Browsed by
Category: Travel postcard

मुकुटमणिपुर

मुकुटमणिपुर

मुकुटमणिपुर
पश्चिम बंगाल में शांति से छुट्टियां बिताने की लोकप्रिय जगह है मुकुटमणिपुर। पहाड़, झील और जंगलों से घिरा मुकुटमणिपुर प्रकृति प्रेमियों के लिए सही जगह है। यहां के विशाल मुकुटमणिपुर बांध से बनी झील में नाव की सैर करके समय बिताया जा सकता है। झील से कुछ दूरी पर प्राचीन अंबिकानगर के अवशेष है जो जैन धर्म का एक तीर्थ स्थान हुआ करता था। यहां की 1350 मीटर ऊंची पारसनाथ पहाड़ी भी जैन धर्म का तीर्थ स्थान है। यहां बंगोपालपुर रिजर्व फोरेस्ट में कई तरह के पक्षियों को देखा जा सकता है। मुकुटमणिपुर कोलकाता से करीब 240 किलोमीटर दूर है।

दीघा

दीघा

दीघा
पश्चिम बंगाल का दीघा समुद्र के किनारे समय बिताने के लिए बढ़िया जगह है। दूर- दूर तक फैला समुद्री किनारा बेहद खूबसूरत लगता है। समुद्र तट के पास उगे कैसुरिना के पेड़ इसकी खूबसूरती को और भी बढ़ा देते हैं। दीघा की खासियत है कि यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही नजारों का आनंद लिया जा सकता है। वारेन हेस्टिंग्स ने इसे ‘ब्राइटन ऑफ ईस्ट’ कहा था। दीघा का शांत और कम गहरा समुद्र तट इसे तैरने के लिए सुरक्षित बनाता है। दीघा कोलकाता से 187 किलोमीटर दूर है।

चिनसुरा

चिनसुरा


चिनसुरा
बंगाल में हुगली नदी के किनारे डच लोगों की बस्ती था चिनसुरा। यहां 1615 से 1825 तक डच अधिपत्य रहा। एक समय इसे बंगाल का सबसे खूबसूरत शहर माना जाता था। इसें डच विरासत से जुड़ी चीजों के लिए जाना जाता है। लेकिन यहां की सबसे लोकप्रिय इमारत घंटाघर है जिसे अंग्रेजों ने बनवाया था। घंटाघर के पास ही हुगली मदरसा है जो कभी डच सिपाहियों के रहने की बैरक हुआ करता था। कमिश्नर हाउस एक शानदार इमारत है जहां डच और अंग्रेजी दोनों दौर की निशानियां नजर आती हैं। यह कोलकाता से 35 किलोमीटर दूर है।

चंद्रनगर

चंद्रनगर

चंद्रनगर
भारत में फ्रांसिसी उपनिवेश का हिस्सा था पश्चिम बंगाल का चंद्रनगर। भारत की आजादी के बाद 9 जून 1951 को इसे भारत में शामिल किया गया। यह शहर सरस्वती नदी के किनारे बसाया गया। लंबे समय तक फ्रांसिसी शासन में रहे चंद्रनगर में फ्रांस की वास्तुकला और स्थापत्य इमारतों में नजर आता है। नदी के किनारे बनी चौड़ी सड़कें और बैठने की जगहें यूरोप की याद दिलाती हैं। सेंट लुईस चर्च और सेक्रेड हार्ट चर्च यहां की प्रमुख इमारतों में से हैं। चंद्रनगर संग्रहालय में फ्रांसिसी समय की वस्तुऐं देखी जा सकती हैं। चंद्रनगर कोलकाता से 30 किलोमीटर दूर है।

सिरामपुर

सिरामपुर

सिरामपुर
हुगली नदी के किनारे बसा यह शहर औपनिवेशिक काल के इतिहास को खुद में संजोए हुए है। यह शहर डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी का अधीन था और 1755 से 1845 तक डेनमार्क की कॉलोनी रहा। डेनिश दौर की इमारतें यहां देखी जा सकती हैं। उस समय इसे फ्रेडरिक्सनगर कहा जाता था। ओलव चर्च और सिरामपुर कॉलज उस समय की महत्वपूर्ण इमारत है जिन्हें यूरोपिय वास्तुकला से बनाया गया है ।सिरामपुर राजाबारी भी देखने लायक हैं। यहां कई मंदिर हैं जिनमें 1755 में बना जगन्नाथ मंदिर प्रमुख है। सिरामपुर कोलकाता से करीब 30 किलोमीटर दूर है।

कुर्सियांग

कुर्सियांग

कुर्सियांग
लेप्चा भाषा में कुर्सियांग का मतलब होता है ‘सफेद ऑर्किड की धरती’। बसंत के मौसम में यहां सफेद ऑर्किड फूल खिलते हैं। पश्चिम बंगाल का यह हिल स्टेशन अपनी खुशगवार आबोहवा और चाय बागानों के लिए जाना जाता है। इसकी 1458 मीटर की ऊंचाई ना तो इसे बहुत गर्म बनाती है ना ही बहुत ठंडा। अंग्रेजों ने सिक्किम के राजा से इस जगह को लिया और अपने अधिकारियों के आराम करने की जगह के तौर पर विकसित किया।पहाड़ी नजारों को देखने के लिए यहां का ईगल्स क्रेग अच्छी जगह है। कुर्सियांग दार्जिलिंग से 30 किलोमीटर दूर है।

लावा

लावा

लावा
भारत से भूटान जाने के पुराने पारम्परिक रास्ते पर है पश्चिम बंगाल का लावा । यह छोटा सा गांव 2350 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। चारों तरफ से चीड़ के जंगल से घिरा और कोहरे की ओट में रहने वाला लावा बहुत सुन्दर लगता है। यहां की खामोशी मनमोह लेती है। लावा से कई ट्रेकिंग के रास्ते निकलते हैं। यहां पास में न्यौरा नेशनल पार्क में ट्रेक किया जा सकता है। लावा में भूटानी शैली का सुन्दर बौद्ध मठ बना है। यहां के जंगलों की प्राकृतिक विवधता को समझने के लिए नेचर इंटरप्रेटेशन सेंटर सही जगह है। लावा कलिंपोंग से 34 किलोमीटर दूर है।

कलिंपोंग

कलिंपोंग

कलिंपोंग
पश्चिम बंगाल का खूबसूरत हिल स्टेशन है कलिंपोंग। समुद्र तल से 1200 मीटर की ऊंचाई पर बसे कलिंपोंग में प्राकृतिक सुन्दरता के साथ देखने के लिए बहुत सी जगहें हैं। रविन्द्रनाथ टैगोर ने यहां रहकर कई कविताएं लिखी थी उनका घर देखा जा सकता है। कलिंपोंग का थोंगशा बौद्ध मठ प्रसिद्ध है इसे भूटानी मठ भी कहा जाता है। औपनिवेशिक जमाने की इमारतें और चर्च भी यहां देखे जा सकते हैं। रोमांच के शौकीन तीस्ता नदी में राफ्टिंग का मजा उठाने के साथ पहाड़ों में ट्रेंकिग कर सकते हैं । कलिंपोंग दार्जिलिंग से 50 किलोमीटर दूर है।

संदक्फू

संदक्फू

संदक्फू
पश्चिम बंगाल की सबसे ऊंची चोटी है संदक्फू। 3636 मीटर ऊंची चोटी के पास एक छोटा सा गांव बसा है। संदक्फू की खासियत है कि यहां से दुनिया पांच सबसे ऊंची चोटियों में चार चोटियां दिखाई देती हैं। एवरेस्ट के साथ कंचनजंघा, ल्होत्से और मकालू चोटियां संदक्फू से नजर आती हैं। इन नजारों के लिए पर्यटक यहां खिचें चले आते हैं। संदक्फू तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है। यहां आने के लिए मनयभंजन से 31 किलोमीटर ट्रेंकिग करके ही पहुंचा जा सकता है। ट्रेंकिग के इस रास्ते पर हिमालय के खूबसूरत नजारे दिखाई देते है।