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कोहका विल्डरनर्स कैंप ( Kohka wilderness camp) – जंगल में बना शांत कोना..

कोहका विल्डरनर्स कैंप ( Kohka wilderness camp) – जंगल में बना शांत कोना..

कोहका विल्डरर्नस कैंप तक पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया था। फरवरी के शुरूआती हफ्ते में हल्की ठंड बनी हुई थी इसलिए गांव के रास्ते में भी कोई खास हलचल दिखाई नहीं दी। पेंच नेशनल पार्क का सफर मेरे लिए खास था क्योंकि पिछले साल में मध्य प्रदेश के दो प्रसिद्ध नेशनल पार्क कान्हा और बांधवगढ़ को देख चुका था और इस साल के सफर की शुरूआत मध्य प्रदेश के ही एक और लोकप्रिय नेशनल पार्क पेंच से होने जा रही थी।

सबसे पहली चीज़ जो कोहका में ध्यान खींचती है वह है यहां की असीम शांति । पेंच के बफर ज़ोन से लगे इस रिजॉर्ट में दूर-दूर तक कोई आवाज नहीं थी। कोहका पहुंचते ही सबसे पहले सौरभ से मुलाकात हुई।
सौरभ ने कुछ साल पहले संजय के साथ मिलकर कोहका रिजॉर्ट की शुरूआत की थी।कहा जाता है कि दुनिया के कुछ बेहतरीन बिजनेस आइडिया यूं ही किसी बातचीत से शुरू हुए हैं। कोहका का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा। सौरभ और संजय दोनों की मुलाकात किसी जंगल के एक सफर के दौरान हुई। वहीं दोनों को किसी जंगल में रिजॉर्ट बनाने का ख्याल आया। एक जैसी सोच के कारण उन्होंने बात को आगे बढ़ाया और पेंच में कोहका की शुरूआत की। इसे शुरू करने के समय सौरभ आयरलैंड के एक लक्जरी होटल में अच्छी नौकरी कर रहे थे और संजय मुंबई में चार्टड अकाउंट थे। लेकिन जंगल का प्यार दोनों को पेंच ले आया।इन्होंने इसे एक ईको-फ्रेंडली रिजॉर्ट के तौर पर विकसित किया। कोहका गावं में बना होने के कारण इसे कोहका नाम दिया गया।

ईको- फ्रेंडली है कोहक

कोहका को एक ईको फ्रेंडली तरीके से बनाने और चलाने की कोशिश की गई है। यहां कुल तीन एकड़ के इलाके में केवल 12 कॉटेज बनाई गई हैं। इसलिए यहां कभी भी आयें भीड़ का अहसास नहीं होगा। रिजॉर्ट को बनाते समय वहां लगे किसी पेड़ को काटा नहीं गया। कुछ जगहों पर निर्माण को पेड़ के हिसाब से ही आकर दिया गया है।

रिजॉर्ट में बिजली की जरूरत को पूरा करने के लिए 7 किलोवॉट का सोलर सिस्टम लगाया है जिससे दिन हो या रात कैंप की ज्यादातर जरूरत पूरी हो जाती है।

कैंप को बनाने में जहां तक हो सके सारा सामान स्थानीय स्तर से ही जुटाने की कोशिश की गई है। यहां बहुतायात से मिलने वाली बांस जैसी चीजों का काफी इस्तेमाल किया गया है। कैंप को सजाने और रोशनी के लिए पुरानी कांच की बोतलों से लैंप बनाए गए हैं तो रास्तों पर रोशनी देने के लिए लगी छोटी एलईडी लाइटों को खुद सौरभ ने कैंप में ही तैयार किया है। यहां तक कि बाथरूम में नहाने का शॉवर भी बांस से ही बनाया गया है।

कमरों में गर्म पानी देने के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाला गीजर लगाया गया है।मैं वहां पांच दिन था । पांच दिनों में से एक दिन सुबह से शाम तक बरसात होती रही और दूसरे दिन भी बादलों में पीछा नहीं छोड़ा लेकिन उसके बाद भी तीसरे दिन इस्तेमाल के लायक गर्म पानी मौजूद था।

जैविक खेती
Organic farming at Kohka

यहां रिजॉर्ट के काफी बड़े हिस्से में जैविक खेती की जाती है। रिजॉर्ट में इस्तेमाल की जाने वाली सब्जियों का बड़ा हिस्सा इस खेती से पूरा किया जाता है। जरूरत पड़ने पर सामान को पास के गांव से ही खरीदा जाता है। इस लिए आप निश्चिंत होकर यहां ऑर्गेनिक खाने का मजा उठा सकते हैं।

कोहका का खाना
कोहका के खाने में भी आपको एक सादगी और अलग सा स्वाद मिलेगा। यह स्वाद कुछ तो यहां की ऑर्गेनिक सब्जियों के कारण है और कुछ उस प्यार के कारण जिससे यहां खाना बनाया जाता है। पहले की दाल, सब्जी और रोटियों का स्वाद जुबान पर थी कि अगली सुबह पोहा, इडली के नाश्ते ने तो रंग ही जमा दिया। अगले चार दिनों तक अलग – अलग तरह की सब्जियां और दालें खायीं। सभी में स्वाद और देसीपन था। एक दिन दोपहर में खासतौर से महाराष्ट्र का खाना बनाया गया जिसमें झुमका, भाकर और पूरन पोली शामिल था। सौरभ से मैंने पूछा कि विदेशी मेहमानों के लिए क्या कॉन्टीनेन्टल खाने की व्यवस्था भी है तो उन्होंने कहा कि वे सभी मेहमानों को भारतीय खाना ही खिलाते हैं और सभी इसे प्यार से खाते हैं।

कोहका के कमरे

कोहका के कॉटेज

यहां कुल 12 कमरे हैं जिन्हें कॉटेज की तरह बनाया गया है। कमरों में आपकी जरूरत का फर्नीचर रखा गया है। बांस के बनीं लैंप से कमरे को सजाया गया है जिन्हें स्थानीय कारीगरों से ही तैयार करवाया गया है।
कमरे में सोने के लिए लकड़ी के पलंग लगाने की बजाए सीमेंट से एक चबूतरा बनाया गया है जिस पर गद्दा लगाया गया है। कमरे में पेंच में पाये जाने वाले जानवरों और पक्षियों की तस्वीरें लगी हैं।


कमरों के बाहर बैठने के लिए बरामदा है जहां रिजॉर्ट की हरियाली और यहां के पक्षियों को देखते हुए समय बिताया जा सकता है।
कमरे में आराम का सारा सामान है और सब कुछ बहुत सरल तरीके से सजाया गया है।

समय बिताने की जगहें


तीन एकड़ के इस रिजॉर्ट काफी पेड़ पौधे हैं और अगर आपको तितलियों और पक्षियों को तलाश करने का शौक है तो यह समय बिताने का सबसे अच्छा जरिया है।
यहां एक लाइब्रेरी और टीवी रूम है जहां काफी किताबें और मासिक पत्रिकाएं रखी गई हैं। खेलने के लिए कैरमबोर्ड और लूडो जैसी चीजें भी हैं। मैंने भी दोस्तों के साथ कैरम बोर्ड पर हाथ आजमाया। कैरम खेलते हुए घंटो कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।

लाइब्रेरी और टीवी रूम

यहां एक बड़ा स्विमिंग पूल भी है। गर्मी के मौसम में यहां आ रहे हैं तो शाम के समय स्विंमिग पूल के ठंड़े पानी में समय बिताया जा सकता है।

क्या क्या कर सकते हैं

पेंच नेशनल पार्क की सफारी तो यहां का मुख्य आकर्षण है लेकिन उसके अलावा भी यहां काफी कुछ किया जा सकता है। कोहका पेंच के बफर ज़ोन से लगा है। यहां पास के जंगल में नेचर वॉक की जा सकती है। पहुंचने के अगले दिन सुबह 6 बजे हम लोग जंगल में नेचर वॉक के लिए निकले। कैंप के नेचर गाईड अनिल हमारे साथ थे। पास के गांव के रहने वाले अनिल को जंगली जानवरों, पेड़ पौधों और पक्षियों की बहुत अच्छी जानकारी है। वे हर चीज की जानकारी देते हुए चलते हैं। भले ही लंबा चलना था लेकिन उनसे बातें करते हुए और जंगल की सुन्दरता को देखते हुए पता ही नहीं चला कि समय कब बीत गया। हमें तो जंगल में एक दहाड़ भी सुनाई दी हालांकि अनिल ने उसे नहीं सुना इसलिए कहा नहीं जा सकता कि वहां बाघ था या नहीं । हमारी नेचर वॉक पास की कोहका झील पर खत्म हुई।

कोहका झील..

कोहका कैंप से कुछ ही दूरी पर कोहका झील है बहुत साल पहले इसे आसपास के इलाके की पानी की जरूरत पूरा करने के लिए बनाया गया था। कोहका से जंगल के रास्ते झील तक जाकर लंबा समय बिता सकते हैं। आज यह झील पक्षियों को देखने की सबसे बढ़िया जगह है। फरवरी का महीना होने का कारण काफी प्रवासी पक्षी भी यहां थे। मैंने यहां दो दिन में करीब 30-35 तरह के पक्षियों को देखा।इस नेचर वॉक में आदिवासी गांव की जिंदगी को भी करीब से देखा जा सकता है।

शाम को कोहका झील पर चाय और पकौडे़ो का साथ..

एक दिन बाद हम शाम को फिर से झील की सैर पर गए और इस बार सैर के साथ कोहका कैंप ने वहां शाम के चाय और नाश्ते का इंतजाम भी किया था। शाम के ढलते सूरज के साथ झील के किनारे चाय पीने का अलग ही मजा है। मन करता है कि वहीं बैठे रहें। शाम की सैर में संजय भी हमारे साथ थे। उन्हें भी फोटोग्राफी और पक्षियों की बढिया जानकारी है। उनसे पता चला कि कैंप से पास ही एक पेड़ पर उड़न गिलहरी (Flying Squirrel) का बसेरा है। अंधेरा होने पर उसे देखने का मौका मिल सकता है। अंधेरे में काफी देर इंतजार करने पर हमें वह दिखाई दे ही गई। घने अंधेरे और उसके तेजी से उड़ने के कारण उसका फोटो ले पाना संभव नहीं हुआ।

कोहका के पास पचधार नाम का गांव है। यह कुम्हारों का गांव है। यहां मिट्टी के बर्तन और दूसरे समान बनाये जाते हैं। यहां जाकर मिट्टी के बर्तन बनाने में हाथ आजमाया जा सकता है। टेरिकोटा का सामान पंसद करते हैं तो यहां की यादगार के तौर पर सजावटी सामान भी खरीद सकते हैं।

जंगल सफारी —
पेंच आने का असली मकसद तो जंगल सफारी ही होता है। यहां कैंप के पास पेंच नेशनल पार्क का तूरिया गेट है। जहां से सुबह और शाम की सफारी की जा सकती है। यह जंगल बाघ के लिए जाना जाता है लेकिन बाघ ना भी मिले तो दूसरे जानवरों और प्रकृति की सुन्दरता का मजा उठाइये। मुझे भी इस बार बाघ नहीं दिखाई दिया। सफारी आप मध्य प्रदेश वन विभाग की वेबसाइट से बुक कर सकते हैं या पहले से रिजॉर्ट के बता दें तो वे भी इसमें मदद कर सकते हैं।

साथी ट्रेवल ब्लागर- अभिनव, मंजूलिका और स्वाति के साथ पेंच सफारी पर

पेंच नेशनल पार्क का एक गेट है खुरसापार। यह गेट पेंच नेशनल पार्क के महाराष्ट्र वाले हिस्से में पड़ता है। यहां के लिए सफारी की जा सकती है।
पेंच नेशनल पार्क दो राज्यों मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर है। इसका इलाका दोनों ही राज्यों में बंटा हुआ है। दोनों ही राज्यों के इलाकों में सफारी उपलब्ध है।

कोहका विल्डरनर्स कैंप एक फाउन्डेशन भी चलाता है। जिसके जरिए पास के आदिवासी गावों की शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए काफी काम किया जाता है। फाउन्डेशन गांव के सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्षा लगाकर उन्हें पढ़ाने और कंप्यूटर शिक्षा देने का काम भी करता है।
कोहका फाउन्डेशन गांव की महिलाओं के साथ मिलकर ऑर्गेनिक उत्पाद जैसे अचार, पापड, जैम,मुरब्बे , साबुन , शैंपू भी बनाता है। कोहका की रसोई और यहां कॉटेज में यहीं के बने सामान, शैंपू और साबुन इस्तेमाल किए जाते हैं।
इस तरह कोहका कैंप पर्यटकों की जरूरतों को पूरा करने के साथ स्थानीय समाज के विकास में भी योगदान करने की कोशिश कर रहा है। कोहका में काम करने वाले सभी लोग भी आसपास के गावों से ही हैं।

कैसे पहुंचे —-

पेंच नेशनल पार्क नागपुर से करीब 90 किलोमीटर दूर है। नागपुर देश के सभी हिस्सों से रेल और हवाई सेवा से जुड़ा है। नागपुर से पेंच के लिए टैक्सी की जा सकती है।

कब जायें —-
भारत में आमतौर पर सभी नेशनल पार्क मानसून के समय जुलाई से सितम्बर के बीच बंद रहते हैं। इसके अलावा किसी भी समय यहां आया जा सकता है। वैसे गर्मी में अप्रेल से जून का समय जंगली जानवरों के देखने के लिए बेहतर माना जाता है। अगर पक्षियों और खासतौर से प्रवासी पक्षियों को देखना चाहते हैं तो सर्दियों के मौसम में यहां आइये।

( This trip was organised by Kohka wilderness camp )

कुछ तस्वीरें….

सिंगीनावा जंगल लॉज – जंगल का असली ठिकाना

सिंगीनावा जंगल लॉज – जंगल का असली ठिकाना

कान्हा नेशनल पार्क आए मुझे कुछ ही घंटे हुए थे। कुछ आराम करने के बाद रात के खाने के लिए अपने कॉटेज से बाहर निकला तो कुछ सरसराहट सुनाई दी। टार्च साथ रखने की हिदायत थी तो टार्च आवाज की तरफ घुमाई और देखा 8-10 हिरणों का एक झुंड वहां घूम रहा है। मेरे और उनके बीच मुश्किल से 5-7 फीट का ही फासला रहा होगा। कान्हा के जंगली जीवन से मेरा परिचय कुछ इस नजदीकी से हुआ। अगले चार दिन यहीं रूकना था तो आस भी बंधी की कमरे के बाहर ही यह सब दिखाई दे रहा है तो जंगल में पता नहीं क्या मिल जाएगा।

कान्हा से इतना नजदीक से परिचय करवाने के लिए सिंगीनावा जंगल लॉज को पूरा श्रेय जाता है। जैसा नाम वैसा ही दर्शन । सिंगीनावा जंगल लॉज कहने भर के लिए जंगल लॉज नहीं है बल्कि असल जंगल ही है। कुछ दूर-दूर बने कॉटेजों को एक पल के लिए भुला दें तो वहां ऐसा और कोई निशान नजर नहीं आता जो उस जगह को जंगल ना साबित करता हो।

कान्हा के बफर जोन से लगे सिंगीनावा के पास 60 एकड की जमीन है।जिसमें कुल मिलाकर 12 कॉटेज है और एक मुख्य इमारत। इसके अलावा पूरे इलाके में जंगल को प्राकृतिक स्थिति में बना कर रखा गया है। वही पेड वही पौधे जो आपको कान्हा में दिखाई देंगें। इसलिए जंगल से इसमें ना तो हमें कोई फर्क समझ आता है और ना ही शायद जानवरों को। वहां पेड़ लगाने का काम लगातार किया जाता है और रिजॉर्ट मे आमतौर पर लगने वाले सजावटी पेडों की जगह स्थानीय पेडों को ही उगाया जाता है।
जंगल के बफर ज़ोन से लगा होने के कारण हिरण ही नहीं यहां कई तरह के जंगली जानवर अक्सर दिखाई देते हैं। पता चला कि लॉज में जंगली सूअर और तेंदुए भी अक्सर दिखाई दे जाते हैं। एक बार बाघ भी आस-पास ही दिखाई दिया था। जंगल से इतनी करीब रिश्ता होने पर जंगल में कुछ बिताने का मजा दुगना हो जाता है।

सुबह होने पर यहां के नैचुरलिस्ट सचिन शर्मा के साथ बर्ड वाचिंग पर निकलना था। लेकिन बर्ड वाचिंग के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं पडी। लॉज और उसके साथ बहती नदी के किनारे इतनी तरह की चिड़िया दिखाई दे जाती है कि लगता है जैसे जंगल में हो। हम सुबह 6 बजे ये सोचकर निकले थे कि कुछ देर में देखकर वापस आ जाएंगें। लेकिन सिंगिानावा और उसके पीछे के इलाके को देखते हुए 3 घंटे ऐसे बीते की पता ही नहीं चला।

इतनी तरह की रंग बिंरगी चिडिया दिखाई दी कि आने का मन ही नहीं किया। वापस आकर सचिन ने गिनती की तो करीब 35 तरह की अलग अलग चिड़ियों को हमने उन तीन घंटों में देख लिया था । सचिन ने बताया कि एक बर्ड वाचर ने यहां 95 प्रजाति की चिडियों को देखा था। यानि मेरा असली जंगल का सफर सिंगीनाव से ही शुरू हो गया था । और मजे की बात सफारी तो अभी किया भी नहीं था।

12 कॉटेज 2 बंगले

सिंगीनावा में रहने के लिए 12 कॉटेज और 2 बंगले बनाए गए हैं। जिनका नाम जंगली जानवरों के नाम पर रखा गया है। मेरा वाला कॉटेज भालू के नाम पर था। एक बडा सा कमरा जिसे बेहद खूबसूरती से सजाया गया था। खास बात यह की इसे सजाने में मध्य प्रदेश के आदिवासी हस्तशिल्प का बखूबी इस्तेमाल किया गया था। कमरे में चीजों को इतनी सही तरह से रखा गया है कि वे कमरे में ठूंसी हुई नहीं लगती। कमरा खासा बडा है इसलिए जगह की कमी का अहसास नहीं होता।

साथ ही कमरे में जंगली जनजीवन के बारे में रखी गई ढेरों किताबें इस और भी खास बनाती हैं। सफारी पर निकलने से पहले अगर कुछ पन्ने पलट लिए जाएं तो जंगल के सफर का मजा बढ जाएगा। कान्हा नेशनल पार्क के बारे में काफी किताबें वहां रखी गई थी।

सिंगीनावा को प्रकृति के साथ अनुकूल बनाने की कोशिश की गई है इसलिए कमरे में प्लास्टिक की बोतलों की जगह तांबे की बोतलों में फिल्टर पानी भरा जाता है। अगर फिर भी जरूरत हो तो प्लास्टिक की बोतल मौजूद है लेकिन जंगल में है तो प्रकृति के साथ जीने की एक कोशिश तो की जा सकती है। इसके अलावा अगर बडे परिवार के साथ आ रहे हैं तो सिंगीनावा में एक 4 कमरों का और एक 2 कमरों का बंगला भी मौजूद हैं। जहां परिवार के साथ समय बिताने का अच्छा मौका मिलेगा।

खाना-पीना

खाने के मामले में भी सिंगीनावा कम नहीं है। यहां चार दिन रहने के दौरान उत्तर भारतीय, चायनीज, कांटीनेंटल सभी तरह का खाना खाया। लेकिन किसी के स्वाद में कोई कमी नहीं । रात के समय खुले आसामान के नीचे , ठंडी हवा से झोकों में जो भी खाने को मिले उसका स्वाद अलग ही आएगा।

एक दिन दोपहर का खाना चाट के नाम रहा। हर तरह की चाट वो भी अपने खालिस स्वाद के साथ ।
लेकिन एक बात किए बिना मेरी खाने की चर्चा अधूरी ही रहेगी और वो है यहां बनने वाली मिठाईयां। यहां जो मिठाई खाई उनका स्वाद तो जैसे अभी भी जुबान पर ही है। मैंने यहां खाई Sticky Toffee muffin और बनोफी ( Banoffee cake) का स्वाद भूलना मुश्किल है। अभी लिखते हुई ही जैसे वह बनोफी मेरे मुंह में घुली जा रही है। मैं सिर्फ वह बनोफी और स्टिकी मफिन खाने के लिए फिर से सिंगीनावा जा सकता हूँ।

Sticky toffee Muffin

कला संग्राहलय – सिंगीनावा की खासियत

रिजोर्ट हो या होटल वहां आपके मनोरंजन के लिए काफी मिल जाता है। लेकिन यह शायद ही सुना हो कि किसी रिजार्ट या होटल में कोई कला संग्राहलय बना है। सिंगीनावा इसलिए सबसे अलग है जहां एक कला संग्राहलय बनाकर स्थानीय गोंड कला को संवारने और एक जगह लाने की कोशिश की गई है। इसे देखना अलग अनुभव है जहां स्थानीय कलाकारों के साथ देश के कुछ नामी कलाकारों की कला के नमूनों को भी सजाया गया है।

लेकिन सिर्फ कला संग्राहलय की क्या बात करें। पूरा सिंगीनावा लॉज ही किसी कला संग्राहलय जैसा लगता है। कला के नमूनों को हर तरफ बेहद सुंदरता के साथ सजाया गया है। दीवारों पर गोंड चित्र बने हैं जिन्हें स्थानीय कलाकारों ने बनाया है । कमरों और हॉल डोकरा मेटल आर्ट के नमूनों से सजे हैं। जगह – जगह पानी के फव्वारे हैं जिनके साथ पत्थर और टेरिकोटा के हस्तशिल्प रखे गये हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी कलाकार के घर ही आ गए हों। रिस्पेशन से लेकर , रेस्टोंरेंट , बार या छत पर खुले में बैठने की जगह सब कुछ सजा हुआ है।


आपको मन बहलाने के लिए सिंगीनावा में एक स्विंमिंग पूल है। जो किसी इंफीनिटी पूल का सा अहसास देता है। लगता है जैसे पूल का एक सिरा जंगल में कहीं खत्म होता है। मैंने खुद काफी समय यहां बिताया।

यहां एक स्पा भी है जहां हर तरह की मसाज ली जा सकती है। स्थानीय लोगों तक रोजगार पहुंचे इसके लिए सिंगीनावा में भी कई तरह की पहल की जा रही है। यहां के स्पा के लिए भी सिंगीनावा ने गांव के स्थानीय लड़के और लड़की को चुना । उसके बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए नेपाल के काठमांडू भी भेजा गया।

सिंगीनावा के नेचुरलिस्ट

सिंगीनावा के नेचुरलिस्ट यहां की खासियत हैं । उनके साथ जंगल में घूमने से जंगल का मजा दूगना हो जाता है। मुझे डेविड और सचिन के साथ घूमने का मौका मिला। जंगल, वहां के जानवरो, कीट-पतंगों और चिडियों के बारे में उनकी जानकारी अद्भुत है। डेविड ड्रेगन फ्लाई और मेंढ़कों के विशेषज्ञ हैं। जंगली जीवन पर डेविड की किताब भी प्रकाशित हो चुकी है। सचिन चिडियों में महारथ रखते हैं। उन्हें किसी चिडिया को देखने की जरूरत नहीं लगती बस आवाज को सुनते ही बता देते हैं कि कौनसी चिडिया है।

कैसे पहुंचे-

हवाई मार्ग – कान्हा नेशनल पार्क अगर हवाई रास्ते से आना हो तो जबलपुर, रायपुर या नागपुर के हवाई अड्डे का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहां से सड़क के जरिए कान्हा में सिंगीनावा पहुंचा जा सकता है। मैं नागुपर का हवाई अड्डे से सड़के के जरिए सिंगीनावा पहुंचा।
कान्हा से जबलपुर 205 किलोमीटर , नागपुर 305 किलोमीटर और रायपुर 255 किलोमीटर दूर है।

रेल मार्ग –
अगर रेल से आना चाहते हैं तो जबलपुर, रायपुर या नागपुर स्टेशन से यहां पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन गोंदिया है जो 180 किलोमीटर दूर है।

जाने का सही समय –
कान्हा नेशनल पार्क 1 अक्टूबर से 30 जून तक खुलता है। अगर बाघ को देखने की इच्छा है तो अप्रेल , मई, जून जैसे गर्मी के मौसम में जाने का कार्यक्रम बनाएं।

(This trip was sponsored by Singinawa jungle lodge. Views expressed here are based on my experiences.)