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उत्तराखंड की 10 जगहें जो आपको देखनी चाहिए

उत्तराखंड की 10 जगहें जो आपको देखनी चाहिए

देवभूमि उत्तराखंड का प्राकृतिक सुन्दरता में कोई मुकाबला नहीं है। बर्फ से ढ़के पहाड़े, देवदार के घने जंगल, नदियां और झीलें आपका मन मोह लेते हैं । उत्तराखंड की अनगिनत जगहों में से चुनी हुई 10 जगहें में आपके सामने रख रहा हूँ।

1- जागेश्वर

Source- https://en.wikipedia.org/wiki/Jageshwar_Temples,_Uttarkhand#/media/File:Image_ank.JPG

ऊंचे पहाडों, देवदार के घने जंगलों और जटागंगा नदी के किनारे बसा है उत्तराखंड का जागेश्वर शिव धाम। अलमोड़ा से करीब 35 किलोमीटर दूर घने जंगल में मौजूद जागेश्वर पहुंचते ही असीम शांति का एहसास होता है। जागेश्वर की गणना भगवान शिव के बारह ज्योर्तिलिंगों में की जाती है। यहां 7वीं शताब्दी से 18 वीं शताब्दी के बीच करीब 125 मंदिर बनाए गए हैं ।मान्यता है भगवान शिव के लिंग रूप की पूजा जागेश्वर से ही शुरू हुई। जागेश्वर को ‘कुमाऊँ का काशी’ भी कहा जाता है। जागेश्वर प्राचीन कैलाश मानसरोवर मार्ग पर स्थित है। ये अल्मोड़ा से करीब 35 किलोमीटर दूर है।

2- बिनसर


प्रकृति का अनुछुआ सौंदर्य देखना चाहते हैं तो बिनसर जरूर जाइए। उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पास का बिनसर एक वन्य प्राणी विहार भी है। बांज और बुरांस के जगलों वाले बिनसर में तेंदुए पाए जाते है। जंगल भी इतना घना कि कुछ इलाकों में सूर्य की रोशनी भी शायद ही पहुंचती हो। बिनसर से हिमालय की नंदा देवी, त्रिशुल, पंचाचुली, नंदाकोट, मृगधूनी जैसी बर्फीली चोटियों का 300 किलोमीटर लंबा अद्भुत नजारा दिखाई देता है। आधुनिक सुविधाओं से दूर यहां कुछ दिन बिताने का अनुभव जिंदगी भर नहीं भुलाया जा सकता। बिनसर अल्मोड़ा से करीब 30 किलोमीटर है।

3- रामगढ़

गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर ने यहां रहकर गीतांजली का कुछ हिस्सा लिखा था। हिन्दी कवियित्री महादेवी वर्मा ने भी यहां के शान्त और सुकून भरे माहौल में लेखन किया । उत्तराखंड के रामगढ़ कस्बे का यह इतिहास इसे खास बनाता है। इसके साथ यहां हिमालय की बेजोड़ खूबसूरती को जोड़ दे तो फिर इस जगह का कोई मुकाबला नहीं। समुद्रतल से 1729 मीटर ऊंचाई पर बसे रामगढ़ की आबोहवा फलों की खेती के भी माकूल है। आडू, खुमानी, सेब जैसे फलों के बगीचों की यहां कमी नहीं इसलिए इसे  ‘कुमाऊँ का फलों का कटोरा’ भी कहा जाता है। रामगढ़ नैनीताल से करीब 34 किलोमीटर दूर है।

4- मुक्तेश्वर

उत्तराखंड की सबसे खूबसूरत जगहों में मुक्तेश्वर का नाम लिया जाता है। नैनीताल जिले का यह छोटा का कस्बा कुछ दिन शांति से बिताने वाले पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। 2286 मीटर की ऊंचाई इसके मौसम को खास बनाती है। इस जगह का नाम यहां भगवान शिव के मंदिर के नाम पर पड़ा जिसे मुक्तेश्वर धाम कहा जाता है। 1893 में यहां इडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई जहां आज भी जानवरों से जुडें मामलों पर रिसर्च किया जाता है। मुक्तेश्वर रामगढ़ से 30 किलोमीटर है।
 

5- रानीखेत

रानीखेत को प्रकृति प्रेमियों का स्वर्ग माना जाता है। रानीखेत की खूबसूरती को शब्दों में नहीं उतारा जा सकता इसे यहां आकर ही महसूस किया जा सकता है। अंग्रेजों के समय इसे सैनिक छावनी बनाया गया। सैनिक छावनी होने के कारण इसका रखरखाव देखते ही बनता है। साफ सुथरी सड़कें, देखने के लिए एक प्यारा सा गोल्फकॉर्स , सेना का म्यूजियम, फलों के बगीचे और प्राचीन मंदिर इसे और भी खास बनाते हैं। यहां का चौबटिया फल उद्यान देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

6- शीतलाखेत
जब बस जंगल के बीच रहने का मन करे , आप चाहें कि आस पास घूमते हिरण आपको दिखाई देते रहें, सुबह चिड़ियों के चहचहाने से आपकी नींद खुले और साथ में पहाडी मौसम का आनंद भी मिले तो बस शीतलाखेत चले आएं। रानीखेत के पास बसा यह छोटा सा गांव बस आराम करने के लिए ही है। कुछ करना चाहें तो  करीब तीन किलोमीटर की चढाई करके पहाड़ की चोटी पर बने मंदिर तक जाएं और मंदिर की चोटी से उत्तराखंड के शानदार नजारों का मजा लें। ये रानीखेत से शीतलाखेत करीब 30 किलोमीटर है।
 

7-नैनीताल

एक बड़ी सी झील, उसमें तैरती रंग-बिरंगी नावें, पानी में दिखाई देता शहर का अक्स,   किनारे बनी माल रोड, पुराने चर्च और इमारतें। अंग्रेजी दौर की खनक और आधुनिकता का अजब मेल है नैनीताल। अंग्रेजों ने आराम करने के लिए उत्तराखंड के इस हिल स्टेशन को बसाया था । खास बात यह है कि उस दौर की खूबसूरती को नैनीताल ने आज भी संजो कर रखा है। कहा जाता है मां सती की आंख ( नैन) यहां गिरी थी जिसके आधार पर इसका नाम नैनीताल पड़ा। झील के किनारे नैयना देवी का प्राचीन मंदिर भी है जो 64 शक्तिपीठों में से एक है।  

8-चौकोरी
ऊंचे बर्फीले पहाडों और घनों जगलों से घिरा है उत्तराखंड का छोटा सा कस्बा चौकोरी। यहां से पंचाचूली और नंदा देवी की बर्फ से ढकी चोटियों का अद्भुत दृश्य नजर आता है। ऐसा लगता है कि हम बिल्कुल इन पहाडों के सामने खडे हैं। यह अनजाना कस्बा प्रकृति प्रेमी पर्यटकों के बीच धीर-धीरे लोकप्रिय हो रहा है। चौकोरी समुद्र तल से 2010 मीटर की ऊंचाई पर है। प्रकृति की अनछुई सुन्दरता को करीब से महसूस करने के लिए चौकोरी बढिया जगह है। यह कस्बा नैनीताल से 173 किलोमीटर की दूरी पर है।

9- मुनस्यारी
उत्तराखंड के चीन से लगते जिले पिथौरागढ का खूबसूरत कस्बा है मुनस्यारी। यह इलाका इतना खूबसूरत है कि इसे छोटा कश्मीर भी कहा जाता है। मुनस्यारी रोमांचक खेल और प्राकृतिक सुन्दरता पसंद करने वाले के बेहतरीन है। मुनस्यारी से ऊपरी हिमालय के कई ट्रेकिंग रास्तों की शुरूआत होती है। यहां से मिलन और रालम ग्लेशियर की चढ़ाई शुरू की जाती है। नंदा देवी चोटी की चढाई का आधार भी मुनस्यारी ही है।यहां से भी पंचाचूली, त्रिशूल और नंदा देवी की बर्फीली चोटियों का मनभावन नजारा दिखाई देता है। मुनस्यारी अल्मोड़ा से 200 किलोमीटर दूर है।

10- अल्मोड़ा

उत्तराखंड का प्राचीन और ऐतिहासिक शहर है अल्मोड़ा।1650 मीटर की ऊँचाई पर बसा अल्मोड़ा एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। यह कुमाऊं के चंद राजाओं की राजधानी रहा। अल्मोड़ा को उत्तराखंड का सांस्कृतिक केन्द्र कहा जाता है। यहां के बाजार की पतली सड़कों पर घूमें तो लगता है पुराने समय में आ गये हैं। लकड़ी की बनी छोटी-छोटी दुकानें इस शहर को अनोखा रुप देती हैं। इस शहर के पास कई प्राचीन मंदिर हैं जो देखे जा सकते हैं। अल्मोड़ा की होली भी बहुत लोकप्रिय है। अल्मोड़ा आएं तो यहां कि प्रसिद्ध बाल मिठाई खाना ना भूलें। अल्मोड़ा नैनीताल से 60 किलोमीटर दूर है।

नोट- ये जगहें मेरे ब्लॉग पर पिछले साल के ट्रेवल पोस्टकार्ड सीरीज में शामिल की गई थी।

हिमाचल प्रदेश की 10 खूबसूरत जगहें

हिमाचल प्रदेश की 10 खूबसूरत जगहें

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है। इस देवभूमि में पर्यटकों के देखने के लिए ना जाने कितने जगहें हैं। आराम से समय बिताने के साथ पहाड़ों पर चढ़ने तक यहां सब कुछ किया जा सकता है। हिमाचल की दस जगहें इस लेख में शामिल की गई हैं। हिमाचल प्रदेश जाने पर आप इन जगहों को शामिल कर सकते हैं।

1- मनाली

हिमाचल प्रदेश का सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशन है मनाली। यहां के बर्फ से ढके पहाड़ों, देवदार के पेड़ों और फलों के बगीचों को देखने लोग खिचें चले आते हैं। गर्मियों में यहां मैदानों की गर्मी से राहत मिलती है तो सर्दियों में यहां बर्फबारी का मजा लिया जा सकता है। मनाली का पौराणिक महत्व भी है। माना जाता है इसका मनाली का नाम ऋषि मनु के नाम पर पड़ा। यहां के हिडम्बा देवी मंदिर की बहुत मान्यता है। रोमांचल खेलों को पसंद करने वालों के लिए भी मनाली पंसदीदा जगह है। मनाली दिल्ली से करीब 530 किलोमीटर दूर है।

2- कुल्लू घाटी


हिमाचल को देवभूमि कहा जाता है।समुद्र तल से 1230 मीटर की ऊंचाई पर बसे कुल्लू को देवताओं की घाटी माना जाता है। कुल्लू में कई प्राचीन मंदिर हैं । ये मंदिर हिमाचल की पहाड़ी वास्तुकला का शानदार उदाहरण है। कुल्लू का दशहरा तो विश्वप्रसिद्ध है। इसे देखने दुनिया भर से लोग यहां आते हैं। व्यास नदी से बनी यह घाटी बेहद सुन्दर है। व्यास नदी का साफ पानी, फलों के बगीचे और घने जंगल इस घाटी को अनोखा बनाते हैं। यहां से ट्रेकिंग के लिए भी कई रास्ते जाते हैं। कुल्लू चंडीगढ से 280 किलोमीटर दूर है।

3- नग्गर
By Akshat Sharma – https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=59590375
कुल्लू घाटी का ऐतिहासिक कस्बा है नग्गर । यह कुल्लू की प्राचीन राजधानी था। उस दौर के भव्यता को याद दिलाता यहां का शानदार किला । नग्गर का किला हिमाचल की काठकोडी वास्तुकल का उत्तम उदाहरण है।आधुनिक समय में नग्गर को प्रसिद्ध मिली रूसी चित्रकार निकोलस रोरिक के घर के रूप में। निकोलस लंबे समय तक यहां रहे। घर को अब संग्राहलय में बदल दिया गया है। उनके घर, उनसे जुडी चीजों और चित्रों को आज भी नग्गर के उनके घर में देखा जा सकता है। नग्गर की प्राकृतिक सुन्दरता भी अद्भुत है। नग्गर कस्बा मनाली से 21 किलोमीटर दूर है।

4- रोहतांग दर्रा

भारत का सबसे प्रसिद्ध दर्रों में से एक है रोहतांग दर्रा। समुद्र तल से 3979 मीटर ऊंचाई वाले इस दर्रे पर पूरे साल बर्फ बिछी रहती है। यहां से बर्फ से ढके पहाडों का सुन्दर नजारा दिखाई देता है। यह दर्रा मनाली से लेह जाने वाले रास्ते पर है। मौसम ऐसा कि साल में मुश्किल से पांच महीने के लिए यह रास्ता खुलता है। मनाली आने वाला हर पर्यटक यहां जरूर आना चाहता है। यह पर्यावरण की समस्या को देखते हुए यहां आने वाली गाडियों की संख्या पर पाबंदी भी लगाई गई है।यह दर्रा मनाली से 50 किलोमीटर दूर है।

5-कसोल

source- By Alok Kumar – https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=51709183

हिमाचल की पार्वती घाटी में बसा है छोटा सा कस्बा कसोल। पार्वती नदी के किनारे बसा यह कस्बा विदेशी सैलानियों में बहुत लोकप्रिय है। कसोल में प्रकृति के सुरम्य नजारे दिखाई देते हैं। पार्वती नदी का सफेद रेत का किनारा इसे और भी खास बनाता है।यहां इसराइली पर्यटक बहुत आते हैं।इसलिए इसे मिनी इसराइल भी कहा जाने लगा है।यहां बढिया इसराइली खाने का मजा लिया जा सकता है।कसोल से कई जगहों जैसे खीरगंगा और मलाना के लिए ट्रेक भी किया जा सकता है। कसोल कुल्लू से करीब 40 किलोमीटर दूर है।

6- डलहौजी
धौलाधार की पहाडियों के बीच बसा है हिमाचल प्रदेश का खूबसूरत शहर डलहौजी। अंग्रेजों के समय बने इस हिलस्टेशन को पांच पहाड़ियों पर बसाया गया था। 2036 मीटर की ऊंचाई पर बसे डलहौजी ने औपनिवेशिक समय की विरासत के साथ प्राकृतिक सुन्दरता को आज भी बनाए रखा है। अंग्रजी दौर में बनाए गए चर्च और इमारतें यहां देखी जा सकती हैं। करीब 150 साल पुराना सेंट जॉन यहां का सबसे पुराना चर्च है। चीड़, देवदार और बुरांश के पेड़ डलहौजी सुन्दरता को और भी बढ़ा देते हैं।यह शहर पठानकोट से 80 किलोमीटर दूर है।

 
 
7-बीड बिलिंग

आसमान में पंछियों की तरह उड़ने की इच्छा हो तो हिमाचल के बीड बिलिंग में चले आइए।  बीड बिलिंग  पैराग्लाइडिग के खेल में दुनिया भर में पहचान बना रहा है। बिलिंग की चोटी से उड़ान भरने के बाद पैराग्लाइडर बीड के खूबसूरत हरे भरे मैदान में उतरते हैं। यहां आसमान में मंडराते रंग बिंरगें पैराग्लाइडर इंद्रधनुषी समा बांधते हैं। यहां तिब्बती शरणार्थियों की बस्ती भी है जहां बौद्ध संस्कृति को देख सकते हैं। बीड बिलिग में चाय के बागानों के बीच घूमने का अलग ही मजा है। यहां का गुनहेड गांव अपने आर्ट मेले के लिए प्रसिद्ध है
 

8-मसरूर रॉक कट टेंपल

 हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में बना मसरूर मंदिर वास्तुशिल्प और स्थापत्य कला का अद्भभुत संगम हैं । पूरे पहाड़ को काट कर मंदिर में ढाल देना प्राचीन कारीगरी और विज्ञान का बेमिसाल नमूना है। 8वीं शताब्दी में बने इन मंदिरों का निर्माण बलुआ चट्टानों को तराश कर किया गया । उत्तर भारत में यह अपनी तरह का अकेला मंदिर है। यहां बलुआ चट्टानों को तराश कर करीब 15 मंदिर बनाए गए थे। इसे हिमाचल का एलोरा भी कहा जाता है। हालांकि ये मंदिर एलोरा से भी पुराने हैं।

9- पालमपुर


चाय के बागानों, हरे भरे जंगलों और धौलाधार के ऊंचे पहाड़ों के बीच बसा है हिमाचल प्रदेश का प्यारा सा कस्बा पालमपुर। पालमपुर अपने चाय बागानों के लिए प्रसिद्ध है। पहाडी ढलानों पर दूर दूर तक फैले बागान बड़े ही खूबसूरत दिखाई देते हैं। पालमपुर की खासियत है यहां का मौसम जो साल पर सुहावना बना रहता है।सर्दियों के मौसम में यहां आने पर बर्फ से ढके धौलाधार के पहाड़ों का शानदार नज़ारा दिखाई देता है। पालमुपर के आसपास देखने के लिए कई प्राचीन मंदिर हैं ।अंग्रेजी दौर की इमारतें, चर्च भी देखे जा सकते हैं।

10-बरोट


देवदार के घने पेड़ों से घिरी घाटी , शांत बहती नदी , अंग्रेजों के जमाने का पुराना बांध,  और झरने, बरोट में वह सब कुछ है जो शांति में कुछ दिन बिताने वाले पर्यटक को चाहिए। हिमाचल प्रदेश में मंडी जिले की चौहार घाटी में बसा बरोट हिमाचल प्रदेश का एक अनजाना हिल स्टेशन है । यहां पहुंच कर समय में पीछे आने का एहसास होता है। बडा भंगाल और छोटा भंगाल जैसे अंदरूनी इलाकों के लिए यहां से ट्रेक भी किया जा सकता है।  अंग्रजों के समय ऊहल नदी पर बना बांध यहां का प्रमुख आकर्षण है।

(2017 में दुनियादेखो पर पूरे वर्ष ट्रेवल पोस्टकार्ड सीरीज चलाई गई। इस लेख में शामिल जगहों को उन्ही पोस्टकार्ड से एक जगह जमा करके यहां लिखा गया है।)
 

जम्मू-कश्मीर की 10 खूबसूरत जगहें

जम्मू-कश्मीर की 10 खूबसूरत जगहें

भारत के सबसे उत्तर में है जम्मू-कश्मीर। हिमालय के पहाड़ों पर बसे इस राज्य में कश्मीर घाटी से हरे-भरी घाटियों और पानी से भरी झीलों से लेकर लद्दाख के बर्फीले रेगिस्तान तक देखने के लिए बहुत कुछ है। लद्दाख इलाके में प्राचीन बौद्ध मठ देखने को मिलते हैं तो जम्मू और कश्मीर में प्राचीन मंदिर और मस्जिदें देखी जा सकती हैं। जम्मू-कश्मीर की दस चुने हुए जगहों को मैंने इस लेख शामिल किया है ।

1- मार्तण्ड सूर्य मंदिर

कश्मीर घाटी के अनंतनाग के पास मटन गांव में है मार्तण्ड सूर्य मंदिर। इस विशाल सूर्य मंदिर को करीब 1300 साल पहले कश्मीर के राजा ललितामदित्य मुक्तपीड ने बनवाया था। मंदिर हालांकि काफी टूट चुका है लेकिन उस समय के स्थापत्य और मूर्तिकला को आज भी यहां देखा जा सकता है। विशाल पत्थरों और खंभों पर की गई नक्काशी अद्भुत है । माना जाता है कि मंदिर के निर्णाण में कश्मीरी स्थापत्य के साथ यूनानी स्थापत्य की झलक भी मिलती है। यह प्राचीन मंदिर मटन गांव के नए सूर्य मंदिर से करीब 2 किलोमीटर दूर है।

2-अवन्तिस्वामी मंदिर


कश्मीर के अनंतनाग के अवन्तिपुर में है अवन्तिस्वामी मंदिर। विष्णु भगवान के इस मंदिर को नौ वीं शताब्दी में राजा अवन्तिवर्मन ने बनवाया था। अवन्तिवर्मन उत्पल वंश के संस्थापक थे। उस समय की कला के निशान दीवारों पर उकेरी मूर्तियों में देखे जा सकते हैं। बीच में ऊंचे चबूतरे पर मुख्य मंदिर था। मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर बने थे। झेलम के किनारे बना यह मंदिर अपने समय में काफी भव्य रहा होगा। माना जाता है कि झेलम नदी की बाढ में यह मंदिर नष्ट हुआ। मंदिर श्रीनगर से पहलगांव जाने वाली सड़क पर ही है।

3-गुलमर्ग


कश्मीर घाटी का गुलमर्ग प्रकृति की सुन्दरता का खजाना है। सर्दियों में गुलमर्ग सफेद बर्फ से ढक जाता है तो गर्मियों में हरी घास का लिहाफ ओढ लेता है। मौसम कोई भी हो इसकी खूबसूरती कम नहीं होती। गुलमर्ग का मौसम कुछ दिन शांति से बिताने के लिए बेहतरीन है। यहां आकर गोंडाला की सवारी का मजा उठायें या कुछ समय यूं ही प्रकृति के साथ बितायें। गुलमर्ग दुनिया के सबसे अच्छे स्की रिजोर्ट में शामिल किया जाता है तो सर्दियों में इस खेल को भी यहां सीखा जा सकता है।गुलमर्ग श्रीनगर से करीब 50 किलोमीटर दूर है।

4-डल झील


श्रीनगर शहर की पहचान है डल झील।डल के चारों तरफ दिखाई देते हरे-भरे ऊंचे पहाड और झील में चलते रंग-बिरंगे शिकारे इसकी सुन्दरता को और भी बढ़ा देते हैं। डल सिर्फ एक झील नहीं बल्कि तैरता शहर है। जहां हजारों लोग रहते हैं। डल में अपना बाजार और स्कूल भी हैं।तैरते खेत डल की सबसे बडी खासियत हैं जिन्हें शिकारे से बांध कर कहीं भी ले जाया जा सकता है । डल का पूरा मजा लेना है तो कुछ दिन हाउसबोट में बिताना जरूरी है। ये हाउस बोट अंग्रेजों के जमाने से ही डल में हैं।

5-मुगल गार्डन

श्रीनगर के मुगल बगीचे कश्मीर की खूबसूरती से होड करते लगते हैं। इन बगीचों को फारसी वास्तुकला की चारबाग शैली के आधार पर बनाया गया था। समकोण पर काटते रास्ते, बगीचों में बहती नहरें, पानी उलीचते फव्वारे एक अलग ही दुनिया रच देते हैं। बगीचों में लगे चिनार के पेडों के नीचे बैठने का मजा यही आकर लिया जा सकता है। मुगल बादशाहों ने करीब चार सौ साल पहले इन बगीचों को बनवाया था। श्रीनगर में शालीमार बाग, निशात बाग, चश्मेशाही ये तीन मुगल बगीचे आज भी मौजूद हैं।

6-पहलगाम

कश्मीर घाटी का जाना-पहचाना हिलस्टेशन है पहलगाव। ऊंचे पहाडों और हरे-भरे चारागाहों से घिरे पहलगाम में आकर प्रकृति की गोद में आने का अहसास होता है। बगल से बहती लिद्दर नदी इसकी खूबसूरती को और भी बढ़ा देती है। पहलगाम के पास देखने के लिए कई घाटियां हैं जिनमें अरू घाटी सबसे लोकप्रिय है। पहलगाम किसी भी मौसम में आया जा सकता है। पहलगाम भगवान शिव की अमरनाथ यात्रा का भी प्रमुख पडाव है।पारम्परिक अमरनाथ यात्रा का रास्ता पहलगाम से ही होकर जाता है। पहलगाम श्रीनगर से करीब 90 किलोमीटर दूर है।

7-सोनमर्ग

मर्ग का मतलब होता है घास का मैदान। इन्हीं हरे भर घास के मैदानों से भरा है कश्मीर घाटी का सोनमर्ग। सोनमर्ग के पास कई ग्लेशियर हैं जिनमें पूरे साल बर्फ जमा रहती है। इसके साथ ही सोनमर्ग से बहुत से ट्रेंकिग रास्तों की शुरूआत भी होती है। कश्मीर की ऊंचाई पर बनी गद्सर, कृष्णासर, सत्सर और गंगाबल जैसी झीलों के लिए भी ट्रेंकिग सोनमर्ग से ही होती है। सोनमर्ग नाला सिंध नदी के किनारे बसा है। इस नदी के तेज बहते पानी पर राफ्टिंग भी की जा सकती है। सोनमर्ग श्रीनगर से 80 किलोमीटर दूर है।

8-लेह


 जम्मू कश्मीर राज्य का एक खूबसूरत शहर है लेह । यह ठंडा रेगिस्तान कुदरत की कारीगरी का अद्भुत नमूना है। घाटी में बिखरी थोड़ी सी हरियाली, भूरे पहाड़, पहाडों की बर्फीली चोटियां और सबसे ऊपर साफ नीला आसामान रंगों का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं कि कुदरत की कलाकारी पर नाज़ होता है। यहां की धरती में भले ही रंगों की कमी हो लेकिन चटख लाल और पीले रंगों से सजे बौद्ध मठ उसका अहसास नहीं होने देते। लेह में 17वीं शताब्दी का बना किला  इस शहर पर एक मुकुट की तरह नजर आता है।
लेह शहर बसा है सिंधु नदी के किनारे।  वही  सिंधु नदी जिसके  नाम से इस महान देश का अपना पहचान मिली। 
 
 
9-नुब्रा घाटी

 समुद्र तल से 10,000 फीट का ऊंचाई पर ठंडे, रूखे पहाडों के बीच रेत के टीलों की कल्पना की है आपने? लद्दाख की नुब्रा घाटी का हुन्डर इलाका प्रकृति का अजूबा ही है। यहां आकर लगता है जैसे रेत के टीलों से भरे राजस्थान में आ गए हों। इसी रेगिस्तान में दो कूबड वाले अनोखे बैक्ट्रीयन ऊंट भी पाये जाते हैं । सूखे – बंजर लद्दाख से अलग नुब्रा में काफी हरियाली नजर आती है। इसके साथ ही 350 साल पुराना डिस्किट बौद्ध मठ नुब्रा की पहचान है।

10-पैगोंग झील

प्रकृति का एक अजूबा है पैंगोग झील। लद्दाख में 14000 फुट की ऊंचाई पर 135 किलोमीटर लंबी नमकीन पानी की झील है पैगोंग। यह झील भारत और चीन की सीमा रेखा भी बनाती है । झील का दो तिहाई हिस्सा चीन में और एक तिहाई भारत में है। झील का पानी सूर्य की रोशनी के साथ पल-पल रंग बदलता है इसके अद्भुत रंगों की छटा देखते ही बनती है। पैंगोंग के रास्ते में चांग-ला से गुजरने वाली दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची सड़क देखने का मौका भी मिलेगा

(2017 में दुनियादेखो पर पूरे वर्ष ट्रेवल पोस्टकार्ड सीरीज चलाई गई। इस लेख में शामिल जगहों को उन्ही पोस्टकार्ड से एक जगह जमा करके यहां लिखा गया है।)

खै़बर हिमालयन रिजॉर्ट एंड स्पा- विलासिता का अनुभव

खै़बर हिमालयन रिजॉर्ट एंड स्पा- विलासिता का अनुभव

मेरे होटल के कमरे की बालकनी के बाहर स्वर्ग जैसा नजारा था। दूर-दूर तक चांदी सी सफेद बर्फ बिछी हुई थी। चारों तरफ खड़े देवदार के पेड़ बर्फ से लदे थे। वहां के शांत माहौल के बीच बस पेड़ों से फुगनियों से गिरती बर्फ या बर्फ के बोझ से टूटती टहनियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी। लग रहा था जैसे सफेद बादलों के बीच कोई परी लोक हो। मैं कश्मीर के गुलमर्ग में होटल खै़बर हिमालय रिजॉर्ट और स्पा में था।कुछ देर पहले ही मैं दिल्ली से गुलमर्ग आया था और इतनी ही देर में होटल ने मुझे लुभा लिया था।

कमरे की बालकोनी से बाहर का नज़ारा

खै़बर जैसे पहाड़ों के बीच बना एक महल ही है। एक लक्जरी होटल से आप जो कुछ चाहते हैं वह सब कुछ यहां मिलेगा। उसके साथ गुलमर्ग के दिल को लुभा लेने वाले नजारों का साथ मिल जांए तो छुट्टी बिताने वाले को और क्या चाहिए।

होटल में अंदर जाते ही सबसे पहले इसकी विशाल लॉबी दिखाई देती है। लॉबी को स्थानीय कश्मीरी हस्तशिल्प से सजाया गया है। दीवारों पर कश्मीर का बारीक लकड़ी का काम किया गया है। हॉल में ऊपर की तरफ खूबसूरत कश्मीरी लकड़ी के काम वाली खिड़कियां जिन्हें स्थानीय भाषा में दाब कहा जाता है, बनाई गई हैं। ऐसा लगता है जैसे लकड़ी के किसी महल में आ गए हों। बाहर के सर्द मौसम में वहां का गर्म माहौल मुझे बहुत सुकून दे रहा था। उसी बीच मेरा स्वागत कश्मीर की पहचान कहवा से किया गया। वहां हॉल के आखिरी कोने में चायकश नाम से पूरे दिन चलने वाला रेस्टोरेंट हैं। जहां गर्म कहवा के साथ बाहर के बर्फ से नजारों का पूरा मजा ले सकता है। यहां बैठे कब वक्त बीत जाए पता ही नहीं चलता।

कश्मीर की कारीगरी से सजा हॉल

कमरे —

कमरे की बालकोनी से बाहर का नज़ारा

मैं खै़बर के लक्जरी बालकनी कमरे में रहा जहां से हिमालय का पूरा नजारा दिखाई देता था। कमरा सही मायने लक्जरी ही था। खासा बड़ा कमरा जो हमारे शहरों किसी छोटे फ्लैट से कम नहीं था। कमरे को कश्मीरी हस्तकला की चीजों से बड़ी ही खूबसूरती से सजाया गया था। बड़े से बिस्तर पर कश्मीर की कशीदाकारी की चादर बिछी हुई थी। हालांकि इतने सुन्दर माहौल के बीच टीवी देखने का मन शायद ही किसी का करे फिर भी चाहें तो बड़ी सी स्क्रीन वाले टीवी पर मनचाहे कार्यक्रमों को देखते हुए वक्त बिताया जा सकता है। किसी लक्जरी होटल में मिलने वाली सभी दूसरी सुविधाएं यहां भी थी। एक बात मुझे खास तौर से नजर आई कि कमरे में इस्तेमाल के लिए जो भी सामान रखा था वो बहुत बेहतर क्वालिटी का था। कमरे में लगे फर्नीचर को स्थानीय कारीगरों ने ही बनाया था जिसमें अखरोट की लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था।
कमरे से बाहर निकल बालकनी में आएं तो फिर शायद कहीं और जाने का मन ही नहीं करेगा। रात के समय मद्दम रोशनी से नहाए रिजॉर्ट का खूबसूरत नजारा बालकनी से दिखाई देता है।

खूबसूरती से सजा कमरा..

कमरे की बात हो रही है तो बताता चलूं कि खैबर का प्रेज़डेन्शल स्वीट बहुत लोकप्रिय है। जाने-माने लोग इसमें वक्त बिताना पसंद करते हैं।पता चला कि कभी – कभी तो ये स्थिति हो जाती है कि स्वीट खाली ना होने पर कुछ लोगों ने अपने आने का कार्यक्रम ही कुछ दिनों के लिए आगे बढ़ा दिया क्योंकि उन्हें इसी में रूकना था।

प्रेज़डेन्शल स्वीट

होटल के गलियारों की छतों को कश्मीर में छतों पर लकड़ी से की जाने वाली कारीगरी – खतमबंध से सजाया गया था। खतमबंध छतों को लकड़ी से सजाने का कश्मीर का पारम्परिक तरीका है। देखने में यह निहायत ही खूबसूरत दिखाई देती है। खतमबंध में लकड़ी को छोटे टुकड़ों को एक ज्यामितिय डिजाइन में एक दूसरे से जोड़ा जाता है।

खाने – पीने की जगह
खै़बर में आराम के साथ मेहमानों के खाने पीने का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। यहां दिन के समय वक्त बिताने के लिए चायकश है। यह पूरे दिन चलने वाला कॉफी शाप जैसा है जहां कश्मीर कहवा, अलग-अलग तरह की चाय , कॉफी और पेस्ट्री का मजा लिया जा सकता है। चायकश ऐसी जगह बना है कि कुछ करने का मन ना हो वहीं बैठ कर होटल की हलचल को देखते रहे या बाहर के नजारों को निहारतें रहे। चायकश के पास ही छोटी सी लाइब्रेरी भी हैं जहां से किताबें निकालें और चाय की चुस्कियों से साथ समय बिताएं। खैबर में काम करने वाले लोग अपने मेहमानों की हर सुविधा का ख्याल रखते हैं। आप कुछ मांगे तो शायद ही आपको ना सुनने को मिले।

क्लोव —
यह खैबर का मुख्य रेस्टोरेंट हैं। सुबह से नाश्ते से लेकर रात के खाने तक का इंतजाम यहीं किया जाता है। सुबह के नाश्ते में मैंने स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय खाने जैसे इडली और सांभर बड़ा का भरपूर मजा उठाया। इसके अलावा सुबह के समय पराठें से लेकर कान्टीनेन्टल तक हर तरह का खाना मौजूद रहता है। कश्मीर की ठंड में पूरे दिन घूमने के लिए सुबह का स्वादिष्ट नाश्ता सबसे जरूरी चीज है।
क्लोव में दिन और रात के खाने के लिए भी पूरा इंतजाम है। यहां लगे बुफे में खाना खाया जा सकता है। अगर आप चाहें तो मेन्यू के हिसाब से अपने लिए खाना आर्डर भी कर सकते हैं। लगभग हर तरह का खाना यहां का मेन्यू में उपलब्ध है। खाना स्वादिष्ट है। लेकिन मेरा सबसे पंसदीदा रहा यहां का कश्मीर वाजवान।

कश्मीरी वाज़वान

एक दिन दोपहर में खास कश्मीर वाजवान बनवाया गया था। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि कश्मीरी वाजवान में मांसाहारी खाना ही बनाया जाता है। लेकिन कश्मीरी वाजवान में शाकाहारी व्यंजनों की भी कमी नहीं हैं। मैं शाकाहारी हूँ और मेरे सामने इतने तरह के कश्मीरी व्यंजन परोसे गए ही खत्म करना मुश्किल था। कश्मीर में होने वाली कमल ककड़ी, राजमा तो खास है ही। यहां की हरी सब्जियों का साग जिसे हाक कहते हैं, स्वाद में अलग था। चावल के बिना तो कश्मीर को खाना पूरा हो ही नहीं सकता। कमलककड़ी को नादुर कहा जाता है तो यहां थी नादुर यखनी, दम आलू, पनीर, राजमा और हरा-भरा कबाब। इसका साथ देने के लिए कई तरह की चटनियां और दही। इस पर पेट ना भरे तो खाने के आखिर में मीठी केसर वाली फिरनी तो है ही। कश्मीर के वाजवान का वो स्वाद मुझे अभी भी याद है।

वाज़वान

L’OCCITANE SPA


खैबर की एक खासियत है यहां का स्पा। कुछ दिन गुलमर्ग घूमने के बाद थकान उतारने के लिए यह बेहतर जगह है। यहां काम करने वाले लोग अपने काम में पूरी तरह प्रशिक्षित हैं। मैंने यहां स्वीडिश और हॉटस्टॉन स्पा लिया। इन दो स्पा के बाद में मैं कश्मीर में अपनी अगले पूर एक हफ्ते के सफर के लिए पूरी तरह से तरोताजा हो गया था।

इंडोर स्विमिंग पूल

बर्फ के बीच नहाने का मजा

बाहर बर्फ गिर रही हो और तापमान शून्य से नीचे हो तो पूल में जाने का मन शायद नहीं करेगा। लेकिन अगर पूल में गर्म पानी मिले और कांच से इंडोर पूल ढकी उसकी दीवारों से बाहर गिरती बर्फ का अहसास भी होता रहे तो कौन नहीं डुबकी लगाना चाहेगा। खै़बर का स्विमिंग पूल कुछ ऐसा ही है। एक बार इसे देख लेने पर एक डुबकी लगाए बिना मन मानेगा ही नहीं। पूल एरिया के पास ही जकूज़ी भी लगाई गई हैं।

खैबर के लिए एक बात बताना जरूरी है। गुलमर्ग कुछ साल पहले तक पर्यटकों के लिए दिन बिताने की एक जगह थी। आमतौर पर पर्यटकों की गाड़ियां श्रीनगर से दिन में यहां आती थी और पूरा दिन घूमने के बाद शाम को लोग लौट जाया करते थे। श्रीनगर के नजदीक होने के कारण यहां बहुत कम लोग रूका करते थे। उसके साथ कश्मीर के बिगड़े हालातों के कारण स्थिति और भी खराब हुई। लेकिन खै़बर जैसे लक्जरी होटल के आने के बाद अब गुलमर्ग की स्थिति में बदलाव आया है। लोग अब यहां सिर्फ घूमने नहीं बल्कि कुछ दिन रूकने भी आते हैं। अप्रेल के जिस समय में वहां गया था वह पर्यटकों के लिहाज के ऑफ सीजन कहा जाता है। उसके बावजूद होटल लगभग पूरा भरा था। भारत के लगभग हर कोने से आए लोग वहां थे। तो यह दिखाता है कि पर्यटन की सुविधाएं कैसे किसी जगह के हालात में परिवर्तन ला सकती हैं।

तो अगर कुछ दिन कश्मीर में बिताना चाहते हैं तो खै़बर को चुन सकते हैं। मैं कह सकता हूं कि आप निराश नहीं होंगे। सर्दियों में आएं तो बर्फ से ढका स्वर्ग आपके लिए होगा और अगर गर्म मौसम में आएं तो गुलमर्ग का हरे भरे घास से ढ़के मैदान आपका स्वागत करेंगें।

कैसे पहुंचें—
गुलमर्ग श्रीनगर से करीब 50 किलोमीटर दूर है। श्रीनगर शहर या एयरपोर्ट से यहां आने के लिए टैक्सी आसानी से उपलब्ध है। आप चाहें तो होटल की गाड़ी भी आपको लेने के लिए एयरपोर्ट आ जाएगी।

क्या करें—-
गुलमर्ग स्किइंग के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। स्कीइंग की उन ढ़लानों को देखने के लिए केबल कार के जरिए ऊपर की बर्फीली चोटियों तक जाया जा सकता है।इसकी सबसे ऊंची अफरावत चाटी है जहां पूरे साल बर्फ जमी रहती है। इसके अलावा गुलमर्ग गोल्फ मैदान, मंदिर और चर्च देखे जा सकते हैं।

Pic by – Abhinav Singh of https://asoulwindow.com

Note– This trip was organised by The khyber himalayan resort & spa

क्राउन प्लाजा जयपुर – एक साल पूरा होने का जश्न

क्राउन प्लाजा जयपुर – एक साल पूरा होने का जश्न

क्राउन प्लाजा जयपुर के एक साल पूरा होने के मौके पर वहां जाने का निमंत्रण मिला। बचपन से ही जयपुर से एक जुड़ाव रहा है तो वहां जाने का मौका मेरे लिए हमेशा ही खास होता है।
जब मेरी गाड़ी होटल के नजदीक पहुंची तो क्राउन प्लाजा की विशाल इमारत नजर आई। जयपुर जैसे शहर में जहां हेरिटज या हेरिटेज हवेली जैसे दिखाई देने वाले होटल बडी संख्या में हैं वहीं क्राउन प्लाजा ने पूरी तरह से आधुनिक आर्किटेक्टर का सहारा लिया है।

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होटल में प्रवेश करते ही नजर आती है इसकी बडी सी लॉबी और रिसेप्शन एरिया। लॉबी का इलाका खासा बडा है और इसमें घुसते ही एहसास हो जाता है कि आप किसी लक्जरी होटल में आ गए हैं। मेरा कमरा पहले से ही बुक था । रिसेप्शन पर मुझे मुश्किल से 2 मिनट लगे और मेरे चेक-इन पूरा हो गया। इसके बाद मैं अपने कमरे में पहुंचा। कमरा खासा बडा था।

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कमरे में घुसते ही एक छोटा सा गलियारा है, जिसके बांयी तरफ बाथरूम और ड्रेसिंग के लिए जगह दी गई थी। इसके बाद पूरा बडा कमरा आपके सामने आता है। कमरे में फर्श पर एक बढिया रंगबिरंगा कालीन बिछा था ।

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कमरे को पूरी तरह से एक आधुनिक रूप दिया गया था। एक तरह बड़ा सा बिस्तर लगा था। बिस्तर पर कुछ कार्ड रखे थे जिन्होंने मेरा ध्यान खींचा। एक कार्ड दरअसल तकियों का मेन्यू था जिसमें बताया गया था कि आप सुविधानुसार कितने तरह के तकिए इस्तेमाल के लिए मंगा सकते हैं।

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दूसरे कार्ड पर टर्नडाउन सर्विस की जानकारी दी गई थी। टर्नडाउन सर्विस लक्जरी होटल्स में दी जाती है जिसमें शाम के समय आपके सोने के लिए कमरे को तैयार किया जाता है। जिसमें आपका बिस्तर बदलने से लेकर कमरे की कुछ दूसरी चीजों को बदला जाता है जिससे आप सुकून और शांति से सो सके।
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कमरे के एक तरफ शीशे की बड़ी सी दीवार थी जिससे होटल के पीछे हरा-भरा जंगल जैसा इलाका नजर आ रहा था। जयपुर शहर के सीतापुर जैसे इंडस्ट्रियल इलाके में इतना हरा भरा जमीन का टुकडा आंखों को काफी रास आया।
कमरें में जरूरत की सभी चीजें थी जिनकी एक बिजनेस ट्रेवलर को जरूरत पड सकती है।

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अब तक दोपहर हो चुकी थी। इसी समय होटल के एक साल पूरा होने के मौके पर केक काटा गया। केक काटने के बाद हमारा खाना होटल के चायनीज रेस्टोरेंट हाउस ऑफ हान में रखा गया था ।

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इसी दिन से रेस्टोरेंट में मंगोलियन ग्रिल्स खाने की शुरूआत भी हुई । चायनीय खाना पंसद करने वालों के लिए हाउस ऑफ हान एक अच्छी जगह है। यहां बने खाने को चाइनीज तरीके से ही बनाने और परोसने की कोशिश की जाती है। इसके लिए यहां एक मलेशिया से विशेष शेफ को भी बुलाया गया है। खाना तो मुझे बहुत अच्छा लगा।
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सबसे ज्यादा लुभाया खाने से पहले पेश की जाने वाली जैसमीन टी परोसने के तरीके ने। इस चाय को पीतल की केतली के जरिए परोसा गया जिसके आगे कई फीट लंबी नली लगी थी। पता नहीं कि चीन या मंगोलिया में इस तरह से चाय परोसी जाती है या नहीं लेकिन यहां यह तरीका देखने में मजेदार लगा।

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हाउस ऑफ हान के अलावा होटल में एक दूसरा रेस्टोरेंट भी है जिसे सिरोको नाम दिया गया है। रात का खाना सिरोको में ही था। रात को सिरोको के खाने में हर तरह का खाना मौजूद था लेकिन मैंने यहां राजस्थानी खाना खाया।

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अब दाल-बाटी चूरमा, गट्टे की सब्जी, कैर सांगरी की सब्जी मिले तो कोई दूसरी खाने की तरफ देख की कैसे सकता है। राजस्थानी खाने को खाने के बाद मुंह से वाह के अलावा कोई दूसरा शब्द नहीं निकला। यहां का राजस्थानी खाना पूरी तरह से पारंपरिक राजस्थानी स्वाद और विशेषता लिए हुए था।
इतने बेहतरीन स्वाद वाला राजस्थानी खाने यहां कैसे बना इसकी वजह पूछे बिना मुझसे नहीं रहा गया तो पता लगा कि होटल ने यहां राजस्थानी खाना बनाने के लिए किसी शेफ को नहीं बल्कि राजस्थानी महाराज को रखा है। महाराज ही यहां ये खाना राजस्थानी खाना बनाते हैं। राजस्थानी मिठाई बनाने के लिए खासतौर से जोधपुर के हलवाईयों को रखा गया है।
सिरोको में अगले दिन सुबह का नाश्ता भी बेहतरीन रहा ।
इस तरह अच्छी यादों के साथ एक दिन का जयपुर क्राउन प्लाजा का यह सफर खत्म हुआ।

श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट एंड स्पा (Shri Radha Brij Vasundhara Resort and Spa)

श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट एंड स्पा (Shri Radha Brij Vasundhara Resort and Spa)

श्री ब्रज राधा वसुधंरा रिसॉर्ट ब्रज की धरती पर बना एक सुन्दर रिसॉर्ट है। यह रिसॉर्ट मथुरा से करीब 30 किलोमीटर दूर गोवर्धन में है। गोवर्धन में ही वह गोवर्धन पर्वत है जिसे भगवान कृष्ण ने अपनी अंगुली पर उठाकर ब्रज वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। आज भी भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। इसी गोवर्धन पर्वत के करीब ही बना है यह रिसॉर्ट । यही इस रिसॉर्ट की खासियत भी है। बस रिसॉर्ट में रूकिए आराम कीजिए और रिसॉर्ट से बाहर आकर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा शुरू कर दीजिए।

TCBG के ट्रेवल ब्लॉगर्स का हमारा छोटा सा ग्रुप भी पहुंचा था इस रिसॉर्ट में रहने के लिए। मथुरा स्टेशन से गोवर्धन का रास्ता हरा भरा और खूबसूरत हैं इसका मजा लेते हुए करीब 30 मिनट में हम गोवर्धन रिसॉर्ट पहुंचे। बड़े से दरवाजे से रिसॉर्ट के अंदर जाते ही माहौल बदल जाता है।

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पेड़-पौधों से भरा इलाका, चौडी सड़क और एक कोने में खड़ी गोल्फ गाड़ी ( ये रिसॉर्ट में एक जगह से दूसरी जगह जाने के काम आती हैं) दिखाई देती हैं। दरअसल यह हॉलिडे रिसॉर्ट होने के साथ एक रिहायशी सोसाइटी भी है। 25 एकड़ में फैले इसके कैम्पस में कुल 240 कॉटेज बने हैं जिसमें से 50 का इस्तेमाल रिसॉर्ट की तरह किया जाता है। बाकि बचे कॉटेज निजी प्रयोग के लिए लोगों को बेचे गए हैं। इन सभी कॉटेज को 24 – 24 के गोलाकार ग्रुप में एक पेड़ के आकार में बनाया है। हर ग्रुप का नाम देश की एक प्रमुख नदी के नाम पर रखा गया है।

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कॉटेज-

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रिसॉर्ट में कमरे के कॉटेज और कॉटेज स्वीट बने हैं। स्वीट में में डबल बेड रूम के साथ ही एक लिविंग रूम भी दिया गया है। जबकि सामान्य कॉटेज में आपको एक डबलबेड रूम मिलता है। यहां पूरे परिवार के लिए 2 कमरे का कॉटेज भी उपल्बध है । मैं कॉटेज स्वीट में रूका था। कमरा खासा बडा था ।

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कॉटेज स्वीट होने के कारण बाहर एक लिविंग रुम और उसके अंदर एक कमरा दिया गया था। कमरे के ठीक बाहर बने लॉन से कॉटेज और भी सुन्दर लग रहा था। शाम के समय लान में आराम से बैठिए और चाय का मजा लिजिए। कमरे में जरूरत की सभी चीजें लगाई गई हैं। हां सुबह-सुबह आप की आवाज चिडियों की चहचहाट से ही खुल जाएगी।

खाना—

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रिसॉर्ट का अपना रेस्टोरेंट हैं जहां हर तरह के खाने का इंतजाम है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, चायनीज या कान्टीनेन्टल सब कुछ यहां मिल जाएगा। मैंने यहां सभी तरह का खाना खाया। उत्तर भारतीय खाना मुझे सबसे बेहतर लगा ।
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सुबह के नाश्ते में बना इडली, सांभर या पोहा भी स्वादिष्ट थे। हां यहां के चायनीज खाने में अभी कुछ सुधार की गुंजाइश हैं। इसके अलावा रेस्टोरेंट कुल मिलाकर बढिया है और ज्यादा मंहगा नहीं है। शहर के बाहर बने रिसॉर्ट के साथ यह परेशानी आती है कि खाना अक्सर मंहगा होता है लेकिन श्री ब्रज वसुंधरा में ऐसा करने की कोशिश नहीं की गई है।

अनुभूति स्पा-

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श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट के स्पा के बारे में जरूर बताना चाहूंगा। अनुभूति नाम का यह स्पा वाकई अलग अनुभूति देता है। इस छोटे से स्पा को बडी सुन्दर से सजाया गया है और अंदर जाते ही शांति का एहसास होता है।

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आप स्पा के बेहद बढिया मसाज का आंनद उठा कर यात्रा की थकान को उतार सकते हैं। अगर गोवर्धन पर्वत की पैदल यात्रा करके यहां आए हो तो फिर स्पा में कुछ समय बिताना अच्छा रहेगा। अनुभूति स्पा सही मायने में इस रिसॉर्ट की एक खासियत है।

रिसॉर्ट में और क्या करें –

रिसॉर्ट में एक छोटा सा इंडोर स्विमिंग पूल भी है जहां समय बिताया जा सकता है। इसके अलावा यहां एक जिम भी है। रिसॉर्ट के क्लब में पूल टेबिल, टेबल टेनिस और एयर हॉकी खेल सकते हैं।

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सुबह उठ कर सैर करने का शौक है तो रिसॉर्ट सबसे बेहतर है। 25 एकड के पूरे केैंम्पस में सड़क बनी है जिस पर पैदल टहला जा सकता है। यहां पर घूमने के लिए साइकिल भी उपलब्ध हैं।

क्या घूमें-

रिसॉर्ट के ठीक सामने से ही गोवर्धन पर्वत की यात्रा का रास्ता है । यात्रा 21 किलोमीटर की है अगर पैदल नहीं करना चाहें तो आजकल गाड़ी या रिक्शा से भी यह यात्रा कर सकते हैं। यात्रा के पूरे रास्ते में मंदिरों की भरमार है जिन में कुछ वाकई पुराने हैं तो कुछ के साथ भगवान कृष्ण की कोई कहानी जुडी है इनको देखते हुए यात्रा पूरी कर सकते हैं।

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एक दिन मथुरा और वृंदावन को देखने के लिए अलग से रखा जा सकता है। अगर पुराने इतिहास में रुचि है तो मथुरा संग्रहालय से बेहतर जगह नहीं हो सकती।

कैसे जाएं-

दिल्ली से मथुरा के लिए बस और ट्रेन आसानी से मिल जाती हैं। ट्रेन करीब 2 घंटे का समय लेगी। बस से भी लगभग इतने ही समय में पहुंच सकते हैं। इसके अलावा अपनी गाड़ी है तो यमुना एक्सप्रेस का इस्तेमाल करके आसानी से पुहंच सकते हैं। रेलवे स्टेशन से गोवर्धन करीब 30 किलोमीटर दूर हैं।

श्री ब्रज राधा वसुंधरा घूमने से ज्यादा आराम करने की जगह है। अगर आप दिल्ली के पास कोई जगह चाहते हैं जहां आधुनिक सुविधाओं के बीच आराम कर सके तो यह बढिया जगह हो सकती है। हां साथ में धार्मिक जगह के दर्शन का फायदा तो है ही। मैंने यहां चार दिन बिताए और वाकई मैंने हर पल का मजा उठाया।

Note- यह यात्रा श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट के निमंत्रण पर TCBG ने आयोजित की थी।

आमोद अलवर बाग( Aamod Alwar Bagh) में दो दिन

आमोद अलवर बाग( Aamod Alwar Bagh) में दो दिन

चारों तरफ अरावली की पहाडियां और हरे- भरे खेतों के बीच बना है आमोद अलवर बाग रिसॉर्ट। सरिस्का टाइगर रिजर्व से नजदीकी इसे और भी खास बनाती है। यह रिसॉर्ट अलवर से करीब 15 किलोमीटर और सरिस्का टाइगर रिजर्व से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। जंगल के नजदीक होने के कारण यहां पूरी शांति और सुकून का अनुभव कर सकते हैं। अलवर बाग में दाखिल होते ही वाकई किसी जंगल में आने का एहसास होता है।

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पांच एकड में फैले इस रिसोर्ट के करीब दो तिहाई हिस्से में पूरी तरह से हरियाली और उसमें भी आवंला, नींबू और शहतूत जैसे पेडों को लगाया गया है। इसी हरियाली के बीच से होकर आप अपने कमरों तक पहुंचते हैं।

कमरे –

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यहां कुल 37 कमरे बने हैं। इन कमरों को राजस्थानी हवेली की तरह बनी चार इमारतों में बांटा गया है। इन इमारतों को रावला, जयगढ़, भंवर विला और गुलाब विला का नाम दिया गया है। जयगढ में सबसे ज्यादा 19 कमरे हैं। बाकी तीनों में 6-6 कमरे हैं। इनसे से कुछ कमरे Super Deluxe हैं तो बाकि के कमरे Deluxe श्रेणी के हैं। मैं जयगढ़ के Super Deluxe कमरे में रूका था। जब में अपने कमरे में पहुचा तो एहसास हुआ कि सही मायने में किसी लक्जरी रिसॉर्ट में आया हूँ। कमरा क्या , शहर के किसी अच्छे खासे फ्लैट से भी बडा हॉल था। कमरे की जरूरत के मुताबिक सभी चीजे वहां रखी गई थी।

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खासियत यह थी कि लक्जरी दिखाने की होड में कमरे को चीजों से भरा नहीं गया था इसलिए कमरे के बड़े आकार को महसूस किया जा सकता था। कमरे के अंदर की खाली जगह सुकून दे रही थी। कमरे के साथ लग बाथरूम भी खासा बडा था। कमरे में साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा गया था। Super Deluxe की तरह ही Deluxe कमरे भी बेहद शालीनता से सजाए गए हैं । ये कमरे भी खासे बड़े हैं। अपनी जरूरत के हिसाब से कमरे चुन सकते हैं।

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यहां भंवर विला और गुलाब विला में बने कमरे आकर्षक हैं। इन सभी कमरों को राजस्थानी चित्रकारी से सजाया गया है। पूरे रिसॉर्ट के सुपर डीलक्स और डीलक्स कमरों का किराया एक समान है फिर भी भंवर विला में रूकने को तरजीह दी जा सकती है। भंवर विला के कमरे के बाहर राजस्थानी तरीके की छत बनी है जिसमें जाली और झरोखे बनाए गए हैं। इसके कारण जहां खुली छत का मजा लिया जा सकता है वहीं आप सबकी नजरों से दूर रहकर शांति के पल बिता सकते हैं।
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खाना – पीना –

रिसॉर्ट के रेस्टोरेंट में उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, राजस्थानी और कॉन्टीनेन्टल हर तरह का खाना परोसा जाता है। दोपहर में मैंने उत्तर भारतीय खाना ही खाया, दाल , पनीर और सब्जी और तंदूर रोटी । खाना स्वाद से भरा था। रात के खाने के लिए बताया गया कि राजस्थानी थाली का इंतजाम किया गया है। खाने का असली मजा रात को ही मिलने वाला था। रात को राजस्थानी थाली में राजस्थान की मशहूर दाल-बाटी, गट्टे की सब्जी, लहसन की चटनी , पापड की सब्जी सभी कुछ था । राजस्थानी खाने का स्वाद लाजवाब था। अलवर बाग के मुख्य शेफ गौरव भनोट खुद भी खाने को नया बनाने की कोशिश करते रहते हैं।

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क्या कर सकते हैं यहां-

अलवर बाग में मनोरंजन के लिए इतने इंतजाम किए गए हैं कि आप चाहें को यहीं अपना पूरा समय बिता सकते हैं। रिसॉर्ट में पेंटबॉल, शूटिंग, रॉक क्लाइंबिंगस, रोप कॉर्स, रिमोट कार रेसिंग जैसे रोमांचक खेलों का मजा लिया जा सकता है। इतने तरह के खेल एक रिसॉर्ट में मुश्किल से ही देखने को मिलते हैं। इसके अलावा बेडमिंटन और बास्केटबाल और क्रिकेट खेल कर भी समय बिताया जा सकता है। इतना सब कुछ करने के बाद थक जाएं तो यहां को स्पा में जाकर थकान उतारी जा सकती है। स्पा में कई तरह की मसाज उपलब्ध हैं।

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शाम के साथ रिसॉर्ट का माहौल और भी खूबसूरत हो जाता है। हरे भरे लॉन के बीच बने स्विमिंग पूल में शाम का पूरा मजा लिया जा सकता है। पूल के साथ ही रिसॉर्ट का आडटडोर किचन काउंटर है जहां से आपकी फरमाइश पर तरह तरह के स्नैक्स परोसे जा सकते हैं।

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इतना सब कुछ को रिसॉर्ट में ही है कि दो दिन भी कम नजर आते हैं। फिर भी अगर बाहर घूमना चाहते हैं तो अलवर और सरिस्का टाइगर रिजर्व की सफारी पर जाया जा सकता है। अलवर यहां के करीब 15 किलोमीटर दूर है जहां अलवर संग्राहलय और किला देख सकते हैं। अलवर राजस्थान का बेहद ऐतिहासिक शहर है । अलवर की प्रसिद्ध सिलीसेंढ झील भी रिसॉर्ट के पास ही है।

सरिस्का टाइगर रिजर्व रिसॉर्ट से 20 किलोमीटर की दूर पर ही है। जंगल देखने का शौक है तो यहां सफारी कर सकते हैं। रिसॉर्ट को बताने पर वे इसकी बुकिंग करने में मदद कर देंगें। मैं भी अपने साथी ट्रेवल ब्लागर्स के साथ दोपहर को जंगल देखने के लिए गया। हालांकि सितम्बर के महीने में टाइगर सफारी बंद रहती है लेकिन जंगल के करीब 20 किलोमीटर अंदर एक प्राचीन हनुमान मंदिर है और मंगलवार और शनिवार को वहां जाने की अनुमति दी जाती है। हम लोग भी शनिवार को ही अलवर बाग में ही थे इसलिए एक छोटा चक्कर जंगल का भी लगाया। वैसे सफारी अक्टूबर से जून तक खुली रहती है।

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दिल्ली से मात्र 150 किलोमीटर दूर होने के कारण सप्ताह के आखिर दिन बिताने के लिए अलवर बाग माकूल जगह है। दिल्ली के करीब 3 घंटे का सडक का सफर करके आराम से यहां पहुंच सकते हैं। अलवर के लिए दिल्ली से बहुत सी ट्रेन भी उपल्बध हैं।

ध्यान रखें की सप्ताह के आखिरी दिनों शनिवार तथा रविवार और छुट्टी के दिनों में रिसॉर्ट आमतौर पर पूरी तरह भरा होता है। इसलिए इन दिनों में जाने से पहले बुकिंग जरूर करवा लें। सप्ताह के बीच में जाने पर ज्यादा शांति से समय बिता सकेंगे।

क्या खरीदें –

अलवर अपने मिल्क केक के लिए प्रसिद्ध है। तो अलवर का मिल्क केक सफर की यादगार के तौर पर साथ ले जाना ना भूंलें । अलवर में मिल्क केक बनाने की कई दुकाने हैं जिनमें बाबा ठाकुर दास एंड संस और दूध मिष्ठान भंडार बहुत प्रसिद्ध हैं। बाबा ठाकुर दास को ही अलवर की प्रसिद्ध मिल्क केक की शुरूआत करने का श्रेय दिया जाता है। बाबा ठाकुरदास की दुकान एक दुकान अलवर के घंटाघर के पास है और दूध मिष्ठान भंडार की एक दुकान तिजारा फ्लाईओवर के नजदीक है।

Note- यह यात्रा आमोद अलवर बाग के निमंत्रण पर की गई थी ।

त्रिपुरारी पूर्णिमा- गोवा का नाव उत्सव ( Boat Festival)

त्रिपुरारी पूर्णिमा- गोवा का नाव उत्सव ( Boat Festival)

उत्सव- गोवा नाव उत्सव ( Goa Boat Festival), विठ्ठलपुर गांव, गोवा
Date- 14 November 2016

अपने मस्त-मौला अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले गोवा में त्रिपुरारी पूर्णिमा को भी खास अंदाज में मनाया जाता है। यही वजह है कि त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन गोवा में होने वाला नाव उत्सव धीरे-धीरे पर्यटकों के बीच अपनी पहचान बनाने लगा है। इस दिन गोवा के विठ्ठलपुर गांव में वलवंती नदी के किनारे इसका आयोजन किया जाता है। इस साल यह नाव उत्सव 14 नवबंर को मनाया जाएगा।

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समुद्र, नदियां और नावें गोवा के जनजीवन के साथ गहराई से जुड़े हैं। लोक जीवन या संस्कृति से जुड़े हर पहलू में यह जुडाव साफ दिखाई देता है। यही कारण है कि त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन नाव उत्सव मनाया जाता है। यह एक नाव बनाने की प्रतियोगिता होती है, जिसमें थर्मोकोल या कार्डबोर्ड से छोटे-छोटे खूबसूरत जहाज या नावें बनाई जाती हैं। बिल्कुल बडे जहाजों की तरह दिखाने देने वाले इन छोटे जहाजों को बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है। जहाजों को रंगबिरंगों कागजों से सजाया जाता है। आजकल इन जहाजों पर रोशनी का इंतजाम भी किया जाता है। रोशनी से जगमगाते रंगबिरंगे जहाज अनोखा समा बांध देते हैं। पूरे गोवा से लोग इस नाव प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए जुटते हैं। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले लोगों की संख्या 1000 तक पहुंच जाती है। आखिर में सबसे खूबसूरत नाव को पुरूस्कार भी दिए जाते हैं।

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उत्सव की शुरूआत शाम के समय भगवान कृष्ण की डोली को गाजे-बाजे के साथ नदी के किनारे लाए जाने से होती है। प्रतियोगिता के खत्म होने तक भगवान की डोली वहीं रहती है। इस दौरान पारम्परिक नाच गाने का दौर चलता है। उसके बाद नदी में जलते दीए प्रवाहित किए जाते हैं। पूरी नदी दीओं से जगमगाती है उस बीच जोर शोर के साथ नावें नदी के पानी में उतारी जाती हैं। नदी में उतरी रंगबिंरगी नावें बेहद खूबसूरत दिखाई देती हैं। धीरे – धीरे यह उत्सव इतना लोकप्रिय हो गया है कि इसे देखने बड़ी संख्या में पर्यटक भी जुटने लगे हैं। गोवा पर्यटन विभाग की तरफ से इस यात्रा को दिखाने के लिए विशेष टूर आयोजित किए जाते हैं।

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गोवा की स्थानीय संस्कृति की अनूठी झलक इस उत्सव के दौरान देखने को मिलती है। नाव प्रतियोगिता के साथ तरह के पारम्परिक संगीत और नृत्यों का प्रदर्शन होता है। पूरे विठ्ठलपुर गांव को रंगबिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है। देर रात को आतिशबाजी का कार्यक्रम भी होता है ।
हिन्दु मान्यता के अनुसार त्रिपुरारी पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा को बेहद पवित्र माना जाता है। इस दिन देश भर में मेलों और उत्सवों का आयोजन होता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था।

तो अगर आप गोवा की अनूठी और मस्त मौला जिंदगी की एक झलक देखना चाहते हैं, वहां के स्थानीय जन-जीवन से रूबरू होना चाहते हैं तो एक बार गोवा के नाव उत्सव में जरूर शामिल हों।

ज्यादा जानकारी के लिए गोवा पर्यटन विभाग की वेबसाइट देख सकते हैं।

Picture courtesy – Goa Tourism

गुनेहड़ की वो शाम

गुनेहड़ की वो शाम

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गुनेहड़ में शाम होने वाली है। आसमान में बादल छाए हैं। हिमाचल के इस पहाड़ी गांव के लिए आज की शाम कुछ अलग होने वाली है। गांव के चौक में आज काफी हलचल है। चौक क्या , एक छोटा सा खुला चौकोर हिस्सा है जिसके चारों तरफ कुछ 5-7 दुकानें बनी हैं। यही गांव का बाज़ार भी है। चौक में एक तरफ मंच तैयार किया जा रहा है। मंच के पास ही एक घर के बाहरी अहाते में फैशन शो की तैयारियां चल रही हैं। गांव की लड़कियां रैंप पर चलने का अभ्यास कर रही हैं। लाइटें लग चुकी है, साउंट सिस्टम को दुरूस्त किया जा रहा है। पूरे दिन बरसात होने के बाद फिलहाल बारिश रुकी हुई है लेकिन आसमान बादलों से भरा पड़ा है। आधा जून बीत चुका है तो इस इलाके में मानसूनी बारिश कभी भी आ सकती है। लग रहा है कि बादल भी गुनहेड़ की माहौल का जायज़ा ले रहे हैं। चौक में लोगों का जुटना भी शुरू हो गया है। पूरे गांव की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपनी जगह पर बैठ गए हैं। सिर्फ गुनेहड ही नहीं आस पास के दूसरे इलाकों से भी लोग यहां आए हैं। कुछ पर्यटक भी अपनी सीट पर बैठे दिखाई दे रहे हैं।

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दरअसल यह सब गुनहेड़ में होने वाले फ्रेंक के मेले के आखिर दिन की तैयारियां हैं। गुनहेड में होनें वाले शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop) फेस्टिवल को गांव वाले फ्रेंक वाला मेला ही कहते हैं। क्योंकि इसे करवाने वाले हैं जर्मनी से गुनहेड़ आकर बसे फ्रेंक।

फ्रेंक और उनके मेले में जानने के लिए मेरा पुराना लेख पढें।

फ्रेंक मेले की आखिरी तैयारियों में व्यस्त दिखाई देते हैं। अंधेरा होते होते पूरा चौक लोगों से खचाखच भर जाता है। दुकानों के बाहर, छतों पर , जमीन पर , जिसको जहां जगह मिली वहीं जम गया है।

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मेले की शुरूआत होती है स्थानीय गद्दी और बड़ा भंगाली समुदाय के कपडों से जुडें फैशन शो से। इस फैशन शो को दिल्ली की फैशन डिजाइनर रेमा कुमार ने तैयार किया है। लेकिन खास बात यह है कि फैशन शो के रैंप पर चलने वाली सब लड़कियां इसी गांव की रहने वाली हैं। लड़कियां पारंपरिक गद्दी और बड़ा भंगाली कपड़ों से सजी हैं। मंच पर उनके आते ही तालियों से उनका स्वागत किया जाता है। लड़कियां गांव वालों के सामने फैशन शो कर रही हैं और गांव के लोग दिल से उनका स्वागत कर रहे हैं। साफ दिखाई देता है कि गुनेहड़ में यह मेला एक बदलाव ला रहा है। गांव के साथ जुडकर कला को आगे ले जाने की फ्रेकं की सोच की यहां साकार होती नजर आती है।

इसी फैशन शो के बाद मलेशिया से आए फिल्म निर्देशक के.एम.लो की फिल्म दिखाई गई। के.एम. दुनिया भर में टुकटुक सिनेमा के नाम से स्थानीय लोगों के साथ मिलकर फिल्म बनाने का प्रयोग करते हैं। इस बार के मेले में उन्होंने गांव के बच्चों को लेकर एलियन और पृथ्वी पर होने वाले उनके हमले को लेकर फिल्म तैयार है। गांव के हर बच्चे ने इसमें कुछ ना कुछ पात्र जरूर निभाया है। फिल्म से दिखाने से पहले के.एम. मंच पर आते हैं और उन्हें देखकर सबसे ज्यादा खुशी बच्चों को ही होती है।

इसके बाद दिखाई जाती है अमित वत्स की 3मिनट फिल्में। अमित ने पिछले एक महीने में गांव के रहने वालें तीन लोगों की जिंदगी पर 3 मिनट की तीन फिल्में तैयार की हैं। अमित अलग-अलग इलाकों में जाकर आम लोगों के विषयों से जुडी फिल्में छोटी फिल्में बनाते हैं।

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गांव के इस चौक की हर दुकान कांगड़ा की पारम्परिक चित्रकारी से सजी है। पूरा चौक अपने आप में एक कला दीर्घा नजर आता है। दीवारों पर सजे इन खूबसूरत चित्रों को गार्गी चंदोला ने स्थानीय कांगडा चित्रकारों की टीम के साथ मिल कर तैयार किया है।

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इसी चौक में गुनहेड़ पॉप नाम की एक दुकान भी खुली है जिसमें भड़कीले रंगों में चित्र सजे नजर आ रहे हैं। लंदन में स्टूडियो चलाने वाली केतना पटेल ने इसे तैयार किया है। इस बार फ्रेंक के साथ मेला आयोजित करने में केतना की भी भूमिका रही है। केतना के इस काम को गांव वालो ने इतना पसंद किया कि उन्होंने भी जी भर के पॉप आर्ट में अपना योगदान किया।

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इस बीच चौक में चल रहे रंगारंग कार्यक्रम में भी जोश बढ़ गया है। अब लोगों के बीच गुनेहड़ के स्थानीय गायकों की टोली अपनी गीत गा रही है और लोग उनका साथ देने के लिए नाचने लगे हैं। बीच- बीच में बारिश की भी फुहारें पड़ने लगती हैं। बारिश तेज होने लगती है लेकिन फिर भी सब लोग अपनी जगहों पर जमें हैं किसी तरह की अफरा-तफरी नहीं। बारिश के बीच ही इलाके के एक और प्रसिद्ध गायक मंच पर आते हैं भगवान शिव का एक भजन गाते हैं और आश्चर्यजनक रूप से बारिश थम जाती है। माहौल में और भी उत्साह आ जाता है। एक के बाद एक गानों का दौर जारी है।

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इसी चौक के कुछ दूरी पर दिल्ली के कलाकार पुनीत कौशिक का ग्लास आर्ट है जो रात की रोशनी में खूबसूरत दिखाई दे रहा है। यहां एक दुकान जयपुर से आई नीरजा और स्प्रिहा ने भी लगाई हैं। नीरजा रद्दी कागज के इस्तेमाल से कपड़ा बनती हैं। उसी कपड़े से बनी चीजों को उन्होंने अपनी दुकान में सजाया था। कागज के कपड़े से बनी दरियां, बैग और दूसरे सजावटी सामान । और आखिर में हैं टेरिकोटा आर्टिस्ट मुदिता की टेरिकोटा से बनी कलाकृतियां।

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अलग- अलग तरह के कलाकारों को एक जगह लाकर किसी गांव के बीचों बीच कला के प्रदर्शन का यह एक अनूठा प्रयोग है। शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop) का यह दूसरा आयोजन है इससे पहले 2013 में फ्रेंक ने इसे पहली बार आयोजित किया था। फ्रेंक का मकसद कला को आम लोगों के जीवन के साथ जोड़ने के साथ ही गांव के विकास में उसका इस्तेमाल करना था। धीरे-धीरे फ्रेंक अपने सपने को पूरा करने के करीब जा रहे हैं।

रात के गहराने के साथ ही कार्यक्रम को खत्म करने का समय हो जाता है। रात 10 बजे के बाद कार्यक्रम की इजाजत नहीं है। लेकिन नाच गाने के दौर के बीच कोई हटने के तैयार नहीं हैं। आखिरकार फ्रेंक किसी तरह गायकों को मंच से हटाकर कार्यक्रम को बंद करवाते हैं। मैं मंच के नीचे ही खड़ा था तो मुझसे मिलते हैं। मिलने पर फ्रेंक यह नहीं पूछते कि कार्यक्रम कैसा रहा ? शायद प्रशंसा लेना उनके स्वभाव में नहीं है। मुझे देखते ही फ्रेंक का पहला वाक्य होता है कि काश यह गांव ऐसा ही बना रहे , दूसरे कस्बों की तरह यहां भी हर घर में गाड़ियों का जमघट ना लगे। दरअसल गांव में मेला देखने के लिए इतने लोग आ गए थे कि गांव में पहली बार जाम जैसी स्थिति बन गई थी।
एक दिन बाद में फ्रेंक से विदा लेने के लिए मिलता हूं। मैंने पूछा, “तो अगला मेला कब होने जा रहा है?”
फ्रेंक का जवाब, “अभी तो मुझे कुछ दिनों तक खूब सोना है।”
फ्रेंक भले ही जवाब ना दें लेकिन पक्का है कि उनकी आंखों में अगले शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop)के सपने ने आकार लेना शुरू कर दिया होगा।

लद्दाख का कुंभ मेला – नरोपा उत्सव (16 से 22 सितम्बर 2016 )

लद्दाख का कुंभ मेला – नरोपा उत्सव (16 से 22 सितम्बर 2016 )

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हिमालय की गोद में बसे लद्दाख को अपनी अनोखी बौद्ध विरासत, संस्कृति और भौगोलिक विविधता के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यहां की बौद्ध संस्कृति अपने आप में अनूठी है। बौद्ध संस्कृति को करीब से देखने की चाह रखने वालों के लिए यह वर्ष बहुत खास है।
इस वर्ष 16-22 सितम्बर के बीच लद्दाख के हेमिस बौद्ध मठ में नरोपा उत्सव मनाया जाएगा। प्रत्येक 12 वर्ष के बाद मनाए जाने के कारण नरोपा उत्सव को लद्दाख का कुंभ मेला भी कहा जाता है। लद्दाख में बुद्द धर्म के द्रुपका पंथ के अनुयायी इस उत्सव को मनाते हैं। पूरे लद्दाख में लगभग 80 फीसदी लोग द्रुपका पंथ में विश्वास रखते हैं। इस वजह से नरोपा उत्सव को मनाने के लिए भारी संख्या में लोग जुटते हैं। इस उत्सव को दुनिया का सबसे बड़ा और प्रमुख बौद्ध उत्सव माना जाता है।

हेमिस मठ
हेमिस मठ

नरोपा उत्सव को भारत के ही रहने वाले बौद्ध संत और विद्वान संत नरोपा की याद में मनाया जाता है। इस साल संत नरोपा के जन्म के एक हजार वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसलिए इस बार का नरोपा उत्सव और भी खास बन जाता है।
संत नरोपा को द्रुपका पंथ का संरक्षक संत माना जाता है। उन्होंनें बौद्ध दर्शन की एक महान परंपरा को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई। संत नरोपा ने लद्दाख में रहे। लद्दाख में उन्होंने “नरोपा के छ: योग”(Six Yogas of Naropa) में दक्षता हासिल की। नरोपा के छ: योग को बौद्ध धर्म की वज्रायान शाखा का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।

इस साल मनाए जाने वाले नरोपा उत्सव को बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाएगा। द्रुपका पंथ के सबसे बड़े धर्म गुरू ग्यालवांग द्रुपका खुद उत्सव के दौरान लद्दाख में मौजूद रहेंगे, इन्हें संत नरोपा का अवतार माना जाता है। उत्सव के दौरान संत नरोपा से जुड़े Six Bone Ornaments को भी सबके सामने रखा जाएगा। इन आभूषणों को नरोपा उत्सव के समय ही सबके सामने लाया जाता है।

हेमिस उत्वस की तैयारी करते हुए ( पुराना फोटो - सिर्फ जानकारी के लिए लगाया गया)
हेमिस उत्वस की तैयारी करते हुए ( पुराना फोटो – सिर्फ जानकारी के लिए लगाया गया)

नरोपा उत्सव लद्दाख के उत्सवों में बहुत ऊंचा स्थान रखता है। उत्सव के दौरान लद्दाख की संस्कृति के विभिन्न रूप भी देखने को मिलेगें। इस दौरान लद्दाख के नृत्य और संगीत को देखने और सुनने का मौका मिलेगा। इसके साथ बालीवुड से जुड़े संगीतकार शंकर, एहसान , लॉय भी उत्सव के दौरान कार्यक्रम पेश करेगें। भारत के फिल्म जगत से जुडी और भी कई हस्तियां इस समय मौजूद रहेंगी। तो लद्दाख की संस्कृति और सभ्यता को करीब से देखने का इरादा रखते हैं तो सितम्बर में लद्दाख का रूख कर सकते हैं। उत्सव के सात दिनों के दौरान लद्दाख और दुनिया भर से करीब पांच से छ: लाख लोगों के पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।

कैसे पहुंचे- लेह शहर लद्दाख का मुख्यालय है। लेह दिल्ली, जम्मू, श्रीनगर और चंड़ीगढ से हवाई सेवा से जुड़ा है। इसके अलावा श्रीनगर और मनाली से सड़क के जरिए भी लेह पहुंचा जा सकता है। सड़क से सफर थोड़ा कठिन है रास्ते में कई ऊंचे दर्रों को पार करना पड़ता है। इसलिए चलने से पहले इलाके के मौसम की जानकारी जरूर लेलें। मनाली की तुलना में श्रीनगर से लेह जाना थोड़ा आसान है। मनाली से लेह की दूरी करीब 473 किलोमीटर है। श्रीनगर से लेह करीब 434 किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्ली से मनाली होते हुए हिमाचल परिवहन की एक बस लेह के लिए जाती है।
नरोपा उत्सव लेह से 40 किलोमीटर दूर हेमिस मठ में आयोजित किया जाएगा। हेमिस तक जाने से लिए लेह से टैक्सी ली जा सकती । स्थानीय बस सेवा भी उपल्बध है ।

ज्यादा जानकारी के लिए नरोपा उत्सव की इस वेबसाइट को देखा जा सकता है।