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सिटी ऑफ माई हार्ट- 19वीं सदी की दिल्ली

सिटी ऑफ माई हार्ट- 19वीं सदी की दिल्ली

19 वीं सदी की दिल्ली में बहुत कुछ घट रहा था। मुगल सत्ता का ज़ोर समाप्त हो चुका था। कभी भारत के बड़े इलाके पर हुकूमत करने वाले मुगल साम्राज्य का बादशाह अब अंग्रेज़ों का पेंशनगार बन चुका था। मुगल साम्राज्य के ढहने के साथ ही दिल्ली की कहानी में भी कई मोड़ आने शुरू हुए। सदी के बीच में अंग्रेजों के खिलाफ हुई क्रांति ने दिल्ली की कहानी को बदल कर रख दिया। नाममात्र का बादशाह भी अब गद्दी से हट चुका था। मुगल सत्ता देश से समाप्त हो गई और दिल्ली की गद्दी पर अंग्रेज़ों के रूप में एक विदेशी ताकत ने कब्ज़ा जमा लिया। इस हलचल भरे दौर में दिल्ली के लाल किले के भीतर और बाहर की ज़िंदगी को इतिहासकार राना सफवी ने अपनी किताब ‘सिटी ऑफ माई हार्ट’ में बेहतर तरीके से दर्शाया है।

यह किताब 19वीं सदी के आखिर और 20 वीं सदी के शुरुआत में लिखी गई चार उर्दू किताबों का अंग्रेजी अनुवाद है। इन चारों किताबों के ज़रूरी हिस्सों को ‘सिटी ऑफ माई हार्ट’ में समेटा गया है। ये चार किताबें हैं – सैयद वज़ीर हसन दहलवी की ‘दिल्ली का आख़िरी दीदार’, मुंशी फैज़ुद्दीन की ‘बज़्म – ए- आखीर’, मिर्ज़ा अहमद सालिम अर्श तैमूरी की ‘किला-ए-मुअल्ला की झलकियां’ और ख़्वाजा हसन निजामी की लिखी किताब ‘बेगमात के आंसू’। इन चारों में से मुंशी फैज़ुद्दीन आख़िरी मुगल बादशाह के समकालीन थे। ये मुगल बादशाह के एक ससुर के सहायक के तौर पर काम करते थे। बाकि तीनों लेखकों ने खुद मुगल सत्ता को ढ़हते हुए नहीं देखा। इन्होंने उस दौर के चश्मदीदों से सुनी बातों के आधार पर अपनी किताबों को लिखा। मिर्ज़ा अहमद सालिम अर्श तैमूरी मुगल खानदान से ही थे । इनके परदादा 1857 के बाद भागकर हैदराबाद चले गए थे। इन्होंने अपने पिता से सुनी बातों को किताब की शक्ल दी । इन चारों किताबों में लिखी बातों को इस बात से मज़बूती मिलती है कि इन किताबों में कई एक जैसी घटनाओं का ज़िक्र किया गया है। यानि चारों किताबें अलग – अलग समय में लिखी होने के बावजूद एक दूसरे की बातों को सहारा देती हैं। इसका मतलब है कि इनमें बताई की कहानियों और घटनाओं को सच माना जा सकता है। ये किताबें उस वक्त लाल किले के अंदर की घटनाओं, परम्पराओं, रीति-रिवाजों, पहनावे, खान-पान, बोली, त्यौहारों, राजनीति और पड़यंत्रों के बारे में काफी जानकारी देती हैं। इसके साथ ही लाल किले के बाहर के शाहजनाबाद में क्या हो रहा था इसकी झलक भी इन किताबों के ज़रिए दिखाई देती है। ‘सिटी ऑफ माई हार्ट’ में शामिल चारों किताबों की अलग-अलग बात करते हैं।

राना सफवी

1- सैयद वज़ीर हसन दहलवी की ‘दिल्ली का आख़िरी दीदार’– इस किताब में दिल्ली की गंगा-जमुनी तहज़ीब , त्यौहारों और किले में रहने वाले लोगों और दिल्ली की आम जनता के बीच के रिश्तों के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसमें जानकारी मिलती हैं कि कैसे लाल किले में नौरोज़, ईद , दशहरा और दीपावली जैसे त्यौहार जोर-शोर से मनाए जाते थे। इसमें बताया गया है कि दशहरे के दिन बादशाह के सामने नालकंठ को छोड़ा जाता था क्योंकि दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना अच्छा माना जाता है। दिल्ली के लोग मेरठ के नौचंदी मेले में हिस्सा जाया करते थे। अलग-अलग मौसम में दिल्ली के लोगों की ज़िंदगी कैसी हुआ करती थी इसके बारे में भी विस्तार से बताया गया है।

2- मुंशी फैज़ुद्दीन की ‘बज़्म – ए- आखीर’– यह किताब सबसे पहले 1885 में प्रकाशित हुई थी। इसकी पहली प्रति दिल्ली की हरदयाल म्यूनिसपल हेरिटेज पब्लिक लाइब्रेरी में रखी है। इस किताब में मुगलिया सल्तनत के आखिरी दिनों का आंखों देखा विवरण है। किताब के लेखक मुंशी फैज़ुद्दीन, मिर्ज़ा मोहम्मद हिदायत अफज़ान के सहायक का काम करते थे। मिर्ज़ा मोहम्मद हिदायत अफज़ान बादशाह बहादुर शाह ज़फर के ससुर थे। इस किताब में पुरानी दिल्ली के सांस्कृतिक पहलू के बारे में जानकारी दी गई है। किताब में लाल किले की रसोई में बनने वाले तरह-तरह के भोजन के बारे में विस्तार से बताया गया है, जैसे- किले में 26 तरह की रोटियां, 24 तरह के चावलों के पकवान, ढ़ेरों तरह की मिठाईयां, कबाब, सब्ज़ियां, अचार आदि बना करते थे।
किले में कौन-कौन लोग काम करते थे। कितने तरह के पेशे हुआ करते थे , इनके बारे में भी बताया गया है, जैसे किले में “किस्साख्वान” हुआ करते थे, ये लोग रात के समय बादशाह के सोने से पहले कमरे के बाहर खड़े होकर कहानियां सुनाया करते थे। रात को सोते समय बाहशाह की रखवाली के लिए अबिसीनियाई ( अफ्रीकी) और तुर्की की महिला पहरेदार हुआ करती थी। ये बादशाह का आखिरी सुरक्षा घेरा होता।
एक बात यह पता चलती है कि उस समय आज की तरह तीन बार खाना खाने का रिवाज़ नहीं था। उस समय दिन में केवल दो बार खाना खाया जाता था। लाल किले में भी केवल दो बार ही खाना बनता था।बादशाह की दिनचर्या की जानकारी भी इस किताब से मिलती है।

3- मिर्ज़ा अहमद सालिम अर्श तैमूरी की ‘किला-ए-मुअल्ला की झलकियां’ – ये मुगल खानदान से ही ताल्लुक रखते थे। 1857 के बाद बहुत से मुगल राजकुमार और खानदान के लोग भागकर देश के दूसरे इलाकों में चले गए थे। अर्श तैमूरी के दादा 1857 के बाद हैदराबाद चले गए थे। अर्श तैमूरी ने 16 साल की उम्र में 1937 में इस किताब को लिखा था। उन्होंने अपने पिता के सुनी कहानियों को इस किताब में जगह दी है। इसमें बहादुर शाह ज़फर और उनसे पहले बादशाह रहे अकबर शाह द्वितीय के बारे में काफी जानकारियां दी गई हैं। दोनों की बादशाहों के पूरे खानदान की सूची भी इस किताब में मिलती है।

4- ख़्वाजा हसन निजामी की लिखी किताब ‘बेगमात के आंसू’– इस किताब में मुगल सल्तनत ख़त्म होने के बाद मुगल वारिसों की ज़िदंगी की जानकारी मिलती है। इस किताब में एक शहजादे मिर्ज़ा नारिस-उल-मुल्क के बारे में जानकारी दी गई है जो बहादुर शाह ज़फर का पोता था। किताब के अनुसार वर्ष 1911 के दरबार के समय यह शहजादा दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगा करता था। इसी तरह बहादुर शाह ज़फर की बेटी कुरेशिया बेगम के बेटे के बारे में भी बताया गया है कि यह दिल्ली की सड़कों पर रात में भीख मांगा करता था। इस किताब में सबसे दिलचस्प किस्सा बहादुर शाह की पोती सुल्तान बानो के बारे में है। लेखक ने खुद इस शहजादी से मुलाकात की थी जो गरीबी की हालत में पुरानी दिल्ली के घर में रहा करती थी। लेखक ने शहजादी से जो कुछ सुना उसे भी किताब में जगह दी गई है।

किताब में एक शहजादे के बारे में भी बताया गया है जो मुगल सल्तनत ख़त्म होने के बाद मेहनत मज़दूरी करके अपना पेट भर रहा था। जब अंग्रेज़ों ने नई दिल्ली को बनाना शुरू किया तो यह शहजादा अपने तांगे में सामान ढोया करता था।

इस तरह के बहुत सी कहानियां आपको ‘सिटी ऑफ माई हार्ट’ में पढ़ने को मिलेंगी। ‘सिटी ऑफ माई हार्ट’ पढ़ते समय लगता है जैसे घटनाएं आपकी ही आँखों के सामने घटित हो रही हैं। किताब पढ़ने में बहुत सहज है। एक बार शुरू करने के बाद किताब को बंद करना आसान नहीं है। मन करता है कि एक बार में ही इसे पूरा पढ़ लिया जाए। इतिहास में रूचि रखने के वालों के लिए इस किताब में बहुत कुछ है। उम्मीद है कि जल्दी ही इसका हिन्दी अनुवाद भी पढ़ने को मिलेगा। किताब को हैचट इंडिया ने छापा है।