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क्राउन प्लाजा जयपुर – एक साल पूरा होने का जश्न

क्राउन प्लाजा जयपुर – एक साल पूरा होने का जश्न

क्राउन प्लाजा जयपुर के एक साल पूरा होने के मौके पर वहां जाने का निमंत्रण मिला। बचपन से ही जयपुर से एक जुड़ाव रहा है तो वहां जाने का मौका मेरे लिए हमेशा ही खास होता है।
जब मेरी गाड़ी होटल के नजदीक पहुंची तो क्राउन प्लाजा की विशाल इमारत नजर आई। जयपुर जैसे शहर में जहां हेरिटज या हेरिटेज हवेली जैसे दिखाई देने वाले होटल बडी संख्या में हैं वहीं क्राउन प्लाजा ने पूरी तरह से आधुनिक आर्किटेक्टर का सहारा लिया है।

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होटल में प्रवेश करते ही नजर आती है इसकी बडी सी लॉबी और रिसेप्शन एरिया। लॉबी का इलाका खासा बडा है और इसमें घुसते ही एहसास हो जाता है कि आप किसी लक्जरी होटल में आ गए हैं। मेरा कमरा पहले से ही बुक था । रिसेप्शन पर मुझे मुश्किल से 2 मिनट लगे और मेरे चेक-इन पूरा हो गया। इसके बाद मैं अपने कमरे में पहुंचा। कमरा खासा बडा था।

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कमरे में घुसते ही एक छोटा सा गलियारा है, जिसके बांयी तरफ बाथरूम और ड्रेसिंग के लिए जगह दी गई थी। इसके बाद पूरा बडा कमरा आपके सामने आता है। कमरे में फर्श पर एक बढिया रंगबिरंगा कालीन बिछा था ।

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कमरे को पूरी तरह से एक आधुनिक रूप दिया गया था। एक तरह बड़ा सा बिस्तर लगा था। बिस्तर पर कुछ कार्ड रखे थे जिन्होंने मेरा ध्यान खींचा। एक कार्ड दरअसल तकियों का मेन्यू था जिसमें बताया गया था कि आप सुविधानुसार कितने तरह के तकिए इस्तेमाल के लिए मंगा सकते हैं।

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दूसरे कार्ड पर टर्नडाउन सर्विस की जानकारी दी गई थी। टर्नडाउन सर्विस लक्जरी होटल्स में दी जाती है जिसमें शाम के समय आपके सोने के लिए कमरे को तैयार किया जाता है। जिसमें आपका बिस्तर बदलने से लेकर कमरे की कुछ दूसरी चीजों को बदला जाता है जिससे आप सुकून और शांति से सो सके।
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कमरे के एक तरफ शीशे की बड़ी सी दीवार थी जिससे होटल के पीछे हरा-भरा जंगल जैसा इलाका नजर आ रहा था। जयपुर शहर के सीतापुर जैसे इंडस्ट्रियल इलाके में इतना हरा भरा जमीन का टुकडा आंखों को काफी रास आया।
कमरें में जरूरत की सभी चीजें थी जिनकी एक बिजनेस ट्रेवलर को जरूरत पड सकती है।

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अब तक दोपहर हो चुकी थी। इसी समय होटल के एक साल पूरा होने के मौके पर केक काटा गया। केक काटने के बाद हमारा खाना होटल के चायनीज रेस्टोरेंट हाउस ऑफ हान में रखा गया था ।

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इसी दिन से रेस्टोरेंट में मंगोलियन ग्रिल्स खाने की शुरूआत भी हुई । चायनीय खाना पंसद करने वालों के लिए हाउस ऑफ हान एक अच्छी जगह है। यहां बने खाने को चाइनीज तरीके से ही बनाने और परोसने की कोशिश की जाती है। इसके लिए यहां एक मलेशिया से विशेष शेफ को भी बुलाया गया है। खाना तो मुझे बहुत अच्छा लगा।
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सबसे ज्यादा लुभाया खाने से पहले पेश की जाने वाली जैसमीन टी परोसने के तरीके ने। इस चाय को पीतल की केतली के जरिए परोसा गया जिसके आगे कई फीट लंबी नली लगी थी। पता नहीं कि चीन या मंगोलिया में इस तरह से चाय परोसी जाती है या नहीं लेकिन यहां यह तरीका देखने में मजेदार लगा।

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हाउस ऑफ हान के अलावा होटल में एक दूसरा रेस्टोरेंट भी है जिसे सिरोको नाम दिया गया है। रात का खाना सिरोको में ही था। रात को सिरोको के खाने में हर तरह का खाना मौजूद था लेकिन मैंने यहां राजस्थानी खाना खाया।

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अब दाल-बाटी चूरमा, गट्टे की सब्जी, कैर सांगरी की सब्जी मिले तो कोई दूसरी खाने की तरफ देख की कैसे सकता है। राजस्थानी खाने को खाने के बाद मुंह से वाह के अलावा कोई दूसरा शब्द नहीं निकला। यहां का राजस्थानी खाना पूरी तरह से पारंपरिक राजस्थानी स्वाद और विशेषता लिए हुए था।
इतने बेहतरीन स्वाद वाला राजस्थानी खाने यहां कैसे बना इसकी वजह पूछे बिना मुझसे नहीं रहा गया तो पता लगा कि होटल ने यहां राजस्थानी खाना बनाने के लिए किसी शेफ को नहीं बल्कि राजस्थानी महाराज को रखा है। महाराज ही यहां ये खाना राजस्थानी खाना बनाते हैं। राजस्थानी मिठाई बनाने के लिए खासतौर से जोधपुर के हलवाईयों को रखा गया है।
सिरोको में अगले दिन सुबह का नाश्ता भी बेहतरीन रहा ।
इस तरह अच्छी यादों के साथ एक दिन का जयपुर क्राउन प्लाजा का यह सफर खत्म हुआ।

श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट एंड स्पा (Shri Radha Brij Vasundhara Resort and Spa)

श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट एंड स्पा (Shri Radha Brij Vasundhara Resort and Spa)

श्री ब्रज राधा वसुधंरा रिसॉर्ट ब्रज की धरती पर बना एक सुन्दर रिसॉर्ट है। यह रिसॉर्ट मथुरा से करीब 30 किलोमीटर दूर गोवर्धन में है। गोवर्धन में ही वह गोवर्धन पर्वत है जिसे भगवान कृष्ण ने अपनी अंगुली पर उठाकर ब्रज वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। आज भी भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। इसी गोवर्धन पर्वत के करीब ही बना है यह रिसॉर्ट । यही इस रिसॉर्ट की खासियत भी है। बस रिसॉर्ट में रूकिए आराम कीजिए और रिसॉर्ट से बाहर आकर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा शुरू कर दीजिए।

TCBG के ट्रेवल ब्लॉगर्स का हमारा छोटा सा ग्रुप भी पहुंचा था इस रिसॉर्ट में रहने के लिए। मथुरा स्टेशन से गोवर्धन का रास्ता हरा भरा और खूबसूरत हैं इसका मजा लेते हुए करीब 30 मिनट में हम गोवर्धन रिसॉर्ट पहुंचे। बड़े से दरवाजे से रिसॉर्ट के अंदर जाते ही माहौल बदल जाता है।

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पेड़-पौधों से भरा इलाका, चौडी सड़क और एक कोने में खड़ी गोल्फ गाड़ी ( ये रिसॉर्ट में एक जगह से दूसरी जगह जाने के काम आती हैं) दिखाई देती हैं। दरअसल यह हॉलिडे रिसॉर्ट होने के साथ एक रिहायशी सोसाइटी भी है। 25 एकड़ में फैले इसके कैम्पस में कुल 240 कॉटेज बने हैं जिसमें से 50 का इस्तेमाल रिसॉर्ट की तरह किया जाता है। बाकि बचे कॉटेज निजी प्रयोग के लिए लोगों को बेचे गए हैं। इन सभी कॉटेज को 24 – 24 के गोलाकार ग्रुप में एक पेड़ के आकार में बनाया है। हर ग्रुप का नाम देश की एक प्रमुख नदी के नाम पर रखा गया है।

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कॉटेज-

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रिसॉर्ट में कमरे के कॉटेज और कॉटेज स्वीट बने हैं। स्वीट में में डबल बेड रूम के साथ ही एक लिविंग रूम भी दिया गया है। जबकि सामान्य कॉटेज में आपको एक डबलबेड रूम मिलता है। यहां पूरे परिवार के लिए 2 कमरे का कॉटेज भी उपल्बध है । मैं कॉटेज स्वीट में रूका था। कमरा खासा बडा था ।

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कॉटेज स्वीट होने के कारण बाहर एक लिविंग रुम और उसके अंदर एक कमरा दिया गया था। कमरे के ठीक बाहर बने लॉन से कॉटेज और भी सुन्दर लग रहा था। शाम के समय लान में आराम से बैठिए और चाय का मजा लिजिए। कमरे में जरूरत की सभी चीजें लगाई गई हैं। हां सुबह-सुबह आप की आवाज चिडियों की चहचहाट से ही खुल जाएगी।

खाना—

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रिसॉर्ट का अपना रेस्टोरेंट हैं जहां हर तरह के खाने का इंतजाम है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, चायनीज या कान्टीनेन्टल सब कुछ यहां मिल जाएगा। मैंने यहां सभी तरह का खाना खाया। उत्तर भारतीय खाना मुझे सबसे बेहतर लगा ।
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सुबह के नाश्ते में बना इडली, सांभर या पोहा भी स्वादिष्ट थे। हां यहां के चायनीज खाने में अभी कुछ सुधार की गुंजाइश हैं। इसके अलावा रेस्टोरेंट कुल मिलाकर बढिया है और ज्यादा मंहगा नहीं है। शहर के बाहर बने रिसॉर्ट के साथ यह परेशानी आती है कि खाना अक्सर मंहगा होता है लेकिन श्री ब्रज वसुंधरा में ऐसा करने की कोशिश नहीं की गई है।

अनुभूति स्पा-

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श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट के स्पा के बारे में जरूर बताना चाहूंगा। अनुभूति नाम का यह स्पा वाकई अलग अनुभूति देता है। इस छोटे से स्पा को बडी सुन्दर से सजाया गया है और अंदर जाते ही शांति का एहसास होता है।

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आप स्पा के बेहद बढिया मसाज का आंनद उठा कर यात्रा की थकान को उतार सकते हैं। अगर गोवर्धन पर्वत की पैदल यात्रा करके यहां आए हो तो फिर स्पा में कुछ समय बिताना अच्छा रहेगा। अनुभूति स्पा सही मायने में इस रिसॉर्ट की एक खासियत है।

रिसॉर्ट में और क्या करें –

रिसॉर्ट में एक छोटा सा इंडोर स्विमिंग पूल भी है जहां समय बिताया जा सकता है। इसके अलावा यहां एक जिम भी है। रिसॉर्ट के क्लब में पूल टेबिल, टेबल टेनिस और एयर हॉकी खेल सकते हैं।

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सुबह उठ कर सैर करने का शौक है तो रिसॉर्ट सबसे बेहतर है। 25 एकड के पूरे केैंम्पस में सड़क बनी है जिस पर पैदल टहला जा सकता है। यहां पर घूमने के लिए साइकिल भी उपलब्ध हैं।

क्या घूमें-

रिसॉर्ट के ठीक सामने से ही गोवर्धन पर्वत की यात्रा का रास्ता है । यात्रा 21 किलोमीटर की है अगर पैदल नहीं करना चाहें तो आजकल गाड़ी या रिक्शा से भी यह यात्रा कर सकते हैं। यात्रा के पूरे रास्ते में मंदिरों की भरमार है जिन में कुछ वाकई पुराने हैं तो कुछ के साथ भगवान कृष्ण की कोई कहानी जुडी है इनको देखते हुए यात्रा पूरी कर सकते हैं।

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एक दिन मथुरा और वृंदावन को देखने के लिए अलग से रखा जा सकता है। अगर पुराने इतिहास में रुचि है तो मथुरा संग्रहालय से बेहतर जगह नहीं हो सकती।

कैसे जाएं-

दिल्ली से मथुरा के लिए बस और ट्रेन आसानी से मिल जाती हैं। ट्रेन करीब 2 घंटे का समय लेगी। बस से भी लगभग इतने ही समय में पहुंच सकते हैं। इसके अलावा अपनी गाड़ी है तो यमुना एक्सप्रेस का इस्तेमाल करके आसानी से पुहंच सकते हैं। रेलवे स्टेशन से गोवर्धन करीब 30 किलोमीटर दूर हैं।

श्री ब्रज राधा वसुंधरा घूमने से ज्यादा आराम करने की जगह है। अगर आप दिल्ली के पास कोई जगह चाहते हैं जहां आधुनिक सुविधाओं के बीच आराम कर सके तो यह बढिया जगह हो सकती है। हां साथ में धार्मिक जगह के दर्शन का फायदा तो है ही। मैंने यहां चार दिन बिताए और वाकई मैंने हर पल का मजा उठाया।

Note- यह यात्रा श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट के निमंत्रण पर TCBG ने आयोजित की थी।

आमोद अलवर बाग( Aamod Alwar Bagh) में दो दिन

आमोद अलवर बाग( Aamod Alwar Bagh) में दो दिन

चारों तरफ अरावली की पहाडियां और हरे- भरे खेतों के बीच बना है आमोद अलवर बाग रिसॉर्ट। सरिस्का टाइगर रिजर्व से नजदीकी इसे और भी खास बनाती है। यह रिसॉर्ट अलवर से करीब 15 किलोमीटर और सरिस्का टाइगर रिजर्व से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। जंगल के नजदीक होने के कारण यहां पूरी शांति और सुकून का अनुभव कर सकते हैं। अलवर बाग में दाखिल होते ही वाकई किसी जंगल में आने का एहसास होता है।

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पांच एकड में फैले इस रिसोर्ट के करीब दो तिहाई हिस्से में पूरी तरह से हरियाली और उसमें भी आवंला, नींबू और शहतूत जैसे पेडों को लगाया गया है। इसी हरियाली के बीच से होकर आप अपने कमरों तक पहुंचते हैं।

कमरे –

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यहां कुल 37 कमरे बने हैं। इन कमरों को राजस्थानी हवेली की तरह बनी चार इमारतों में बांटा गया है। इन इमारतों को रावला, जयगढ़, भंवर विला और गुलाब विला का नाम दिया गया है। जयगढ में सबसे ज्यादा 19 कमरे हैं। बाकी तीनों में 6-6 कमरे हैं। इनसे से कुछ कमरे Super Deluxe हैं तो बाकि के कमरे Deluxe श्रेणी के हैं। मैं जयगढ़ के Super Deluxe कमरे में रूका था। जब में अपने कमरे में पहुचा तो एहसास हुआ कि सही मायने में किसी लक्जरी रिसॉर्ट में आया हूँ। कमरा क्या , शहर के किसी अच्छे खासे फ्लैट से भी बडा हॉल था। कमरे की जरूरत के मुताबिक सभी चीजे वहां रखी गई थी।

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खासियत यह थी कि लक्जरी दिखाने की होड में कमरे को चीजों से भरा नहीं गया था इसलिए कमरे के बड़े आकार को महसूस किया जा सकता था। कमरे के अंदर की खाली जगह सुकून दे रही थी। कमरे के साथ लग बाथरूम भी खासा बडा था। कमरे में साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा गया था। Super Deluxe की तरह ही Deluxe कमरे भी बेहद शालीनता से सजाए गए हैं । ये कमरे भी खासे बड़े हैं। अपनी जरूरत के हिसाब से कमरे चुन सकते हैं।

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यहां भंवर विला और गुलाब विला में बने कमरे आकर्षक हैं। इन सभी कमरों को राजस्थानी चित्रकारी से सजाया गया है। पूरे रिसॉर्ट के सुपर डीलक्स और डीलक्स कमरों का किराया एक समान है फिर भी भंवर विला में रूकने को तरजीह दी जा सकती है। भंवर विला के कमरे के बाहर राजस्थानी तरीके की छत बनी है जिसमें जाली और झरोखे बनाए गए हैं। इसके कारण जहां खुली छत का मजा लिया जा सकता है वहीं आप सबकी नजरों से दूर रहकर शांति के पल बिता सकते हैं।
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खाना – पीना –

रिसॉर्ट के रेस्टोरेंट में उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, राजस्थानी और कॉन्टीनेन्टल हर तरह का खाना परोसा जाता है। दोपहर में मैंने उत्तर भारतीय खाना ही खाया, दाल , पनीर और सब्जी और तंदूर रोटी । खाना स्वाद से भरा था। रात के खाने के लिए बताया गया कि राजस्थानी थाली का इंतजाम किया गया है। खाने का असली मजा रात को ही मिलने वाला था। रात को राजस्थानी थाली में राजस्थान की मशहूर दाल-बाटी, गट्टे की सब्जी, लहसन की चटनी , पापड की सब्जी सभी कुछ था । राजस्थानी खाने का स्वाद लाजवाब था। अलवर बाग के मुख्य शेफ गौरव भनोट खुद भी खाने को नया बनाने की कोशिश करते रहते हैं।

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क्या कर सकते हैं यहां-

अलवर बाग में मनोरंजन के लिए इतने इंतजाम किए गए हैं कि आप चाहें को यहीं अपना पूरा समय बिता सकते हैं। रिसॉर्ट में पेंटबॉल, शूटिंग, रॉक क्लाइंबिंगस, रोप कॉर्स, रिमोट कार रेसिंग जैसे रोमांचक खेलों का मजा लिया जा सकता है। इतने तरह के खेल एक रिसॉर्ट में मुश्किल से ही देखने को मिलते हैं। इसके अलावा बेडमिंटन और बास्केटबाल और क्रिकेट खेल कर भी समय बिताया जा सकता है। इतना सब कुछ करने के बाद थक जाएं तो यहां को स्पा में जाकर थकान उतारी जा सकती है। स्पा में कई तरह की मसाज उपलब्ध हैं।

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शाम के साथ रिसॉर्ट का माहौल और भी खूबसूरत हो जाता है। हरे भरे लॉन के बीच बने स्विमिंग पूल में शाम का पूरा मजा लिया जा सकता है। पूल के साथ ही रिसॉर्ट का आडटडोर किचन काउंटर है जहां से आपकी फरमाइश पर तरह तरह के स्नैक्स परोसे जा सकते हैं।

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इतना सब कुछ को रिसॉर्ट में ही है कि दो दिन भी कम नजर आते हैं। फिर भी अगर बाहर घूमना चाहते हैं तो अलवर और सरिस्का टाइगर रिजर्व की सफारी पर जाया जा सकता है। अलवर यहां के करीब 15 किलोमीटर दूर है जहां अलवर संग्राहलय और किला देख सकते हैं। अलवर राजस्थान का बेहद ऐतिहासिक शहर है । अलवर की प्रसिद्ध सिलीसेंढ झील भी रिसॉर्ट के पास ही है।

सरिस्का टाइगर रिजर्व रिसॉर्ट से 20 किलोमीटर की दूर पर ही है। जंगल देखने का शौक है तो यहां सफारी कर सकते हैं। रिसॉर्ट को बताने पर वे इसकी बुकिंग करने में मदद कर देंगें। मैं भी अपने साथी ट्रेवल ब्लागर्स के साथ दोपहर को जंगल देखने के लिए गया। हालांकि सितम्बर के महीने में टाइगर सफारी बंद रहती है लेकिन जंगल के करीब 20 किलोमीटर अंदर एक प्राचीन हनुमान मंदिर है और मंगलवार और शनिवार को वहां जाने की अनुमति दी जाती है। हम लोग भी शनिवार को ही अलवर बाग में ही थे इसलिए एक छोटा चक्कर जंगल का भी लगाया। वैसे सफारी अक्टूबर से जून तक खुली रहती है।

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दिल्ली से मात्र 150 किलोमीटर दूर होने के कारण सप्ताह के आखिर दिन बिताने के लिए अलवर बाग माकूल जगह है। दिल्ली के करीब 3 घंटे का सडक का सफर करके आराम से यहां पहुंच सकते हैं। अलवर के लिए दिल्ली से बहुत सी ट्रेन भी उपल्बध हैं।

ध्यान रखें की सप्ताह के आखिरी दिनों शनिवार तथा रविवार और छुट्टी के दिनों में रिसॉर्ट आमतौर पर पूरी तरह भरा होता है। इसलिए इन दिनों में जाने से पहले बुकिंग जरूर करवा लें। सप्ताह के बीच में जाने पर ज्यादा शांति से समय बिता सकेंगे।

क्या खरीदें –

अलवर अपने मिल्क केक के लिए प्रसिद्ध है। तो अलवर का मिल्क केक सफर की यादगार के तौर पर साथ ले जाना ना भूंलें । अलवर में मिल्क केक बनाने की कई दुकाने हैं जिनमें बाबा ठाकुर दास एंड संस और दूध मिष्ठान भंडार बहुत प्रसिद्ध हैं। बाबा ठाकुर दास को ही अलवर की प्रसिद्ध मिल्क केक की शुरूआत करने का श्रेय दिया जाता है। बाबा ठाकुरदास की दुकान एक दुकान अलवर के घंटाघर के पास है और दूध मिष्ठान भंडार की एक दुकान तिजारा फ्लाईओवर के नजदीक है।

Note- यह यात्रा आमोद अलवर बाग के निमंत्रण पर की गई थी ।

त्रिपुरारी पूर्णिमा- गोवा का नाव उत्सव ( Boat Festival)

त्रिपुरारी पूर्णिमा- गोवा का नाव उत्सव ( Boat Festival)

उत्सव- गोवा नाव उत्सव ( Goa Boat Festival), विठ्ठलपुर गांव, गोवा
Date- 14 November 2016

अपने मस्त-मौला अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले गोवा में त्रिपुरारी पूर्णिमा को भी खास अंदाज में मनाया जाता है। यही वजह है कि त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन गोवा में होने वाला नाव उत्सव धीरे-धीरे पर्यटकों के बीच अपनी पहचान बनाने लगा है। इस दिन गोवा के विठ्ठलपुर गांव में वलवंती नदी के किनारे इसका आयोजन किया जाता है। इस साल यह नाव उत्सव 14 नवबंर को मनाया जाएगा।

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समुद्र, नदियां और नावें गोवा के जनजीवन के साथ गहराई से जुड़े हैं। लोक जीवन या संस्कृति से जुड़े हर पहलू में यह जुडाव साफ दिखाई देता है। यही कारण है कि त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन नाव उत्सव मनाया जाता है। यह एक नाव बनाने की प्रतियोगिता होती है, जिसमें थर्मोकोल या कार्डबोर्ड से छोटे-छोटे खूबसूरत जहाज या नावें बनाई जाती हैं। बिल्कुल बडे जहाजों की तरह दिखाने देने वाले इन छोटे जहाजों को बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है। जहाजों को रंगबिरंगों कागजों से सजाया जाता है। आजकल इन जहाजों पर रोशनी का इंतजाम भी किया जाता है। रोशनी से जगमगाते रंगबिरंगे जहाज अनोखा समा बांध देते हैं। पूरे गोवा से लोग इस नाव प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए जुटते हैं। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले लोगों की संख्या 1000 तक पहुंच जाती है। आखिर में सबसे खूबसूरत नाव को पुरूस्कार भी दिए जाते हैं।

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उत्सव की शुरूआत शाम के समय भगवान कृष्ण की डोली को गाजे-बाजे के साथ नदी के किनारे लाए जाने से होती है। प्रतियोगिता के खत्म होने तक भगवान की डोली वहीं रहती है। इस दौरान पारम्परिक नाच गाने का दौर चलता है। उसके बाद नदी में जलते दीए प्रवाहित किए जाते हैं। पूरी नदी दीओं से जगमगाती है उस बीच जोर शोर के साथ नावें नदी के पानी में उतारी जाती हैं। नदी में उतरी रंगबिंरगी नावें बेहद खूबसूरत दिखाई देती हैं। धीरे – धीरे यह उत्सव इतना लोकप्रिय हो गया है कि इसे देखने बड़ी संख्या में पर्यटक भी जुटने लगे हैं। गोवा पर्यटन विभाग की तरफ से इस यात्रा को दिखाने के लिए विशेष टूर आयोजित किए जाते हैं।

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गोवा की स्थानीय संस्कृति की अनूठी झलक इस उत्सव के दौरान देखने को मिलती है। नाव प्रतियोगिता के साथ तरह के पारम्परिक संगीत और नृत्यों का प्रदर्शन होता है। पूरे विठ्ठलपुर गांव को रंगबिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है। देर रात को आतिशबाजी का कार्यक्रम भी होता है ।
हिन्दु मान्यता के अनुसार त्रिपुरारी पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा को बेहद पवित्र माना जाता है। इस दिन देश भर में मेलों और उत्सवों का आयोजन होता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था।

तो अगर आप गोवा की अनूठी और मस्त मौला जिंदगी की एक झलक देखना चाहते हैं, वहां के स्थानीय जन-जीवन से रूबरू होना चाहते हैं तो एक बार गोवा के नाव उत्सव में जरूर शामिल हों।

ज्यादा जानकारी के लिए गोवा पर्यटन विभाग की वेबसाइट देख सकते हैं।

Picture courtesy – Goa Tourism

गुनेहड़ की वो शाम

गुनेहड़ की वो शाम

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गुनेहड़ में शाम होने वाली है। आसमान में बादल छाए हैं। हिमाचल के इस पहाड़ी गांव के लिए आज की शाम कुछ अलग होने वाली है। गांव के चौक में आज काफी हलचल है। चौक क्या , एक छोटा सा खुला चौकोर हिस्सा है जिसके चारों तरफ कुछ 5-7 दुकानें बनी हैं। यही गांव का बाज़ार भी है। चौक में एक तरफ मंच तैयार किया जा रहा है। मंच के पास ही एक घर के बाहरी अहाते में फैशन शो की तैयारियां चल रही हैं। गांव की लड़कियां रैंप पर चलने का अभ्यास कर रही हैं। लाइटें लग चुकी है, साउंट सिस्टम को दुरूस्त किया जा रहा है। पूरे दिन बरसात होने के बाद फिलहाल बारिश रुकी हुई है लेकिन आसमान बादलों से भरा पड़ा है। आधा जून बीत चुका है तो इस इलाके में मानसूनी बारिश कभी भी आ सकती है। लग रहा है कि बादल भी गुनहेड़ की माहौल का जायज़ा ले रहे हैं। चौक में लोगों का जुटना भी शुरू हो गया है। पूरे गांव की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपनी जगह पर बैठ गए हैं। सिर्फ गुनेहड ही नहीं आस पास के दूसरे इलाकों से भी लोग यहां आए हैं। कुछ पर्यटक भी अपनी सीट पर बैठे दिखाई दे रहे हैं।

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दरअसल यह सब गुनहेड़ में होने वाले फ्रेंक के मेले के आखिर दिन की तैयारियां हैं। गुनहेड में होनें वाले शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop) फेस्टिवल को गांव वाले फ्रेंक वाला मेला ही कहते हैं। क्योंकि इसे करवाने वाले हैं जर्मनी से गुनहेड़ आकर बसे फ्रेंक।

फ्रेंक और उनके मेले में जानने के लिए मेरा पुराना लेख पढें।

फ्रेंक मेले की आखिरी तैयारियों में व्यस्त दिखाई देते हैं। अंधेरा होते होते पूरा चौक लोगों से खचाखच भर जाता है। दुकानों के बाहर, छतों पर , जमीन पर , जिसको जहां जगह मिली वहीं जम गया है।

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मेले की शुरूआत होती है स्थानीय गद्दी और बड़ा भंगाली समुदाय के कपडों से जुडें फैशन शो से। इस फैशन शो को दिल्ली की फैशन डिजाइनर रेमा कुमार ने तैयार किया है। लेकिन खास बात यह है कि फैशन शो के रैंप पर चलने वाली सब लड़कियां इसी गांव की रहने वाली हैं। लड़कियां पारंपरिक गद्दी और बड़ा भंगाली कपड़ों से सजी हैं। मंच पर उनके आते ही तालियों से उनका स्वागत किया जाता है। लड़कियां गांव वालों के सामने फैशन शो कर रही हैं और गांव के लोग दिल से उनका स्वागत कर रहे हैं। साफ दिखाई देता है कि गुनेहड़ में यह मेला एक बदलाव ला रहा है। गांव के साथ जुडकर कला को आगे ले जाने की फ्रेकं की सोच की यहां साकार होती नजर आती है।

इसी फैशन शो के बाद मलेशिया से आए फिल्म निर्देशक के.एम.लो की फिल्म दिखाई गई। के.एम. दुनिया भर में टुकटुक सिनेमा के नाम से स्थानीय लोगों के साथ मिलकर फिल्म बनाने का प्रयोग करते हैं। इस बार के मेले में उन्होंने गांव के बच्चों को लेकर एलियन और पृथ्वी पर होने वाले उनके हमले को लेकर फिल्म तैयार है। गांव के हर बच्चे ने इसमें कुछ ना कुछ पात्र जरूर निभाया है। फिल्म से दिखाने से पहले के.एम. मंच पर आते हैं और उन्हें देखकर सबसे ज्यादा खुशी बच्चों को ही होती है।

इसके बाद दिखाई जाती है अमित वत्स की 3मिनट फिल्में। अमित ने पिछले एक महीने में गांव के रहने वालें तीन लोगों की जिंदगी पर 3 मिनट की तीन फिल्में तैयार की हैं। अमित अलग-अलग इलाकों में जाकर आम लोगों के विषयों से जुडी फिल्में छोटी फिल्में बनाते हैं।

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गांव के इस चौक की हर दुकान कांगड़ा की पारम्परिक चित्रकारी से सजी है। पूरा चौक अपने आप में एक कला दीर्घा नजर आता है। दीवारों पर सजे इन खूबसूरत चित्रों को गार्गी चंदोला ने स्थानीय कांगडा चित्रकारों की टीम के साथ मिल कर तैयार किया है।

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इसी चौक में गुनहेड़ पॉप नाम की एक दुकान भी खुली है जिसमें भड़कीले रंगों में चित्र सजे नजर आ रहे हैं। लंदन में स्टूडियो चलाने वाली केतना पटेल ने इसे तैयार किया है। इस बार फ्रेंक के साथ मेला आयोजित करने में केतना की भी भूमिका रही है। केतना के इस काम को गांव वालो ने इतना पसंद किया कि उन्होंने भी जी भर के पॉप आर्ट में अपना योगदान किया।

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इस बीच चौक में चल रहे रंगारंग कार्यक्रम में भी जोश बढ़ गया है। अब लोगों के बीच गुनेहड़ के स्थानीय गायकों की टोली अपनी गीत गा रही है और लोग उनका साथ देने के लिए नाचने लगे हैं। बीच- बीच में बारिश की भी फुहारें पड़ने लगती हैं। बारिश तेज होने लगती है लेकिन फिर भी सब लोग अपनी जगहों पर जमें हैं किसी तरह की अफरा-तफरी नहीं। बारिश के बीच ही इलाके के एक और प्रसिद्ध गायक मंच पर आते हैं भगवान शिव का एक भजन गाते हैं और आश्चर्यजनक रूप से बारिश थम जाती है। माहौल में और भी उत्साह आ जाता है। एक के बाद एक गानों का दौर जारी है।

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इसी चौक के कुछ दूरी पर दिल्ली के कलाकार पुनीत कौशिक का ग्लास आर्ट है जो रात की रोशनी में खूबसूरत दिखाई दे रहा है। यहां एक दुकान जयपुर से आई नीरजा और स्प्रिहा ने भी लगाई हैं। नीरजा रद्दी कागज के इस्तेमाल से कपड़ा बनती हैं। उसी कपड़े से बनी चीजों को उन्होंने अपनी दुकान में सजाया था। कागज के कपड़े से बनी दरियां, बैग और दूसरे सजावटी सामान । और आखिर में हैं टेरिकोटा आर्टिस्ट मुदिता की टेरिकोटा से बनी कलाकृतियां।

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अलग- अलग तरह के कलाकारों को एक जगह लाकर किसी गांव के बीचों बीच कला के प्रदर्शन का यह एक अनूठा प्रयोग है। शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop) का यह दूसरा आयोजन है इससे पहले 2013 में फ्रेंक ने इसे पहली बार आयोजित किया था। फ्रेंक का मकसद कला को आम लोगों के जीवन के साथ जोड़ने के साथ ही गांव के विकास में उसका इस्तेमाल करना था। धीरे-धीरे फ्रेंक अपने सपने को पूरा करने के करीब जा रहे हैं।

रात के गहराने के साथ ही कार्यक्रम को खत्म करने का समय हो जाता है। रात 10 बजे के बाद कार्यक्रम की इजाजत नहीं है। लेकिन नाच गाने के दौर के बीच कोई हटने के तैयार नहीं हैं। आखिरकार फ्रेंक किसी तरह गायकों को मंच से हटाकर कार्यक्रम को बंद करवाते हैं। मैं मंच के नीचे ही खड़ा था तो मुझसे मिलते हैं। मिलने पर फ्रेंक यह नहीं पूछते कि कार्यक्रम कैसा रहा ? शायद प्रशंसा लेना उनके स्वभाव में नहीं है। मुझे देखते ही फ्रेंक का पहला वाक्य होता है कि काश यह गांव ऐसा ही बना रहे , दूसरे कस्बों की तरह यहां भी हर घर में गाड़ियों का जमघट ना लगे। दरअसल गांव में मेला देखने के लिए इतने लोग आ गए थे कि गांव में पहली बार जाम जैसी स्थिति बन गई थी।
एक दिन बाद में फ्रेंक से विदा लेने के लिए मिलता हूं। मैंने पूछा, “तो अगला मेला कब होने जा रहा है?”
फ्रेंक का जवाब, “अभी तो मुझे कुछ दिनों तक खूब सोना है।”
फ्रेंक भले ही जवाब ना दें लेकिन पक्का है कि उनकी आंखों में अगले शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop)के सपने ने आकार लेना शुरू कर दिया होगा।

लद्दाख का कुंभ मेला – नरोपा उत्सव (16 से 22 सितम्बर 2016 )

लद्दाख का कुंभ मेला – नरोपा उत्सव (16 से 22 सितम्बर 2016 )

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हिमालय की गोद में बसे लद्दाख को अपनी अनोखी बौद्ध विरासत, संस्कृति और भौगोलिक विविधता के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यहां की बौद्ध संस्कृति अपने आप में अनूठी है। बौद्ध संस्कृति को करीब से देखने की चाह रखने वालों के लिए यह वर्ष बहुत खास है।
इस वर्ष 16-22 सितम्बर के बीच लद्दाख के हेमिस बौद्ध मठ में नरोपा उत्सव मनाया जाएगा। प्रत्येक 12 वर्ष के बाद मनाए जाने के कारण नरोपा उत्सव को लद्दाख का कुंभ मेला भी कहा जाता है। लद्दाख में बुद्द धर्म के द्रुपका पंथ के अनुयायी इस उत्सव को मनाते हैं। पूरे लद्दाख में लगभग 80 फीसदी लोग द्रुपका पंथ में विश्वास रखते हैं। इस वजह से नरोपा उत्सव को मनाने के लिए भारी संख्या में लोग जुटते हैं। इस उत्सव को दुनिया का सबसे बड़ा और प्रमुख बौद्ध उत्सव माना जाता है।

हेमिस मठ
हेमिस मठ

नरोपा उत्सव को भारत के ही रहने वाले बौद्ध संत और विद्वान संत नरोपा की याद में मनाया जाता है। इस साल संत नरोपा के जन्म के एक हजार वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसलिए इस बार का नरोपा उत्सव और भी खास बन जाता है।
संत नरोपा को द्रुपका पंथ का संरक्षक संत माना जाता है। उन्होंनें बौद्ध दर्शन की एक महान परंपरा को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई। संत नरोपा ने लद्दाख में रहे। लद्दाख में उन्होंने “नरोपा के छ: योग”(Six Yogas of Naropa) में दक्षता हासिल की। नरोपा के छ: योग को बौद्ध धर्म की वज्रायान शाखा का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।

इस साल मनाए जाने वाले नरोपा उत्सव को बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाएगा। द्रुपका पंथ के सबसे बड़े धर्म गुरू ग्यालवांग द्रुपका खुद उत्सव के दौरान लद्दाख में मौजूद रहेंगे, इन्हें संत नरोपा का अवतार माना जाता है। उत्सव के दौरान संत नरोपा से जुड़े Six Bone Ornaments को भी सबके सामने रखा जाएगा। इन आभूषणों को नरोपा उत्सव के समय ही सबके सामने लाया जाता है।

हेमिस उत्वस की तैयारी करते हुए ( पुराना फोटो - सिर्फ जानकारी के लिए लगाया गया)
हेमिस उत्वस की तैयारी करते हुए ( पुराना फोटो – सिर्फ जानकारी के लिए लगाया गया)

नरोपा उत्सव लद्दाख के उत्सवों में बहुत ऊंचा स्थान रखता है। उत्सव के दौरान लद्दाख की संस्कृति के विभिन्न रूप भी देखने को मिलेगें। इस दौरान लद्दाख के नृत्य और संगीत को देखने और सुनने का मौका मिलेगा। इसके साथ बालीवुड से जुड़े संगीतकार शंकर, एहसान , लॉय भी उत्सव के दौरान कार्यक्रम पेश करेगें। भारत के फिल्म जगत से जुडी और भी कई हस्तियां इस समय मौजूद रहेंगी। तो लद्दाख की संस्कृति और सभ्यता को करीब से देखने का इरादा रखते हैं तो सितम्बर में लद्दाख का रूख कर सकते हैं। उत्सव के सात दिनों के दौरान लद्दाख और दुनिया भर से करीब पांच से छ: लाख लोगों के पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।

कैसे पहुंचे- लेह शहर लद्दाख का मुख्यालय है। लेह दिल्ली, जम्मू, श्रीनगर और चंड़ीगढ से हवाई सेवा से जुड़ा है। इसके अलावा श्रीनगर और मनाली से सड़क के जरिए भी लेह पहुंचा जा सकता है। सड़क से सफर थोड़ा कठिन है रास्ते में कई ऊंचे दर्रों को पार करना पड़ता है। इसलिए चलने से पहले इलाके के मौसम की जानकारी जरूर लेलें। मनाली की तुलना में श्रीनगर से लेह जाना थोड़ा आसान है। मनाली से लेह की दूरी करीब 473 किलोमीटर है। श्रीनगर से लेह करीब 434 किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्ली से मनाली होते हुए हिमाचल परिवहन की एक बस लेह के लिए जाती है।
नरोपा उत्सव लेह से 40 किलोमीटर दूर हेमिस मठ में आयोजित किया जाएगा। हेमिस तक जाने से लिए लेह से टैक्सी ली जा सकती । स्थानीय बस सेवा भी उपल्बध है ।

ज्यादा जानकारी के लिए नरोपा उत्सव की इस वेबसाइट को देखा जा सकता है।

कुमाऊं के कारपेट साहब

कुमाऊं के कारपेट साहब

 जिम कॉर्बेट 

“The tiger is a
large hearted gentleman with boundless courage and that when he is
exterminated-as exterminated he will be, unless public opinion rallies to his
support-India will be the poorer by having lost the finest of her fauna.” – Jim Corbett

इन पंक्तियों का मतलब है – “बाघ बेहद साहसी और बड़े दिल का सज्जन जानवर है और अगर उसे जनता का समर्थन नहीं
मिला तो वह पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। और अपने बेहतरीन जीव के खोने के बाद भारत
और भी गरीब हो जाएगा” – जिम कॉर्बेट

कालाढूंगी में जिम कार्बेट संग्रहालय में बार्ड
पर इस बात ने तुरंत मेरा ध्यान खींचा । बार्ड पर लिखी कुछ पंक्तियां हमारे देश , हमारे पर्यावरण और बेशकीमती जानवरों को लेकर जिम कार्बेट को पूरी सोच को सामने
ला देती हैं। इसे पढ़ने के बाद एहसास होता है कि कैसे एक शिकारी से आदमखोर जानवरों
का शिकारी बनने वाला इंसान अपने बाद के जीवन में उनका रखवाला बन गया। 
जंगल और जानवरों पर आने वाले संकट की जो बात आज की जा रही है, उन्होंने उस संकट को आज से करीब 100 साल पहले ही समझ लिया था। पर्यावरण उस
समय बड़ा मुद्दा नहीं था लेकिन जंगल और जानवरों को  लेकर गहरी समझ रखने वाली पारखी नजरों ने आने
वाले खतरे को भांप लिया था।
जिम कॉर्बेट का घर
उसी ‘जिम कॉर्बेट’ या कहें कि ‘कारपेट साहब’ को जानने समझने के लिए कालाढूंगी के उनके घर
में बना संग्राहलय माकूल जगह है। स्थानीय लोगों में वे कारपेट साहब के नाम से ही मशहूर थे।

संग्राहलय में उनसे जुड़ी तस्वीरों और जानकारी
को सहेजा गया है। तस्वीरों से आप को उनके जीवन के बारे में बहुत कुछ जानने और
समझने को मिलता है।
वे एक शिकारी और प्रकृति प्रेमी थे ये तो सब
जानते हैं। पर यहां आकर मुझे पता चला कि नैनीताल इलाके के सफल व्यापारी के तौर
पर उन्होंने काफी पैसा भी कमाया। लेकिन जंगल से प्यार इतना गहरा था कि पहचान एक
प्रकृतिप्रेमी के तौर पर ही बनी। 
 कॉर्बेट अपनी बहन मैगी के साथ
यहां उनकी इस्तेमाल की गई बहुत सी चीजें भी
दिखाई गई हैं। उनके समय की मेज़, कुर्सी, उनका पलंग ,पालकी  जैसी चीजें यहां रखी गई हैं।एक बार को तो ऐसा लगता है कि जैसे आप फिर से
कारपेट साहब के समय में ही लौट गये हैं और यहीं कहीं से वे आकर आप से बात करने
लगेंगे।
नैनीताल के लिए भले ही वे बडे व्यापारी थे
लेकिन कालाढूंगी में  उनका दूसरा ही रुप
नजर आता है। यहां वे गांव वालों की मदद करने वाले इंसान के तौर पर पहचाने जाते थे ।
उन्होंने लोगों को खेती के लिए जमीनें  दीं। इलाके में केले की खेती की शुरुआत भी कारपेट
साहब ने ही की। उन्हें दवाईयों की जानकारी भी थी, किताबों में जिक्र मिलता है कि
उनकी लाल दवाई पीते ही गांव वालों का सर्दी जुकाम , बुखार छू मंतर हो जाया करता था।
तो ऐसे कारपेट साहब को तो लोग याद करेंगे ही।
उनकी सबसे बडी पहचान को आदमखोर जानवरों के
शिकारी के तौर पर बनी। इसी वजह से पूरे कुमाऊं और गढवाल में उनका बेहद सम्मान किया
जाता है।कालाढूंगी के पास छोटा
हल्द्वानी गांव भी उन्होंने ही बसाया ।
लोगों के दिलों में कारपेट साहब कि क्या जगह थी
इसका पता मुझे इंटरनेट पर उनके बारे में कुछ तलाश करते समय मिला। साल 1986 में
बीबीसी की टीम उन पर एक डाक्यूमेंटरी बनाने कालाढूंगी और नैनीताल आई। इसी
कालीढूंगी के घर में उसकी शूंटिंग हुई। उस समय तक कारपेट साहब भारत से गए 40 साल
हो चुके थे। लेकिन लोगों को दिलों में उनकी याद इतनी ताजा थी कि बीबीसी की टीम के
सम्मान में कुमाऊं के दूर दराज के गावों से लोग कालाढूंगी आए और उन्होंने कुमाऊंगी
नाच और गानों के साथ टीम का स्वागत किया। उस समय तक तो कारपेट साहब के साथ काम कर
चुके बहुत से स्थानीय लोग भी जिंदा थे।
कालाढूंगी के घर में आकर कारपेट साहब को लेकर
लोगों के इसी प्यार और सम्मान को आज भी महसूस किया जा सकता है। मुझे यहां आने वाले
लोगों में पर्यटक ही नहीं बल्कि आस-पास  के
लोग भी बड़ी संख्या में दिखाई दिए।
कार्बेट साहब पहचान एक शिकारी की थी लेकिन वे
मानते थे कि कोई जानवर आदमखोर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों के कारण वह आदमखोर बन
जाता है। 
उन्होंने अपनी पहली और सबसे मशहूर किताब मैन इटर्स ऑफ कुमाऊं की
प्रस्तावना में लिखा है – 

 “A man-eating tiger is a
tiger that has been compelled, through stress of circumstances beyond its
control, to adopt a diet alien to it. The stress of circumstances is, in nine
cases out of 10, wounds, and, in the 10th case, old age.  “Human beings are not the
natural prey of tigers, and it is only when tigers have been incapacitated
through wounds or old age that, in order to survive, they are compelled to take
to a diet of human flesh.”

यानि “ बाघ को परिस्थितियां
आदमखोर बनने के लिए मजबूर करती हैं, 10 में से 9 मामलो में बाघ के घाव इसका कारण
थे, और दसवें मामले में बाघ का बुढ़ापा इसकी वजह बना।”

“आदमी बाघों का प्राकृतिक आहार नहीं है, बुढापे, घाव या किसी
वजह से जिंदा रहने की लड़ाई में ही बाघ आदमी को खाना शरु करता है। ”

शिकारी कारपेट साहब ने  कैमरा भी
खरीदा था और जानवरों के चित्र लेने में उनका बहुत मजा आता था। उन्होनें लिखा है कि
रायफल से शूंटिग की बजाए कैमरे से शूट करना उनको कहीं ज्यादा पसंद था।
ऐसे अनोखे कारपेट साहब के बारे में कालाढूंगी
आकर बहुत कुछ जानने को मिला । लेकिन  कारपेट साहब को जानने का सफर अभी पूरा
नहीं हुआ था उसमें एक आश्चर्य और बाकी था।
Corbett Wild Iris Spa and Resort की तरफ से घूमने के लिए जो जगह
चुनी गई थी उसमें कालाढूंगी से कुछ किलोमीटर दूरी पर पवलगढ़ में बना का वन विभाग
का रेस्ट हाउस भी शामिल था। वन विभाग के रेस्ट हाउस  आमतौर पर जंगल के अंदर बहुत शांत इलाके में
होते हैं इसलिए मुझे लगा कि दोपहर के खाने के लिए इस जगह को चुना गया होगा। लेकिन
यहां पहुंचे तो पता चला कि इस रेस्ट हाउस का इतिहास भी कारपेट साहब से जुड़ा है।
पवलगढ़ रेस्ट हाउस
इस रेस्ट हाउस को 1912 में अंग्रेजी कॉटेज
स्टाइल में बनाया गया था। 1930 में  इस
रेस्ट हाउस में कारपेट साहब भी रुक चुके थे। यहीं रहते हुए उन्होने रेस्ट हाउस के
ठीक बगल में सेमल के पेड़ के नीचे अपने समय के सबसे मशहूर बाघ “बैचलर ऑफ पवलगढ़”को मारा था। वह
पेड़ आज भी मौजूद है।

इसी पेड़ के नीचे मारा था
बाघ
 कहा जाता है वह अपने समय का सबसे विशाल बाघ था।अपनी किताब
मैन इटर्स ऑफ कुमाऊं में वे लिखते है कि गांव वाले बताते हैं कि उन्होंने इससे बड़ा
बाघ पहले कभी देखा ही नहीं था।
लेकिन जानकारी मिलती है कि “बैचलर ऑफ पवलगढ़ आदमखोर” नहीं था।
फिर भी कार्बेट ने उसे क्यों मारा इसकी जानकारी मुझे कहीं नहीं मिली। लेकिन
स्थानीय लोगों में एक बात प्रसिद्ध है कि बाघ को मारने के बाद उसकी लाश के
पोस्टमार्टम के दौरान कार्बेट को पता चला कि बाघ आदमखोर नहीं था। उस घटना का उन पर
इतना गहरा उसर हुआ कि इस घटना के बाद वे और भी जोर शोर से जानवरों को बचाने के काम
में जुट गए।
उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि 1936 में
हेली नेशनल पार्क के नाम से देश का पहला संरक्षित पार्क बना। आजादी के बाद कार्बेट
के प्रति सम्मान जताते हुए भारत सरकार ने 1952 में उसका नाम बदल कर जिम कार्बेट
नेशनल पार्क कर दिया।
शायद यह कार्बेट साहब की ही विरासत थी कि देश
में बाघ बचाने के लिए जब काम शुरु किया गया। तो कार्बेट नेशनल पार्क में ही देश का
पहला बाघ अभ्यारण्य भी बनाया गया।
प्रकृति और जंगल के जानवरों से प्यार करने
वाले कारपेट साहब के लिए इससे बड़ी श्रंद्धांजलि कुछ और हो भी नहीं सकती थी।
तो सिर्फ बाघ को देखने के लिए कार्बेट पार्क घूमने
नहीं आएं। एक दिन उस इंसान के बारे में जानने की भी कोशिश करें जिसनें पूरी दुनिया
में बाघ संरक्षण के प्रयासों को एक दिशा दी।
कॉर्बेट नेशनल पार्क की अनोखी दुनिया

कॉर्बेट नेशनल पार्क की अनोखी दुनिया

राजस्थान के रणथम्बौर नेशनल पार्क से दिल्ली वापस आते ही अगले
दिन कॉर्बेट नेशनल पार्क जाने का मौका मिल गया। एक घूमने के शौकीन को और क्या
चाहिए । एक ही दिन में जाने की तैयारी की, कैमरे को संभाला और अगले सफर के लिए
तैयार । सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि रूकने की जगह के बारे में कुछ पता करने का मौका
ही नहीं मिला। मुझे वहां Corbett Wild Iris Spa and Resort में रुकना था।
 रिजोर्ट की तरफ जाते हुए मन में एक ही बात थी कि क्या यह भी कॉर्बेट
के दूसरे रिजोर्ट की तरह ही हुल्लड़ बाजी का अड्डा होगा। ढिकाला की तरफ के भीड भरे
पार्टियों के लिए मशहूर इलाके में जाने का कोई मन नहीं था। रामनगर पहुंचने पर
गाड़ी ढिकाला की तरफ ना जाकर सीधे हाथ की तरफ मुड़ी तो कुछ सूकून मिला कि चलो उस
इलाके से तो बच गए। रामनगर में कोसी का बैराज पार करने के बाद कुछ किलोमीटर
नैनीताल की तरफ चलने के बाद गाडी उलटे हाथ पर मुड़ी और जंगल में खो सी गई। हम सीधे
जंगल के बीचों बीच आ गए थे। अब हमारे सामने एक पतली
सी सड़क थी। दोनों तरफ साल और टीक के घने पेड थे।
घने जंगल से गुजरती सड़क
अब महसूस हुआ कि हम सही मायने
में जंगल में थे। पता चला कि सड़क भी हाल ही में बनी थी। जंगल में 7 किलोमोटर चलने के बाद हम
क्यारी गांव में पहुंचे। वही गांव के पास बना था Corbett Wild Iris Spa and Resort । 
यहां तक
पहुंचने के लिए गाड़ी को नदी के उबड़-खाबड़ रास्ते पर भी चलना पडा। चारों तरफ की
शांति को सिर्फ चिडियों की चहचहाट ही तोड रही थी। हमारा जंगल का सफर शुरु हो चुका
था। कुछ अलग तरीके से।
घने जंगल के बीच बना है यह रिजोर्ट। दिल्ली से 6 घंटे के सफर के बाद यहां
पहुंचे थे। थकान का जो थोडा बहुत असर  था
वह भी ठंडे शर्बत के स्वागत के साथ उतर गया।
ज्यादा कुछ नहीं करके सीधे अपने कमरों में पहुंचे थोड़ा सा आराम करने के लिए।
बडे से इलाके में कुछ- कुछ दूर पर कमरे और कॉटेज बने थे। 
मेरा कमरा खासा बडा और
अच्छे तरीके से सजा था। कमरे में वह सब कुछ मौजूद था जो एक- दो दिन के लिए आराम की
चाह रखने वाले लोग चाहते हैं।
कुछ देर आराम के बाद सभी लोग दोपहर के खाने पर मिले। बेहतर तरीके बना स्वादिष्ट खाना, भरपेट खाया । डायनिंग हॉल में जंगल के बीच
रहने का ही आभास होता है। लकड़ी का फर्नीचर, बड़ी- बडी कांच की खिड़कियां
जिनसे  बाहर की हरियाली का मजा लिया जा
सकता है।
खुला-खुला डायनिंग हॉल
खाने के बाद रिजोर्ट को देखने निकल गया। आम का तो पूरा बगीचा था
यहां। पता चला कि बगीचे के बीच ही इस रिजोर्ट को बनाया गया है। 
जंगल में रुकने को
कुछ और बेहतर तरीके से महसूस करना चाहते हैं यहां छप्पर वाले कॉटेज भी हैं।  एक तरफ स्पा था और स्पा के बगल में बड़ा सा
स्विमिंग पूल।
यहां
एक एक्टिविटी रूम भी है। इस बड़े से हॉल में पूल टेबल, टेबिल-टेनिस , और कैरम
बार्ड जैसी चीजें रखी हुई हैं। खेलों के शौकीन हैं तो यहां बड़ा अच्छा समय बिताया
जा सकता  है।

आस पास देखते हुए ही नेचर वॉक पर जाने का समय हो गया। रिजोर्ट के पास ही है
क्यारी नाम छोटा सा कुमाऊंनी गांव । इसी गांव में हमें नेचर वॉक पर जाना था।
विनोद नेचर वॉक के बारे में बताते हुए
इस वॉक से पहले हमारी मुलाकात हुई विनोद बुधानी से। विनोद क्यारी गांव के ही
रहने वाले हैं और अब रिजोर्ट के साथ गाईड और नैचरलिस्ट का काम करते है। पहली ही नजर
में विनोद पक्के नैचरलिस्ट नजर आते  हैं।
खाकी पैंट , सफेद टी-शर्ट, गले में एक तरफ दूरबीन और दूसरी तरफ छोटे से बैग में
स्थानीय चिंडियों की प्रजातियों पर लिखी एक किताब। अगले दो दिन हमें विनोद के साथ
ही रहना था। दोस्ती तो मिलते ही हो गई। विनोद को स्थानीय पशु पक्षियों की
प्रजातियों और पेड़-पौधों  की बहुत अच्छी
जानकारी थी।
यह जानकर अच्छा लगा कि गांव के बहुत से लोग रिजोर्ट में ही काम करते हैं। गांव
में ही रहकर अगर पर्यटन से रोजगार पैदा होता है तो इससे अच्छा भला क्या हो सकता
है। । गांव में कई लोगों के पास जिप्सी भी हैं जो पर्यटकों को सफारी पर ले जाने का
काम करती है। पर्यटकों के आने से अब गांव में कई होमस्टे भी खुल गए हैं। एक पूरी
अर्थव्यवस्था है जो पर्यटन के इर्द-गिर्द पनपने लगी है।
विनोद के साथ हम चले क्यारी गांव की तरफ। खिचड़ी नदी को पार कर हम पहुचे इस
गांव में, नदी में ज्यादा पानी नहीं था इसलिए पैदल ही इसको पार कर लिया।
खिचड़ी नदी 
( Image courtesy- Abhinav Singh)
 गांव में
लोगों की जिंदगी को करीब से देखने का मौका। गांव के खेतों में गेहूँ की कटाई का
काम चल रहा था। 
विनोद ने हमें गांव के पास उगे बहुत से पेड़-पौधों के बारे में बताया। 
हाथी कान नाम का पौधा
रोजमर्रा की जिंदगी में डॉक्टर से ज्यादा लोग इन्हीं पेड़ पौधों पर भरोसा करते
हैं। जब 24 घंटे का डॉक्टर घर में ही मौजूद हो तो फिर चिंता किस बात की। कोई पौधा
दर्द दूर करता है तो कोई चोट पर एंटी सेप्टिक का काम करता है। किसी से गठिया का
इलाज हो सकता है तो किसी से गैस की समस्या रफूचक्कर हो जाती है।

पेड़ पर लगा नींबू
हम शहर में रहने
वालों का तो इन चीजों से नाता टूट गया है लेकिन अगर इन चीजों के बारे में जानने का
कोई ऐसा मौका मिले तो उसका पूरा फायदा उठाना चाहिए। प्रकृति ने अपने खजाने में
बहुत कुछ छिपा रखा है हमारे लिए, बस पहचानने की जरुरत है।
नेचर वॉक के आखिर में गांव की एक दुकान में हमारी शाम की चाय का इंतजाम था।
गर्मागरम पकौड़े , समोसे और चाय की चुस्कियों के साथ अपनी इस नेचर वॉक को खत्म
किया।
वापस लौटते – लौटते अंधेरा हो गया। शाम को बड़े से लॉन में खाने का इंतजाम था। 
 Image courtesy- Iris Resort
भारतीय से लेकर कॉन्टीनेन्टल तक शाम के खाने का इंतजाम शानदार था। खास बात यह थी
कि यह बनाने वाले खानसामा यहीं आसपास के थे ।
शाम के खाने के साथ ही संगीत का
कार्यक्रम भी रखा गया । एक से एक गाने सुनने को मिले। कलाकारों की यहां कोई
कमी नहीं थी। सब मिल कर शाम को खूबसूरत बना रहे थे। खाना खाते, घूमने फिरने की
बातें करते करते आधी रात हो गई। घुमक्कड़ी के किस्से शुरु हो तो फिर रुकते कहां
हैं। लेकिन सोना भी जरुरी था क्योंकि अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर फिर से क्यारी
गांव में ही जाना था।  इस तरह से कॉर्बेट
के जंगल में पहला दिन पूरा हुआ। लेकिन अभी दो दिन और बाकी थे। उन दिनों में हमें
ताज्जुब में डालने वाली कई चीजें थी।  उसके
बारे में अगली पोस्ट में बात करेंगे।
कैसे पहुंचे – रामनगर दिल्ली से करीब 250 किलोमीटर दूर है। दिल्ली से ट्रेन और बस की सुविधा से जुड़ा है। ट्रेन और बस से करीब 6 घंटे में यहां पहुंचा जा सकता है।  Corbett Wild Iris Spa and Resort  रामनगर से   करीब 12 किलोमीटर दूर है। रामनगर से टैक्सी
लेकर यहां पहुंचा जा सकता है।

( Travel correspondent blogger group(TCBG) organised this visit and Corbett Wild Iris Spa and Resort sponsored it.)

गुनेहड़ – कला दीर्घा में बदलता गांव

गुनेहड़ – कला दीर्घा में बदलता गांव

गुनेहड़ की एक सुबह मुझे मेरे होटल की बालकनी से कुछ
महिलाएं आती दिखाई दी। खूबसूरत रंग बिंरंगे कपड़ों में सजी, काफी कुछ राजस्थानी
पहनावे जैसा। वे महिलाएं नीचे की तरफ बने खेतों में चली गई। एक घंटे बाद जब वे फिर
से आती दिखाई दी तो मेरी साथी ब्लागर श्री और मंजुलिका ने उनके फोटो लेने की इजाजत
मांगी। वे आराम से तैयार हो गई, बोली, ले लो जी, जितने फाटो लेने हैं। अभिनव और
मैं भी अपना कैमरा लेकर पहुंचे। 

उन महिलाओं ने हमें अपने घर आने का न्यौता दिया और
साथ में प्यार से हमें उलाहना भी कि आप पहले बताते तो हम अच्छे तैयार होकर आते पूरे गद्दी पहनावे और श्रंगार के
साथ। आज कि दुनिया में इतना प्यार और अपनापन वो भी चार अनजान लोगों से कोई गांव
वाला ही दिखा सकता है।  

इस पर हममें से
किसी ने कहा कि हम फिर  आएंगे फ्रेंक वाले
मेले में
, उस समय आप के घर भी चलेंगे। ‘फ्रेंक वाला मेला’ सुनते ही उनकी आंखों में
चमक आ गई, बोली कि उस समय तो हम भी तैयार होकर आएंगें, आप जरुर आना।

‘फ्रेंक वाला मेला’ यह शब्द सुनकर जो चमक उन गद्दी महिलाओं के चहरे
पर दिखाई दी,यही वह जुड़ाव है जो इस मेले को शुरु करने वाले फ्रेंक चाहते भी थे। मेला
गांव वालों के साथ जुड़े, उनको साथ लेकर चले।

 फ्रेंक वाला मेला
दरअसल एक कला उत्सव ( आर्ट फेस्टिवल) है जिसे फ्रेंक हिमाचल की कांगड़ा घाटी के छोटे
से गांव गुनेहड़ में करवाते हैं। देश-विदेश के कलाकार उसमें जुड़ते हैं, अपनी कला
दिखाते हैं। फ्रेंक चाहते तो इस कला उत्सव को भी दूसरे शहरों में होने वाले आर्ट
फेस्टिवल की तरह बुद्धिजीवियों का अड्डा बना सकते थे । जहां देश दुनिया के लोग
जुटते तो जरुर हैं लेकिन आस-पास के परिवेश या लोगों से उनका जुडाव कम ही हो पाता
है।

यहीं पर आकर फ्रेंक का मेला सबसे अलग और ख़ास हो जाता है।
इस आर्ट फेस्टिवल में कलाकार आते तो दुनिया भर से हैं लेकिन वे स्थानीय लोगों के
साथ मिलकर अपनी कला को दिखाते हैं। फैशन डिजाइनर स्थानीय गद्दी पहनावे को मिलाकर
कपड़े तैयार कर रहा है, उसके बाद गद्दी महिलाओं का पारम्परिक कपड़ों में फैशन शो
होता है। 
फोटोग्राफर गांव के लोगों की जिंदगी को अपने कैमरे में उतार रहे हैं।
फिल्म बनाने वाले गांव के बच्चों को अभिनय करवा कर उनके साथ फिल्म बना रहे हैं। 
पूरा गुनेहड़ गांव जैसे एक बड़ी सी कला दीर्घा में बदल जाता है। कोई एक जगह नहीं
गांव का चौराहे, नुक्कड़, गली मोहल्ले हर जगह कला की कोई अभिव्यक्ति चलती रहती है।
ये दुकानें बनती हैं फेस्टिवल का हिस्सा

पिछले आर्ट फेस्टिवल की कलाकारी

कुछ रंग अभी भी ताज़ा हैं
कोई कलाकार लोगों के साथ मिलकर गांव की दुकानों और खाली
पड़ी दिवारों को अपनी कूंची से नए रंग दे रहा होता है। तो कोई दरवाजों को सजाने
में व्यस्त है। और इन सब में गांव के लोगों का हिस्सा लेना वाकई अनोखी बात है।

फ्रेंक बताते हैं कि 2013 में हुए पहले उत्सव में शुरु में
तो गांव के लोगों थोड़ा दूर-दूर रहे लेकिन कुछ ही दिन में सब ऐसे घुल मिल गए कि
लगता नहीं कि बाहर से आए कलाकार वहां काम कर रहें हैं।
इस उत्सव को फ्रेंक ने नाम दिया है शॉपआर्टआर्टशॉप 
( ShopartartShop) । नाम इसलिए पड़ा कि गांव
में खाली पड़ी दुकानों को एक महीने के लिए बाहर से आए कलाकारों को दे दिया जाता
है। इन दुकानों में कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। गांव से इनका जुड़ाव
इतना ज्यादा है कि पहले शॉपआर्टआर्टशॉप में तो गांव वालों में खुद ही अपनी दुकाने
फ्रेंक को दे दी वो भी बिना कोई पैसा लिए।
खाली दुकानों में आती है रौनक

2013 में हुए पहले उत्सव के समय आस-पास के गांवों के 5000
लोगों मेला देखने आए। अब तीन साल के बाद 14 मई से 14 जून तक यह दूसरा शॉपआर्टआर्टशॉप
कला उत्सव होने जा रहा है। फ्रेंक को उम्मीद है कि इस बार इससे भी ज्यादा लोग मेले
को देखने आएंगे।

इन्होंने पिछले मेले में फिल्म बनाई थी

कला के कुछ नमूने

आप भी चाहें को इस शॉपआर्टआर्टशॉप ( ShopartartShop)  कला उत्सव की मदद कर सकते
हैं।
मदद के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

हां, मेला देखने के लिए सबका स्वागत है। गुनेहड़ हिमाचल में
पैराग्लाइडिंग के लिए प्रसिद्ध जगह बिर-बिलिंग के बिल्कुल पास ही है, इसलिए यहां
रुकने और खाने पीने की जगहों की कमी नहीं है।   
कैसे पहुंचें-

रेल- बड़ी लाइन का सबसे नजदीकी स्टेशन पठानकोट है। गुनेहड़
से पठानकोट करीब 150 किलोमीटर दूर है। पठानकोट से टैक्सी और हिमाचल परिवहन की बस
उपलब्ध हैं। टैक्सी करीब 3,000 हजार रुपये में मिल जाएगी। 

बस- दिल्ली, चंड़ीगढ़ जैसे शहरों से यहां के लिए सीधी बस
सेवा है। वोल्वो से लेकर साधारण बस तक जैसा आप चाहें। बस आपको गुनेहड़ से कुछ पहले
बिर में उतारगी।
दिल्ली से बस का किराया बस की सुविधा के हिसाब से करीब 600 रुपये से लेकर 1200 रुपये तक है। 

हवाई जहाज- कागंडा में हवाई उड्डा है जहां दिल्ली से नियमित
उड़ान आती है। 
अमृतसर का खाना

अमृतसर का खाना

पंजाब का नाम सुनते ही ध्यान में आती है मौज मस्ती और
पंजाबियों की जिंदादिली, और जितने जिंदादिल हैं यहां के लोग, उतना ही जानदार है
यहां का खाना।
मक्खन, घी, दूध, दही और लस्सी तो यहां के रोजमर्रा के खाने
का हिस्सा है। । इस बार पंजाब की यात्रा में जी भर कर पंजाब का खाना खाया। पंजाबी
खाना खाने के लिए अमृतसर से बढ़िया जगह कौन सी हो सकती है भला। तो आज बात अमृतसर
के पंजाबी खाने की ।
अमृतसर के खाने को 
खाने की शुरुआत हुई वाघा बार्डर से कुछ पहले बने सरहद रेस्टोरेंट से। शाम
को होने का बीटिंग रिट्रीट को देखने से पहले दोपहर का खाना यहीं खाने का कार्यक्रम
था।
सरहद
 जैसा नाम है वैसी ही है सरहद की खासियत। यहां सीमा के दोनों तरफ के शहरों यानी
अमृतसर और लाहौर के खाने का मजा लिया जा सकता है। रेस्टोरेंट के बाहर दो छोटे
टैम्पों खड़े हैं जिनको  पाकिस्तान का
प्रसिद्ध ट्रक आर्ट से सजा या गया है।

पंजाब का खाना तो अमृतसर में कहीं भी खाया जा सकता था लेकिन
जब सरहद में थे तो लाहौरी खाना का मजा क्यों हाथ से जाने दिया जाए यह सोचकर लाहौर
से जुड़ा शाकाहारी खाना मंगवाया। ( पता नहीं कभी लाहौर जाने को मिले या नहीं)
लाहौरी मिंया जी दाल , लाहौरी नजाकत कोफ्ते और लाहौरी
कलौंजी वाले नान। जितने अनोखा नाम है इनके उतना ही बेहतर उनका स्वाद भी था। पेटभर
कर खाया।  और भी चीजे थीं जिन्हें खाने का
मन था लेकिन वाघा पर होने वाले कार्यक्रम के लिए देर हो रही थी इसलिए जल्दी ही
वहां से निकल गए।

      सरहद का खाना
वाघा से आकर रात को हरमदिंर साहिब के दर्शन  किए। उसके बाद रात के खाने के लिए एक ही नाम
दिमाग में था अमृतसर का प्रसिद्ध केसर दा ढ़ाबा। 
यह मशहूर ढ़ाबा चौक पासिंया के
पास है।  केसर दा ढ़ाबा पहुंचे तो देखा की
ढ़ाबे में बैठने की जगह नहीं है। 20 मिनट इंतजार करने के बाद हमारा नंबर आया। यहां
खाने के लिए बहुत कुछ है। पर केसर की थाली में सभी स्वाद मिल जाते हैं। तो केसर की
थाली मंगवाई। दाल फ्राई, छोले, रायता और तंदूरी लच्छा परांठा।
 थाली को परोसने का
अंदाज भी सबसे अलग था, थाली के आते ही लाने वाले ने परांठों को हाथ से दबा कर थाली
में रखा। शायद उसमें मक्खन को अंदर तक पहुंचाने के लिए। स्वाद तो वाकई लाजवाब था।
थाली में इतना कुछ है कि उसको खत्म करना किसी एक के बस की बात नहीं है। इसके साथ
ही मंगवाई लस्सी। इतना सब खाने के बाद तो उठने की हिम्मत भी नहीं बची थी लेकिन
खाना का आखिर में फिरनी खाना नहीं छोड़ सकते थे। इनकी फिरनी भी खाने के जितनी ही
स्वादिष्ट थी।
केसर के ढाबे पर दाल को पूरे 12 घंटे तक पकाया जाता, इतना
पकाने से उसका स्वाद में अनोखापन आ जाता है जो आम दाल में नहीं मिलता।
   इस देग में पकती है दाल
खाना बनाने की जगह पर लगे तंदूर में लगातार परांठें और
रोटिया बनती रहती हैं। आप चाहें तो जाकर देख भी सकते हैं कि यहां खाना कैसे बनाया
जाता है।

अगले दिन सुबह अमृतसर के छोले कुलचे का नाश्ता करना था। इसे
खाने के लिए हम पहुंचे भाई कुलवंत सिंह कुलचे वाले के यहां। स्वर्णमंदिर जाने वाली
सड़क पर जलियांवाला बाग से कुछ पहले एक गली में यह दुकान है। मक्खन लगे आलू से भरे
कुलचे और साथ में छोले और चटनी। 

सुबह सुबह गर्मागरम तंदूर  से निकले कुलचे खाकर मजा आ गया। कुलचा बनाने का
तरीका भरवां नान से कुछ अलग होता है। इसे पूरे दिन कभी भी खाया जा सकता है। अभी तो
पेट भर चुका था लेकिन आज पूरे दिन अमृतसर के खाने की अच्छी दुकानों का भी सफर था
इसलिए तय किया कि अब बस थोड़ा ही खाना है जिससे ज्यादा से ज्यादा स्वाद लिए जा
सकें। कुछ देर घूमने के बाद थोड़ा खाना पचा तो हम पहुंचे हिंदु कॉलेज के पास आहूजा
लस्सी
पर। वैसे तो लस्सी पंजाब का ऐसा तोहफा है जो भारत में कहीं भी जाएं आपको मिल
ही जाएगा लेकिन अमृतसर की लस्सी बात ही कुछ और है। आहूजा लस्सी यहां लस्सी की सबसे
प्रसिद्ध दुकान है। बड़ा सा लस्सी का गिलास और ऊपर रखी मलाई , पीते ही मजा आ जाता
है।
अमृतसर के खाने की दुकानों में अगला नंबर था लोहगढ़ गेट के
पास मनु फ्रूट क्रीम आइसक्रीम का ।
 दिसंबर का महीना और ठंडी आइसक्रीम, दोनों का
आपस में कोई मेल नहीं। लेकिन कुछ छूट नहीं जाए इसलिए इसका स्वाद लेना तो बनता ही
था। मुझे फ्रूट क्रीम में बहुत मजा नहीं आया, स्वाद लगभग वैसा ही था जैसा किसी
दूसरी फ्रूट क्रीम में होता है। हो सकता है कि ठंडे मौसम की वजह से ज्यादा आनंद
नहीं ले पाया , अगली बार कभी कुछ गर्म मौसम में गया तो एक बार फिर खाकर जरुर
देखूंगा।
यहां से कारवां बढ़ा मक्खन चिकन की तरफ। यहां मासांहारी
खाने की सबसे अच्छी दुकानों में से एक है मक्खन चिकन। हालांकि मेरा मासांहारी खाने
से कुछ लेना देना नहीं है तो यहां मेरे बताने लायक कुछ नहीं है। आप मासांहारी खाना
खाते हो तो यहां होकर आएं।
पेट में कुलचे और  लस्सी का असर अभी तक था। लेकिन वापसी से पहले
एक जगह और बच गई थी। अमृतसर की मशहूर ब्रजवासी चाट जो क्रिस्टल चौक के पास में है
। यहां पर हमने टिक्की, पापडी चाट और भल्ले खाए। चाट खाने में मजेदार थी।
इस तरह से हमारा अमृतसरी
खाने का सफर पूरा हुआ।
अमृतसर में खाने की दुकानों
की कमी नहीं है। जब भी जाएं अपनी पसंद के हिसाब से चुनें और अमृतसरी खाने का मजा
उठाएं।

अमृतसर में हो तो हरमिंदर साहिब
के लंगर का प्रसाद जरुर चखें। दावे के साथ कह सकता हूँ कि इतना स्वादिष्ट खाना
आपने पहले शायद ही खाया होगा। 
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