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Author: dipanshu

सिंगीनावा जंगल लॉज – जंगल का असली ठिकाना

सिंगीनावा जंगल लॉज – जंगल का असली ठिकाना

कान्हा नेशनल पार्क आए मुझे कुछ ही घंटे हुए थे। कुछ आराम करने के बाद रात के खाने के लिए अपने कॉटेज से बाहर निकला तो कुछ सरसराहट सुनाई दी। टार्च साथ रखने की हिदायत थी तो टार्च आवाज की तरफ घुमाई और देखा 8-10 हिरणों का एक झुंड वहां घूम रहा है। मेरे और उनके बीच मुश्किल से 5-7 फीट का ही फासला रहा होगा। कान्हा के जंगली जीवन से मेरा परिचय कुछ इस नजदीकी से हुआ। अगले चार दिन यहीं रूकना था तो आस भी बंधी की कमरे के बाहर ही यह सब दिखाई दे रहा है तो जंगल में पता नहीं क्या मिल जाएगा।

कान्हा से इतना नजदीक से परिचय करवाने के लिए सिंगीनावा जंगल लॉज को पूरा श्रेय जाता है। जैसा नाम वैसा ही दर्शन । सिंगीनावा जंगल लॉज कहने भर के लिए जंगल लॉज नहीं है बल्कि असल जंगल ही है। कुछ दूर-दूर बने कॉटेजों को एक पल के लिए भुला दें तो वहां ऐसा और कोई निशान नजर नहीं आता जो उस जगह को जंगल ना साबित करता हो।

कान्हा के बफर जोन से लगे सिंगीनावा के पास 60 एकड की जमीन है।जिसमें कुल मिलाकर 12 कॉटेज है और एक मुख्य इमारत। इसके अलावा पूरे इलाके में जंगल को प्राकृतिक स्थिति में बना कर रखा गया है। वही पेड वही पौधे जो आपको कान्हा में दिखाई देंगें। इसलिए जंगल से इसमें ना तो हमें कोई फर्क समझ आता है और ना ही शायद जानवरों को। वहां पेड़ लगाने का काम लगातार किया जाता है और रिजॉर्ट मे आमतौर पर लगने वाले सजावटी पेडों की जगह स्थानीय पेडों को ही उगाया जाता है।
जंगल के बफर ज़ोन से लगा होने के कारण हिरण ही नहीं यहां कई तरह के जंगली जानवर अक्सर दिखाई देते हैं। पता चला कि लॉज में जंगली सूअर और तेंदुए भी अक्सर दिखाई दे जाते हैं। एक बार बाघ भी आस-पास ही दिखाई दिया था। जंगल से इतनी करीब रिश्ता होने पर जंगल में कुछ बिताने का मजा दुगना हो जाता है।

सुबह होने पर यहां के नैचुरलिस्ट सचिन शर्मा के साथ बर्ड वाचिंग पर निकलना था। लेकिन बर्ड वाचिंग के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं पडी। लॉज और उसके साथ बहती नदी के किनारे इतनी तरह की चिड़िया दिखाई दे जाती है कि लगता है जैसे जंगल में हो। हम सुबह 6 बजे ये सोचकर निकले थे कि कुछ देर में देखकर वापस आ जाएंगें। लेकिन सिंगिानावा और उसके पीछे के इलाके को देखते हुए 3 घंटे ऐसे बीते की पता ही नहीं चला।

इतनी तरह की रंग बिंरगी चिडिया दिखाई दी कि आने का मन ही नहीं किया। वापस आकर सचिन ने गिनती की तो करीब 35 तरह की अलग अलग चिड़ियों को हमने उन तीन घंटों में देख लिया था । सचिन ने बताया कि एक बर्ड वाचर ने यहां 95 प्रजाति की चिडियों को देखा था। यानि मेरा असली जंगल का सफर सिंगीनाव से ही शुरू हो गया था । और मजे की बात सफारी तो अभी किया भी नहीं था।

12 कॉटेज 2 बंगले

सिंगीनावा में रहने के लिए 12 कॉटेज और 2 बंगले बनाए गए हैं। जिनका नाम जंगली जानवरों के नाम पर रखा गया है। मेरा वाला कॉटेज भालू के नाम पर था। एक बडा सा कमरा जिसे बेहद खूबसूरती से सजाया गया था। खास बात यह की इसे सजाने में मध्य प्रदेश के आदिवासी हस्तशिल्प का बखूबी इस्तेमाल किया गया था। कमरे में चीजों को इतनी सही तरह से रखा गया है कि वे कमरे में ठूंसी हुई नहीं लगती। कमरा खासा बडा है इसलिए जगह की कमी का अहसास नहीं होता।

साथ ही कमरे में जंगली जनजीवन के बारे में रखी गई ढेरों किताबें इस और भी खास बनाती हैं। सफारी पर निकलने से पहले अगर कुछ पन्ने पलट लिए जाएं तो जंगल के सफर का मजा बढ जाएगा। कान्हा नेशनल पार्क के बारे में काफी किताबें वहां रखी गई थी।

सिंगीनावा को प्रकृति के साथ अनुकूल बनाने की कोशिश की गई है इसलिए कमरे में प्लास्टिक की बोतलों की जगह तांबे की बोतलों में फिल्टर पानी भरा जाता है। अगर फिर भी जरूरत हो तो प्लास्टिक की बोतल मौजूद है लेकिन जंगल में है तो प्रकृति के साथ जीने की एक कोशिश तो की जा सकती है। इसके अलावा अगर बडे परिवार के साथ आ रहे हैं तो सिंगीनावा में एक 4 कमरों का और एक 2 कमरों का बंगला भी मौजूद हैं। जहां परिवार के साथ समय बिताने का अच्छा मौका मिलेगा।

खाना-पीना

खाने के मामले में भी सिंगीनावा कम नहीं है। यहां चार दिन रहने के दौरान उत्तर भारतीय, चायनीज, कांटीनेंटल सभी तरह का खाना खाया। लेकिन किसी के स्वाद में कोई कमी नहीं । रात के समय खुले आसामान के नीचे , ठंडी हवा से झोकों में जो भी खाने को मिले उसका स्वाद अलग ही आएगा।

एक दिन दोपहर का खाना चाट के नाम रहा। हर तरह की चाट वो भी अपने खालिस स्वाद के साथ ।
लेकिन एक बात किए बिना मेरी खाने की चर्चा अधूरी ही रहेगी और वो है यहां बनने वाली मिठाईयां। यहां जो मिठाई खाई उनका स्वाद तो जैसे अभी भी जुबान पर ही है। मैंने यहां खाई Sticky Toffee muffin और बनोफी ( Banoffee cake) का स्वाद भूलना मुश्किल है। अभी लिखते हुई ही जैसे वह बनोफी मेरे मुंह में घुली जा रही है। मैं सिर्फ वह बनोफी और स्टिकी मफिन खाने के लिए फिर से सिंगीनावा जा सकता हूँ।

Sticky toffee Muffin

कला संग्राहलय – सिंगीनावा की खासियत

रिजोर्ट हो या होटल वहां आपके मनोरंजन के लिए काफी मिल जाता है। लेकिन यह शायद ही सुना हो कि किसी रिजार्ट या होटल में कोई कला संग्राहलय बना है। सिंगीनावा इसलिए सबसे अलग है जहां एक कला संग्राहलय बनाकर स्थानीय गोंड कला को संवारने और एक जगह लाने की कोशिश की गई है। इसे देखना अलग अनुभव है जहां स्थानीय कलाकारों के साथ देश के कुछ नामी कलाकारों की कला के नमूनों को भी सजाया गया है।

लेकिन सिर्फ कला संग्राहलय की क्या बात करें। पूरा सिंगीनावा लॉज ही किसी कला संग्राहलय जैसा लगता है। कला के नमूनों को हर तरफ बेहद सुंदरता के साथ सजाया गया है। दीवारों पर गोंड चित्र बने हैं जिन्हें स्थानीय कलाकारों ने बनाया है । कमरों और हॉल डोकरा मेटल आर्ट के नमूनों से सजे हैं। जगह – जगह पानी के फव्वारे हैं जिनके साथ पत्थर और टेरिकोटा के हस्तशिल्प रखे गये हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी कलाकार के घर ही आ गए हों। रिस्पेशन से लेकर , रेस्टोंरेंट , बार या छत पर खुले में बैठने की जगह सब कुछ सजा हुआ है।


आपको मन बहलाने के लिए सिंगीनावा में एक स्विंमिंग पूल है। जो किसी इंफीनिटी पूल का सा अहसास देता है। लगता है जैसे पूल का एक सिरा जंगल में कहीं खत्म होता है। मैंने खुद काफी समय यहां बिताया।

यहां एक स्पा भी है जहां हर तरह की मसाज ली जा सकती है। स्थानीय लोगों तक रोजगार पहुंचे इसके लिए सिंगीनावा में भी कई तरह की पहल की जा रही है। यहां के स्पा के लिए भी सिंगीनावा ने गांव के स्थानीय लड़के और लड़की को चुना । उसके बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए नेपाल के काठमांडू भी भेजा गया।

सिंगीनावा के नेचुरलिस्ट

सिंगीनावा के नेचुरलिस्ट यहां की खासियत हैं । उनके साथ जंगल में घूमने से जंगल का मजा दूगना हो जाता है। मुझे डेविड और सचिन के साथ घूमने का मौका मिला। जंगल, वहां के जानवरो, कीट-पतंगों और चिडियों के बारे में उनकी जानकारी अद्भुत है। डेविड ड्रेगन फ्लाई और मेंढ़कों के विशेषज्ञ हैं। जंगली जीवन पर डेविड की किताब भी प्रकाशित हो चुकी है। सचिन चिडियों में महारथ रखते हैं। उन्हें किसी चिडिया को देखने की जरूरत नहीं लगती बस आवाज को सुनते ही बता देते हैं कि कौनसी चिडिया है।

कैसे पहुंचे-

हवाई मार्ग – कान्हा नेशनल पार्क अगर हवाई रास्ते से आना हो तो जबलपुर, रायपुर या नागपुर के हवाई अड्डे का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहां से सड़क के जरिए कान्हा में सिंगीनावा पहुंचा जा सकता है। मैं नागुपर का हवाई अड्डे से सड़के के जरिए सिंगीनावा पहुंचा।
कान्हा से जबलपुर 205 किलोमीटर , नागपुर 305 किलोमीटर और रायपुर 255 किलोमीटर दूर है।

रेल मार्ग –
अगर रेल से आना चाहते हैं तो जबलपुर, रायपुर या नागपुर स्टेशन से यहां पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन गोंदिया है जो 180 किलोमीटर दूर है।

जाने का सही समय –
कान्हा नेशनल पार्क 1 अक्टूबर से 30 जून तक खुलता है। अगर बाघ को देखने की इच्छा है तो अप्रेल , मई, जून जैसे गर्मी के मौसम में जाने का कार्यक्रम बनाएं।

(This trip was sponsored by Singinawa jungle lodge. Views expressed here are based on my experiences.)

वो हंसते चेहरे

वो हंसते चेहरे

मैं मैजेस्टिक प्रिसेंस क्रूज की 16 वीं मंजिल या जहाज की भाषा में कहें तो डेक पर बैठा था। सुबह के नाश्ते का समय था । डेक के रेस्टोरेंट में कांच की खिड़कियों से समुद्र को निहारते नाश्ता करते लोगों का तांता लगा था। तभी मेरे पास कोई आया ये पूछने की मुझे क्या चाहिए। लंबा स्मार्ट सा लडका । उसके नेम प्लेट पर नजर गई। रणबीर ( शायद यही नाम था) । मुस्कराहट के साथ उसने पूछा ‘क्या ले कर आऊं आपके लिए’।
जहाज पर दो दिन में इस मेहमाननवाजी की आदत हो चुकी थी। बस कुर्सी पर बैठो की मिनट भर के अंदर कोई आपके सामने होता है पूछने के लिए कि क्या चाहिए।
खैर कुछ खाने का मन नहीं था। तो रणबीर से बात ही करने लगा। मैंने पूछा इंडिया से । उसने पूछा आप कहां से मैने कहा दिल्ली बस फिर तो उसके चेहरे की मुस्कान और भी फैल गई। यही मुस्कान है जिससे जहाज के ये लोग अपने मेहमानों की स्वागत करते हैं हर वक्त । यकीन मानिए एक भी बार आपको ये मुस्कुराहट बेमतलब ओढी हुई नहीं लगेगी। बातों का सिलसिला चला तो पता चला कि रणबीर पिछले 11 साल से क्रुज पर है। करीब नौ महीने घर से दूर रहता है। तीन महीने के लिए घर जाता है।

मैंने पूछा कि घर की याद नहीं आती इतने दिन कैसे रह पाते हो वो भी समुद्र के बीच । उसने कहा यहां वही रह सकता है जो नौकरी समझ कर नहीं बल्कि मजे लेकर काम करे। ऐसा नहीं करो तो एक दिन भी निकालना मुश्किल है। इन लोगों की मुस्कराहट का राज समझ आ रहा था।

तभी उसे मुंबई का एक और साथी दिखाई दिया । मुझसे मिलवाने के लिए उसको आवाज देकर बुलाता है। वो भी हंसता हुआ आया । नाम याद नहीं आ रहा । लेकिन वह भी मस्त हंसते हुए बताता रहा कि 15 साल से क्रूज पर काम कर रहा है लेकिन बोर नहीं हुआ। यही मस्ती है जो ये लोग यहां आने वाले मेहमानो से भी बांटते हैं। आपको एक पल के लिए भी नहीं लगेगा कि ये लोग दिल से काम नहीं कर रहे।

दोनों से बात कर ही रहा था कि दोनों को उनका एक और साथी दिखाई दिया। बोले सर ये है प्रसाद हमेशा जोक मारता है। प्रसाद का नाम याद रह गया मुझे। उसके बाद हम चारों काफी देऱ तक बाद करते रहे। भारत का होने का यह फायदा था कि हम सब आराम से बात कर रहे थे। उन तीनों के हंसते चेहरे अभी भी याद हैं । फिर उनसे कहा कि एक फोटो हो जाए फटाफट फोटो देने के लिए तीनों तैयार हो गए बिल्कुल मुस्कुराते हुए।

लेकिन ये तीनों कोई अलग नहीं। जहाज पर किसी भी जगह जाइए वहां के लोग मुस्कराते मिलेगें। मदद करने को हर समय तैयार। कमरे की देखभाल करने वाले हों , मैनेजर हो या कोई दूसरा कर्मचारी सबके सब दिल को खुश करने वाली मुस्कुराहट के साथ ही मिलते हैं। उनमें कोई बनावट नजर नहीं आती।

एक रेस्टोरेंट की मैनेजर थीं। पहले दिन एक रात के खाने के समय मिली। हमने कुछ भारतीय खाना मांगा। उनके मेन्यू में नहीं था लेकिन ला कर दिया। उसके बाद अगले दिन अल-सुबह सबसे ऊपर के डेक पर मिल गई जहां नाश्ता होता था । मैंने कहा आप सोई नहीं तो हंसते हुए बोली आपकी आँखे लाल है सो तो आप भी नहीं रहे। मैंने कहा इतना अच्छा क्रूज आपने बनाया है यहां सोने का समय कहां है। हम दोनों ही हंसने लगे। उसके बाद अगले 5 दिन कहीं भी मिलती तो हम लोग आपस में हाल-चाल जरूरे पूछते । बीच में एक दिन मौसम खराब था तो मिलते ही उन्होंने कुछ हिदायतें और तबीयत खराब होने पर ली जाने वाली गोली के बारे में खुद ही बता दिया। उन्हे याद रहता था कि मैं कुछ दोस्तों के साथ हूं तो सबके बारे में भी पता कर लेती। यही कुछ बाते हैं जो किसी सफर को यादगार बना देती हैं।

आखरी दिन इमीग्रेशन का काम पूरा करना था इसलिए पांचवी मंजिल पर रिसेप्शन पर पहुंचा। रिसेश्पशन पर जिसकी ड्यूटी थी उसने पता किया कि इमीग्रेशन के लोग कहां बैठे हैं? पांचवे मंजिल से चौदहवी मंजिल तक मुझे वहां छोडने गया । वहां लोग नहीं मिले तो फिर उसने पता किया लेकिन जब तक वो नहीं मिले उसने रास्ता बता कर उपना पीछा नहीं छुडाया।

शायद जब आप धरती से दूर समुद्र में हो । आपको पता हो कि यही कुछ लोग हैं जो आपके साथ अगले कुछ दिन रहेंगें तो आपस में जुडना काफी आसान हो जाता है। यही वजह है कि घर से दूर रहते हुए भी जहाज के लोग दिल खोल कर हंसते मुस्कुराते हैं और हमेशा पूछते हैं आपको क्या चाहिए।
मैं अभी क्रूज से वापस आ चुका हूँ लेकिन ऐसा लगता है कि ये मुस्कराहट क्रूज से दूर नहीं होने देगी….

( this trip was organised by cruise professional )

गोलकुंडा का किला Golkunda fort

गोलकुंडा का किला Golkunda fort

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गोलकुंडा का किला
प्राचीन वास्तुकला के अद्भुत प्रयोग का उदाहरण है गोलकुंडा का किला। किले की खासियत है कि इसके मुख्य दरवाजे के गुंबद के नीचे अगर ताली बजाई जाए तो उसकी आवाज 1 किलोमीटर दूर पहाड़ की ऊंचाई पर बने महल तक सुनाई देती है। गोलकुंडा के वैभव का अंदाजा इस बात से लगया जा सकता है कि विश्वप्रसिद्ध कोहिनूर हीरा गोलकुंडा की खदानों से ही निकला था।16-17 वीं सदी में कुतुबशाही वंश की राजधानी रहे गोलकुंडा में उस दौर के महल, इमारते और मस्जिदें अभी भी देखी जा सकती है।यह किला हैदराबाद के बेहद नजदीक है।

श्री शैलम SRISAILAM

श्री शैलम SRISAILAM

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श्रीशैलम
आंध्रप्रदेश के कुर्नूल जिले में है श्री शैलम। यह शहर नल्लामल्ला की पहाड़ियों पर स्थित है। यहां भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक है इसलिए इस मंदिर की बहुत मान्यता है। भगवान शिव को यहां मल्लिकार्जुन स्वामी कहा जाता है। वर्तमान मंदिर को विजयनगर साम्राज्य के राजा हरिहर राय ने करीब 6 शताब्दी पहले बनवाया था। कृष्णा नदी पर बना विशाल श्री शैलम बांध भी देखने लायक है। श्री शैलम हैदराबाद से 212 किलोमीटर की दूरी पर है।

बोर्रा गुफाएं Borra Caves

बोर्रा गुफाएं Borra Caves

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बोर्रा गुफाएं
बोर्रा गुफाएं आंध्र प्रदेश की अनंतगिरी पहाडियों में स्थित है। इन्हें भारत की सबसे बडी प्राकृतिक गुफाओं में से एक माना जाता है। करीब 200 मीटर गहरी ये गुफाएं हजारों वर्षों तक पानी के कारण चूना पत्थर की चट्टानों के कटने से बनी हैं। चूना मिले पानी के टपकने से गुफाओं में बहुत सी आकृतियां बन गई हैं। स्थानीय जनजातियां इस गुफा को पवित्र मानते हैं और इसमें बने शिवलिंग की पूजा करते हैं। इनमें 30 से 50 हजार वर्ष पुराने पत्थर के औजार भी मिले हैं। ये गुफाएं विशाखापट्टनम से 90 किलोमीटर दूर हैं।

विजयवाड़ा vijaywada

विजयवाड़ा vijaywada

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विजयवाड़ा
कृष्णा नदी के किनारे बसा है आंध्र प्रदेश का ऐतिहासिक शहर विजयवाड़ा। इस प्राचीन शहर में बहुत से मंदिर और गुफा मंदिर हैं। यहां कनक दुर्गा मंदिर की बहुत मान्यता है। मोगलराजपुरम में गुफा मंदिर बनें हैं जिनमें भगवान नटराज और विनायक की मूर्तियां हैं। यहां से बौद्ध और जैन धर्म से जुड़े अवशेष भी मिले हैं। विजयवाडा के पास ही प्रकाशम बांध बना है जिससे एक खूबसूरत झील का निर्माण हुआ है। विजयवाड़ा हैदराबाद से 275 किलोमीटर दूर है। विजयवाड़ा अपने आमों के लिए भी प्रसिद्ध है।

विशाखापट्टनम visakhapatnam

विशाखापट्टनम visakhapatnam

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विशाखापट्टनम
आंध्र प्रदेश का प्राचीन शहर और प्रसिद्ध प्राकृतिक बंदरगाह है विशाखापट्टनम । विशाखापट्टनम के खूबसूरत समुद्री तट लोगों को अपनी तरफ खीचंते हैं। यह शहर तीन तरफ से हरी भरी पहाडियों और एक तरफ से समुद्र से घिरा है। तीनों पहाडियों पर तीन धर्मों के धार्मिक स्थल बने हैं। शहर का इतिहास छठी शताब्दी ईसा पूर्व से मिलता है। यहां का पनडुब्बी संग्रहालय खास है जहां पनडुब्बी के जीवन के बारे में जानकारी मिलती है। यह हैदराबाद से करीब 620 किलोमीटर दूर है।

तिरुपति Tirupati

तिरुपति Tirupati

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तिरुपति
भारत के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है तिरुपति । आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित तिरूपति घने जंगलों से ढकी सात पहाडियों से घिरा है। इनमें से एक पहाड़ी पर बना है तिरुपति वेन्कटेश्वर मंदिर । इस मंदिर में दर्शन करने के लिए हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। भगवान वेन्कटेश्वर को बालाजी भी कहा जाता है। इन्हें भगवान विष्णु का रूप माना जाता है। तिरुपति वेन्कटेश्वर मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुशैली का सुन्दर उदाहरण है। तिरुपति हैदराबाद से करीब 587 और बेंगलुरु से 260 किलोमीटर दूर है।

अरकू घाटी araku valley

अरकू घाटी araku valley

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अरकू घाटी
पूर्वी घाट के पहाडों पर आंध्र प्रदेश का एक अनछुआ इलाका है अरकू घाटी। समुद्र तल से 1300 मीटर ऊंची अरकू घाटी आंध्र प्रदेश का लोकप्रिय हिल स्टेशन है। यहां के खूबसूरत दृश्य, जंगल, झरने और सुहावनी आबोहवा पर्यटकों को अपनी तरफ खींचते हैं। विशाखापट्टनम से अरकू घाटी का रेल से सफर करने पर इसका पूरा प्राकृतिक सौंदर्य दिखाई देता है। ब्राजगेज रेलवे लाइन पर भारत का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन सिमलीगुड़ा इसी रास्ते पर है। अरकू घाटी विशाखापट्टनम से 114 किलोमीटर दूर है।

लेपाक्षी मंदिर Lepakshi Temple

लेपाक्षी मंदिर Lepakshi Temple

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लेपाक्षी मंदिर
आंध्र प्रदेश के लेपाक्षी गांव में बना है 16 वीं सदी का लेपाक्षी मंदिर। यह मंदिर अपने झूलते खंबे के अद्भुत आश्चर्य के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मंदिर 70 खंबों पर टिका है जिसमें से एक खंबा जमीन से कुछ ऊपर उठा है। यह कैसे संभव हुआ इसके रहस्य का पता नहीं लगाया जा सका है। विजयनगर शैली में बने इस मंदिर की दीवारों को बारीक नक्काशी और रामायण , महाभारत की कहानिया दर्शाते सुन्दर चित्रों से सजाया गया है। लेपाक्षी हैदराबाद से करीब 500 किलोमीटर दूर है।