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पटनीटॉप

पटनीटॉप

पटनीटॉप
जम्मू- कश्मीर का बहुत प्रसिद्ध हिल स्टेशन है पटनीटॉप। समुद्रतल से 2024 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस कस्बे में पहुंचते ही देवदार के घने जंगल आपका स्वागत करते हैं। यहां चारों तरफ प्राकृतिक सुन्दरता फैली हुई है। गर्मियों के मौसम में यहां ठंड का अहसास होता है तो सर्दियों में बर्फबारी का मजा लिया जा सकता है। यहां पर ट्रेकिंग के लिए कई रास्ते हैं जिनसे इन पहाडों में घूमा जा सकता है। यहां कई प्राचीन मंदिर भी देख सकते हैं। पटनीटॉप जम्मू से करीब 112 किलोमीटर दूर है।

वेरीनाग

वेरीनाग

वेरीनाग
कश्मीर घाटी की लोकप्रिय और खूबसूरत जगह है वेरीनाग। कश्मीरी भाषा में नाग का मतलब होता है पानी का स्रोत। वेरीनाग को ही झेलम नदी का मुख्य स्रोत माना जाता है। यहां बादशाह जहांगीर ने इस झरने के चारों तरफ अष्टकोणीय तालाब बनवाया। बाद में शाहजहां के समय यहां मुगल बगीचा बनवाया गया। कहा जाता है कि यहां का साफ नीला पानी कभी नहीं सूखता। श्रीनगर से जम्मू जाने वाले रास्ते पर वेरीनाग देखा जा सकता है।यह श्रीनगर से 78 किलोमीटर दूर है।

नगिन झील

नगिन झील


नगिन झील
श्रीनगर का एक खूबसूरत हिस्सा है नगिन झील। चारों तरफ से चिनार और विलो के पेड़ों से घिरी साफ पानी की यह झील बहुत शांत और सुरम्य है। डल झील की तुलना में छोटी मगर भीड़ से दूर इस झील में आकर शांति का एहसास होता है। नगिन झील में काफी शानदार हाउस बोट हैं जहां रहा जा सकता है।यह झील एक छोटे से रास्ते से जरिए डल झील से जुड़ी है।नगिन से लेकर डल झील तक बोटिंग करने का अलग ही मजा है। नगिन डल झील से करीब 6 किलोमीटर दूर है।

युसमर्ग

युसमर्ग


युसमर्ग
कश्मीर घाटी के बड़गाम जिले में है खूबसूरत युसमर्ग। कश्मीरी में मर्ग का मतलब होता है घास का मैदान। युसमर्ग में जहां तक देखो हरी घास के मैदान नजर आते हैं। मैदानों का साथ देते हैं चीड़ के पेड़ और उन पेड़ों के पीछे से दिखाई देती हैं हिमालय की बर्फ से ढ़की चोटियां। यहां दूर-दूर तक टहलने का मजा लिया जा सकता है। युसमर्ग से एक नदी बहती है जिसे दूधगंगा कहा जाता है। युसमर्ग के पास ही निलनाग झील भी देखी जा सकती है। युसमर्ग श्रीनगर से करीब 50 किलोमीटर दूर है।

दूधपत्री

दूधपत्री

दूधपत्री
कश्मीर घाटी में पीर-पंजाल की पहाड़ियों पर 2700 मीटर की ऊंचाई पर है दूधपत्री। दूधपत्री एक अनजानी सी खूबसूरत जगह है।यहां के दूर-दूर तक फैले हरे घास के मैदान पहली ही नजर में मन मोह लेते हैं। ऐसा लगता है जैसे मखमली गलीचा बिछा हो। दूधपत्री के पास ही एक नदी बहती है। दूर से देखने से इसका साफ पानी दूध जैसा सफेद नजर आता है। घने देवदार के जंगल के बहती यह नदी बहुत सुन्दर नजर आती है। दूधपत्री श्रीनगर से करीब 40 किलोमीटर दूर है।

बेतला राष्ट्रीय उद्यान

बेतला राष्ट्रीय उद्यान

बेतला राष्ट्रीय उद्यान
देश के पहले नौ टाईगर रिजर्व में से एक है झारखंड का बेतला राष्ट्रीय उद्यान। इसे 1974 में टाईगर रिजर्व में शामिल किया गया था। यहां बाघ और हाथी समेत बहुत तरह के जानवर देखे जा सकते हैं। यहां गर्म पानी के स्रोत और झरने भी हैं। इसी जगंल में ऐतिहासिक पलामू किला भी है। यह किला झारखंड की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। इसे 16वीं सदी में चेरो राज्य के मेदिनी राय ने बनवाया था। इस किले पर पास एक अधबना किला भी है। बेतला राष्ट्रीय उद्यान रांची से 156 किलोमीटर दूर है।

किरीबुरू

किरीबुरू

किरीबुरू
अगर आपको जंगलों से प्यार है तो किरीबुरू आपके लिए ही है। झारखंड का यह इलाका साल के घने जंगलों के लिए जाना जाता है। यहां सारंडा का जंगल एशिया का सबसे बड़ा साल का जंगल है। स्थानीय भाषा में सारंड़ा का मतलब है सात सौ पहाड़ियों का घर। यह जंगल कई तरह के जंगली जानवरों और पेड-पौधों का भी ठिकाना है। यहां उड़ने छिपकली और हाथी मिलते हैं। किरीबुरू की पहाड़ी से सूर्यास्त का शानदार नजारा दिखाई देता है। यह लौह अयस्क की खदानों के लिए भी प्रसिद्ध है। किरीबुरू जमशेदपुर से 160 किलोमीटर दूर है।

पारसनाथ

पारसनाथ


पारसनाथ
जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थान है पारसनाथ पर्वत। पारसनाथ झारखंड के गिरड़ीह जिले में पड़ता है। धार्मिक स्थान होने के साथ पारसनाथ प्राकृतिक सुन्दरता से भी भरा हुआ है। घने जंगलों से घिरा यहां का मुख्य मंदिर झारखंड की सबसे ऊंची पारसनाथ चोटी पर बना है। यह चोटी समुद्र तल से 4480 फीट की ऊंचाई पर है। माना जाता है कि जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ सहित 20 तीर्थंकरों ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था। पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए 9 किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती है।पारसनाथ रांची से 150 किलोमीटर दूर है।

मलूटी

मलूटी


मलूटी
झारखंड के दुमका जिले का ऐतिहासिक गांव है मलूटी। यह गांव टेरिकोटा के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां 300 साल पहले 108 मंदिर बनाए गए थे। वर्तमान में इनमें से 72 मंदिर ही सुरक्षित बचे हैं।अधिकांश मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं। मंदिरों की दीवारों पर रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के दृश्य उकेरे गए हैं। इन मंदिरों को अनूठी स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है। पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा मलूटी छोटा नागपुर पठार के सिरे पर है। यह इलाका घने जगंलों, नदियों और जंगलों से भरा है। मलूटी रांची से 370 किलोमीटर दूर है।

मैक्लुस्कीगंज

मैक्लुस्कीगंज


मैक्लुस्कीगंज
इतिहास की अनोखी धरोहर है झारखंड का मैक्लुस्कीगंज।यह छोटा सा कस्बा एंग्लो-इंडियन बस्ती हुआ करता था। इसे 1930 के आसपास कोलकाता के अर्नेस्ट टिमोथी ने बसाया था। एक समय यहां 400 एंग्लो-इंडियन परिवार रहा करते थे। उस दौर को बयान करते विशाल विक्टोरियन बंगलें आज भी यहां देखे जा सकते हैं। अब यहां कुछ ही एंग्लो-इंडियन परिवार बचे हैं। लेकिन बीत वक्त की महक को यहां महसूस किया जा सकता है। साल के जंगलों और पहाड़ी आबोहवा वाला मैक्लुस्कीगंज इतिहास तलाशने वाले के लिए बढिया जगह है। यह कस्बा रांची से 60 किलोमीटर दूर है।