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इंद्र जात्रा— काठमांडू घाटी में इंद्र पूजा का उत्सव

इंद्र जात्रा— काठमांडू घाटी में इंद्र पूजा का उत्सव

काठमांडू दरबार स्क्वेर में जनसैलाब उमड़ा हुआ था। खासे बड़े स्क्वेर में कहीं तिल रखने की भी जगह नहीं थी। जिसे जहां जगह मिली फंस कर खडा था। मंदिरों की सीढियां, आसपास के घरों की छतें और ऊंचे रेस्टोरेंट सभी खचाखच भरे थे। आज एक खास दिन था। इंद्रजात्रा के त्यौहार की पहली रथयात्रा निकलने वाली थी। हर तरफ ढोल- नगाडों का शोर सुनाई दे रहा था। जहां तहां लोग नाच रहे थे।

नाचते गाते युवा

युवाओं का जोश देखते ही बनता था। लड़के और लड़कियां बन संवर कर इसमें हिस्सा लेने के लिए पंहुचे थे। लड़के-लड़कियों के समूह ढोल नगाडे बजा रहे थे। मैं इंद्रजात्रा शुरू होने के तीसरे दिन काठमांडू पहुंचा था यही पहली रथयात्रा का दिन भी था। इंद्र जात्रा के कुल आठ दिन के त्योहार में तीन दिन तक रथयात्रा निकलती हैं। जीवित देवी कुमारी के रथ पर बाहर निकलने के कारण यह यात्रा बहुत अहम होती है।

क्या है इंद्र जात्रा
इंद्र जात्रा काठमांडू घाटी के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इंद्र जात्रा को नेपाली भाषा में येंया कहा जाता है। इसे यहां का नेवारी समुदाय मनाता है। हिन्दु और बौद्ध दोनों ही इसे मनाते हैं। बरसात के देवता इंद्र और उनकी मां दांगि को प्रसन्न करने के लिए इसे मनाया जाता है। भारत के बहुत से त्यौहारों की तरह ही यह भी सीधे फसल और किसानों से जुडा है। इंद्र से अच्छी बरसात और बेहतर फसल की कामना की जाती है। इंद्र की मां दांगि के लिए माना जाता है कि वे मृत आत्माओें को अपने साथ ले आसमान में ले जाती है। इसलिए पिछले एक वर्ष के दौरान हुए मृत लोगों के परिजन दांगि ( इंद्र की मां ) की पूजा करते हैं। एक तरह से कहा जा सकता है कि सामाजिक ताने बाने को छूता हुआ त्यौहार है इंद्र जात्रा।

दांगि , इंद्र की मां

इसे नेपाली चंद्र कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद के महीने में आठ दिनों तक मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत शुक्लपक्ष के 12वें दिन होती है और इसकी समाप्ति कृष्ण पक्ष के चौथे दिन होती है। इस दौरान कई तरह की पूजा, नाच-गान और रीति रिवाज पूरे किए जाते हैं। इंद्र जात्रा की शुरूआत पहले दिन एक पेड़ के तने को हनुमान ढोका के सामने खडा करने से होती है। इसे पेड़ के तने को योंसि थनेगु या लिंगम कहा जाता है। इस के ऊपरी सिरे पर इंद्र की पताका फहरायी जाती है।

योसि थनेंगु या लिंगम

लिंगम के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पेड़ को पास के नाला गांव के पवित्र जंगल से ही लाया जाता है। यह कुछ-कुछ पुरी की जगन्नाथ यात्रा की तरह लगता है जहां भी एक खास जंगल के विशेष लक्षणों वाले पेड़ का इस्तेमाल भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र को विग्रह को बनाने के लिए किया जाता है। अब अगले आठ दिनों तक इसकी पूजा की जाती है। साथ ही दरबार स्क्वेर में भैरव समते कई मूर्तियों और मंदिरों को जनता के दर्शनों के लिए खोल दिया जाता है।

मुझे जान कर हैरानी हुई की दरबार स्क्वेर पर बने प्राचीन मंदिरों में से बहुत से मंदिरों को साल में किसी खास दिन ही खोला जाता है। इंद्र जात्रा के समय खुलने वाला स्वेत भैरव भी उनमें से एक हैं। यह एक प्रमुख देवता है जिनके दर्शन जात्रा के दौरान किए जाते हैं।

स्वेत भैरव

किवदंती है कि भगवान इंद्र स्वर्ग से एक विशेष फूल लेने के लिए काठमांडू घाटी में आए। फूल तोड़ते समय लोगों ने उन्हें चोर समझ कर पकड लिया और बंदी बनाकर राजा के पास ले गए। पता चलने पर इंद्र की मां दागिं स्वयं यहां आई। उनकी बात सुनकर लोगों ने इंद्र को रिहा किया। तब मां दांगि ने आशीर्वाद दिया कि इस घाटी में हमेशा बारिश और फसल बेहतर होगी। तब से ही यह उत्वस मनाया जाता है।

इंद्र के बंदी स्वरूप को अभी भी उत्सव के समय दिखाया जाता है। यहां एक ऊंचे मंच पर इंद्र की प्रतिमा होती है । इस प्रतिमा के हाथों को रस्सियों से बांधा जाता है।

बंदी इंद्र

कुमारी यात्रा

इन्हीं आठ दिनों के दौरान तीन बार रथ यात्रा निकलती है। रथयात्रा इस त्यौहार का सबसे अहम पहलू है। क्योंकि इस दौरान ही जीवित देवी कुमारी अपने कुमारी घर से बाहर आती है। कुमारी नेपाल के नेवारी समुदाय की एक प्रथा है। जिसमें एक बच्ची को विशेष लक्षणों के आधार पर कुमारी चुना जाता है। कुमारी को देवी तलेजू का रूप माना जाता है। कुमारी पूरे वर्ष अपने खास घर में ही रहती है।वह परिवार के लोगों के अलावा कुछ खास दोस्तों से ही मिलती है। ऐसे में रथयात्रा ऐसा मौका होता है जब लोग बाहर सड़क पर कुमारी के दर्शन करते हैं। इसलिए कुमारी के दर्शनों की होड़ लगी रहती है। हजारों की भीड़ दर्शनों के लिए वहां जमा होती है।

कुमारी देवी का रथ

एक तरह से कुमारी रथयात्रा इंद्र जात्रा उत्सव का ही हिस्सा है। लेकिन इतिहास के अनुसार इसे बहुत बाद में इंद्र जात्रा में शामिल किया गया। इंद्र जात्रा का उत्सव 10 वीं शताब्दी से ही काठमांडू घाटी में मनाया जा रहा है। लेकिन कुमारी रथयात्रा को अठारहवीं सदी में इंद्रजात्रा में शामिल किया गया।

उत्सव के अहम हिस्से
रथयात्रा-
उत्सव में तीन दिनों तक निकलने वाली रथयात्रा इस उत्सव का अहम हिस्सा है। इसमें जीवित देवी कुमारी के साथ, भगवान गणेश और भगवान भैरव के रथों की यात्रा शहर की सडकों पर निकलती है। तीन दिनों में अगल -अलग रास्तों से यह यात्रा गुजरती है। पहली रथयात्रा इंद्र जात्रा उत्सव शुरू होने के तीसरे दिन निकलती है। देवी कुमारी को देखने का यह सबसे अच्छा मौका होता है।

भगवान गणेश का रथ

भगवान भैरव का रथ

लाखे – मुखौटा नृत्य
लाखे भी इस उत्सव का मुख्य हिस्सा है। लाखे नाम के मुखौटा धारी व्यक्ति पूरे रथयात्रा के दौरान नृत्य करते हुए चलते हैं। लाखे को एक दानव का रूप माना जाता है। भारी भरकम मुखौटा और कपडे पहनकर लाखे भीड़ के बीच नृत्य करता हुआ चलता है। कुछ खोजबीन से पता चला कि लाखे के मुखौटे और कपडों का वजन 40 किलो तक हो सकता है। इतने भारी वजन के साथ भीड के बीच संतुलन बनाते हुए नृत्य करना आसान काम नहीं है।एक लय के साथ नृत्य करता लाखे अनोखा लगता है।

नृत्य करता हुआ लाखे

पुलुकिसी-
पुलुकिसी इस उत्सव का एक और अहम हिस्सा है। पुलुकिसी या इंद्र का हाथी। इसे ऐरावत भी कहा जाता है। माना जाता है कि ऐरावत सफेद हाथी है जो कि इंद्र का वाहन है। इंद्र के बंदी बना लेने के बाद शहर की सडकों पर अपनी मालिक को ढूंढते हाथी के रूप में इसे दर्शाया जाता है। उत्सव के समय भीड़ के बीच पुलुकिसी आगे पीछे दौडता रहता है।

पुलुकिसी

आठवें दिन पेड के तने योंसि थनेगु को गिराया जाता है। इसे योंसि क्वथलेगु कहा जाता है। तने के नीचे आने के साथ ही उत्सव समाप्त हो जाता है।

इंद्र जात्रा कैसे देखें –

अगर इसे देखने चाहते हैं तो कोशिश करें की उत्सव के पहले दिन ही दरबार स्क्वेर पहुंच जाएं। उस दिन रास्तों की पहचान कर लें। उत्सव के तीसरे दिन पहली रथयात्रा निकलती है। पहली रथयात्रा के समय बहुत भीड़ होती हैं। इसलिए इस दिन रथयात्रा के रास्ते में आने वाले किसी रेस्टोरेंट या होटल से बात करके उसकी छत से इसे देखना सबसे अच्छा उपाय है।
दूसरी रथयात्रा के समय भीड़ कम हो जाती है इसलिए उस दिन कुमारी घर तक जाकर इसे देखना आसान है। देवी कुमारी के घर से निकलने की तस्वीरें भी यहां मिल सकती हैं। मैं भीड से दूर रहने की कोशिश करता हूँ। दूसरे दिन यात्रा का रास्ता मेरे होटल के सामने से जाता था। इसलिए मैंने दूसरे दिन की रथयात्रा मेरे होटल से देखी।
रथयात्रा निकलने के बाद रात को भी दरबार स्क्वेर जरूर जाएं। रात भर कुछ ना कुछ होता जरूर दिखाई देता है। मैं रात को 12 बजे के बाद स्क्वेर गया था। उस समय आसानी से घूमा जा सकता है।

कहां रूकें –
इंद्र जात्रा को देखने के आयें हैं तो कोशिश करें कि दरबार स्केवर के आस-पास के होटल में रूकें । इससे किसी भी समय जाने-आने में आसानी होगी। मैं दरबार स्क्वेर के पास Dwarika chhen होटल में रूका था। होटल के दरबार स्क्वेर से सटा होने के कारण मुझे काफी आसानी हुई।

See this video to know some interesting fact about #Indrajatra

Note – This trip was organised by Nepal tourism board and Explore Himalaya