने सीधी उड़ान सेवा शुरू की है।
भले ही उड़ान सेवा सीधी उपलब्ध ना हो लेकिन फिर भी करीब 10-11 घंटे के बीच दिल्ली से बाली आराम से पहुंचा जा सकता है।

3- एक जैसी संस्कृति-


बाली भारतीयों के एक संस्कृति के लिहाज से भी खास है। यह है ऐसा द्वीप है जो हिन्दू बहुत है यहां की लगभग 85 फीसदी मूल आबादी हिन्दू है।सैंकड़ों वर्षों से बाली एक हिन्दू बहूल इलाका है। हालांकि किसी समय पूरा इन्डोनेशिया ही हिन्दू बहुल हुआ करता था। लेकिन बाद में मुस्लिम धर्म के प्रभाव में बाली के अलावा पूरा देश मुस्लिम धर्म बहुत हो चुका है। खास बात है कि इन्डोनिशया के मुस्लिम बहुत होते हुए भी बाली में पूरी तरह हिन्दू प्रभाव ही दिखाई देता है। यहां के हिन्दू धर्म का पूजा पद्धति भारत से अलग है। यहां मुख्य रूप से ब्रह्मा , विष्णु और महेश की पूजा की जाती है। यहां लगभग हर घर में एक बड़ा मंदिर बना होता है। यहां बहुत से प्रसिद्घ मंदिर हैं जिनकी सैर की जा सकती है।

4- हर बजट में रहने की सुविधा-

बाली में हर बजट के यात्री के लिए रहने के ठिकाने उपलब्ध हैं। यहां एक से बढ़कर आलीशान रिजॉर्ट्स से लेकर सस्ते हॉस्टल तक सब कुछ मिल जाते हैं। यहां 1000 भारतीय रूपयों में कमरा आसानी से मिल जाता है। ऊपर के बजट की तो कोई सीमा ही नहीं है।

5- मौज-मस्ती का ठिकाना

बाली मौज मस्ती के लिए सही जगह है। अगर आपको नाइटलाइफ पसंद है तो बाली आपके लिए बिल्कुल सही है। यहां के समुद्र के किनारे के बाजारों में ढरों नाइटक्लब, पब और रेस्टोरेंट्स हैं जिनमें आप देर रात तक मस्ती कर सकते हैं। बजट के लिहाज से भी ये बहुत मंहगें नहीं हैं।

(This trip was sponsored by Indonesia tourism and Malindo air. Views expressed here are mine.)

रायगढ़ का चक्रधर समारोह – शास्त्रीय और लोक कलाओं का मंच

रायगढ़ का चक्रधर समारोह – शास्त्रीय और लोक कलाओं का मंच

देश के आम छोटे कस्बों या शहरों जैसा ही है छत्तीसगढ़ का रायगढ़। यहां पहुंचने पर आप को कुछ खास नजर नहीं आएगा। लेकिन यह शहर कला की दुनिया में अपनी अलग ही पहचान रखता है। यही वजह है कि इसे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है। इसी सांस्कृतिक नगरी की पहचान है यहां होने वाला वार्षिक चक्रधर समारोह।

रायगढ़ में कला का इतिहास
कला की दुनिया में रायगढ की यह पहचान बहुत पुरानी है। इसकी शुरूआत यहां के राजघराने के समय में ही हो गई थी। आज़ादी के पहले से ही यहां के राजघराने ने कला की विभिन्न विधाओं को संरक्षण देने का काम शुरू कर दिया था। संगीत, नृत्य और काव्य की धारा इस शहर में बहा करती थी। रायगढ की इस सांस्कृतिक विरासत को सबसे मजबूत करने का काम किया यहां के राजा चक्रधर सिंह ने। चक्रधर सिंह अच्छे तबला और सितार वादक होने के साथ तांडव नृत्य में भी निपुण थे। वर्ष 1924 में उनके गद्दी पर बैठने के साथ ही यहां कला की नई दुनिया का आगाज़ हुआ। उन्होंने कत्थक के लखनऊ और जयपुर घराने से जुड़े गुरूओं को रायगढ़ बुलाया। कत्थक की इन दोनों शैलियों के मेल से उन्होंने कत्थक की एक नई “रायगढ़ शैली” की शुरूआत की। राजा चक्रधर ने संगीत और काव्य पर बहुत से ग्रंथों की रचना की। उन्होंने कई बहुत से उपन्यास भी लिखे थे। उर्दू भाषा पर भी उनकी पकड़ बेहतरीन थी। उन्होंने फरहत के उपनाम से उर्दू भाषा में गज़लें लिखीं। उनका जन्म गणेश चतुर्थी के दिन हुआ था। उनके पिता ने उनके जन्म की खुशी में गणेश चतुर्थी के दिन शहर में उत्सव मनाना शुरू किया था। राजा चक्रधर की याद में 1985 से गणेश चुतुर्थी के अवसर पर यहां के राजघराने ने चक्रधर समारोह की शुरुआत की। इसमें देश के बड़े कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। बाद में साल 2001 में जिला प्रशासन ने उत्सव का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया तब से जिला प्रशासन इसे सफलतापूर्वक पूरा कर रहा है।

चक्रधर समारोह 2018
इस बार हुआ 34वां चक्रधर समारोह भी खास था। दस दिन तक चले इस उत्सव में देश के जाने माने संगीतकारों, नर्तकों, गायकों और कलाकारों ने हिस्सा लिया। यहां शास्त्रीय संगीत से लेकर गज़लों और आधुनिक म्यूज़िक बैंड्स ने भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। एक छोटे से शहर में देश के नामचीन कलाकारों को बुलाना, उनकी व्यवस्था करना और सफल कार्यक्रम का आयोजन करवाना आसान काम नहीं हैं।

जिला प्रशासन पूरी मेहनत के साथ इस आयोजन का पूरा करवाता है। इसमें इसे स्थानीय लोगों का भी पूरा सहयोग मिलता है। कार्यक्रम में राजा चक्रधर के वंशज भी हिस्सा लेते हैं। शहर की प्रमुख इमारतों, चौराहों और कभी राजपरिवार का निवास स्थान रहे मोती महल को रोशनी से सजाया जाता है। यह गणेश चतुर्थी का समय होता है इसलिए शहर में सजे गणेश पंडालों में भी चहल-पहल होती है। मुझे दो दिन के लिए यह समारोह देखने का मौका मिला।

इस वर्ष के कार्यक्रम में छन्नूलाल मिश्रा, भजन सोपोरी, वारसी बंधु, रूपकुमार व सोनाली राठौर जैसे प्रख्यात कलाकारों ने हिस्सा लिया।
यहां होने वाली भारी भीड़ को देखकर मुझे ताज्‍जुब हो रहा था कि ऐसे छोटे शहर में शास्त्रीय संगीत के चाहने वालों की कोई कमी नहीं है। लोग देर रात कार्यक्रमों को देखने के लिए डटे रहते हैं।

छत्तीसगढ़ के लोक संगीत को मिलने वाला प्रोत्साहन चक्रधर संगीत समारोह की बड़ी खासियत है। इन वर्ष भी छत्तीसगढ़ के संगीत और गायन की बहुत सी प्रस्तुतियां यहां देखने को मिली। मुझे पंडवानी बेहद पसंद आई। पंडवानी को दुनिया भर में पहचान दिलवानी वाली तीजन बाई भी छत्तीसगढ़ से ही हैं। अब तीजन बाई के बाद राज्य की युवा पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ाने के काम में लगी है।

पंडवानी गायिका रश्नि वर्मा

पंडवानी एक एकल नाट्य कला है। इसमें पंडवानी जुड़ी है महाभारत के पांडवों से , इसलिए इसमें महाभारत की कथाओं का गायन किया जाता है। कलाकार की गायन शैली पंडवानी को खास बनाती है। कहानी के चरित्रों के हिसाब से चेहरे के हाव-भाव से लेकर आवाज़ में होने वाला उतार चढ़ाव अद्भुत लगता है। इस बार के चक्रधर समारोह में रश्नि वर्मा ने पंडवानी गायन किया।

रायगढ़ में क्या देखें

रायगढ़ में करीब दो दिन रूकना था और चक्रधर समारोह देर शाम ही शुरू होता था। इसलिए काफी समय था कि जिसमें आस-पास घूमा जा सकता था। छत्तीसगढ़ का यह इलाका पहाड़ों, नदियों, जंगलों और झरनों से भरा हुआ है। यहां देखने के लिए बहुत सी प्राकृतिक जगहें हैं जहां कुछ समय बिताया जा सकता है।

भारतीयों के लिए दुबई वीज़ा

भारतीयों के लिए दुबई वीज़ा

काँच और स्टील से बनी ऊँची इमारतें, चमक-दमक से भरे शॉपिंग माॉल्स और घूमने के लिए एक सुरक्षित ठिकाना होने के कारण दुबई दुनिया में सबसे ज्यादा घूमे जाने वाले शहरों की सूची में अगले नंबर पर आता है। दुबई जाने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या भी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। मुझे ये शहर बहुत पसंद है और पिछले कुछ वर्षों में मैं तीन बार यहाँ जा चुका हूँ। मैं दुबई घूमने के अपने अनुभव साझा करूँ उससे पहले इस लेख में दुबई वीज़ा कैसे मिले इस बारे में बता रहा हूँ।

कैसे लें दुबई वीज़ा

दुबई वीज़ा के लिए आवेदन करने से पहले मुझे यही पता था कि दुबई दुनिया के उन कुछ देशों में से है जो भारतीयों को आसानी से वीज़ा देता है। मैंने जब तलाश करने की कोशिश की तो पता चला कि यह बात सही है तो है लेकिन पूरी तरह नहीं। जानने कि कोशिश करते हैं कि ऐसा कैसे हैं।
दरअसल बात यह है कि दुबई के लिए वीज़ा नियम आसान तो हैं लेकिन वे एक जैसे नहीं है। आप पर कैसे नियम लागू होंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहाँ से वीजा के लिए आवेदन कर रहे हैं। आप को आसान ज़रिया भी मिल सकता है और थोड़ा मुश्किल भी। मुश्किल से मेरा मतलब है कि आपको बैंक डिटेल, इनकम टैक्स रिटर्न या अपनी नौकरी से जुड़े दस्तावेज जमा करने पड़ सकते हैं।

संयुक्त अरब अमीरात का भारतीय दूतावास सीधे वीज़ा की सुविधा नहीं देता । दुनिया भर में आधिकारिक रूप से अधिकतर देशों के लिए वीज़ा देने का काम देखने वाली कंपनी VFS भारत में केवल उन्हीं लोगों को दुबई वीज़ा देती है जो दुबई की आधिकारिक एयरलाइन्स एमिरेट्स या फ्लाईदुबई के जरिए यात्रा करते हैं। दूसरे लोगों को एयरलाइन्स या एजेंट्स के ज़रिए वीज़ा लेना होता है।

दुबई या संयुक्त अरब अमीरात के लिए ई-वीज़ा की सुविधा है।आप चाहे किसी भी तरीके से वीज़ा लें, आपको किसी ऑफिस या दूतावास में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बस ईमेल से अपने ज़रूरी दस्तावेज़ भेजने के बाद आपको ई-वीज़ा मिल जाता है।

भारतीयों को निम्नलिखित 4 प्रमुख तरीकों से दुबई का पर्यटन वीज़ा मिल सकता है।

1- वीजा ऑन अराइवल
2- एयरलाइन्स के ज़रिए
3- वीज़ा एजेंट्स के ज़रिए
4- ट्रांजिट वीज़ा ( अभी घोषणा लेकिन लागू नहीं)

अब मैं एक-एक करके सभी तरीकों के बारे में आपको बताऊंगा जिसके आपको अंदाजा हो जाएगा कि आपके लिए कौनसा तरीका आसान रहेगा।

1- वीज़ा ऑन अरावल –
इसका मतलब है दुबई एयरपोर्ट पहुँचने पर आपको आसानी से वीज़ा मिल जाएगा। लेकिन इसमें एक शर्त यह है कि भारतीय पासपोर्ट धारकों के पास पहले से अमेरिका का वैध विजिटर वीज़ा या ग्रीन कार्ड होना चाहिए। इसके साथ ही ब्रिटेन या यूरोपियन यूनियन का रेजिडेंसी वीजा रखने वाले भारतीय भी इस वीज़ा ऑन अराइवल की सुविधा का फायदा उठा सकते है। भले ही यह सबके लिए नहीं लेकिन फिर भी काफी भारतीय इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं।

फीस- इस सुविधा को लेने के लिए आपको 100 दिरहम का शुल्क चुकाना होगा। साथ में 20 दिरहम का सर्विस चार्ज भी देना होगा।

अवधि- एक बार में 14 दिन का वीज़ा लिया जा सकता है। जिसे 250 दिरहम का शुल्क चुकाकर अगले 14 दिन तक बढ़वाया जा सकता है। वीज़ा बढ़वाने की सुविधा एक ही बार मिलेगी।

2- एयरलाइन्स के ज़रिए-
भारत से दुबई जाने वाली लगभग सभी हवाई कंपनियां अपने ग्राहकों के लिए दुबई वीज़ा दिलवाती हैं। इसके लिए आपको संबंधित एयरलाइन की वेबसाइट के जरिए आवेदन करना होता है। वीज़ा फीस चुकाने के बाद आपको ईमेल के जरिए ई-वीज़ा मिल जाता है।
अगर आप दुबई की आधिकारिक एयरलाइन्स , एमिरेट्स या फ्लाई दुबई से यात्रा कर रहे हैं तो फिर VFS के जरिए आप दुबई वीजा के लिए आवेदन कर सकते हैं। VFS केवल एमिरेट्स या फ्लाई दुबई से रिटर्न टिकट खरीदने वालों को वीज़ा सुविधा देता है।
इसके अलावा भारत से जाने वाली दूसरी एयरलाइन्स जैसे एयरइंडिया, इंडिगो, स्पाइस जेट, जेट एयरवेज़, एतिहाद और एयर एरेबिया भी वीज़ा की सुविधा देती हैं। इसके लिए नियम यह है कि आप जिस एयरलाइन के ज़रिए वीज़ा का आवेदन कर रहे हैं आपके पास उस एयरलाइन का रिटर्न टिकट होना चाहिए।

लेकिन यहीं आकर दुबई वीज़ा लेने की दुविधा शुरु होती हैं। एयरलाइन्स के जरिए वीज़ा का आवेदन करने पर आपको अपने बैंक डिटेल के साथ दो साल का आटीआर या फिक्सड डिपोजिट या पैन कार्ड की जानकारी देनी पड़ती है। अलग -अलग एयरलाइन्स के हिसाब से इनमें कुछ अंतर हो सकता है। जब दूसरे आसान उपाय मौजूद हैं जहां बिना किसी तरह की जानकारी दिए दुबई वीज़ा मिल जाता है ( उसका जिक्र आगे ) तो एयरलाइन्स के ज़रिए वीजा लेने में मुश्किल नियम क्यों रखें गए हैं यह समझ नहीं आया।

अगर आप एमिरेट्स या फ्लाई दुबई के टिकट से यात्रा कर रहे हैं तो इतनी आसानी जरूर मिलती है कि अगर आपने आवेदन करने के पिछले पांच वर्ष के भीतर दुबई की यात्रा की है या आपके पास अमेरिका , ब्रिटेन, यूरोप, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा या स्विटज़रलैंड का वैध वीज़ा है तो आपको किसी तरह की बैंक या आटीआर की जानकारी नहीं देनी पड़ती।

दुबई वीज़ा के लिए इतने अलग नियम क्यों रखे हैं यह समझ नही आता? एक देश जो पर्यटन में दुनिया का अगुआ बनने की इच्छा रखता है वहां एक जैसे नियम होना बेहतर रहता है।

3- वीज़ा एजेन्ट्स के ज़रिए —
दुबई का वीज़ा लेने का सबसे आसान ज़रिया हैं वीज़ा एजेंट्स जो बिना किसी परेशानी के आपको वीज़ा दिला देते हैं। बस आप ईमेल से अपना पासपोर्ट और पासपोर्ट साइज फोटो ( सफेद बैंकग्राउन्ड के साथ ) उनको भेज दीजिए और 2-3 दिन में आपको ईमेल पर वीज़ा मिल जाएगा। हालांकि हर एजेन्ट की वीज़ा फीस में अंतर हो सकता है। मुझे अलग- अलग वीज़ा एजेन्ट की फीस में 500 रूपये तक का अंतर मिला। मोटे तौर पर फिलहाल 6000 रूपये में आप दुबई का वीज़ा ले सकते हैं।

एजेन्ट से वीज़ा लेना आसान तो है लेकिन एजेंट्स भी अपने हिसाब से दस्तावेज मांगते हैं। मैने पहले वीज़ा के लिए Musafir से बात की और उन्होंने केवल पासपोर्ट और फ़ोटो ही मांगा। जबकि अकबर ट्रेवल ने पहले तो केवल पासपोर्ट और फ़ोटो देने को कहा लेकिन बाद में मुझसे नौकरी से जुड़ा और पहचान पत्र मांगा। इसलिए आप अपने हिसाब से कुछ एजेन्टस से बात कर लें। मैंने आखिर में travel2dubai से वीज़ा लिया।

4- मुफ्त ट्रांजिट वीज़ा –
मुफ्त ट्रांजिट वीजा के इस नियम की घोषणा हाल ही में की गई है। इसे लागू करने की तारीख़ के बारे में अभी कुछ नहीं कहा गया है। उम्मीद है कि जल्द ही यह नियम लागू हो जाएगा। अगर आप भारत से दुनिया के किसी देश में जा रहे हैं और उस दौरान आपको बीच में दुबई से अपनी फ्लाइट बदलनी है तो आप इस सुविधा का फायदा ले सकते हैं। इसके तहत आपको 48 घंटे के लिए दुबई का मुफ्त ट्रांजिट वीजा एयरपोर्ट पर ही दिया जाएगा । इसके लिए शर्त यह है कि आपको आपके पास आपके पास किसी तीसरे देश में जाने का वैध हवाई टिकट होना चाहिए। ये सुविधा पूरी तरह से मुफ्त हैं। आप चाहें तो इसे 96 घंटे के लिए भी यह वीज़ा ले सकते हैं जिसके लिए आपको 50 दिरहम की फीस चुकानी होगी। अगर आप दुबई के रास्ते कहीं जा रहे हैं तो इस आसान और मुफ्त सुविधा का लाभ उठाकर बहुत कम खर्च में दुबई घूम सकते हैं। क्योंकि ध्यान रखिए दुबई के सामान्य टूरिस्ट वीज़ा के लिए आपको ख़ासी रकम खर्च करनी पड़ती है।

OTB ( Ok to Board) – दुबई वीज़ा से जुड़ी एक जरूरी बात है OTB। ध्यान रखिए कि टूरिस्ट वीज़ा पर दुबई जाने वालों को अब OTB की जरूरत नहीं होती। हां, अगर आपके पासपोर्ट पर ECR स्टैम्प है तो आपको टूरिस्ट वीज़ा लेने पर भी OTB करवाना होगा।

जरूरी बेवसाइट-
दुबई वीज़ा से जुडी आधिकारिक जानकारी के लिए यूएई इमिग्रेशन की वेबसाइट- https://government.ae/en/information-and-services/visa-and-emirates-id
यहाँ सभी जरूरी जानकारियाँ आपको मिल जाएंगी। इसके अलावा सभी एयरलाइन्स की वेबसाइट्स और VFS की बेवसाइट पर भी जानकारी मिल जाएगी।

दुबई वीज़ा के लिए कुछ एजेंट्स – musafir.com, akbartravels.com, travel2dubai.com

कोहका विल्डरनर्स कैंप ( Kohka wilderness camp) – जंगल में बना शांत कोना..

कोहका विल्डरनर्स कैंप ( Kohka wilderness camp) – जंगल में बना शांत कोना..

कोहका विल्डरर्नस कैंप तक पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया था। फरवरी के शुरूआती हफ्ते में हल्की ठंड बनी हुई थी इसलिए गांव के रास्ते में भी कोई खास हलचल दिखाई नहीं दी। पेंच नेशनल पार्क का सफर मेरे लिए खास था क्योंकि पिछले साल में मध्य प्रदेश के दो प्रसिद्ध नेशनल पार्क कान्हा और बांधवगढ़ को देख चुका था और इस साल के सफर की शुरूआत मध्य प्रदेश के ही एक और लोकप्रिय नेशनल पार्क पेंच से होने जा रही थी।

सबसे पहली चीज़ जो कोहका में ध्यान खींचती है वह है यहां की असीम शांति । पेंच के बफर ज़ोन से लगे इस रिजॉर्ट में दूर-दूर तक कोई आवाज नहीं थी। कोहका पहुंचते ही सबसे पहले सौरभ से मुलाकात हुई।
सौरभ ने कुछ साल पहले संजय के साथ मिलकर कोहका रिजॉर्ट की शुरूआत की थी।कहा जाता है कि दुनिया के कुछ बेहतरीन बिजनेस आइडिया यूं ही किसी बातचीत से शुरू हुए हैं। कोहका का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा। सौरभ और संजय दोनों की मुलाकात किसी जंगल के एक सफर के दौरान हुई। वहीं दोनों को किसी जंगल में रिजॉर्ट बनाने का ख्याल आया। एक जैसी सोच के कारण उन्होंने बात को आगे बढ़ाया और पेंच में कोहका की शुरूआत की। इसे शुरू करने के समय सौरभ आयरलैंड के एक लक्जरी होटल में अच्छी नौकरी कर रहे थे और संजय मुंबई में चार्टड अकाउंट थे। लेकिन जंगल का प्यार दोनों को पेंच ले आया।इन्होंने इसे एक ईको-फ्रेंडली रिजॉर्ट के तौर पर विकसित किया। कोहका गावं में बना होने के कारण इसे कोहका नाम दिया गया।

ईको- फ्रेंडली है कोहक

कोहका को एक ईको फ्रेंडली तरीके से बनाने और चलाने की कोशिश की गई है। यहां कुल तीन एकड़ के इलाके में केवल 12 कॉटेज बनाई गई हैं। इसलिए यहां कभी भी आयें भीड़ का अहसास नहीं होगा। रिजॉर्ट को बनाते समय वहां लगे किसी पेड़ को काटा नहीं गया। कुछ जगहों पर निर्माण को पेड़ के हिसाब से ही आकर दिया गया है।

रिजॉर्ट में बिजली की जरूरत को पूरा करने के लिए 7 किलोवॉट का सोलर सिस्टम लगाया है जिससे दिन हो या रात कैंप की ज्यादातर जरूरत पूरी हो जाती है।

कैंप को बनाने में जहां तक हो सके सारा सामान स्थानीय स्तर से ही जुटाने की कोशिश की गई है। यहां बहुतायात से मिलने वाली बांस जैसी चीजों का काफी इस्तेमाल किया गया है। कैंप को सजाने और रोशनी के लिए पुरानी कांच की बोतलों से लैंप बनाए गए हैं तो रास्तों पर रोशनी देने के लिए लगी छोटी एलईडी लाइटों को खुद सौरभ ने कैंप में ही तैयार किया है। यहां तक कि बाथरूम में नहाने का शॉवर भी बांस से ही बनाया गया है।

कमरों में गर्म पानी देने के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाला गीजर लगाया गया है।मैं वहां पांच दिन था । पांच दिनों में से एक दिन सुबह से शाम तक बरसात होती रही और दूसरे दिन भी बादलों में पीछा नहीं छोड़ा लेकिन उसके बाद भी तीसरे दिन इस्तेमाल के लायक गर्म पानी मौजूद था।

जैविक खेती
Organic farming at Kohka

यहां रिजॉर्ट के काफी बड़े हिस्से में जैविक खेती की जाती है। रिजॉर्ट में इस्तेमाल की जाने वाली सब्जियों का बड़ा हिस्सा इस खेती से पूरा किया जाता है। जरूरत पड़ने पर सामान को पास के गांव से ही खरीदा जाता है। इस लिए आप निश्चिंत होकर यहां ऑर्गेनिक खाने का मजा उठा सकते हैं।

कोहका का खाना
कोहका के खाने में भी आपको एक सादगी और अलग सा स्वाद मिलेगा। यह स्वाद कुछ तो यहां की ऑर्गेनिक सब्जियों के कारण है और कुछ उस प्यार के कारण जिससे यहां खाना बनाया जाता है। पहले की दाल, सब्जी और रोटियों का स्वाद जुबान पर थी कि अगली सुबह पोहा, इडली के नाश्ते ने तो रंग ही जमा दिया। अगले चार दिनों तक अलग – अलग तरह की सब्जियां और दालें खायीं। सभी में स्वाद और देसीपन था। एक दिन दोपहर में खासतौर से महाराष्ट्र का खाना बनाया गया जिसमें झुमका, भाकर और पूरन पोली शामिल था। सौरभ से मैंने पूछा कि विदेशी मेहमानों के लिए क्या कॉन्टीनेन्टल खाने की व्यवस्था भी है तो उन्होंने कहा कि वे सभी मेहमानों को भारतीय खाना ही खिलाते हैं और सभी इसे प्यार से खाते हैं।

कोहका के कमरे

कोहका के कॉटेज

यहां कुल 12 कमरे हैं जिन्हें कॉटेज की तरह बनाया गया है। कमरों में आपकी जरूरत का फर्नीचर रखा गया है। बांस के बनीं लैंप से कमरे को सजाया गया है जिन्हें स्थानीय कारीगरों से ही तैयार करवाया गया है।
कमरे में सोने के लिए लकड़ी के पलंग लगाने की बजाए सीमेंट से एक चबूतरा बनाया गया है जिस पर गद्दा लगाया गया है। कमरे में पेंच में पाये जाने वाले जानवरों और पक्षियों की तस्वीरें लगी हैं।


कमरों के बाहर बैठने के लिए बरामदा है जहां रिजॉर्ट की हरियाली और यहां के पक्षियों को देखते हुए समय बिताया जा सकता है।
कमरे में आराम का सारा सामान है और सब कुछ बहुत सरल तरीके से सजाया गया है।

समय बिताने की जगहें


तीन एकड़ के इस रिजॉर्ट काफी पेड़ पौधे हैं और अगर आपको तितलियों और पक्षियों को तलाश करने का शौक है तो यह समय बिताने का सबसे अच्छा जरिया है।
यहां एक लाइब्रेरी और टीवी रूम है जहां काफी किताबें और मासिक पत्रिकाएं रखी गई हैं। खेलने के लिए कैरमबोर्ड और लूडो जैसी चीजें भी हैं। मैंने भी दोस्तों के साथ कैरम बोर्ड पर हाथ आजमाया। कैरम खेलते हुए घंटो कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।

लाइब्रेरी और टीवी रूम

यहां एक बड़ा स्विमिंग पूल भी है। गर्मी के मौसम में यहां आ रहे हैं तो शाम के समय स्विंमिग पूल के ठंड़े पानी में समय बिताया जा सकता है।

क्या क्या कर सकते हैं

पेंच नेशनल पार्क की सफारी तो यहां का मुख्य आकर्षण है लेकिन उसके अलावा भी यहां काफी कुछ किया जा सकता है। कोहका पेंच के बफर ज़ोन से लगा है। यहां पास के जंगल में नेचर वॉक की जा सकती है। पहुंचने के अगले दिन सुबह 6 बजे हम लोग जंगल में नेचर वॉक के लिए निकले। कैंप के नेचर गाईड अनिल हमारे साथ थे। पास के गांव के रहने वाले अनिल को जंगली जानवरों, पेड़ पौधों और पक्षियों की बहुत अच्छी जानकारी है। वे हर चीज की जानकारी देते हुए चलते हैं। भले ही लंबा चलना था लेकिन उनसे बातें करते हुए और जंगल की सुन्दरता को देखते हुए पता ही नहीं चला कि समय कब बीत गया। हमें तो जंगल में एक दहाड़ भी सुनाई दी हालांकि अनिल ने उसे नहीं सुना इसलिए कहा नहीं जा सकता कि वहां बाघ था या नहीं । हमारी नेचर वॉक पास की कोहका झील पर खत्म हुई।

कोहका झील..

कोहका कैंप से कुछ ही दूरी पर कोहका झील है बहुत साल पहले इसे आसपास के इलाके की पानी की जरूरत पूरा करने के लिए बनाया गया था। कोहका से जंगल के रास्ते झील तक जाकर लंबा समय बिता सकते हैं। आज यह झील पक्षियों को देखने की सबसे बढ़िया जगह है। फरवरी का महीना होने का कारण काफी प्रवासी पक्षी भी यहां थे। मैंने यहां दो दिन में करीब 30-35 तरह के पक्षियों को देखा।इस नेचर वॉक में आदिवासी गांव की जिंदगी को भी करीब से देखा जा सकता है।

शाम को कोहका झील पर चाय और पकौडे़ो का साथ..

एक दिन बाद हम शाम को फिर से झील की सैर पर गए और इस बार सैर के साथ कोहका कैंप ने वहां शाम के चाय और नाश्ते का इंतजाम भी किया था। शाम के ढलते सूरज के साथ झील के किनारे चाय पीने का अलग ही मजा है। मन करता है कि वहीं बैठे रहें। शाम की सैर में संजय भी हमारे साथ थे। उन्हें भी फोटोग्राफी और पक्षियों की बढिया जानकारी है। उनसे पता चला कि कैंप से पास ही एक पेड़ पर उड़न गिलहरी (Flying Squirrel) का बसेरा है। अंधेरा होने पर उसे देखने का मौका मिल सकता है। अंधेरे में काफी देर इंतजार करने पर हमें वह दिखाई दे ही गई। घने अंधेरे और उसके तेजी से उड़ने के कारण उसका फोटो ले पाना संभव नहीं हुआ।

कोहका के पास पचधार नाम का गांव है। यह कुम्हारों का गांव है। यहां मिट्टी के बर्तन और दूसरे समान बनाये जाते हैं। यहां जाकर मिट्टी के बर्तन बनाने में हाथ आजमाया जा सकता है। टेरिकोटा का सामान पंसद करते हैं तो यहां की यादगार के तौर पर सजावटी सामान भी खरीद सकते हैं।

जंगल सफारी —
पेंच आने का असली मकसद तो जंगल सफारी ही होता है। यहां कैंप के पास पेंच नेशनल पार्क का तूरिया गेट है। जहां से सुबह और शाम की सफारी की जा सकती है। यह जंगल बाघ के लिए जाना जाता है लेकिन बाघ ना भी मिले तो दूसरे जानवरों और प्रकृति की सुन्दरता का मजा उठाइये। मुझे भी इस बार बाघ नहीं दिखाई दिया। सफारी आप मध्य प्रदेश वन विभाग की वेबसाइट से बुक कर सकते हैं या पहले से रिजॉर्ट के बता दें तो वे भी इसमें मदद कर सकते हैं।

साथी ट्रेवल ब्लागर- अभिनव, मंजूलिका और स्वाति के साथ पेंच सफारी पर

पेंच नेशनल पार्क का एक गेट है खुरसापार। यह गेट पेंच नेशनल पार्क के महाराष्ट्र वाले हिस्से में पड़ता है। यहां के लिए सफारी की जा सकती है।
पेंच नेशनल पार्क दो राज्यों मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर है। इसका इलाका दोनों ही राज्यों में बंटा हुआ है। दोनों ही राज्यों के इलाकों में सफारी उपलब्ध है।

कोहका विल्डरनर्स कैंप एक फाउन्डेशन भी चलाता है। जिसके जरिए पास के आदिवासी गावों की शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए काफी काम किया जाता है। फाउन्डेशन गांव के सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्षा लगाकर उन्हें पढ़ाने और कंप्यूटर शिक्षा देने का काम भी करता है।
कोहका फाउन्डेशन गांव की महिलाओं के साथ मिलकर ऑर्गेनिक उत्पाद जैसे अचार, पापड, जैम,मुरब्बे , साबुन , शैंपू भी बनाता है। कोहका की रसोई और यहां कॉटेज में यहीं के बने सामान, शैंपू और साबुन इस्तेमाल किए जाते हैं।
इस तरह कोहका कैंप पर्यटकों की जरूरतों को पूरा करने के साथ स्थानीय समाज के विकास में भी योगदान करने की कोशिश कर रहा है। कोहका में काम करने वाले सभी लोग भी आसपास के गावों से ही हैं।

कैसे पहुंचे —-

पेंच नेशनल पार्क नागपुर से करीब 90 किलोमीटर दूर है। नागपुर देश के सभी हिस्सों से रेल और हवाई सेवा से जुड़ा है। नागपुर से पेंच के लिए टैक्सी की जा सकती है।

कब जायें —-
भारत में आमतौर पर सभी नेशनल पार्क मानसून के समय जुलाई से सितम्बर के बीच बंद रहते हैं। इसके अलावा किसी भी समय यहां आया जा सकता है। वैसे गर्मी में अप्रेल से जून का समय जंगली जानवरों के देखने के लिए बेहतर माना जाता है। अगर पक्षियों और खासतौर से प्रवासी पक्षियों को देखना चाहते हैं तो सर्दियों के मौसम में यहां आइये।

( This trip was organised by Kohka wilderness camp )

कुछ तस्वीरें….

उत्तराखंड की 10 जगहें जो आपको देखनी चाहिए

उत्तराखंड की 10 जगहें जो आपको देखनी चाहिए

देवभूमि उत्तराखंड का प्राकृतिक सुन्दरता में कोई मुकाबला नहीं है। बर्फ से ढ़के पहाड़े, देवदार के घने जंगल, नदियां और झीलें आपका मन मोह लेते हैं । उत्तराखंड की अनगिनत जगहों में से चुनी हुई 10 जगहें में आपके सामने रख रहा हूँ।

1- जागेश्वर

Source- https://en.wikipedia.org/wiki/Jageshwar_Temples,_Uttarkhand#/media/File:Image_ank.JPG

ऊंचे पहाडों, देवदार के घने जंगलों और जटागंगा नदी के किनारे बसा है उत्तराखंड का जागेश्वर शिव धाम। अलमोड़ा से करीब 35 किलोमीटर दूर घने जंगल में मौजूद जागेश्वर पहुंचते ही असीम शांति का एहसास होता है। जागेश्वर की गणना भगवान शिव के बारह ज्योर्तिलिंगों में की जाती है। यहां 7वीं शताब्दी से 18 वीं शताब्दी के बीच करीब 125 मंदिर बनाए गए हैं ।मान्यता है भगवान शिव के लिंग रूप की पूजा जागेश्वर से ही शुरू हुई। जागेश्वर को ‘कुमाऊँ का काशी’ भी कहा जाता है। जागेश्वर प्राचीन कैलाश मानसरोवर मार्ग पर स्थित है। ये अल्मोड़ा से करीब 35 किलोमीटर दूर है।

2- बिनसर


प्रकृति का अनुछुआ सौंदर्य देखना चाहते हैं तो बिनसर जरूर जाइए। उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पास का बिनसर एक वन्य प्राणी विहार भी है। बांज और बुरांस के जगलों वाले बिनसर में तेंदुए पाए जाते है। जंगल भी इतना घना कि कुछ इलाकों में सूर्य की रोशनी भी शायद ही पहुंचती हो। बिनसर से हिमालय की नंदा देवी, त्रिशुल, पंचाचुली, नंदाकोट, मृगधूनी जैसी बर्फीली चोटियों का 300 किलोमीटर लंबा अद्भुत नजारा दिखाई देता है। आधुनिक सुविधाओं से दूर यहां कुछ दिन बिताने का अनुभव जिंदगी भर नहीं भुलाया जा सकता। बिनसर अल्मोड़ा से करीब 30 किलोमीटर है।

3- रामगढ़

गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर ने यहां रहकर गीतांजली का कुछ हिस्सा लिखा था। हिन्दी कवियित्री महादेवी वर्मा ने भी यहां के शान्त और सुकून भरे माहौल में लेखन किया । उत्तराखंड के रामगढ़ कस्बे का यह इतिहास इसे खास बनाता है। इसके साथ यहां हिमालय की बेजोड़ खूबसूरती को जोड़ दे तो फिर इस जगह का कोई मुकाबला नहीं। समुद्रतल से 1729 मीटर ऊंचाई पर बसे रामगढ़ की आबोहवा फलों की खेती के भी माकूल है। आडू, खुमानी, सेब जैसे फलों के बगीचों की यहां कमी नहीं इसलिए इसे  ‘कुमाऊँ का फलों का कटोरा’ भी कहा जाता है। रामगढ़ नैनीताल से करीब 34 किलोमीटर दूर है।

4- मुक्तेश्वर

उत्तराखंड की सबसे खूबसूरत जगहों में मुक्तेश्वर का नाम लिया जाता है। नैनीताल जिले का यह छोटा का कस्बा कुछ दिन शांति से बिताने वाले पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। 2286 मीटर की ऊंचाई इसके मौसम को खास बनाती है। इस जगह का नाम यहां भगवान शिव के मंदिर के नाम पर पड़ा जिसे मुक्तेश्वर धाम कहा जाता है। 1893 में यहां इडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई जहां आज भी जानवरों से जुडें मामलों पर रिसर्च किया जाता है। मुक्तेश्वर रामगढ़ से 30 किलोमीटर है।
 

5- रानीखेत

रानीखेत को प्रकृति प्रेमियों का स्वर्ग माना जाता है। रानीखेत की खूबसूरती को शब्दों में नहीं उतारा जा सकता इसे यहां आकर ही महसूस किया जा सकता है। अंग्रेजों के समय इसे सैनिक छावनी बनाया गया। सैनिक छावनी होने के कारण इसका रखरखाव देखते ही बनता है। साफ सुथरी सड़कें, देखने के लिए एक प्यारा सा गोल्फकॉर्स , सेना का म्यूजियम, फलों के बगीचे और प्राचीन मंदिर इसे और भी खास बनाते हैं। यहां का चौबटिया फल उद्यान देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

6- शीतलाखेत
जब बस जंगल के बीच रहने का मन करे , आप चाहें कि आस पास घूमते हिरण आपको दिखाई देते रहें, सुबह चिड़ियों के चहचहाने से आपकी नींद खुले और साथ में पहाडी मौसम का आनंद भी मिले तो बस शीतलाखेत चले आएं। रानीखेत के पास बसा यह छोटा सा गांव बस आराम करने के लिए ही है। कुछ करना चाहें तो  करीब तीन किलोमीटर की चढाई करके पहाड़ की चोटी पर बने मंदिर तक जाएं और मंदिर की चोटी से उत्तराखंड के शानदार नजारों का मजा लें। ये रानीखेत से शीतलाखेत करीब 30 किलोमीटर है।
 

7-नैनीताल

एक बड़ी सी झील, उसमें तैरती रंग-बिरंगी नावें, पानी में दिखाई देता शहर का अक्स,   किनारे बनी माल रोड, पुराने चर्च और इमारतें। अंग्रेजी दौर की खनक और आधुनिकता का अजब मेल है नैनीताल। अंग्रेजों ने आराम करने के लिए उत्तराखंड के इस हिल स्टेशन को बसाया था । खास बात यह है कि उस दौर की खूबसूरती को नैनीताल ने आज भी संजो कर रखा है। कहा जाता है मां सती की आंख ( नैन) यहां गिरी थी जिसके आधार पर इसका नाम नैनीताल पड़ा। झील के किनारे नैयना देवी का प्राचीन मंदिर भी है जो 64 शक्तिपीठों में से एक है।  

8-चौकोरी
ऊंचे बर्फीले पहाडों और घनों जगलों से घिरा है उत्तराखंड का छोटा सा कस्बा चौकोरी। यहां से पंचाचूली और नंदा देवी की बर्फ से ढकी चोटियों का अद्भुत दृश्य नजर आता है। ऐसा लगता है कि हम बिल्कुल इन पहाडों के सामने खडे हैं। यह अनजाना कस्बा प्रकृति प्रेमी पर्यटकों के बीच धीर-धीरे लोकप्रिय हो रहा है। चौकोरी समुद्र तल से 2010 मीटर की ऊंचाई पर है। प्रकृति की अनछुई सुन्दरता को करीब से महसूस करने के लिए चौकोरी बढिया जगह है। यह कस्बा नैनीताल से 173 किलोमीटर की दूरी पर है।

9- मुनस्यारी
उत्तराखंड के चीन से लगते जिले पिथौरागढ का खूबसूरत कस्बा है मुनस्यारी। यह इलाका इतना खूबसूरत है कि इसे छोटा कश्मीर भी कहा जाता है। मुनस्यारी रोमांचक खेल और प्राकृतिक सुन्दरता पसंद करने वाले के बेहतरीन है। मुनस्यारी से ऊपरी हिमालय के कई ट्रेकिंग रास्तों की शुरूआत होती है। यहां से मिलन और रालम ग्लेशियर की चढ़ाई शुरू की जाती है। नंदा देवी चोटी की चढाई का आधार भी मुनस्यारी ही है।यहां से भी पंचाचूली, त्रिशूल और नंदा देवी की बर्फीली चोटियों का मनभावन नजारा दिखाई देता है। मुनस्यारी अल्मोड़ा से 200 किलोमीटर दूर है।

10- अल्मोड़ा

उत्तराखंड का प्राचीन और ऐतिहासिक शहर है अल्मोड़ा।1650 मीटर की ऊँचाई पर बसा अल्मोड़ा एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। यह कुमाऊं के चंद राजाओं की राजधानी रहा। अल्मोड़ा को उत्तराखंड का सांस्कृतिक केन्द्र कहा जाता है। यहां के बाजार की पतली सड़कों पर घूमें तो लगता है पुराने समय में आ गये हैं। लकड़ी की बनी छोटी-छोटी दुकानें इस शहर को अनोखा रुप देती हैं। इस शहर के पास कई प्राचीन मंदिर हैं जो देखे जा सकते हैं। अल्मोड़ा की होली भी बहुत लोकप्रिय है। अल्मोड़ा आएं तो यहां कि प्रसिद्ध बाल मिठाई खाना ना भूलें। अल्मोड़ा नैनीताल से 60 किलोमीटर दूर है।

नोट- ये जगहें मेरे ब्लॉग पर पिछले साल के ट्रेवल पोस्टकार्ड सीरीज में शामिल की गई थी।