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Author: dipanshu

गुजरात के डेडियापाडा में टीकाकरण की सफलता

गुजरात के डेडियापाडा में टीकाकरण की सफलता

घने जंगलों, नदियों और पहाडों से घिरा है गुजरात के नर्मदा जिले का डेडियापाडा तालुका। देखने में यह जगह किसी दूसरी प्रसिद्ध पहाड़ी जगह का मुकाबला करती नजर आती है। जहां तक नजर जाती हैं बस सागौन के जंगल नजर आते हैं। जंगलों के बीच छोटे-छोटे आदिवासी गांव बसे हैं। धान के खेत जंगल के बीच किसी हरी चादर से बिछे नजर आते हैं। यहां कुछ दिन बिताने हों तो जगह स्वर्ग से कम नहीं लगती। लेकिन कुछ दिन रूकें तो सच्चाई से वास्ता पड़ने लगता है। ऐसी ही एक सच्चाई है बच्चों में टीकाकरण की कमी। इस इलाके की दुर्गम स्थिति और आदिवासियों में जागरूकता की कमी के कारण यहां बच्चों के टीकाकरण की दर करीब 50 फीसदी ही थी। इस दर को बढाने की खासा जरुरत थी। इलाके में टीकाकरण को सफल बनाने के लिए यूनिसेफ, स्वास्थ्य विभाग और स्वंयसेवी सस्थाओ को मिलाकर टीकाकरण बढ़ाने के अभियान की शुरूआत वर्ष 2013 में की गई। अभियान का मकसद ज्यादा से ज्यादा बच्चों को टीकाकरण की जद में लाने का था। आज 2017 में अभियान के चार साल पूरा होने पर इलाके में टीकाकरण करीब 97 फीसदी पर पहुंच गया है। इस आंकडों को देखकर वाकई खुशी होती है। देश के दूरदराज के इलाकों तक टीकाकरण कार्यक्रम को सफलता से लागू करना बहुत बडी उपलब्धि है। लेकिन यहां तक पहुचने का सफर इतना आसान नहीं था।

डेडियापाडा तालुका के 65 गांवों में यह अभियान शुरू किया गया। इन गांवों की आबादी करीब 65 हजार है। यहां काम कर रही संस्थाओं को समझ आया कि बिना स्थानीय लोगों की भागीदारी के टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं है। इसके लिए सरकार के स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं और यूनिसेफ ने मिल कर एक रणनीति बनाई । इसके तहत आदिवासी लोगों पर प्रभाव रखने वाले लोगों की पहचान की गई। इसमें स्थानीय जंगल समिति, पंचायत सदस्य, गांव प्रधान, भगत भुवा और फलिया स्वयंसेवकों को जोडकर एक नेटवर्क बनाया गया। इस नेटवर्क ने मिल कर टीककरण के लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास किया।

साभार- INRECA

टीकाकरण के सिपहसालार

1- जंगल समिति– डेडियापाडा के अंधिकाश इलाके में घने जंगल हैं। गांव सड़कों से दूर घने जंगलो और पहाडों पर बसे हैं। वन अभ्यारण्य का हिस्सा होने के कारण वन विभाग यहां काफी सक्रिय रहता है। ऐसे में स्थानीय जंगल समीति के लोगों को इस अभियान का हिस्सा बनाने का काफी फायदा मिला। वे लोग लगातार गांव वालों के संपर्क में रहते हैं। जिससे अभियान के मकसद को अंदरूनी इलाकों तक पहुचाने में मदद मिली।

2- पंचायत सदस्य– पंचायत सदस्य गांवों के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं। ऐसे में इन लोगों का गांव के हर व्यक्ति के साथ सीधा संपर्क होता है। पंचायत सदस्य असरदार तरीके से टीकाकरण के महत्व को लोगों तक पहुंचा सके।

3- भगत भुवा– ये लोग स्थानीय पंडित की तरह होते हैं। आदिवासी गांवों में भगत भुवा की बहुत मान्यता है। ये गांव के असरदार लोगों में से होते हैं। भगत भुवा के कहने का आदिवासियों पर काफी सकारात्मक असर दिखाई दिया।

भगत भुवाओं से चर्चा , फोटो साभार- INRECA

4- फलिया स्वयंसेवक – आदिवासी गांवों में कई छोटे टोले होते हैं। उन टोलों को फलिया कहा जाता है। उसी के नाम पर फलिया स्वंयसेवक बनाए गए। फलिया स्वसंसेवक गांव के लिए युवक युवतियां होते हैं। इन्हें टीकाकरण के प्रचार प्रसार का प्रशिक्षण दिया गया। स्थानीय होने के कारण गांव वाले इनकी बात आसानी से समझ जाते हैं। उसी टोले से होने के कारण इनकी पहुंच टोले के हर घर तक होती है। इसके साथ ही घर की महिलाओं को समझाना और उन्हें बच्चों के साथ टीकाकरण के लिए टीकाकरण केन्द्र तक लाना भी आसान हो। गया।

5- स्वंयसेवी संस्था– यूनिसेफ ने टीकाकरण के काम को आगे बढ़ाने के लिए स्वंयसेवी संस्थाओं का सहारा लिया। इस तरह की संस्थाओं को चुना गया जो इलाके में बेहतर काम कर रही हों। उनके पिछले कार्यों को जांच कर उन्हें टीकाकरण के काम के साथ जोड़ा गया। डेडियापाडा में आईएनआरईसीए ( INRECA) संस्था को यह काम दिया गया। संस्था ने टीकाकरण के प्रसार में लगे लोगों को प्रशिक्षण दिया और उन्हें जागरुक किया। उन्हें प्रचार प्रसार के तरीकों के बारे में सिखाया गया।

फोटो साभार- INRECA

डेडियापाडा तालुका में अधिकांश आदिवासी आबादी है। यहां के 65 गांवों में से 40 ऐसे हैं जिनसे बरसात के महीनों में संपर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। पहाड़ों और जंगलों में बसे ये गांव बरसाती नदियों से घिर जाते हैं। ऐसे में सभी के मिले जुले प्रयासों से ही इस इलाके में टीकाकरण की सफलता सुनिश्चित हो पाई। टीकाकरण का ही नतीजा है कि डेडियापाड़ा तालुका में शिशु और मातृमृत्यु दर में खासी कमी आई है। डेडियापाड़ा में प्रति हजार पर शिशु मृत्यु दर 28 है जबकि नर्मदा जिले की 36 और गुजरात राज्य की 33 है। डेडियापाड़ा की सफलता से साफ है कि अगर मिलजुल कर प्रयास किए जाएं तो किसी भी अभियान को सफल बनाया जा सकता है।

पर्यटन का बदलता बाज़ार

पर्यटन का बदलता बाज़ार

जब से मैंने दुबई पोर्ट से मैजेस्टिक प्रिंसेस क्रूज का अपना सफर शुरू किया तब से जहाज पर कुछ ऐसा था जो मुझे अलग सा लग रहा था। जहाज पर मौज मस्ती का माहौल था, बढिया खाना था। धूप सेकने के लिए शानदार डेक और भरपूर समुद्री नजारे। हाथ में हाथ डालकर घूमते बहुत से जोडे दिखाई दे रहे थे। उनसे आंखे मिलती तो वे मुस्करा भर देते और अपनी दुनिया में खो जाते। कुछ लोग किताबें पढने में मग्न थे तो कुछ दुनिया की बेहतरीन शराब से अपने गला तर करने में लगे थे।

मैजेस्टिक प्रिसेंस का डेक 16

सब कुछ वैसा ही जैसा किसी भी लक्जरी रिसोर्ट में देखा जा सकता है। लेकिन जो अलग था वो थे यहां मस्ती कर रहे ये लोग। आप शायद हैरान होंगे की इन लोगों में ऐसा क्या अलग हो सकता है।
अलग बात यह थी कि क्रूज पर दिखाई दिए लोगों में से करीब 60-70 फीसदी ऐसे थे जो शायद अपनी रिटारमेंट के बाद की जिंदगी जी रहे थे। इन सब की उम्र लगभग 60 के पार थी। लेकिन जिंदगी को जीने के उनके जोश में कोई कमी नहीं थी। वे यूं ही बेपरवाह मस्ती में थे जितना कोई युवा जोडा हो सकता है। सिर्फ जोडे ही क्यों जहाज पर इस उम्र के ऐसे भी बहुत से लोग थे जो अकेले ही खुशियां बटोरने के लिए निकल पडे थे।


ऐसा नहीं था कि क्रूज किसी खास उम्र के लोगों को लेकर निकला हो। जहाज पर युवा जोडे और दूसरे लोगों की भी खासी तादाद थी। बहुत से भारतीय परिवार मिले जो एक साथ क्रूज पर निकले थे। उन परिवारों में भी मुझे बुजुर्ग भी दिखाई दिए। लेकिन फिर भी इतनी बडी संख्या में बुजुर्गों का क्रूज पर होना मुझे चौंका गया।
क्रूज पर कुछ दिन बिताने और लोगों के बात करने के बाद मुझे समझ आया कि ऐसा क्यों है।

बुजुर्गों के लिए क्यों खास है क्रूज का सफर

इस उम्र के लोगों में भी घूमने की चाह किसी से कम नहीं लेकिन वे ऐसी जगह चाहते हैं जो सुरक्षित हो, साफ हो,रखरखाव बेहतर हो और जहां उनका ध्यान रखने के लिए लोग हो। इस मायने में क्रूज पूरी तरह खरा उतरता था। वहां के कर्मचारी हर वक्त लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार रहते थे।

सेहत का ध्यान

मैंने देखा कि कितने ही बुजुर्ग थे जो व्हीलचेयर या इलेक्ट्रिक साइकिल पर वहां घूम रहे थे। लेकिन उन्हें कोई परेशानी नहीं हो रही थी। जहाज में आने जाने के लिए बने चौडे गलियारे और बडी लिफ्ट किसी तरह की परेशानी नहीं पैदा करते, जो आमतौर पर शहर में घूमने पर सामने आती है। क्रूज के सुरक्षित माहौल में मर्जी से कहीं भी आने जाने की आजादी उन्हें क्रूज के लिए आकर्षित करती है।

क्रूज में रहने से हर दिन नई जगह जाने और होटल तलाश करने की समस्या से पूरी मुक्ति मिल जाती है। क्रूज अपने सफर के दौरान लगभग हर दिन या किसी नए बंदरगाह पर पहुंचते हैं । उस नए शहर में घुमाने का इंतजाम पूरी सुरक्षा के साथ क्रूज कंपनी के द्वारा ही किया जाता है। पूरा दिन घूमने के बाद आप वापस आ जाते हैं अपने क्रूज की दुनिया में जहां शानदार शामें बिता सकते हैं। दुनिया के शहरों को इतनी बेफिक्री से देखने का मजा शायद क्रूज ही दे सकता है।

एट्रियम में डांस क्लास

क्रूज पर समय बिताना बहुत आसान है। वहां बहुत से मनोरंजक कार्यक्रम और गतिविधियां होती रहती हैं। आप अपनी पंसद के मुताबिक उनमें हिस्सा ले सकते हैं। वहां के एट्रियम में रोजाना लोगों को बॉल डांस सिखाया जाता था। वहां डांस सीखने वालों में बड़ी संख्या बुजुर्ग जोड़े थे। ये जोड़े बडे मजे से सिखाने वाले के निर्देशों का पालन करते थे। एट्रियम की सुनहरी बॉलकनी से उनको सीखते देखना भी एक अलग अनुभव था।

क्रूज पर होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेते लोग

मैंने वापस आकर इंटरनेट पर आंकडों को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि दुनिया भर में क्रूज के सबसे बड़े ग्राहक 60 से ऊपर की उम्र के लोग हैं। इन लोगों ने अपनी जिंदगी में पैसा कमाया है और अब वे उसे खर्च करना चाहते हैं। क्रूज उन्हें लक्जरी के साथ उन्हें वह सुविधा और सुरक्षा दे रहा है जो उन्हें चाहिए।
हम ये भी कह सकते हैं कि बुजुर्ग लोगों का एक बडा बाजार है जिसे क्रूज इंडस्ट्री ने शायद बहुत पहले ही समझ लिया।

लेकिन खास बात यह कि अभी भी दुनिया में घूमने के लिए तैयार इस सबसे बडे हिस्से पर ध्यान नहीं दिया गया है। यही वजह है कि अब होटल से लेकर एयरलाइन्स तक इस बढ़ते बाजार को अपनी तरफ खींचने में लगे हैं। बढ़ता बाजार शब्द सुनकर चौंकिए मत। दुनिया भर में बुजुर्ग की बढती संख्या वाकई एक बडा बाजार है। आज बेहतर होती स्वास्थ्य सुविधाओं, खान-पान और रहन सहन के कारण आम आदमी की औसत आयु बढती जा रही है। लोग लंबा और स्वस्थ जीवन जीने लगे हैं। ऐसे में जीवन की जिम्मदारियों को पूरा करने के बाद वे घर से बाहर निकलना चाहते हैं। इसलिए यह बाजार पक्के तौर पर बढने ही वाला है।

मैं करीब दस साल पहले हिमालय के एक ट्रेक पर गया था। खासा मुश्किल ट्रेक था । सुविधाएं भी ना के बराबर। उस ट्रेक पर मेरे साथ बैंगलोर से आए एक दंपत्ति थे । दोनों ही रिटायर्ड जिंदगी के दौर में थे। पति वैज्ञानिक रह चुके थे तो पत्नी कॉलेज प्रिंसिपल से रिटायर हुई थी। उनसे बात हुई तो पता चला कि उस समय तक वे दुनिया के दसियों देशों का चक्कर लगा चुके थे। शायद ही कोई महीना जाता हो जिसमें वे घूमने ना जाते हों। चाहे वह चक्कर विदेश का हो या देश में किसी जगह का। उस समय मैंने भले भी नहीं सोचा लेकिन क्रूज के सफर के बाद में कह सकता हूँ कि हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बाहर निकल खुली आंखों से दुनिया को निहारना चाहते हैं।

जरा आंकडों पर नजर डालें

एक अनुमान के मुताबकि साल 2050 तक अमेरिका और चीन में 60 साल से ऊपर के लोगों की संख्या प्रत्येक देश में 100 मिलियन को पार कर जाएगी। और ये वो आबादी है जिसने वैश्विकरण के दौर में खासा कमाई भी की है। अब वे उस कमाई को अपने आराम पर खर्च करना चाहते हैं।

एक और आंकडा देखिए अमेरिका की अगर बात करें तो वहां खर्च होने वाले पैसे का 70% हिस्सा 60 साल से ऊपर की आयु वाले लोगों के पास ही है।

क्या बदलाव हो रहे हैं
दुनिया भर के होटल और हवाई जहाज कंपनियां विशेष सुविधाएं देने की कोशिश कर रही हैं। खास उम्र के हिसाब से इमारतों को बनाया जा रहा है।
लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट का उदाहरण लिया जा सकता है। हीथ्रो दुनिया का पहला डिमेंशिया फ्रेंडली एयरपोर्ट है। यहां के कर्मचारियों को डिमेंशिया के मरीजों की सहायता के लिए खास तौर से प्रशिक्षित किया गया है।
शंघाई एयरपोर्ट पर इस तरह के बदलाव किए गए हैं कि हर उम्र के लोग आराम से सफर कर सकें ।

भारत के आंकडे भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। हमारे यहां तीर्थ यात्रा का प्रचलन तो सदियों से रहा है। लेकिन अब बुजुर्गों के समूह दुनिया को भी नापने के लिए निकल रहे हैं। और उन कंपनियों के लिए बड़ा बाजार खडा कर रहे है जो उन्हें प्यार और दुलार के साथ घुमा सकता है। और फिलहाल तो इस बाजार में क्रूज लाइनर का कब्जा नजर आता है। घूमने निकले पड़े ये बुजुर्ग साबित कर रहे हैं कि उम्र महज एक आंकडा भर है।

( This trip was organised by Cruise Professionals)

इंद्र जात्रा— काठमांडू घाटी में इंद्र पूजा का उत्सव

इंद्र जात्रा— काठमांडू घाटी में इंद्र पूजा का उत्सव

काठमांडू दरबार स्क्वेर में जनसैलाब उमड़ा हुआ था। खासे बड़े स्क्वेर में कहीं तिल रखने की भी जगह नहीं थी। जिसे जहां जगह मिली फंस कर खडा था। मंदिरों की सीढियां, आसपास के घरों की छतें और ऊंचे रेस्टोरेंट सभी खचाखच भरे थे। आज एक खास दिन था। इंद्रजात्रा के त्यौहार की पहली रथयात्रा निकलने वाली थी। हर तरफ ढोल- नगाडों का शोर सुनाई दे रहा था। जहां तहां लोग नाच रहे थे।

नाचते गाते युवा

युवाओं का जोश देखते ही बनता था। लड़के और लड़कियां बन संवर कर इसमें हिस्सा लेने के लिए पंहुचे थे। लड़के-लड़कियों के समूह ढोल नगाडे बजा रहे थे। मैं इंद्रजात्रा शुरू होने के तीसरे दिन काठमांडू पहुंचा था यही पहली रथयात्रा का दिन भी था। इंद्र जात्रा के कुल आठ दिन के त्योहार में तीन दिन तक रथयात्रा निकलती हैं। जीवित देवी कुमारी के रथ पर बाहर निकलने के कारण यह यात्रा बहुत अहम होती है।

क्या है इंद्र जात्रा
इंद्र जात्रा काठमांडू घाटी के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इंद्र जात्रा को नेपाली भाषा में येंया कहा जाता है। इसे यहां का नेवारी समुदाय मनाता है। हिन्दु और बौद्ध दोनों ही इसे मनाते हैं। बरसात के देवता इंद्र और उनकी मां दांगि को प्रसन्न करने के लिए इसे मनाया जाता है। भारत के बहुत से त्यौहारों की तरह ही यह भी सीधे फसल और किसानों से जुडा है। इंद्र से अच्छी बरसात और बेहतर फसल की कामना की जाती है। इंद्र की मां दांगि के लिए माना जाता है कि वे मृत आत्माओें को अपने साथ ले आसमान में ले जाती है। इसलिए पिछले एक वर्ष के दौरान हुए मृत लोगों के परिजन दांगि ( इंद्र की मां ) की पूजा करते हैं। एक तरह से कहा जा सकता है कि सामाजिक ताने बाने को छूता हुआ त्यौहार है इंद्र जात्रा।

दांगि , इंद्र की मां

इसे नेपाली चंद्र कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद के महीने में आठ दिनों तक मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत शुक्लपक्ष के 12वें दिन होती है और इसकी समाप्ति कृष्ण पक्ष के चौथे दिन होती है। इस दौरान कई तरह की पूजा, नाच-गान और रीति रिवाज पूरे किए जाते हैं। इंद्र जात्रा की शुरूआत पहले दिन एक पेड़ के तने को हनुमान ढोका के सामने खडा करने से होती है। इसे पेड़ के तने को योंसि थनेगु या लिंगम कहा जाता है। इस के ऊपरी सिरे पर इंद्र की पताका फहरायी जाती है।

योसि थनेंगु या लिंगम

लिंगम के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पेड़ को पास के नाला गांव के पवित्र जंगल से ही लाया जाता है। यह कुछ-कुछ पुरी की जगन्नाथ यात्रा की तरह लगता है जहां भी एक खास जंगल के विशेष लक्षणों वाले पेड़ का इस्तेमाल भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र को विग्रह को बनाने के लिए किया जाता है। अब अगले आठ दिनों तक इसकी पूजा की जाती है। साथ ही दरबार स्क्वेर में भैरव समते कई मूर्तियों और मंदिरों को जनता के दर्शनों के लिए खोल दिया जाता है।

मुझे जान कर हैरानी हुई की दरबार स्क्वेर पर बने प्राचीन मंदिरों में से बहुत से मंदिरों को साल में किसी खास दिन ही खोला जाता है। इंद्र जात्रा के समय खुलने वाला स्वेत भैरव भी उनमें से एक हैं। यह एक प्रमुख देवता है जिनके दर्शन जात्रा के दौरान किए जाते हैं।

स्वेत भैरव

किवदंती है कि भगवान इंद्र स्वर्ग से एक विशेष फूल लेने के लिए काठमांडू घाटी में आए। फूल तोड़ते समय लोगों ने उन्हें चोर समझ कर पकड लिया और बंदी बनाकर राजा के पास ले गए। पता चलने पर इंद्र की मां दागिं स्वयं यहां आई। उनकी बात सुनकर लोगों ने इंद्र को रिहा किया। तब मां दांगि ने आशीर्वाद दिया कि इस घाटी में हमेशा बारिश और फसल बेहतर होगी। तब से ही यह उत्वस मनाया जाता है।

इंद्र के बंदी स्वरूप को अभी भी उत्सव के समय दिखाया जाता है। यहां एक ऊंचे मंच पर इंद्र की प्रतिमा होती है । इस प्रतिमा के हाथों को रस्सियों से बांधा जाता है।

बंदी इंद्र

कुमारी यात्रा

इन्हीं आठ दिनों के दौरान तीन बार रथ यात्रा निकलती है। रथयात्रा इस त्यौहार का सबसे अहम पहलू है। क्योंकि इस दौरान ही जीवित देवी कुमारी अपने कुमारी घर से बाहर आती है। कुमारी नेपाल के नेवारी समुदाय की एक प्रथा है। जिसमें एक बच्ची को विशेष लक्षणों के आधार पर कुमारी चुना जाता है। कुमारी को देवी तलेजू का रूप माना जाता है। कुमारी पूरे वर्ष अपने खास घर में ही रहती है।वह परिवार के लोगों के अलावा कुछ खास दोस्तों से ही मिलती है। ऐसे में रथयात्रा ऐसा मौका होता है जब लोग बाहर सड़क पर कुमारी के दर्शन करते हैं। इसलिए कुमारी के दर्शनों की होड़ लगी रहती है। हजारों की भीड़ दर्शनों के लिए वहां जमा होती है।

कुमारी देवी का रथ

एक तरह से कुमारी रथयात्रा इंद्र जात्रा उत्सव का ही हिस्सा है। लेकिन इतिहास के अनुसार इसे बहुत बाद में इंद्र जात्रा में शामिल किया गया। इंद्र जात्रा का उत्सव 10 वीं शताब्दी से ही काठमांडू घाटी में मनाया जा रहा है। लेकिन कुमारी रथयात्रा को अठारहवीं सदी में इंद्रजात्रा में शामिल किया गया।

उत्सव के अहम हिस्से
रथयात्रा-
उत्सव में तीन दिनों तक निकलने वाली रथयात्रा इस उत्सव का अहम हिस्सा है। इसमें जीवित देवी कुमारी के साथ, भगवान गणेश और भगवान भैरव के रथों की यात्रा शहर की सडकों पर निकलती है। तीन दिनों में अगल -अलग रास्तों से यह यात्रा गुजरती है। पहली रथयात्रा इंद्र जात्रा उत्सव शुरू होने के तीसरे दिन निकलती है। देवी कुमारी को देखने का यह सबसे अच्छा मौका होता है।

भगवान गणेश का रथ

भगवान भैरव का रथ

लाखे – मुखौटा नृत्य
लाखे भी इस उत्सव का मुख्य हिस्सा है। लाखे नाम के मुखौटा धारी व्यक्ति पूरे रथयात्रा के दौरान नृत्य करते हुए चलते हैं। लाखे को एक दानव का रूप माना जाता है। भारी भरकम मुखौटा और कपडे पहनकर लाखे भीड़ के बीच नृत्य करता हुआ चलता है। कुछ खोजबीन से पता चला कि लाखे के मुखौटे और कपडों का वजन 40 किलो तक हो सकता है। इतने भारी वजन के साथ भीड के बीच संतुलन बनाते हुए नृत्य करना आसान काम नहीं है।एक लय के साथ नृत्य करता लाखे अनोखा लगता है।

नृत्य करता हुआ लाखे

पुलुकिसी-
पुलुकिसी इस उत्सव का एक और अहम हिस्सा है। पुलुकिसी या इंद्र का हाथी। इसे ऐरावत भी कहा जाता है। माना जाता है कि ऐरावत सफेद हाथी है जो कि इंद्र का वाहन है। इंद्र के बंदी बना लेने के बाद शहर की सडकों पर अपनी मालिक को ढूंढते हाथी के रूप में इसे दर्शाया जाता है। उत्सव के समय भीड़ के बीच पुलुकिसी आगे पीछे दौडता रहता है।

पुलुकिसी

आठवें दिन पेड के तने योंसि थनेगु को गिराया जाता है। इसे योंसि क्वथलेगु कहा जाता है। तने के नीचे आने के साथ ही उत्सव समाप्त हो जाता है।

इंद्र जात्रा कैसे देखें –

अगर इसे देखने चाहते हैं तो कोशिश करें की उत्सव के पहले दिन ही दरबार स्क्वेर पहुंच जाएं। उस दिन रास्तों की पहचान कर लें। उत्सव के तीसरे दिन पहली रथयात्रा निकलती है। पहली रथयात्रा के समय बहुत भीड़ होती हैं। इसलिए इस दिन रथयात्रा के रास्ते में आने वाले किसी रेस्टोरेंट या होटल से बात करके उसकी छत से इसे देखना सबसे अच्छा उपाय है।
दूसरी रथयात्रा के समय भीड़ कम हो जाती है इसलिए उस दिन कुमारी घर तक जाकर इसे देखना आसान है। देवी कुमारी के घर से निकलने की तस्वीरें भी यहां मिल सकती हैं। मैं भीड से दूर रहने की कोशिश करता हूँ। दूसरे दिन यात्रा का रास्ता मेरे होटल के सामने से जाता था। इसलिए मैंने दूसरे दिन की रथयात्रा मेरे होटल से देखी।
रथयात्रा निकलने के बाद रात को भी दरबार स्क्वेर जरूर जाएं। रात भर कुछ ना कुछ होता जरूर दिखाई देता है। मैं रात को 12 बजे के बाद स्क्वेर गया था। उस समय आसानी से घूमा जा सकता है।

कहां रूकें –
इंद्र जात्रा को देखने के आयें हैं तो कोशिश करें कि दरबार स्केवर के आस-पास के होटल में रूकें । इससे किसी भी समय जाने-आने में आसानी होगी। मैं दरबार स्क्वेर के पास Dwarika chhen होटल में रूका था। होटल के दरबार स्क्वेर से सटा होने के कारण मुझे काफी आसानी हुई।

See this video to know some interesting fact about #Indrajatra

Note – This trip was organised by Nepal tourism board and Explore Himalaya

नगरकोट

नगरकोट

11 जून 2017
नगरकोट
बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों को देखने के लिए नगरकोट बेहतरीन जगह है। मौसम साफ हो तो यहां से सूरज के उगने का शानदार नजारा दिखाई देता है। समुद्र तल से 2195 मीटर की ऊंचाई पर बसे नगरकोट का मौसम ठंडा रहता है । मैदानों की गरमी से बचने के लिए यह जगह माकूल है। यही कारण है कि नेपाल का यह खूबसूरत पहाड़ी कस्बा पर्यटकों से गुलजार रहता है। नगरकोट नेपाल की राजधानी काठमांडू से 32 किलोमीटर दूर है।

पाटन

पाटन


10 जून 2017
पाटन
काठमांडू के पास ही बसा है ऐतिहासिक पाटन। यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से राजधानी रहा। यहां का दरबार चौक काठमांडू घाटी के तीनों दरबार चौकों में सबसे भव्य है। इसके मंदिरों और महलों में लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी का काम स्तब्ध कर देता है। यहां के राजमहल और उससे जुड़े मुल चौक और सुन्दरी चौक के भीतर लकड़ी पर बेहतरीन काम किया गया है। पाटन शहर को बागमती नदी काठमांडू से अलग करती है। यह काठमांडू से 5 किलोमीटर दूर है। पाटन दरबार चौक यूनेस्को विश्व विरासत स्थलो में शामिल है।

भक्तपुर

भक्तपुर

9 जून 2107
नेपाल का ऐतिहासिक शहर है भक्तपुर । यह शहर 12वीं से 15वीं शताब्दी तक नेपाल की राजधानी रहा। लकड़ी पर बारीक नक्काशी के काम की नेवाड़ी कला का बेजोड़ उदाहरण है भक्तपुर। यहां के मंदिरों और महलों पर की गई शानदार नक्काशी से आंखे हटाने का मन ही नहीं करेगा। भक्तपुर की पतली गलियों से निकलने पर हर घर कला का जीता जाता जागता उदाहरण लगता है। यही वजह है कि भक्तपुर के दरबार चौक को यूनेस्को विश्वविरासत स्थलों में शामिल किया गया है। भक्तपुर काठमांडू से 10 किलोमीटर दूर है।

काठमांडू

काठमांडू


8 जून 2017
काठमांडू
नेपाल का सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक केन्द्र है काठमांडू। नेपाल की इस राजधानी में भगवान शिव का प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर है। जिसे द्वादश ज्योर्तिलिंगो में सबसे प्रमुख माना जाता है। बडी संख्या में हिन्दु इसके दर्शन करने के लिए काठमांडू आते हैं। यह दुनिया का अनोखा शहर है जिसके आस-पास सात यूनेस्को विश्व विरासत स्थल हैं। पशुपतिनाथ मंदिर के साथ काठमांडू के दरबार चौक, स्वयंभूनाथ मंदिर और बौद्धनाथ स्तूप को यूनेस्को विश्व विरासत स्थलों में शामिल किया गया है। यहां मौज मस्ती और खरीदारों के शौकीनों के लिए यहां थमेल जैसा बाजार भी है।

पोखरा

पोखरा

7 जून 2017

नेपाल का प्यारा और छोटा हिल स्टेशन है पोखरा। पोखरा एक घाटी में बसा है। बडी सी खूबसूरत फेवा झील इसकी खासियत है। इसी झील के एक तरफ पोखरा शहर बसा है। यहां से अन्नपूर्णा की बर्फ से ढकी चोटियां साफ दिखाई देती हैं। ट्रेंकिग जैसे रोमांचक खेलों को पसंद करने वाले के लिए पोखरा पसंदीदा जगह है। यहां से हिमालय के अंदरूनी इलाकों में ट्रेकिंग की जा सकती है। यहां पैराग्लाइंडिग और लाइट एयरक्राफ्ट से उड़ने की भी व्यवस्था है। पोखरा काठमांडू से 150 किलोमीटर दूर है।

लुंबिनी

लुंबिनी


6 जून 2017
लुंबिनी
भारत- नेपाल की सीमा के पास नेपाल में स्थित है महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी । महात्मा बुद्ध की जन्म स्थली पर मायादेवी मंदिर बना है। इसी जगह पर सबसे प्राचीन बुद्ध विहार के सबूत मिले हैं जिसे ईसा से 600 वर्ष प्राचीन माना जाता है। सम्राट अशोक ने लुंबिनी में स्तूपों और मठों को निर्माण करवाया था। सम्राट अशोक के प्रसिद्ध स्तंभों में से एक लुंबिनी में है जिसमें इस जगह के महात्मा बुद्ध के जन्मस्थल होने की जानकारी दी गई है। लुंबिनी नेपाल की राजधानी काठमांडू से 250 किलोमीटर दूर है। लुंबिनी युनेस्को विश्व विरासत स्थलों में शामिल है।

चितवन नेशनल पार्क

चितवन नेशनल पार्क

5 जून 2017
चितवन नेशनल पार्क
साल के घने जंगलों से ढका है नेपाल का चितवन नेशनल पार्क। एक सींग वाला गैंडा इन जंगलों की शान है। यहां के घास के मैदानों में घूमते गैंडों को देखना अलग ही अनुभव है। इस पार्क ने गैंडों के संरक्षण में मिसाल कायम की है।आज यहां 600 से ज्यादा गैंडें हैं। इसके साथ ही यहां बडी संख्या में बाघ और सैंकडों तरह ही चिडियां भी पाई जाती हैं। नेपाल के इस पहले नेशनल पार्क को 1984 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया। चितवन नेपाल की राजधानी काठमांडू से करीब 150 किलोमीटर दूर है।