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दुबई फ्रेम- दुबई की नई पहचान

दुबई फ्रेम- दुबई की नई पहचान

दुबई ऊँची इमारतों का शहर है। शहर के नए इलाके में स्टील और काँच की आसमान छूती इमारतों का जाल बिछा है। हर इमारत ऊँचा निकलने के दौड़ में दूसरे से होड़ करती नज़र आती है। लेकिन ऊँचा जाना ही काफी नहीं है। यहाँ आपको हर उस शक्ल की इमारत नज़र आ सकती है जैसा कि आप सोच सकते हैं। सीधी, टेढ़ी, गोल, तिरछी, बस आप कोई आकार सोचिए और पूरी उम्मीद है कि उस आकार की कोई इमारत या तो बन चुकी होगी या कहीं ना कहीं तैयार हो रही होगी। इन्हीं इमारतों में कुछ ऐसी हैं जो इस शहर की पहचान को नया रंग दे देती हैं। कुछ समय पहले तक समुद्र के बीच बने दुनिया के सबसे मंहगे होटलों में से एक बुर्ज़-अल-अरब ने यह भूमिका निभाई । उसके बाद दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज़-खलीफ़ा सामने आई और अब बारी है दुबई फ्रेम की।

बुर्ज़-अल-अरब
बुर्ज़-खलीफ़ा
दुबई की ऊँची इमारतें

दुबई फ्रेम दुबई के नक्शे पर बनी ताज़ातरीन इमारत है। अक्सर लोग दुबई को बिना आत्मा वाला कांच की इमारतों का शहर कहते हैं। यह भी कहा जाता है कि वास्तुशिल्प के नज़रिए से दुबई में ऐसा कुछ नहीं है जैसा आपको भारत के प्राचीन मंदिरों, मिस्र के पिरामिड़ों या यूरोप की पुराने गॉथिक चर्चों या इमारतों में दिखाई देता है। लेकिन क्या पुराना होना ही किसी की पहचान के लिए काफी है। वे पुरानी इमारतें भी कभी तो जवान रही होंगी। आज का दुबई अब उसी काम को कर रहा है। दुबई अब जवान हो रहा है। दुबई रोज अपना इतिहास लिख रहा है , हर रोज अपने भविष्य का निर्माण कर रहा है। भले ही आज ना हो लेकिन हो सकता है 100-200 या 300 वर्षों के बाद यही इमारतें प्राचीन स्थापत्य का हिस्सा हो जाएँ। तो इतनी भूमिका के बाद इस लेख में दुबई फ्रेम की बात हो जाए।

दुबई फ्रेम

दुबई फ्रेम को नाम उसके आकार के कारण मिला है। इसका आकार किसी तस्वीर के फ्रेम जैसा है। देखने में लगता है कि एक विशाल फ्रेम दुबई के बीचों बीच खड़ा है। इसमें दो विशाल खंभे हैं जिन्हें ऊपर से एक लंबे ब्रिज या स्काई डेक से मिला दिया गया है। इस तरह से देखने में एक आयाताकार फ्रेम जैसा नज़र आता है। इस खाली फ्रेम को खुद दुबई अपनी जीती जागती तस्वीर से भरता है। फ्रेम के एक तरफ पुराना और दूसरी तरफ नया दुबई बसा है। कह सकते हैं कि फ्रेम के एक तरफ से नई दुबई तो दूसरी तरफ से पुरानी दुबई की तस्वीर दिखाई देती है। दुबई फ्रेम दुबई की तस्वीर से आपको रूबरू करवाता है। फ्रेम की कंक्रीट से बनी बाहरी दीवारों को सुनहरे रंग के स्टील से ढका गया है।

सुनहरे स्टील से ढकी दीवारें

इसे बनाने के पीछे सोच यह है कि दुबई का भूत, वर्तमान और भविष्य लोगों को एक साथ दिखाई दे जाए। इमारत में दाखिल होने के बाद आप दॉंये हाथ की तरफ बनी लिफ्ट से ऊपर जाते हैं । इस लिफ्ट में दाखिल होने से पहले एक प्रदर्शनी में से होकर गुज़रते हैं। इस प्रदर्शनी में दुबई के पुराने इतिहास को दर्शाया गया है। मछली पकड़ने वालों और घुमंतू कबीलों की बस्ती के दुनिया के सबसे आधुनिक शहर में बदलने की कहानी यहाँ दिखाई गई है। यह दुबई फ्रेम का पहला चरण है जहाँ आप उसके भूतकाल से परिचित होते हैं। उसके इतिहास के बारे में जानते हैं।

यहां से निकलकर कर आप लिफ्ट लेते हैं। काँच की पारदर्शी लिफ्ट से दुबई से नज़ारे देखते हुए आप 150 मीटर ऊपर 48 मंजिल जितनी ऊंचाई पर पहुँचते हैं। लिफ्ट को इतनी ऊँचाई तय करने में 75 सेकंड का समय लगता है। यह फ्रेम का दूसरा चरण है। यहाँ दोनों खंभों को जोड़ने वाले ब्रिज या कहें कि स्काई डेक पर आप घूम सकते हैं। इतनी ऊंचाई से दुबई के शानदार नज़ारे दिखाई देते हैं। लिफ्ट से बाहर आने पर ब्रिज के दाँयी या दक्षिण दिशा की तरफ नई दुबई है जिसकी नुमाइंदगी करता बुर्ज खलीफा आपको दिखाई देता है। इस तरफ नज़र डालने पर ऊँची-ऊँची इमारतें दिखाई देती है। शहर के चौड़े हाईवे और तेज़ दौड़ती गाड़ियाँ दिखाई देती हैं।

ब्रिज या स्काई डेक
ब्रिज से दिखाई देता नया दुबई
ब्रिज से पुराने दुबई का नज़ारा

फ्रेम के बाँयी या उत्तर दिशा की तरफ आपको पुराने दुबई का इलाका दिखाई देता है। यह बर और देरा का इलाका है। जहाँ छोटी-छोटी इमारतें है और पुराने शहर की बसावट नज़र आती है। स्काई डेक पर कई स्क्रीन लगी हैं जिनसे दुबई शहर के बारे में जानकारी ली जा सकती है। इस स्काई डेक का ख़ास फीचर है इसके बीच बना काँच का फर्श। यहाँ आप जमीन से 150 मीटर ऊपर कांच के पारदर्शी फर्श पर चलने का मजा ले सकते हैं। इस फर्श पर पहला कदम रखने में डर लगता है क्योंकि नीचे अनंत गहराई दिखाई देती है। लेकिन एक बार इस पर आ गए तो फिर चलने में मज़ा आता है। मैंने देखा कि कई लोग चाह कर भी इस पर चलने की हिम्मत नहीं कर पाए। दुबई फ्रेम का ब्रिज वाला हिस्सा आपको दुबई के वर्तमान की तस्वीर दिखाता है। यहाँ हर तरफ से दुबई इतना सुन्दर दिखाई देता है कि इसे देखते हुए समय कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता है। अगर शाम के समय जाएँ तो डेक से डूबते सूरज का ख़ूबसूरत नज़ारा भी देखा जा सकता है।

पारदर्शी कांच का फर्श

इसके बाद आप दूसरी तरफ की लिफ्ट से नीचे जाते हैं। नीचे जाने के बाद आप एक हॉल में पहुंचते हैं। इस छोटे से हॉल में सामने एक स्क्रीन लगी है । इस स्क्रीन पर करीब 10 मिनट के लिए एक फिल्म चलाई जाती है। इसमें दिखाया जाता है कि आने वाले समय में कैसे दुबई में उड़न टैक्सी और ड्रोन काम करेंगे। किस तरह से भविष्य का दुबई तकनीक से लैस होगा। यह फ्रेम का तीसरा और आखिरी हिस्सा है जिसमें भविष्य के दुबई की होने वाली तस्वीर की झलक मिलती है। इसके बाद आप मुख्य इमारत से बाहर निकलते हैं। बाहर निकलने के बाद बाहर म्यूज़िकल फाउंटेन लगा है जो थोड़ी- थोड़ी देर में चलता रहता है। अगर आप पूरे फ्रेम को कैमरे में कैद करना चाहते है तो बाहर बने बगीचे के बिल्कुल कोने में जा सकते हैं। यहाँ से लगभग पूरी इमारत कैमरे में आ जाती है। शाम के वक्त दुबई फ्रेम पर रंगबिरंगी रोशनी भी की जाती है।

फ्रेम के बाहर बना म्यूज़िकल फाउंटेन
रात की रोशनी में फ्रेम

दुबई फ्रेम

टिकट-
दुबई फ्रेम के लिए 50 दिरहम का टिकट लगता है।
3 से 12 साल के बच्चों के लिए 20 दिरहम का टिकट लेना होगा। तीन वर्ष से छोटे बच्चों और वरिष्ठ लोगों के लिए टिकट फ्री है।

कब जाएँ-
दुबई फ्रेम पूरे साल सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक खुलता है। रमज़ान और सार्वजनिक छुट्टी के दिनों में समय में बदलाव हो सकता है।

कैसे पहुँचें-
अल-जफिलिया मैट्रो स्टेशन से पैदल पहुँचा जा सकता है। यह स्टेशन दुबई मैट्रो की रेड लाइन पर है।

*मेरे ब्ल़ॉगर साथी श्रीनिधि का दुबई फ्रेम पर अंग्रेजी में लिखा लेख पढ़ें

शारजाह में एक दिन

शारजाह में एक दिन

दुबई के सबसे करीब बसा अमीरात है शारजाह। मैंने दुबई जाने के दौरान एक दिन शारजाह के लिए रखा था। शारजाह में दुबई जितनी चमक-दमक नज़र नहीं आती लेकिन शारजाह में भी देखने के लिए काफी कुछ है। दुबई में रहने वाले मेरे दोस्त अमित ने मुझे वहां हाल में खुले आर्ट इंस्टालेशन रेन रूम के बारे में बताया था। उसका कहना था कि मुझे वह ज़रूर देखना चाहिए। तो मैंने शारजाह में एक दिन में देखने लायक मेरे पसंद की कुछ चीज़ों को तलाश किया। इसमें रेन रूम के अलावा शारजाह का म्यूज़ियम ऑफ इस्लामिक सिविलाइज़ेशन और वहां समुद्री किनारे का इलाका शामिल था। यह सभी जगहें आस पास ही थी। मेरे पास एक दिन का समय था इसलिए इससे ज़्यादा जगहें मैं नहीं देख सकता था। लेकिन अगर देखना चाहें तो इनके अलावा भी शारजाह में बहुत कुछ है। बहुत से म्यूज़ियम और आर्ट गैलरियां हैं जिन्हें देखा जा सकता है। म्यूज़ियम ऑफ इस्लामिक सिविलाइजेशन के आगे शारजाह का हेरिटेज इलाका है जिसे पुराने तरीके से ही संवारा गया है। मैंने देखने के लिए रेन रूम को सबसे पहले चुना।

दुबई से शारजाह कैसे जाएँ-

मैंने बर दुबई में ही रह रहा था इसलिए वहां अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) बस स्टेशन से मैंने शारजाह के लिए पब्लिक बस ली। यहाँ से बस नंबर E306 शारजाह के लिए ली जा सकती है। ये बस पूरे दिन मिलती रहती है। बस आरामदायक और एयरकंडीशन है इसलिए कोई परेशानी नहीं होती। बस की ख़ासियत यह है कि ये डबल डेकर बस है। मैं बस की ऊपरी मंजिल की सबसे आगे वाली सीट पर बैठा। ऊपर आगे की सीट से रास्ते का शानदार नज़ारा देखने को मिलता है। किराया है – 10 दिरहम और किराया चुकाने के लिए आपके पास Nol सिल्वर कार्ड होना चाहिए। करीब 1 घंटे में बस आपको शारजाह के अल जुबैल ( Al- Jubail) बस स्टेशन पर पहुँच जाते हैं।

शारजाह जाने वाली डबल डेकर बस

दुबई के पब्लिक ट्रांसपोर्ट और Nol कार्ड के बारे में जानने के लिए मेरा पुराना ब्लॉग पढ़ें- पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दुबई कैसे घूमें

रेन रूम –

शारजाह बस अड्डे से मैंने रेन रूम के लिए टैक्सी ली। किराया करीब 14 दिरहम आया। रेन रूम बस स्टेशन से बहुत दूर नहीं है। यह पास के अल मजर्राह इलाके में है। लेकिन गर्मी बहुत थी इसलिए मैंने टैक्सी लेना ठीक समझा आप चाहें तो पैदल भी जा सकते हैं। रेन रूम शारजाह में बना एक नया ठिकाना है। टैक्सी वाला उसे ठीक से तलाश नहीं कर पाया। गूगल मैप के सहारे से रेन रून पहुंचा। रेन रूम एक तरह का आर्ट इंस्टालेशन है। जिसे शारहजाह आर्ट फाउंडेशन ने तैयार किया है। यहां एक बड़ा हॉल है जिसके बीच एक बड़ी सी चौकोर जगह में छत से बरसात की तरह पानी गिरता रहता है। आप को उस पानी के बीच चलना होता है। छत पर 3डी ट्रैकिंग कैमरे लगे हैं। कैमरों के सेंसर आपको पहचान कर ठीक आपके ऊपर से हिस्से में पानी गिरना बंद कर देते हैं। तो आप तेज़ मूसलाधार बरसात के बीच में होते हैं लेकिन आप पर पानी नहीं गिरता। यही रेन रूम की ख़ासियत है। यह विज्ञान, कला और प्रकृति का मेल है। यहाँ ध्यान यह रखना है आप बहुत धीरे चलें। तेज़ चलने पर सेंसर आपके कदमों को सही से नहीं पकड़ पाता और आप भीग जाते हैं। एक अंधेर कमरे में बरसते पानी के बीच धीर-धीरे चलने में बहुत सूकून महसूस होता है। इस जगह का अनुभव कुछ अलग ही है। कमरे में अंधरा है और बस एक किनारे पर लगे बल्ब से ही हल्की रोशनी मिलती है। पहली बार देखने में तो यह कुछ ख़ास नहीं लगता लेकिन जब आप इसे करना शुरू कर देते हैं तो बाहर निकलने का मन नहीं करता । मुझे यहाँ काफी मज़ा आया। अगर शारजाह आ रहे हैं तो रेन रूम ज़रूर आएँ।

रेन रूम
रेन रूम
रेन रूम

टिकट – 25 दिरहम
समय- शनिवार से गुरूवार – सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक
शुक्रवार- शाम 4 बजे से रात 11 बजे तक

शारजाह म्यूज़ियम ऑफ इस्लामिक सिविलाइजेशन-

रेन रूम से निकल कर मैं पहुंचा शारजाह के म्यूज़ियम ऑफ इस्लामिक सिविलाइज़ेशन पर। यह म्यूज़ियम समुद्र किनारे के साथ लगी सड़क पर बना है जिसे कॉर्निश रोड कहा जाता है। रेन रूम से बस 5 मिनट पैदल चल कर यहाँ पहुंचा जा सकता है। म्यूज़ियम की इमारत का बाहरी हिस्सा बहुत शानदार है। इसे इस्लामी वास्तुशैली से बनाया गया है। इमारत के फोटो अच्छे आते हैं। इसके सामने सड़क को पार करके समुद्री किनारे के पास से पूरी इमारत को एक फ्रेम में कैद किया जा सकता है। यहां इस्लाम धर्म और उससे जुड़ी संस्कृति से सम्बन्धित 5000 से ज़्यादा प्राचीन वस्तुएं रखी गई हैं। इनमें किताबें, धार्मिक वस्तुएँ, कपड़े, हथियार, सिक्के और रोजमर्रा के सामान शामिल हैं। यहां इन चीजों रखने के लिए अलग-अलग गैलरियाँ बनाई गई हैं। यहां एक गैलरी विज्ञान और तकनीक के विषय पर बनाई गई है। एक जमाने में अरब के बगदाद जैसे शहर ज्ञान और विज्ञान का केन्द्र हुआ करते थे। मैं उस विकास को समझना चाहता था लेकिन जब मैं पहुँचा उस समय गैलरी में कुछ सुधार का काम चल रहा था जिसके कारण यह गैलरी बंद थी। लेकिन उसके अलावा भी यहां बहुत कुछ था जिसे मैने देखा। यह म्यूज़ियम काफी बड़ा है इसिलए पूरा म्यूज़ियम देखने में काफी समय लगेगा। सही तरीके से देखना हो तो 3-4 घंटे चाहिए।

इसे देखने के बाद मैंने कुछ समय समुद्र के किनारे की सड़क पर टहलते हुए बिताया। यहां आप नावों को आते-जाते हैं। शाम होने लगी थी इसलिए मैंने फिर से टैक्सी ली और बस स्टेशन पहुँचा। बस स्टेशन से बस लेकर फिर अल घुबाईबा आ गया।

कोर्निश रोड, शारजाह


अगर आपके पास समय है तो म्यूज़ियम के आगे निकलकर शारजाह के पुराने इलाके में जा सकते हैं। यहां हार्ट ऑफ शारजाह नाम का इलाका है जहां पुरानी इमारतों में बहुत से म्यूज़ियम हैं जिन्हें देखा जा सकता है। बस स्टेशन के सामने शारजाह का सेन्ट्रल सूक है। इस खूबसूरत बाज़ार में भी वक्त बिताया जा सकता है। इसे बाहर से ख़ूबसूरत नीली टाइल्स से सजाया गया है इसलिए इसे ब्लू सूक भी कहा जाता है। यह संयुक्त अरब अमीरात के सबसे बड़े मॉल्स में से एक है।

शेख़ ज़ायद मस्जिद, अबू धाबी

शेख़ ज़ायद मस्जिद, अबू धाबी

संयुक्त अरब अमीरात(UAE) की राजधानी है अबू धाबी। संयुक्त अरब अमीरात सात अमीरातों से मिल कर बना है और अबू धाबी उनमें सबसे महत्वपूर्ण अमीरात है। आमतौर से संयुक्त अरब अमीरात में घूमने के लिए दुबई सबसे लोकप्रिय जगह है। लेकिन दुबई के पास के दूसरे शहरों जैसे शारजाह और अबू धाबी में भी देखने के लिए काफी कुछ है। मेरी दुबई यात्रा के दौरान मैंने एक-एक दिन इन दोनों शहरों के लिए रखा था। आज बात करते हैं अबू धाबी की। अबू धाबी दुबई से करीब 150 किलोमीटर दूर है। अबू धाबी सबसे अमीर अमीरात है लेकिन फिर भी दुबई के मुकाबले यहां हर तरफ सादगी दिखाई देती है। यहां पर्यटकों की वैसी भीड़ नहीं नज़र आती है जैसी आप दुबई में देखते हैं। लेकिन अब अबू धाबी भी बदल रहा है। यहां बनी शेख़ ज़ायद मस्जिद को देखने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं। इसके साथ ही यहां पास के यास आइलैंड पर बना एडवेंचर पार्क फरारी वर्ल्ड भी लोगों को आकर्षित कर रहा है। फ़रारी वर्ल्ड में F1 रेसिंग ट्रेक भी देखा जा सकता है। हाल ही में अबू धाबी में पेरिस का प्रसिद्ध लूवर म्यूज़ियम भी खुला है। हालांकि मैं बस यहां की विशाल शेख़ ज़ायद मस्जिद देखना चाहता था। यह दुनिया की कुछ सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। मुझे केवल मस्जिद ही देखनी थी इसलिए एक दिन का समय काफी था।

दुबई से अबू धाबी कैसे जाएं

दुबई से आबुधाबी की लक्जरी बस

आबू धाबी पहुंचने के लिए मैंने दुबई की पब्लिक बस को चुना। दुबई से अबू धाबी जाने के लिए बस सबसे सही और सस्ता साधन है। दुबई के अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन से आबुधाबी सेंट्रल बस स्टेशन के लिए सीधी बस मिलती है। आबूधाबी के लिए अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) से बस नंबर E100 और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन बस नंबर E101 मिलेगी। एक तरफ का किराया 25 दिरहम है। इन एयरकंडीशन आरामदायक बसों में आपको सफर का पता भी नहीं चलता। टिकट के लिए इन बसों में आपको Nol सिल्वर कार्ड लेना होगा। सिल्वर कार्ड 25 दिरहम का आता है जिसमें 19 दिरहम का ट्रैवल क्रेडिट मिलता है। ये बस हर बीस मिनट में अबू धाबी के लिए निकलती हैं। करीब दो घंटे में आप अबू धाबी पहुंच जाते हैं।

अबू धाबी बस स्टेशन से शेख जायद मस्जिद

अबू धाबी सेन्ट्रल बस स्टेशन

अबू धाबी सेन्ट्रल बस स्टेशन वेटिंग एरिया

बस से आप अबू धाबी के सेंट्रल बस स्टेशन पर पहुंचते हैं। इस बस स्टेशन के अंदर या ठीक बाहर बने स्टॉप से आपको अबू धाबी की बहुत सी जगहों पर जाने के लिए सिटी बस मिल जाएगी। अबू धाबी का बस स्टेशन साधारण सा है। बस स्टेशन में बड़ा सा हॉल है जहां वेटिंग एरिया , खाने-पीने की कुछ दुकानें और पूछताछ काउंटर बने हैं। मैंने पहले यहां कुछ खाया। मुझे यहां के अबू धाबी की शेख़ ज़ायद मस्जिद जाना था इसलिए मैंने पूछताछ काउंटर से वहां जाने वाली बस के बारे में पता किया। मुझे पता चला कि 54 नंबर की बस मुझे सीधे मस्जिद तक पहुंचा देगी। हालांकि पूछताछ पर बैठे व्यक्ति ने मुझे बस कहां से मिलेगी इसकी गलत जानकारी दी। बस स्टेशन के अंदर बहुत से प्लेटफार्म बने हैं जहां से सिटी बसें चलती हैं। लेकिन मेरी बस अंदर से नहीं बल्कि सड़क पर बने बस स्टॉप से मिलनी थी। कुछ देर इधर-उधर से पता करने पर मुझे पता चला की बस स्टेशन से बाहर निकल कर सड़क पर जाना होगा जहां से मुझे बस लेनी होगी।

बस रूट के बारे में बस स्टॉप पर दी गई जानकारी

टिकट वेंडिंग मशीन

बस का टिकट लेने के लिए बस स्टेशन पर वेंडिंग मशीन लगी थी। वहां टिकट के लिए कोई काउंटर नहीं था। बस वेंडिग मशीन में अपना आखिरी स्टेशन लिखिए, पैसे डालिए और आपका टिकट आपको मिल जाएगा। वेंडिग मशीन अगर इस्तेमाल ना कर पाएं तो कोई बात नहीं वहां खड़े गार्ड इसमें आपकी मदद कर देंगे। खैर टिकट लेकर मैं सड़क पर पहुंचा और वहां अपनी बस का इंतजार करने लगा। कुछ देर में बस आई उसका नंबर देख में बस में चढ़ गया। बस में कोई कंडेक्टर नहीं होता। आप पीछे के दरवाजे से बस के अंदर जाते हैं। दरवाजे के बाहर एक बटन लगा होता है उसे दबाने पर दरवाजा खुल जाता है। अंदर जाने पर आप दरवाजे के पास लगी मशीन पर अपनी टिकट छुआते हैं जिससे आपकी यात्रा दर्ज हो जाती है।

बस स्टॉप से दिखाई देती मस्जिद

पर्यटकों के लिए गोल्फ कार्ट

करीब 40-45 मिनट के सफर के बाद बस ने मुझे मस्जिद के पिछले गेट से कुछ दूरी पर उतारा। यहीं के मस्जिद की ख़ूबसूरती नज़र आने लगी थी। दोपहर का समय था इसलिए गर्मी बहुत थी। जहां उतरा वहां से गेट से होते हुए मस्जिद तक की दूरी काफी थी और तेज़ गर्मी में चलना मुश्किल लग रहा था लेकिन तभी मैंने देखा की गेट का पास एक गोल्फ कार्ट खड़ी थी। उसका ड्राइवर देखते ही समझ गया कि मैं मस्जिद देखने आया हूँ। उसने बैठने का इशारा किया। मैंने पूछा तो पता चला कि यह गोल्फ कार्ड गेट से मस्जिद के अंदर तक ले जाने के लिए चलाई जा रही है । इस सेवा के लिए कोई पैसा नहीं देना होता। मेरे पीछे कुछ दूसरे लोग भी मस्जिद की तरफ आ रहे थे। ड्राइवर ने उनको प्यार से बोला कि अगर वे पैदल ना चलना चाहें तो वे बस 5 मिनट इंतजार करें वह उनको लेने वापस आ रहा है। पांच मिनट में उसने मुझे मस्जिद के बाहर पहुंचा दिया। वहां सुरक्षा जांच के बाद आप मस्जिद में जा सकते हैं।

शेख़ ज़ायद मस्जिद

सुरक्षा जांच से निकलते ही दिखाई देती मस्जिद

मस्जिद के अहाते के आगे का मुख्य दरवाज़ा

सुरक्षा जांच से बाहर निकलते ही आपको पूरी मस्जिद दिखाई देती है। यहां से आप पूरी मस्जिद को कैमरे में कैद कर सकते हैं। सफेद संगमरमर से बनी मस्जिद दिन की रोशनी में बहुत खूबसूरत दिखाई देती है। मैंने कुछ फ़ोटो लिए और आगे बढ़ गया। पैदल रास्ते से होते हुए मस्जिद के मुख्य बरामद तक पहुंच सकते हैं। पैदल ना चलना चाहें तो यहां भी गोल्फ कार्ट की सुविधा उपलब्ध है। मुख्य बरामदे के बाहर पानी से भरे तालाब बने हैं जो ख़ूबसूरत लगने के साथ यहां की गर्मी में ठंडक देने का काम भी करते है। मुख्य बरामदा बहुत विशाल है और इसमें बने गुम्बज में शानदार कारीगरी की गई है। बरामदे से मस्जिद का विशाल अहाता दिखाई देता है। नमाज के समय भीड़ ज्यादा होने पर लोग यहां से भी नमाज पढ़ते हैं। अहाता इतना विशाल है कि इसमें 31000 लोग एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं। इसके फर्श को रंग बिरंगे संगमरमर से बने डिज़ाइनों से सजाया गया है। मस्जिद के अहाते से ही 4 बड़ी मीनारें दिखाई देती हैं। हर मीनार 106 मीटर ऊंची है। इस मस्जिद को बनाने में दुनिया भर की सभी प्रमुख इस्लामी वास्तुकला के डिज़ाइनों का प्रयोग किया गया है।

मुख्य अहाता और फ़र्श पर की गई कारीगरी

मस्जिद के बारे में बताने के लिए यहां फ्री गाइडेड टूर चलाए जाते हैं। मैं शुक्रवार को वहां पहुंचा था। शुक्रवार को दिन में मस्जिद पर्यटकों के लिए बंद रहती है और शाम 4.30 बजे के बाद ही पर्यटक अंदर जा सकते हैं। यहां बरामदे में एक बोर्ड लगा है जिस पर गाइडेड टूर से जुड़ी जानकारी लिखी गई है। अगर आप गाइडिड टूर का हिस्सा बनना चाहते हैं तो उस बोर्ड के पास खड़े हो जाएं। बोर्ड में लिख समय पर गाइड वहां पहुंच जाएंगें। शुक्रवार का पहला टूर शाम पांच बजे से था। ठीक पांच बजे कुछ गाइड वहां आए और मेरा टूर शुरू हुआ। गाइड मस्जिद के बनने की कहानी बताना शुरू करते हैं। गलियारे में आगे बढ़ते हुए वहां बनी की गई कलाकारी के बारे में बताते हैं। इस मस्जिद को बनाने में इटली, भारत, ग्रीस, ईरान, मौरक्को, चीन, ब्रिटेन, जैसे बहुत से देशों की चीजों का इस्तेमाल किया गया है। मस्जिद को पूरा बनने में करीब 11साल का समय लगा। मस्जिद को बनाने में भारत के संगरमर का भी इस्तेमाल किया गया है। गाइड एक-एक कर सभी चीजों की जानकारी देता है। आप उससे प्रश्न भी पूछ सकते हैं।

गलियारे के खंभें

खंभों पर “पीट्रा ड्यूरा” का काम

मस्जिद के गलियारे में संगमरमर के खंभे लगे हैं। इन खंभों को कीमती और अर्ध-कीमती पत्थरों जैसे लाजवर्त (lapis lazuli), लाल गोमेद ( red Agate), ऐमेथिस्ट (amethyst) से सजाया गया है। इन खंभों का डिज़ाइन अरब में बहुतायत से पाए जाने वाले ख़जूर के पेड़ों से लिया गया है। इसके गलियारों में कुल 1096 खंभे बनाए गए हैं। कीमती पत्थरों से खंभों को सजाने के लिए “पीट्रा ड्यूरा” का इस्तेमाल किया गया है।

Trivia – “पीट्रा ड्यूरा” पत्थरों में कीमती पत्थरों को जड़ने की कला है। इटली में जन्मी इस कला का इस्तेमाल ताजमहल को सजाने में भी किया गया है।

गुम्बज पर लिखी कुरान की आयतें

गलियारे के गुम्बजों पर कुरान की आयतें लिखी गई है। इन्हें लिखने के लिए कैलिग्राफी का इस्तेमाल किया गया है। कैलिग्राफी को हिन्दी में सुलेखन कहा जाता है। यहां गुम्बजों पर कैलिग्राफी की कई शैलियों को देखा जा सकता है। पूरी मस्जिद में कुल 82 गुम्बज बने हैं। मुख्य हॉल के बीच बना गुम्बज सबसे विशाल है।

Trivia- कैलिग्राफी की शुरुआत पश्चिम एशिया में ही हुई थी। यहां हाथ से कुरान लिखने के लिए इस कला का विकास किया गया।

मुख्य पूजा हॉल में टंगे झाड़ फ़ानूस

मस्जिद के मुख्य पूजा हॉल की बहुत की विशेषताएं हैं। यहां की छत पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा झाड़ फ़ानूस टंगा है। स्वरोस्की क्रिस्टल से बने इन झाड़ फ़ानूसों की ख़ूबसूरती देखते ही बनती है। मस्जिद में कुल 7 झाड़ फ़ानूस लगाए गए हैं। सबसे बड़े फ़ानूस का वजन 12 टन है। फ़ानूसों में 40 किलो शुद्ध सोने का इस्तेमाल किया गया है। मुख्य हॉल में दुनिया का सबसे बड़ा हाथ से बना गलीचा बिछाया गया है। 1200 कारीगरों ने दो साल की मेहनत से इसे तैयार किया है।

मुख्य पूजा हॉल

गाइड टूर की एक ख़ासियत है कि आप यहां के गाइड से इस्लाम से जुड़ा कोई भी सवाल कर सकते हैं। वे खुले दिल से आपके सवालों के जवाब देते हैं। मैं दूसरी बार यह मस्जिद देख रहा था। जब मैं पिछली साल यहां आया था तो गाइड एक महिला थीं। टूर के दौरान उन्होंने कहा था नमाज ध्यान और योग का मिश्रण है। मैंने उनसे पूछा कि आप क्या कह रही हैं- उन्होंने बात दोहराई कि मैं सही कह रही हूँ, नमाज, ध्यान और योग का मेल ही है। तब मैंने उन्हें कहा था कि काश आपकी यह बात भारत तक भी पहुंचती।

रोशनी से नहाई मस्जिद

मस्जिद देख कर बाहर आने तक शाम होने लगी थी। मैने आने का यह समय जानबूझ कर चुना था ताकि लौटते समय अंधेरा हो जाए और कृत्रिम रोशनी में मस्जिद को देखा जा सके। सैंकड़ों बल्बों की रोशनी में नहाई मस्जिद बहुत शानदार दिखाई देती है। यहां आने के लिए ऐसा समय चुनें की शाम की रोशनी का अांनद ले सकें। मस्जिद पर की जाने वाले रोशनी की ख़ासियत यह है कि इसकी रोशनी चांद की रोशनी के हिसाब से घटती-बढ़ती है। इसलिए हर दिन इसकी रोशनी में फर्क दिखाई देता है। चांद के बढ़ने के साथ ही यहां के गुम्बजों पर रोशनी भी बढ़ती चली जाती है।

पर्यटकों के लिए मस्जिद खुलने का समय –
शनिवार से गुरूवार- सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक
शुक्रवार – शाम 4.30 से रात 10 बजे तक

गाइडेड टूर का समय –
रविवार से गुरूवार- सुबह 10, 11 और शाम 5 बजे
शुक्रवार – शाम 5 और 7 बजे
शनिवार- सुबह 10, 11, दोपहर 2, शाम 5 और 7 बजे

– ध्यान रखें कि रमज़ान के महीने में पर्यटकों के लिए मस्जिद खुलने का समय बदल जाता है। रमज़ान में शुक्रवार के दिन मस्जिद पर्यटकों के लिए बंद रहती है। बाकि के दिनों में सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच पर्यटकों के लिए खोली जाती है। गाईड टूर केवल सुबह 10 और 11 बजे किए जा सकते हैं।

दुबई म्यूज़ियम

दुबई म्यूज़ियम

किसी शहर को जानना समझना चाहते हैं तो उसके इतिहास को समझना भी बहुत ज़रूरी है। इतिहास को जानने के लिए म्यूज़ियम एक सही जगह है। दुबई शहर में भी ऐसा ही म्यूज़ियम है जिसे दुबई म्यू़ज़ियम कहा जाता है। कुछ दशकों पहले तक दुबई मछुआरों, घूमंतू कबीलों और समुद्री किनारे के व्यापार करने की छोटी सी बस्ती हुआ करती थी। लेकिन पिछले 100 वर्षों में दुबई ने तरक्की की नई ऊंचाईयों को छुआ है। रेत से सोना बनाने की दुबई की इस कहानी को समझना चाहते हैं तो आपको दुबई म्यूज़ियम आना होगा।

दुबई म्यूज़ियम

दुबई की सबसे पुरानी बस्ती अल-फ़हीदी इलाके में यह म्यूज़ियम बना है। इसे 200 साल से भी ज़्यादा पुराने अल-फ़हीदी किले में बनाया गया है।यह किला इस इलाके की सबसे पुरानी इमारत है। दुबई खाड़ी के किनारे बना यह छोटा सा किला दुबई की रक्षा के लिए बनाया गया था। यहां का राजपरिवार भी इसी किले में रहा करता था। बाद में दुबई के शहर के विकिसित होने के बाद किले को संरक्षित करके म्यूज़ियम में बदल दिया गया। यहां किले के साथ दुबई के इतिहास को भी संजोया गया है। यहां यह जानकर ताज्जुब होगा कि दुबई के रेगिस्तान में मानव की 5000 हजार साल पुरानी बस्तियां भी मिली हैं। यानि दुबई शहर भले ही नया हो लेकिन यहां कि सभ्यता बहुत पुरानी है।

म्यूज़ियम में जाने के लिए 3 दिरहम का टिकट लगता है। म्यूज़ियम दो हिस्सों में बना है। एक हिस्सा जमीन के ऊपर है । किला छोटा होने के कारण शायद ऊपर इतनी जगह नहीं थी दुबई के पूरे इतिहास को दिखाया जा सके इसलिए बाद में किले की ज़मीन के नीचे म्यूज़ियम के दूसरे हिस्से को बनाया गया। किले के नीचे वाले हिस्सों में पिछले कुछ सौ सालो में दुबई में हुए विकास को विस्तार से समझाया गया है।

ऊपर वाले हिस्से की बात करें तो जैसे ही दुबई म्यूज़ियम के मुख्य दरवाजे के अंदर आते हैं आपको टिकट काउंटर मिलता है। टिकट लेने का बाद आप चौकोर अहाते में पहुंचते हैं। यह अहाता चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा है। दीवार के साथ ही दो तरफ लंबे कमरे बने हैं जो शायद रहने के काम आते होंगे। दीवार के तीन कोनों पर तीन बुर्ज़ बने हैं जो सुरक्षा के काम आते होंगे। देखने में किला बहुत छोटा है। अगर भारत के किलों से तुलना करें तो इसे एक तरह की सुरक्षा चौकी कहा जा सकता है। लेकिन 300 साल पुराने छोटे से दुबई के लिए यह काफी कहा जा सकता है। अहाते में दुबई में रहने के पुराने तरीके को दिखाया गया है। यहां घर मुख्यत खजूर की पत्तियों और तने के इस्तेमाल से ही बनाया जाते थे। ये घर गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते थे। इन घरों में एक मीनार भी बनी होती थी जिसे बरजील कहते थे। यह मीनार गर्मियों में घरों को ठंडा रखने का काम करती थी। बरजील के बारे में जानने के लिए मेरा पुराना लेख- अल-फ़हीदी -दुबई का झांकता इतिहास पढ़ सकते हैं। इसके अलावा अहाते में लकड़ी की नावों को रखा गया था। ये छोटी नावें ही पुराने जमाने में समुद्र में जाने के काम आती थी।

खजूर की पत्तियों से बने पारंपरिक घर

साथ ही ऊपर के कमरों में यहां इस्तेमाल होने वाले संगीत के वाद्ययंत्रों और हथियारों को भी दिखाया गया है। यहां दुबई के कुछ मॉडल रखे गए हैं जिन्हें देख कर पता चलता है कि 200 या 300 साल पहले दुबई कैसा रहा होगा।

सन् 1822 का दुबई

दूसरा हिस्सा ज़मीन के नीचे बना है।यहां दुबई के इतिहास को विस्तार से समझायाा गया है। इसे देखकर पता चलता है कि दुबई की तरक्की में केवल तेल का ही योगदान नहीं है बल्कि तेल की ख़ोज होने से काफी पहले 19 वीं शताब्दी के आखिरी वर्षो में ही दुबई ने व्यापार को बढ़ाने के लिए नीतियां बनानी शुरू कर दी थी। 1894 में ही यहां विदेशी व्यापारियों को टैक्स में रियायत दी जाने लगी थी। लगभग इसी समय दुबई खाड़ी के दोनों किनारों पर बर और देरा इलाके का विकास भी शुरू हो गया था। 1908 में देरा में 350 और बर दुबई के इलाके में 50 दुकाने बन चुकी थी। इस दुकानों में व्यापरी भारतीय मसालों, कपड़ों और सोने की बिक्री किया करते थे। देरा और बर के इन बाज़ारों को आज भी देखा जा सकता है।


दुबई के पास हत्ता में 5000 साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इसके बाद के वर्षों में भी दुबई के इलाके में हमेशा लोगों के रहने के अवेशष मिले हैं। हत्ता से मिली चीज़ों को भी इस म्यूज़ियम में दिखाया गया है। दुबई में मिले कुछ अवशेष तो यहां की सभ्यता को करीब 7000 साल पीछे ले जाते हैं। सब देखने के बाद म्यूज़ियम में बनी दुकान से आप दुबई से जुड़ी चीजों की खरीदारी करते हुए यहां से बाहर निकल सकते हैं।


इस म्यूज़ियम ने दुबई को लेकर मेरी समझ को काफी बढ़ाया। म्यूज़ियम जैसी जगहों का काम भी यही होता है वे आपको कुछ ऐसा दिखाते हैं जो या तो आपको पता नहीं होता या जो आपको कभी बताया नहीं जाता।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दुबई कैसे घूमें ?

पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दुबई कैसे घूमें ?

किसी नई जगह घूमने जाएं तो एक दुविधा होती है कि वहां घूमा कैसे जाए? किस साधन का इस्तेमाल किया जाए? अगर आप कम बजट में सफ़र करना चाहते हैं तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से अच्छा कुछ और नहीं हो सकता। जिन शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट अच्छा नहीं होता वहां घूमने में काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। दुबई इस मामले में बेहतर शहर है। दुबई का पब्लिक ट्रांसपोर्ट काफी विकसित और व्यवस्थित है। मेरी हाल की दुबई यात्रा में मैंने घूमने के लिए पूरी तरह से पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ही इस्तेमाल किया। इससे ना केवल मैं आराम से घूम पाया बल्कि मेरा बजट भी काबू में रहा।
दुबई में रोड्स एंड ट्रांसपोर्ट अथोरिटी ( RTA) पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को चलाती है। इसमें मैट्रो, ट्राम, बस, वॉटर बस, अबरा(लकड़ी की नाव) और टैक्सियां शामिल हैं। दुबई समुद्र के किनारा बसा है और शहर के भीतर तक दुबई खाड़ी आने के कारण वॉटर ट्रांसपोर्ट भी यहां विकसित किया गया है। इन सभी के बारे में एक-एक करके बात करेंगे पर पहले बात करते हैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट के टिकट सिस्टम की।

किराया कैसे निर्धारित किया जाता है-
आपकी यात्रा का किराया इस बात से निर्धारित होता है कि आपने उस यात्रा के दौरान कितने ज़ोन पार किए हैं। दरअसल दुबई को यात्रा के हिसाब से कुल 7 ज़ोन में बांटा गया है। एक ही ज़ोन के भीतर यात्रा करने पर एक समान किराया है और एक से दूसरे ज़ोन में जाने पर किराया बढ़ता है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का टिकट कैसे लें-
यहां की मैट्रो,बसों और ट्राम में सफ़र करने के लिए आपको नोल कार्ड (Nol card) का इस्तेमाल करना होता है। ये कार्ड आप मैट्रो स्टेशन, बस स्टेशन या वेंडिंग मशीन से खरीद सकते हैं।
नोल कार्ड (Nol Card) चार तरह के होते हैं – रेड टिकट ( Red ticket) , सिल्वर कार्ड ( Silver card) , गोल्ड कार्ड ( Gold card), ब्लू कार्ड ( Blue card)। पर्यटक अपनी ज़रूरत के हिसाब से रेड टिकट, सिल्वर कार्ड या गोल्ड कार्ड (मैट्रो के गोल्ड कोच में बैठने के लिए) का इस्तेमाल कर सकते हैं। ब्लू कार्ड का इस्तेमाल दुबई में रहने वाले लोग ही कर सकते हैं।

रेड टिकट –
पर्यटकों के लिए सबसे सही है रेड टिकट। यह कागज़ के सामान्य टिकट की तरह ही होता है। रेड टिकट की कीमत 2 दिरहम होती है।इसमें एक ज़ोन का 4 दिरहम किराया लगता है। यानि अगर आप सिर्फ एक ज़ोन के लिए रेड टिकट चाहते हैं तो आपको कुल 6 दिरहम ( 2 दिरहम टिकट + 4 दिरहम ज़ोन का किराया) चुकाना होगा। आप चाहें तो पूरे दिन का डे पास (Day pass) ले सकते हैं जिसमें 22 दिरहम ( 20 दिरहम डे पास + 2 दिरहम रेड टिकट की कीमत) में आप एक दिन में दुबई के किसी भी ज़ोन में किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का जितना चाहे उपयोग कर सकते हैं। इसमें मैट्रो, बस, वॉटर बस और ट्राम शामिल है।अगर पूरे दिन कई जगह जाने का सोच रहे हैं तो डे पास (Day pass) लेना सही रहेगा।
मैं अपनी हर यात्रा के बाद नया रेड टिकट लिया करता है। इस तरह हर बार मुझे टिकट के 2 दिरहम चुकाने पड़ते थे। मुझे बाद में पता चला कि एक रेड टिकट में अधिकतम 10 सिंगल ट्रिप या 5 डे पास रिचार्ज करवाए जा सकते हैं। अगर आप रेड टिकट का इस्तेमाल कर रहें हो तो इस बात की जानकारी टिकट काउंटर से ज़रूर ले लें। इससे आप कुछ दिरहम बचा सकेंगे।

सिल्वर कार्ड-
इसके अलावा पर्यटक सिल्वर कार्ड भी ले सकते हैं। यह प्लास्टिक का कार्ड है।यह कार्ड 25 दिरहम का आता है जिसके साथ 19 दिरहम ट्रिप क्रेडिट मिलता है। इसका मतलब की सिल्वर कार्ड की असल कीमत करीब 6 दिरहम पड़ती है। अगर कुछ लंबा जैसे 7-10 दिन रूकने का सोच रहे हैं तो सिल्वर कार्ड बेहतर रहेगा। सिल्वर कार्ड में घूमने का किराया रेड कार्ड की तुलना में कम है। रेड कार्ड में एक ज़ोन का किराया 4 दिरहम तो सिल्वर कार्ड में यह किराया 3 दिरहम है। दो ज़ोन के बीच यात्रा करने पर रेड कार्ड में 6 तो सिल्वर कार्ड में 5 दिरहम चुकाने होंगे। दो से ज़्यादा ज़ोन होेने पर रेड कार्ड में 8.5 और सिल्वर कार्ड में 7.5 दिरहम का किराया लगेगा। हालांकि सिल्वर कार्ड में डे पास की सुविधा नहीं है। सिल्वर कार्ड 5 साल के लिए वैध होता है इसलिए आप बाद में कभी दुबई जाएं तो अपने खरीदे कार्ड का इस्तेमाल कर सकते हैं।

गोल्ड कार्ड –
दुबई मैट्रो में एक गोल्ड क्लास होती है। इसमें सीटें कुछ बेहतर होती हैं इसलिए किराया भी ज्यादा है। गोल्ड क्लास के लिए आपको या तो गोल्ड कार्ड लेना होगा या फिर गोल्ड क्लास रेड टिकट लेना होगा। ऊपर उदाहरण के लिए जो किराए बताए गए हैं वे मैट्रो के सामान्य डिब्बे या लोकल बस के लिए हैं।

एक जगह से दूसरी जगह जाने के दौरान आप मैट्रो, बस, ट्राम या वॉटर बस में से किसी भी साधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। इनके लिए अलग टिकट लेने की ज़रूरत नहीं है और ना ही अलग से किराया लगेगा। ध्यान रखें कि एक ही यात्रा के दौरान दो अलग-अलग साधनों का इस्तेमाल करने के बीच 30 मिनट से ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए और साथ ही आपका कुल सफ़र 3 घंटे में पूरा हो जाना चाहिए। किराया इस पर निर्भर करेगा कि आपने कुल कितने ज़ोन में यात्रा की है।

अब दुबई के पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साधनों- मैट्रो, बस, ट्रैक्सी, अबरा, ट्राम और मोनो रेल की बात करते हैं।

1- दुबई मैट्रो-

बाहर से दुबई का एक मैट्रो स्टेशन

दुबई में घूमने का सबसे बढ़िया और आसान तरीका है दुबई मैट्रो। मैट्रो लाइन को इस तरह से बनाया गया है कि यह दुबई में घूमने वाली लगभग सभी जगहों के आस-पास से निकलती है। अगर कोई जगह थोड़ी दूरी पर भी है तो उसके नज़दीकी मैट्रो स्टेशन से टैक्सी या लोकल बस ली जा सकती है। दुबई में दो मैट्रो लाइन हैं। इन्हें रेड और ग्रीन लाइन कहा जाता है।
रेड लाइन रशिदिया(Rashidia) से यूएई एक्सचेंज ( UAE Exchange) के बीच चलती है।
ग्रीन लाइन एतिसलात (Etisalat) से क्रीक ( Creek) स्टेशन के बीच चलती है।

दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट रेड लाइन पर पड़ता है। एयरपोर्ट के टर्मिनल 1 और 3 मैट्रो लाइन से जुड़े हैं। अगर आप टर्मिनल 2 पर हैं तो वहां से टर्मिनल 1 या 3 मैट्रो स्टेशन के लिए बस या टैक्सी ले सकते हैं। हर मैट्रो रेल में चार डिब्बे हैं जिसमें पहले डिब्बे का आधा हिस्सा गोल्ड क्लास और आधा हिस्सा महिलाओं और बच्चों के लिए आरक्षित है।

रेड लाइन पर आने वाली लोकप्रिय जगहें- दुबई मॉल, बुर्ज़ अल अरब, मॉल ऑफ एमिरेट्स, दुबई फ्रेम, इब्नबतूता मॉल, दुबई मरीना

ग्रीन लाइन पर आने वाली लोकप्रिय जगहें- अल-फ़हीदी, बुर्ज़मान, अल-सीफ, अल-घुबाईबा, दुबई म्यूज़ियम, देरा

2 – लोकल बस-
दुबई में घूमने का दूसरा तरीका है लोकल बस का इस्तेमाल करना। लगभग पूरे दुबई में जाने के लिए आपको बस मिल जाती हैं। हालांकि पर्यटकों के लिए कुछ दिन में इसे समझना मुश्किल हो सकता है। इसलिए मैट्रो बेहतर है। लेकिन कहीं-कहीं जाने के लिए बस का इस्तेमाल किया जा सकता है। किसी स्थानीय व्यक्ति या इंटरनेट से अपना बस नंबर पता कर लें और बस स्टेंड से अपनी बस पकड़ लें। बस में टिकट देने के लिए कोई कंडेक्टर नहीं होता। बस में दरवाजे से अंदर जाते समय अपना कार्ड वहां लगी मशीन पर लगा दें जिससे आपकी यात्रा दर्ज़ हो जाती है फिर निकलते समय फिर कार्ड लगा दें और आपकी यात्रा का पैसा कट जाएगा।

अल घुबाईबा बस स्टेशन
दुबई से आबुधाबी की लक्जरी बस

अगर दुबई से आबुधाबी या शारजाह जैसे शहरों में जाना हो तो बस सबसे अच्छा साधन है। दुबई के अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन से आबुधाबी सेंट्रल बस स्टेशन के लिए सीधी बस मिलती है। आबूधाबी के लिए अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) से बस नंबर E100 और इब्नबतूता मॉल बस स्टेशन बस नंबर E101 मिलेगी। एक तरफ का किराया 25 दिरहम है। इन एयरकंडीशन आरामदायक बसों में आपको सफर का पता भी नहीं चलता। टिकट के लिए इन बसों में आपको सिल्वर कार्ड लेना ही होगा क्योंकि इनमें रेड टिकट नहीं चलता। तो अगर दुबई में घूमने के दौरान आबुधानी जाने का प्लान है तो दुबई जाते ही सिल्वर कार्ड ले लें और जरूरत के हिसाब से उसे रिचार्ज करवाते रहें।

अल-घुबाईबा ( Al Ghubaiba) से शारजाह के अल जुबैल बस स्टेशन के लिए बस नंबर E306 से जाया जा सकता है। इसके अलावा दूसरे स्टेशनों से भी शारजाह के लिए बस ली जा सकती है।

दुबई के एयरकंडीशन बस स्टॉप

आप दुबई की बस में सफर करें या ना करें पर एक बार दुबई के बस स्टाप पर ज़रूर जा कर देखे। यहां बसों का इंतज़ार करने के लिए एयरकंडीशन बस स्टॉप बनाए गए हैं। दुबई की गर्मी में इस तरह बस स्टॉप बहुत सुकून देते हैं।

3- टैक्सी-
दुबई में टैक्सी की भी बेहतरीन व्यवस्था हैं । अब इन टैक्सियों को एप के ज़रिए भी बुक किया जा सकता है। वैसे सड़क पर किसी भी टैक्सी को हाथ देकर आप उसमें बैठ सकते हैं। टैक्सी में मीटर 5 दिरहम से शुरू होता है और उसके बाद हर किलोमीटर के करीब 1.75 दिरहम देने होते हैं। कम से कम 12 दिरहम का बिल आएगा। अगर आपका टैक्सी बिल 12 दिरहम से कम है तो भी आपको 12 दिरहम को चुकाने ही होंगें। ट्रैफिक में इंतजार करने का भी कुछ पैसा जोड़ा जाता है। यात्रा खत्म होने पर ड्राइवर आपको स्क्रीन पर आपका फाइनल बिल दिखाएगा और आपको कागज की रसीद भी दी जाएगी। बिना स्क्रीन देखे और रसीद लिए ड्राइवर को पैसे नहीं दें। एक बार ड्राइवर ने बहाना बनाकर मुझे बिल नहीं दिया और ना ही स्क्रीन पर देखने दिया। जब मैंने वापस उसी जगह से टैक्सी ली तो मुझे पता चला की उसने मुझसे करीब 10 दिरहम ज़्यादा ले लिए। हालांकि मेरे साथ ऐसा एक बार ही हुआ लेकिन आप जब भी टैक्सी लें इस बात का ध्यान ज़रूर रखें कि ड्राइवर आपको फाइनल बिल दिखाए।
एयरपोर्ट टैक्सी का मीटर 25 दिरहम से शुरू होता है और उसमें हर किलोमीटर के करीब 2 दिरहम लगते हैं। इसके अलावा दुबई में उबर टैक्सी भी उपलब्ध है।

4- अबरा ( लकड़ी की नाव)-

दुबई की पारम्परिक लकड़ी की नाव- अबरा

दुबई कई सैकड़ों वर्षों से अबरा का चलन है। लकड़ी की बनी पारम्परिक नावों को यहां अबरा कहा जाता है। अबरा यहां के पारम्परिक जीवन को देखने का भी बेहतरीन जरिया है। लकड़ी के पुराने अबरा दुबई खाड़ी में बर दुबई से देरा के बीच चलते हैं। इस सफर में मुश्किल से 4-5 मिनट का ही समय लगता है लेकिन यह सफर आपको फिर से पुराने दौर में पहुंचा देगा।
पुराने अबरा बर दुबई से देरा के बीच दो रूट्स पर चलते हैं।
1- बर दुबई अबरा स्टेशन से देरा ओल्ड सूक अबरा स्टेशन
2- दुबई ओल्ड सूक अबरा स्टेशन से देरा के अल सबकहा अबरा स्टेशन

देरा का अबरा स्टेशन

देरा के पुराना बाज़ारों ( ओल्ड सूक) को देखने के लिए बर दुबई अबरा स्टेशन से अबरा लिया जा सकता है। इन अबरा में 1 दिरहम का टिकट लगता है। अबरा का चलाने वाला ही खुद आकर आपसे पैसे ले लेगा। मुझे ये पुराने अबरा बहुत सुरक्षित नहीं लगे। इन अबरा में मुझे सुरक्षा के लिए लाइफ जैकेट जैसा भी कुछ दिखाई नहीं दिया। लेकिन सफर इतना छोटा है कि डर नहीं लगता।

RTA का अबरा

अगर सुरक्षित अबरा का मज़ा लेना चाहते हैं तो RTA के द्वारा चलाए जा रहे अबरा से जा सकते हैं। इनसे अल घुबाईबा, दुबई ओल्ड सूक ( Dubai old souk) और अल सीफ ( Al Seef) जैसे स्टेशनों से देरा के बनियास (Baniyas) स्टेशन जा सकते हैं। ये पारम्परिक अबरा से तेज़ और सुरक्षित हैं। इनमें आपको लाइफ जैकेट भी मिलती है। इनका टिकट 2 दिरहम है। मैंने अल सीफ से बनियास जाने के लिए अबरा का इस्तेमाल किया।
दुबई मरीना में एयरकंडीशन अबरा भी चलते हैं।

5- ट्राम –

ट्राम का नेटवर्क

ट्राम

दुबई में ट्राम सेवा कुछ वर्ष पहले शुरू की गई है। ट्राम अल सुफोह रोड ( Al Sufouh road) स्टेशन से जुमेरिया बीच रोड ( Jumeirah beach road) स्टेशन के बीच चलती है। दुबई मरीना का इलाका देखने के लिए ट्राम सबसे सही साधन है। ट्राम दुबई मैट्रो के दमाक ( Damac Metro station) और जुमेरिया लेक टॉवर्स मैट्रो स्टेशन ( Jumeirah lake towers metro staion) से जुड़ी है। इसलिए मैट्रो से आसानी से ट्राम में जाया जा सकता है। ट्राम के लिए अलग से कोई टिकट नहीं है। आप अपने मैटो में लिए टिकट या कार्ड का ही इस्तेमाल कर सकते हैं।

6- पाम जुमेरिया मोनो रेल-

मोनो रेल स्टेशन
मोनो रेल

दुबई के पाम जुमेरिया आईलैंड के लिए मोनो रेल शुरू की गई है। मोनो रेल को एक निजी कंपनी चलाती है। मोनो रेल कृत्रिम रूप से बनाए गए पाम आईलैंड को देखने और आईलैंड के आखिर छोर पर बने अटलांटिस होटल और एडवेंचर पार्क तक जाने के लिए बिल्कुल सही है। निजी कंपनी की होने के कारण इसमें Nol card नहीं चलते। आपको अलग से टिकट लेना होता है। मोनो रेल के गेटवे स्टेशन ( Gatewat Station) से अटलांटिस स्टेशन ( Atlantis Staion) तक जाने के लिए एक तरफ का टिकट 20 दिरहम और रिटर्न टिकट 30 दिरहम का है। मोनो रेल का गेटवे स्टेशन ट्राम के पाम जुमेरिया ट्राम स्टेशन से जुडा है। ट्राम से पाम जुमेरिया ट्राम स्टेशन पहंच कर वहां से मोनो रेल ली जा सकती है।

ऊपर बताए इन सभी साधनों का इस्तेमाल करके आप आसानी से दुबई घूम सकते हैं। अगर आप भी दुबई के पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ी कोई जानकारी जोड़ना चाहते हैं तो ज़रूर बताएं।

अल फ़हीदी- दुबई का इतिहास झाँकता है जहाँ….

अल फ़हीदी- दुबई का इतिहास झाँकता है जहाँ….

मिट्टी,पत्थर,लकड़ी के इस्तेमाल से बनी एक मंजिला या दुमंजिला इमारतें। इमारतों के बीच से निकलती पतली सड़कें। इमारतों को ठंडा रखने के लिए बनी ऊंची पुरानी मीनारें किसी भी तरह से दुबई में होने का आभास नहीं देती। जिसने भी आज की आधुनिक दुबई को तस्वीरों या असल में देखा हो अगर उसे आँखें बंद करके इस इलाके में छोड़ दिया जाए तो वह कभी यह नहीं बता पाएगा कि यह दुबई का इलाका है। यही बात अल-फ़हीदी को ख़ास बनाती है। दुनिया के हर विकसित देश की तरह दुबई ने भी सीधे आज के दौर में कदम नहीं रखा। दुबई का भी अपना एक अतीत रहा है और इस अतीत को जानने समझने का एक ज़रिया है- दुबई का अल-फ़हीदी इलाका। यह जगह दुबई के इतिहास से आपको रूबरू करवाती है। मुझे इतिहास से लगाव रहा है इसलिए अपनी हाल की दुबई यात्रा में मैं भी अल-फ़हीदी जा पहुंचा।

क्या है अल-फहीदी—-

अल-फ़हीदी दुबई की शुरूआती बसावटों में से एक है जिसे दुबई खाड़ी के किनारे करीब 150 वर्ष पहले बसाया गया था। उस वक्त दुबई मछुआरों की एक छोटी सी बस्ती हुआ करता था। यहाँ रहने वाले लोग मछलियां पकड़ने और समुद्र से मोती निकालने का काम करते थे। खाड़ी से निकले पत्थरों, जिप्सम और मिट्टी के इस्तेमाल से इन इमारतों को बनाया गया था। क्रीक के किनारे बसे होने के कारण यहां से नावों के जरिए समुद्र में आना-जाना आसान था। फिर दुबई में तेल मिलने में और समुद्री व्यापार में तरक्की होने पर यह जगह पीछे छूट गई।अब दुबई अमीरों की दुनिया थी जहां हर कोई आना चाहता था। इसके साथ ही अल-फ़हीदी में रहने वाले लोगों ने भी इस इलाके को छोड़ दिया। काफी समय तक यूँही पड़ा रहने के बाद दुबई सरकार ने अपने इतिहास की इस धरोहर को संभाला और आज का अल-फ़हीदी हिस्टोरिकल नेबरहुड सामने आया।

अल-फ़हीदी की गलियां

1980 के दशक में अल फ़हीदी के संरक्षण का काम शुरू किया गया था। उस समय इस इलाके को नए सिरे से संवारा गया। आज यहाँ पुराने दौर के करीब 50 घर हैं जिन्हें पुराने तरीके से मरम्मत करके तैयार किया गया है। धीरे-धीरे और भी घरों को ठीक करने का काम किया जा रहा है। यहां के पुराने घरों में आर्ट गैलरी, कैफे, म्यूजियम, हेरिटेज होटल आदि खोले गए हैं जो हर वक्त मेहमानों का स्वागत करने के लिए तैयार रहते हैं। यहां आप दुबई के पुराने जीवन, संस्कृति और रहन-सहन के तरीकों को करीब से देख सकते हैं।

अल-फहीदी में क्या देखें

अल-फ़हीदी में घुसते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है शेख़ मोहम्मद सेंटर फॉर कल्चर अंडरस्टैंडिंग ( Sheikh Mohammed Centre for Cultural Understanding ) पर। इस केन्द्र को दुबई की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से अल-फहीदी की एक पुरानी इमारत में खोला गया है। सेन्टर की टैग लाइन है “ओपन डोर्स, ओपन माइंड्स ( Open doors, Open minds)”। इस लाइन का मतलब है कि यहां आपका खुले दिल से स्वागत है और आप यहां दुबई की संस्कृति , सभ्यता, रहन-सहन और खान-पान से जुड़े कोई भी सवाल बिना किसी झिझक के पूछ सकते हैं।

मैं सितम्बर के आखिरी हफ्ते में दुबई गया था और वहां खासी गर्मी थी। गर्मी की वजह से सेन्टर का मुख्य दरवाजा बंद था। जैसे ही में दरवाज़ा खोल कर अंदर दाखिल हुआ पारम्परिक कपड़े पहने एक व्यक्ति ने मुस्करा कर मेरा स्वागत किया और तुरंत ठंडा पानी पीने को दिया। उसके बाद उसने मुझे बताया कि इस केन्द्र में क्या- क्या किया जाता है। इस केन्द्र से पर्यटकों के लिए हैरिटेज वॉक चलाए जाते हैं । इन हैरिटेज वॉक के जरिए आप अल-फ़हीदी के इतिहास को समझ सकते हैं। करीब 1.5 घंटे के हैरिटेज वॉक के लिए 100 दिरहम की राशि ली जाती है। इसके साथ ही यहां पारम्परिक अमीराती भोजन भी किया जा सकता है। यहां आप स्थानीय अमीराती भोजन जैसे, सुबह का नाश्ता, दोपहर या रात का खाना और शाम की चाय का मज़ा ले सकते हैं। इसके लिए आपको 120 से लेकर 150 दिरहम के बीच राशि चुकानी होगी।

मैं जब तक यहाँ पहुंचा तब तक हैरिटेज वॉक का समय खत्म हो चुका था इसलिए यहाँ से अल-फ़हीदी के इलाके की जानकारी लेकर मैं खुद ही आगे घूमने के लिए निकल गया। सेन्टर से मुझे अल-फ़हीदी का एक नक्शा दे दिया गया जिसमें यहां के हर घर के बारे में जानकारी और वहां तक पहुंचने का रास्ता समझाया गया था। सेन्टर पर मिले व्यक्ति ने बताया कि हर घर देखने के लिए खुला है, जिसका घर का दरवाजा भी खुला मिले उसमें जाया जा सकता है। घरों में म्यूजियम, आर्ट गैलरी, कैफे, म्यूजियम और होटल जैसी चीजें खोली गई हैं। हां, किसी भी घर में कोई परिवार नहीं रहता। हर घर के आगे नंबर लिए हुए हैं, नक्शे में उस नंबर के घर को खोजते हुए आप आराम से मनचाही जगह पर पहुंच सकते हैं।

दुबई की पारंपरिक नाव डाउ( Dhow)

सेन्टर से आगे बढ़ने पर मैं आस-पास की इमारतों को देखते हुए यहां खाड़ी के किनारे पहुँचा। खाड़ी के किनारे पर दुबई में चलने वाली लकड़ी की नाव को यहां दिखाया गया है। इस लकड़ी की नाव को डाउ (Dhow) कहा जाता है। इन्हीं लकड़ी की नावों के सहारे करीब एक-डेढ़ सदी पहले दुबई में व्यापार की शुरूआत हुई थी। भारत और आस-पास के देशों से इन्हीं नावों के सहारे माल समुद्री रास्ते से दुबई पहुँचता था।


यहीं घूमते हुए एक घर के बाहर मुझे दिखाई दिया आर्किटेक्चरल हेरिटेज एंड एंटिक्वटीज़ डिपार्टमेंट ( Architectural Heritage and Antiquities Department) लिखा दिखाई दिया। नाम से लग रहा था कि यह प्राचीन वस्तुओं की देखभाल से जुड़ी जगह है। यहां अंदर जाने पर मेरी मुलाकात अब्दुल्लानाज़री से हुई। अब्दुल्ला ने मुझे देखते ही हिन्दी में कहा, ‘आप हिन्दुस्तान से हैं। आप तो हमारे भाई जैसे हैं।’

अब्दुल्लानाज़री के साथ मेरा फ़ोटो

अब्दुल्लानाज़री यहां वालंटियर गाइड के तौर पर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि उनका बचपन इसी अल-फ़हीदी की गलियों में बीता है। दुबई के वर्तमान शेख भी उनके ही पड़ोसी थे। बाद में सब लोगों की तरह अब्दुल्लानाज़री का परिवार भी यहां से चला गया। लेकिन अब वे लोगों को यहां के बारे में बताने के लिए वालंटियर गाइड के तौर पर काम करते है जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती है। उनके पुराने घर में अब अरेबियन कॉफी सेंटर चलता है जो काफी मशहूर कैफे है। अब्दुल्ला इस पूरे इलाके को दिखाने के लिए मेरे साथ चल दिए। अब्दुल्ला अपने शौक के लिए गाइड का काम करते हैं और इसके लिए कोई फीस नहीं लेते। सबसे पहले उन्होंने एंटिक्वटीज़ डिपार्टमेंट की इमारत के बारे में ही बताया। समुद्र के किनारे बनी इस इमारत में दुबई के पुराने घरों में बनी सबसे लंबी बालकनी है। बालकनी से खाड़ी का शानदार नजारा दिखाई देता है।

पुराने घरों में सबसे लंबी बालकनी
दुबई खाड़ी के किनारे बसा अल-फ़हीदी

बरजील या कमरा ठंडा करने वाली मीनारें

बरजील- घर ठंडा करने की मीनार

मैं इमारतों के ऊपर बनी मीनारें के बारे में जानना चाहता था। अब्दुल्ला ने बताया कि ये मीनारें पुराने समय के एयरकंडीशन की तरह हैं। इन मीनारों को बरजील (Barjeel) कहा जाता है। इन चौकोर मीनारों में बने खांचों से गर्म हवा बाहर निकलती है और चारों तरफ की ठंडी हवा कमरे के अंदर जाती है और उसे ठंडा रखती है।। आज भी यह सिस्टम बखूबी काम करता है। पुराने समय में खाड़ी देशों में गर्मी के समय इस तरह के मीनारों वाले कमरे और सर्दी के समय मिट्टी, लकड़ी और पत्तियों से बनी छत वाले कमरों का इस्तेमाल किया जाता था। हर घर में इसी तरह दो अलग-अलग तरह के कमरे बनाए जाते थे। घर ठंडा करने के लिए इस तरह की इमारतों को पूरे खाड़ी देशों में बनाया जाता था। दुबई और बहरीन से लेकर ईरान और अफगानिस्तान तक इन्हें बनाया जाता था । प्रचीन मिस्त्र में करीब 5000 वर्ष पहले भी इन्हें बनाने के सबूत पाए गए हैं। दुबई के इलाके में शुरूआत में इन मीनारों और घरों को खजूर की पत्तियों से बनाया जाता था। जिसे बेट अरीश ( Bait Areesh) कहा जाता था। दुबई के देरा इलाके में वर्ष1894 में लगी एक आग में घरों के जल जाने के बाद पत्थर और मिट्टी जैसी आग प्रतिरोधी और ज़्यादा मजबूत चीजों का इस्तेमाल घरों और मीनारों को बनाने में होने लगा।

कॉइन म्यूजियम

अब अब्दु्ल्ला मेरे साथ हो गए थे इसलिए नक्शे को देखने की जरूरत नहीं थी। वे मुझे यहां के कॉइन म्यूजियम में ले गए। इस म्यूजियम में दुबई में चलने वाले प्राचीन सिक्कों को सहेजा गया है। इस तरह के कई म्यूजियम पूरे इलाके में बने हैं। कॉइन म्यूजियम के बाद हमने कॉफी म्यूजियम देखा। कॉफी पीना अरब की संस्कृति का हिस्सा है। इसे दर्शाने के लिए यहाँ एक घर में कॉफी म्यूजियम बनाया गया है। इसमें कॉफी से जुड़ी पुरानी मशीनों और कॉफी बनाने की जानकारी को समेटा गया है। यहां आप कई तरह की कॉफी को पीने का मज़ा भी ले सकते हैं।

कॉफी म्यूजियम

Coffee trivia – कॉफी पीना अरब की संस्कृति का अहम हिस्सा है। यहां किसी के यहाँ जाने पर मेहमानों को कॉफी पेश की जाती है। किसी की पेश की गई कॉफी के लिए मना करना अच्छा नहीं माना जाता है। इसलिए आप अरब में किसी के यहाँ जाएं तो कॉफी पेश करने पर उसके लिए मना ना करें।

XAV आर्ट कैफे

दो सौ साल पहले बनी किले की सुरक्षा दीवार

इसके बाद मैंने कई घरों को देखा जिनमें आर्ट कैफे , आर्ट गैलरी और हेरिटेज होटल खुले हैं। यहां अंदर जाने पर आपको सभी तरह की आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी लेकिन बाहर से देखने पर ऐसा ही लगेगा जैसे अरेबियन नाइट्स के दौर में घूम रहे हैं।
अगर आप दुबई आ रहे हैं और इतिहास में रूचि रखते हैं तो अल-फहीदी आपके लिए बढ़िया जगह हो सकती है। अल-फ़हीदी से ही लगा है दुबई म्यूजियम । दुबई म्यूजियम को अल-फहीदी किले में बनाया गया है। इस म्यूजियम की बात अगले ब्लॉग पोस्ट में।

कैसे पहुंचे— अल-फ़हीदी दुबई के बर दुबई इलाके में पड़ता है। बर दुबई एक महत्वपूर्ण रिहायशी और व्यवसायिक इलाका है। यहां दुबई मैट्रो से आसानी से पहुंचा जा सकता है। अल-फहीदी दुबई मैट्रो के अल-फहीदी स्टेशन से 10 मिनट की पैदल दूरी पर है। अल-फहीदी दुबई मैट्रो की ग्रीन लाइन पर पड़ता है। वैसे रेड लाइन पर पड़ने वाला बुर्ज़मान स्टेनश भी अल-फहीदी के पास ही है। बुर्ज़मान स्टेशन से भी पैदल यहां तक पहुंचा जा सकता है।

क्या देखें– कॉफी म्यूजियम, कॉइन म्यूजियम, आर्ट गैलेरी और आर्ट कैफे। पुराने शहर की गलियों में घूमें। पास ही दुबई म्यूजियम देखना ना भूलें।

कहां ठहरें– अगर हेरिटज होटल में रूकने का मन है तो अल-फ़हीदी में रूका जा सकता है। यहां फिलहाल दो हेरिटेज होटल चलाए जा रहे हैं। एक्सएवी (XAV) यहां का मशहूर हेरिटेज होटल है।

पर्यटन का बदलता बाज़ार

पर्यटन का बदलता बाज़ार

जब से मैंने दुबई पोर्ट से मैजेस्टिक प्रिंसेस क्रूज का अपना सफर शुरू किया तब से जहाज पर कुछ ऐसा था जो मुझे अलग सा लग रहा था। जहाज पर मौज मस्ती का माहौल था, बढिया खाना था। धूप सेकने के लिए शानदार डेक और भरपूर समुद्री नजारे। हाथ में हाथ डालकर घूमते बहुत से जोडे दिखाई दे रहे थे। उनसे आंखे मिलती तो वे मुस्करा भर देते और अपनी दुनिया में खो जाते। कुछ लोग किताबें पढने में मग्न थे तो कुछ दुनिया की बेहतरीन शराब से अपने गला तर करने में लगे थे।

मैजेस्टिक प्रिसेंस का डेक 16

सब कुछ वैसा ही जैसा किसी भी लक्जरी रिसोर्ट में देखा जा सकता है। लेकिन जो अलग था वो थे यहां मस्ती कर रहे ये लोग। आप शायद हैरान होंगे की इन लोगों में ऐसा क्या अलग हो सकता है।
अलग बात यह थी कि क्रूज पर दिखाई दिए लोगों में से करीब 60-70 फीसदी ऐसे थे जो शायद अपनी रिटारमेंट के बाद की जिंदगी जी रहे थे। इन सब की उम्र लगभग 60 के पार थी। लेकिन जिंदगी को जीने के उनके जोश में कोई कमी नहीं थी। वे यूं ही बेपरवाह मस्ती में थे जितना कोई युवा जोडा हो सकता है। सिर्फ जोडे ही क्यों जहाज पर इस उम्र के ऐसे भी बहुत से लोग थे जो अकेले ही खुशियां बटोरने के लिए निकल पडे थे।


ऐसा नहीं था कि क्रूज किसी खास उम्र के लोगों को लेकर निकला हो। जहाज पर युवा जोडे और दूसरे लोगों की भी खासी तादाद थी। बहुत से भारतीय परिवार मिले जो एक साथ क्रूज पर निकले थे। उन परिवारों में भी मुझे बुजुर्ग भी दिखाई दिए। लेकिन फिर भी इतनी बडी संख्या में बुजुर्गों का क्रूज पर होना मुझे चौंका गया।
क्रूज पर कुछ दिन बिताने और लोगों के बात करने के बाद मुझे समझ आया कि ऐसा क्यों है।

बुजुर्गों के लिए क्यों खास है क्रूज का सफर

इस उम्र के लोगों में भी घूमने की चाह किसी से कम नहीं लेकिन वे ऐसी जगह चाहते हैं जो सुरक्षित हो, साफ हो,रखरखाव बेहतर हो और जहां उनका ध्यान रखने के लिए लोग हो। इस मायने में क्रूज पूरी तरह खरा उतरता था। वहां के कर्मचारी हर वक्त लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार रहते थे।

सेहत का ध्यान

मैंने देखा कि कितने ही बुजुर्ग थे जो व्हीलचेयर या इलेक्ट्रिक साइकिल पर वहां घूम रहे थे। लेकिन उन्हें कोई परेशानी नहीं हो रही थी। जहाज में आने जाने के लिए बने चौडे गलियारे और बडी लिफ्ट किसी तरह की परेशानी नहीं पैदा करते, जो आमतौर पर शहर में घूमने पर सामने आती है। क्रूज के सुरक्षित माहौल में मर्जी से कहीं भी आने जाने की आजादी उन्हें क्रूज के लिए आकर्षित करती है।

क्रूज में रहने से हर दिन नई जगह जाने और होटल तलाश करने की समस्या से पूरी मुक्ति मिल जाती है। क्रूज अपने सफर के दौरान लगभग हर दिन या किसी नए बंदरगाह पर पहुंचते हैं । उस नए शहर में घुमाने का इंतजाम पूरी सुरक्षा के साथ क्रूज कंपनी के द्वारा ही किया जाता है। पूरा दिन घूमने के बाद आप वापस आ जाते हैं अपने क्रूज की दुनिया में जहां शानदार शामें बिता सकते हैं। दुनिया के शहरों को इतनी बेफिक्री से देखने का मजा शायद क्रूज ही दे सकता है।

एट्रियम में डांस क्लास

क्रूज पर समय बिताना बहुत आसान है। वहां बहुत से मनोरंजक कार्यक्रम और गतिविधियां होती रहती हैं। आप अपनी पंसद के मुताबिक उनमें हिस्सा ले सकते हैं। वहां के एट्रियम में रोजाना लोगों को बॉल डांस सिखाया जाता था। वहां डांस सीखने वालों में बड़ी संख्या बुजुर्ग जोड़े थे। ये जोड़े बडे मजे से सिखाने वाले के निर्देशों का पालन करते थे। एट्रियम की सुनहरी बॉलकनी से उनको सीखते देखना भी एक अलग अनुभव था।

क्रूज पर होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेते लोग

मैंने वापस आकर इंटरनेट पर आंकडों को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि दुनिया भर में क्रूज के सबसे बड़े ग्राहक 60 से ऊपर की उम्र के लोग हैं। इन लोगों ने अपनी जिंदगी में पैसा कमाया है और अब वे उसे खर्च करना चाहते हैं। क्रूज उन्हें लक्जरी के साथ उन्हें वह सुविधा और सुरक्षा दे रहा है जो उन्हें चाहिए।
हम ये भी कह सकते हैं कि बुजुर्ग लोगों का एक बडा बाजार है जिसे क्रूज इंडस्ट्री ने शायद बहुत पहले ही समझ लिया।

लेकिन खास बात यह कि अभी भी दुनिया में घूमने के लिए तैयार इस सबसे बडे हिस्से पर ध्यान नहीं दिया गया है। यही वजह है कि अब होटल से लेकर एयरलाइन्स तक इस बढ़ते बाजार को अपनी तरफ खींचने में लगे हैं। बढ़ता बाजार शब्द सुनकर चौंकिए मत। दुनिया भर में बुजुर्ग की बढती संख्या वाकई एक बडा बाजार है। आज बेहतर होती स्वास्थ्य सुविधाओं, खान-पान और रहन सहन के कारण आम आदमी की औसत आयु बढती जा रही है। लोग लंबा और स्वस्थ जीवन जीने लगे हैं। ऐसे में जीवन की जिम्मदारियों को पूरा करने के बाद वे घर से बाहर निकलना चाहते हैं। इसलिए यह बाजार पक्के तौर पर बढने ही वाला है।

मैं करीब दस साल पहले हिमालय के एक ट्रेक पर गया था। खासा मुश्किल ट्रेक था । सुविधाएं भी ना के बराबर। उस ट्रेक पर मेरे साथ बैंगलोर से आए एक दंपत्ति थे । दोनों ही रिटायर्ड जिंदगी के दौर में थे। पति वैज्ञानिक रह चुके थे तो पत्नी कॉलेज प्रिंसिपल से रिटायर हुई थी। उनसे बात हुई तो पता चला कि उस समय तक वे दुनिया के दसियों देशों का चक्कर लगा चुके थे। शायद ही कोई महीना जाता हो जिसमें वे घूमने ना जाते हों। चाहे वह चक्कर विदेश का हो या देश में किसी जगह का। उस समय मैंने भले भी नहीं सोचा लेकिन क्रूज के सफर के बाद में कह सकता हूँ कि हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बाहर निकल खुली आंखों से दुनिया को निहारना चाहते हैं।

जरा आंकडों पर नजर डालें

एक अनुमान के मुताबकि साल 2050 तक अमेरिका और चीन में 60 साल से ऊपर के लोगों की संख्या प्रत्येक देश में 100 मिलियन को पार कर जाएगी। और ये वो आबादी है जिसने वैश्विकरण के दौर में खासा कमाई भी की है। अब वे उस कमाई को अपने आराम पर खर्च करना चाहते हैं।

एक और आंकडा देखिए अमेरिका की अगर बात करें तो वहां खर्च होने वाले पैसे का 70% हिस्सा 60 साल से ऊपर की आयु वाले लोगों के पास ही है।

क्या बदलाव हो रहे हैं
दुनिया भर के होटल और हवाई जहाज कंपनियां विशेष सुविधाएं देने की कोशिश कर रही हैं। खास उम्र के हिसाब से इमारतों को बनाया जा रहा है।
लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट का उदाहरण लिया जा सकता है। हीथ्रो दुनिया का पहला डिमेंशिया फ्रेंडली एयरपोर्ट है। यहां के कर्मचारियों को डिमेंशिया के मरीजों की सहायता के लिए खास तौर से प्रशिक्षित किया गया है।
शंघाई एयरपोर्ट पर इस तरह के बदलाव किए गए हैं कि हर उम्र के लोग आराम से सफर कर सकें ।

भारत के आंकडे भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। हमारे यहां तीर्थ यात्रा का प्रचलन तो सदियों से रहा है। लेकिन अब बुजुर्गों के समूह दुनिया को भी नापने के लिए निकल रहे हैं। और उन कंपनियों के लिए बड़ा बाजार खडा कर रहे है जो उन्हें प्यार और दुलार के साथ घुमा सकता है। और फिलहाल तो इस बाजार में क्रूज लाइनर का कब्जा नजर आता है। घूमने निकले पड़े ये बुजुर्ग साबित कर रहे हैं कि उम्र महज एक आंकडा भर है।

( This trip was organised by Cruise Professionals)

वो हंसते चेहरे

वो हंसते चेहरे

मैं मैजेस्टिक प्रिसेंस क्रूज की 16 वीं मंजिल या जहाज की भाषा में कहें तो डेक पर बैठा था। सुबह के नाश्ते का समय था । डेक के रेस्टोरेंट में कांच की खिड़कियों से समुद्र को निहारते नाश्ता करते लोगों का तांता लगा था। तभी मेरे पास कोई आया ये पूछने की मुझे क्या चाहिए। लंबा स्मार्ट सा लडका । उसके नेम प्लेट पर नजर गई। रणबीर ( शायद यही नाम था) । मुस्कराहट के साथ उसने पूछा ‘क्या ले कर आऊं आपके लिए’।
जहाज पर दो दिन में इस मेहमाननवाजी की आदत हो चुकी थी। बस कुर्सी पर बैठो की मिनट भर के अंदर कोई आपके सामने होता है पूछने के लिए कि क्या चाहिए।
खैर कुछ खाने का मन नहीं था। तो रणबीर से बात ही करने लगा। मैंने पूछा इंडिया से । उसने पूछा आप कहां से मैने कहा दिल्ली बस फिर तो उसके चेहरे की मुस्कान और भी फैल गई। यही मुस्कान है जिससे जहाज के ये लोग अपने मेहमानों की स्वागत करते हैं हर वक्त । यकीन मानिए एक भी बार आपको ये मुस्कुराहट बेमतलब ओढी हुई नहीं लगेगी। बातों का सिलसिला चला तो पता चला कि रणबीर पिछले 11 साल से क्रुज पर है। करीब नौ महीने घर से दूर रहता है। तीन महीने के लिए घर जाता है।

मैंने पूछा कि घर की याद नहीं आती इतने दिन कैसे रह पाते हो वो भी समुद्र के बीच । उसने कहा यहां वही रह सकता है जो नौकरी समझ कर नहीं बल्कि मजे लेकर काम करे। ऐसा नहीं करो तो एक दिन भी निकालना मुश्किल है। इन लोगों की मुस्कराहट का राज समझ आ रहा था।

तभी उसे मुंबई का एक और साथी दिखाई दिया । मुझसे मिलवाने के लिए उसको आवाज देकर बुलाता है। वो भी हंसता हुआ आया । नाम याद नहीं आ रहा । लेकिन वह भी मस्त हंसते हुए बताता रहा कि 15 साल से क्रूज पर काम कर रहा है लेकिन बोर नहीं हुआ। यही मस्ती है जो ये लोग यहां आने वाले मेहमानो से भी बांटते हैं। आपको एक पल के लिए भी नहीं लगेगा कि ये लोग दिल से काम नहीं कर रहे।

दोनों से बात कर ही रहा था कि दोनों को उनका एक और साथी दिखाई दिया। बोले सर ये है प्रसाद हमेशा जोक मारता है। प्रसाद का नाम याद रह गया मुझे। उसके बाद हम चारों काफी देऱ तक बाद करते रहे। भारत का होने का यह फायदा था कि हम सब आराम से बात कर रहे थे। उन तीनों के हंसते चेहरे अभी भी याद हैं । फिर उनसे कहा कि एक फोटो हो जाए फटाफट फोटो देने के लिए तीनों तैयार हो गए बिल्कुल मुस्कुराते हुए।

लेकिन ये तीनों कोई अलग नहीं। जहाज पर किसी भी जगह जाइए वहां के लोग मुस्कराते मिलेगें। मदद करने को हर समय तैयार। कमरे की देखभाल करने वाले हों , मैनेजर हो या कोई दूसरा कर्मचारी सबके सब दिल को खुश करने वाली मुस्कुराहट के साथ ही मिलते हैं। उनमें कोई बनावट नजर नहीं आती।

एक रेस्टोरेंट की मैनेजर थीं। पहले दिन एक रात के खाने के समय मिली। हमने कुछ भारतीय खाना मांगा। उनके मेन्यू में नहीं था लेकिन ला कर दिया। उसके बाद अगले दिन अल-सुबह सबसे ऊपर के डेक पर मिल गई जहां नाश्ता होता था । मैंने कहा आप सोई नहीं तो हंसते हुए बोली आपकी आँखे लाल है सो तो आप भी नहीं रहे। मैंने कहा इतना अच्छा क्रूज आपने बनाया है यहां सोने का समय कहां है। हम दोनों ही हंसने लगे। उसके बाद अगले 5 दिन कहीं भी मिलती तो हम लोग आपस में हाल-चाल जरूरे पूछते । बीच में एक दिन मौसम खराब था तो मिलते ही उन्होंने कुछ हिदायतें और तबीयत खराब होने पर ली जाने वाली गोली के बारे में खुद ही बता दिया। उन्हे याद रहता था कि मैं कुछ दोस्तों के साथ हूं तो सबके बारे में भी पता कर लेती। यही कुछ बाते हैं जो किसी सफर को यादगार बना देती हैं।

आखरी दिन इमीग्रेशन का काम पूरा करना था इसलिए पांचवी मंजिल पर रिसेप्शन पर पहुंचा। रिसेश्पशन पर जिसकी ड्यूटी थी उसने पता किया कि इमीग्रेशन के लोग कहां बैठे हैं? पांचवे मंजिल से चौदहवी मंजिल तक मुझे वहां छोडने गया । वहां लोग नहीं मिले तो फिर उसने पता किया लेकिन जब तक वो नहीं मिले उसने रास्ता बता कर उपना पीछा नहीं छुडाया।

शायद जब आप धरती से दूर समुद्र में हो । आपको पता हो कि यही कुछ लोग हैं जो आपके साथ अगले कुछ दिन रहेंगें तो आपस में जुडना काफी आसान हो जाता है। यही वजह है कि घर से दूर रहते हुए भी जहाज के लोग दिल खोल कर हंसते मुस्कुराते हैं और हमेशा पूछते हैं आपको क्या चाहिए।
मैं अभी क्रूज से वापस आ चुका हूँ लेकिन ऐसा लगता है कि ये मुस्कराहट क्रूज से दूर नहीं होने देगी….

( this trip was organised by cruise professional )

भूटान की पहचान – टाइगर नेस्ट – Trek to Tiger’s nest ( Taktsang) Monastery

भूटान की पहचान – टाइगर नेस्ट – Trek to Tiger’s nest ( Taktsang) Monastery

टाइगर नेस्ट मठ आज पूरी दुनिया में भूटान की पहचान है। यह भूटान के सबसे पवित्र बौद्ध मठों में से एक है। इस बौद्ध मठ को तक्तसांग मठ ( Taktsang Monastery) भी कहा जाता है। पारो घाटी में एक ऊंची पहाड़ी चट्टान पर टंगा सा दिखाई देता यह मठ यहां आने की इच्छा रखने वालों को चुनौती सी देता लगता है। यह मठ करीब 3120 मीटर की ऊंचाई पर एक पहाडी कगार पर बना है। पारो शहर से मठ की चढाई शुरू करने की जगह करीब 12 किलोमीटर दूर है। रास्ते में कुछ जगहों से टाइगर नेस्ट दिखाई देता है। सड़क से देखने पर पहाड की सीधी कगार पर टंगे मठ पर चढना अंसभव सा ही लगता है।

मैं और मेरे ट्रेवल ब्लागर दोस्तो ने टाइगर नेस्ट का सफर सुबह जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी शुरु करने का सोचा। सुबह जल्दी चढ़ाई करने पर सुबह की ठंडक और कम भीड के बीच आराम से चढाई कर सकते हैं। हम सब तैयार होकर करीब आठ बजे होटल से निकले। चढाई शुरू करने की जगह से करीब 8.30 बजे हमने मठ के लिए 5.5 किलोमीटर की चढ़ाई शुरू की। जहां से चढ़ाई शुरू होती है वह जगह घने जंगल के बीच है।

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रास्ते से ठीक पहले एक पटरी बाजार है जहां से यादगार के तौर पर टाइगर नेस्ट से जुडी चीजों की खरीदारी की जा सकती है। इसी छोटे से बाजार से होकर हम आगे बढ़े। आगे बढ़ते ही चीड़ और दूसरे पहाडी पेडों का जंगल शुरू हो जाता है। घने और शांत जंगल के बीच थोड़ा सा आगे बढने के बाद पानी का एक झरना है जिस पर पानी मदद से घूमने वाले बौद्ध प्रार्थना चक्र बने हैं।

 प्रार्थना चक्र
प्रार्थना चक्र

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बौद्ध धर्म में पवित्र माने जाने वाले रंग बिरगी पताकाएं भी खूब दिखाई देती है। जंगल में रूककर थोडे फोटो लिए और आगे बढे। कुछ आगे बढने पर चढाई से सामना होता है। रास्ता कच्चा है और संभल कर आगे बढने में ही समझदारी है। लेकिन आराम से चलते रहे तो चढ़ाई का पता नहीं चलता। कई जगहों से पारो घाटी का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। आंखों से सामने पूरी पारो घाटी नजर आती है।

पारो घाटी का नजारा
पारो घाटी का नजारा
रास्ता
रास्ता

लगभग आधा सफर तय करने के बाद एक बडा प्रार्थना चक्र आता है। हम यहां कुछ देर रूके पीछे से आ रहे सब लोगो को साथ लिया और आगे बढे। यहां मुझे पानी पीने की खाली प्लास्टिक बोतलों से बने बहुत से प्रार्थना चक्र भी दिखाई दिए।

प्लास्टिक बोतलों से बने प्रार्थना चक्र
प्लास्टिक बोतलों से बने प्रार्थना चक्र

पर्यटकों की बढती तादात से पर्यावरण पर पडते प्रभाव को कुछ कम करने का यह अच्छा प्रयास है। अच्छी बात यह है कि पर्यावरण और स्थानीय संस्कृति पर पडने वाले प्रभाव को देखते हुए ही भूटान में बहुत देर से और धीर-धीरे देश के इलाकों को पर्यटकों के लिए खोला गया है। और आज भी इस देश में पर्यटक के तौर पर आने पर बहुत से नियम और कायदों का पालन करना पडता है।
इसी जगह के पास एक रेस्टोरेंट भी बना है जो मुख्य रास्ते से थोड़ा हट कर है। चाहें तो वहां आराम कर सकते हैं लेकिन अधिकतर पर्यटक मठ से वापसी के दौरान वहां खाना खाने के लिए रूकते हैं। हम भी सीधे आगे बढे और वापसी में रूकने का तय किया।

व्यपांइट से टाइगर नेस्ट
व्यूपांइट से टाइगर नेस्ट

मठ से करीब एक किलोमीटर पहले एक व्यूपांइट आता है। यह जगह ऊंचाई में मठ के लगभग बराबर और उसके ठीक सामने हैं। इसलिए यहां से मठ की सबसे शानदार तस्वीरें ली जा सकती हैं। इसी वजह से इस जगह को व्यू पाइट कहते हैं। व्यूपांइंट पर हम सबने भी फोटो खिंचवाए। मठ के बहुत सारे फोटो लिए। सुनहरा छत से बना मठ बेहद शानदार लगता है। नीचे से जिस मठ तक पहुचना असंभव लग रहा था यहां पहुंच कर लगता है कि मंजिल पर पहुंच ही जाएंगे।

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व्यूपाइंट के बाद मठ तक पहुंचने के लिए सीधे घाटी में उतराई शुरू होती है। यहां से उतरने के लिए सीढियां बनी हैं। सीढियों से उतरते ही एक बडा विशाल झरना है जिसे पुल से पार किया जाता है। इस झरने को पवित्र माना जाता है।

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घाटी में उतरने के बाद मठ से पहुंचने के लिए करीब 150 सीढियां चढनी पडती हैं। इस तरह से करीब 750 सीढियों का सफर तय करके मठ तक पहुंचा जा सकता है।
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मठ पर पहुंच कर अनोखी शांति का एहसास होता है बस झरने के पानी गिरने की आवाज सुनाई देती है। मठ के बाहर से खडे होकर फोटो लिए जा सकते हैं। मठ के अंदर कैमरा या मोबाइल ले जाना मना है। इसलिए यहां बाहर बने लॉकर में सब सामान रखा। लॉकर पर कोई देखभाल करने वाला या कोई ताला नहीं है अलमारी में बने छोटे – छोटे लॉकर हैं जिनमें सामान रखिए भगवान भरोसे सामान छोडिए और चले जाइए। शायद बौद्ध धर्म का असर है कि भूटान में अपराध बेहद कम होते हैं इसलिए मठ जैसी जगहों पर चोरी के बारे में किसी ने नहीं सोचा होगा। लेकिन बेहतर होगा कि आप एक छोटा ताला साथ ले जाएं और लॉकर पर लगा दें। मैं एक छोटा ताला अपने साथ रखता हूं तो यहां वह काम आया, सबका सामान लॉकर में रखा और बिना चिन्ता के मठ में चले गए।
पहाडी की कगार पर बना मठ कई हिस्सों में बना है। कगार से साथ ऊपर उठते कई मंदिरों का समूह है। यहां कुल चार मुख्य मंदिर हैं। इसमें सबसे प्रमुख भगवान पद्मसंभव का मंदिर है जहां उन्होंने तपस्या की थी। इस मठ के बनने की कहानी भी भगवान पद्मसंभव से ही जुडी है।

कैसे बना टाइगर नेस्ट

भूटान की लोककथाओं के अनुसार इसी मठ की जगह पर 8वीं सदी में भगवान पद्मंसभव ने तपस्या की थी। पहाडी की कगार पर बनी एक गुफा में रहने वाले राक्षस को मारने के लिए भगवान पद्मसंभव एक बाघिन पर बैठ तिब्बत से यहां उड़कर आए थे। यहां आने के बाद उन्होंने राक्षस को हराया और इसी गुफा में तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन और तीन घंटे तक तपस्या की । भगवान पद्मसंभव बाघिन पर बैठ कर यहां आए थे इसी कारण इस मठ को टाइगर नेस्ट भी बुलाया जाता है। भगवान पद्मसंभव को स्थानीय भाषा में गुरू रिम्पोचे की कहा जाता है।

यहां सबसे पहले वर्ष 1692 में मठ परिसर बनाया गया। उसके बाद समय – समय पर यहां निर्माण का काम होता रहा। कुछ वर्ष पहले 19 अप्रेल 1998 के दिन मठ में भयानक आग लगी जिसके बाद मठ का बडा हिस्सा नष्ट हो गया था। जिसके बाद इसे फिर से बनाया गया है।

मठ सभी मंदिरों को देखते हुए करीब 2 घंटे बिताने के बाद वापसी का सफर शुरू किया। कुछ देर में व्यूपांइट पर पहुंचे। इस समय तक दोपहर बाद का समय हो चुका था। इस समय सूरज मठ के सामने था इसलिए मठ के अच्छे फोटो आ रहे थे। दरअसल सूरज मठ के ठीक पीछे से ही निकलता है इसलिए सुबह के समय अच्छे फोटो लेना मुश्किल है, दोपहर बाद सूरज मठ के सामने आ जाता है जिससे व्यूपांइंट से मठ के अच्छे फोटो लिए जा सकते हैं।

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वापसी में हम सब लोग खाना खाने के लिए आधे रास्ते में बने रेस्टोरेंट में रूके। रेस्टोरेंट से मठ का नजारे लेते हुए खाना खाने का आनंद लिया जा सकता है। यहां से भी मठ के अच्छे फोटो आते हैं कई लोग जो टाइगर नेस्ट तक नहीं जा पाते यहीं से फोटो लेकर वापस चले जाते हैं।
टाइगर नेस्ट के पूरे रास्ते में खाने की यही एक जगह है , 400 रूपये की एक थाली जिसमें भरपेट खा सकते हैं। खाना साधारण लेकिन बेहतर था। इतना थककर आने के बाद इस खाने की बहुत जरुरत पडती है।

भूटान की इस मामले में दाद देनी पडेगी कि पर्यटन के दबाव के बावजूद उन्होंने अपने नियमों से समझौता नहीं किया है। 5.5 किलोमीटर की चढाई के पूरे रास्ते में एक ही रेस्टोरेंट को इजाजत दी गई है। इसके उलट भारत में किसी भी धार्मिक जगह की चढाई पर चले जाइए पूरा रास्ता खाने पानी का दुकानों से भरा मिलेगा। जिसके कारण हर जगह गंदगी और प्लास्टिक नजर आती है।
एक बात और पता चली कि यहां के स्थानीय गाइड और लोग मिलकर अकसर रविवार के दिन चढाई के पूरे रास्ते की सफाई करते हैं। रास्ते में पडे कचरे और प्लास्टिक की बोतलों को एक जगह जमा करके नीचे लाया जाता है। पर्यावरण के महत्व को भूटान के लोगों ने अच्छे से समझा है। ये कुछ अच्छी बातें हैं जो भूटान से सीखी जा सकती हैं।

खाना खाने के बाद हमने भी थोडा तेजी से उतरना शुरू किया। शाम होने के साथ आसमान में बादल दिखाई देने लगे थे। बरसात होने पर परेशानी खड़ी हो सकती थी। एक बार हल्की बूंदा-बांदी तो जरूर मिली लेकिन तेज बरसात का सामना नहीं करना पडा। करीब 4 बजे तक हम नीचे आ चुके थे। नीचे बने पटरी बाजार से मठ की यादगार के तौर पर कुछ चीजें खरीदी और पारो के लिए निकल गए।

Note- मेरी भूटान यात्रा को ट्रेवल कंपनी भूटान बुकिंग ने प्रायोजित किया था।
My trip to Bhutan was sponsored by travel company Bhutan Bookings. For any booking you can contact them.


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फुनशलिंग से थिम्पू की ओर…

फुनशलिंग से थिम्पू की ओर…

फुनशलिंग में एक रात बिताने के बाद अगले दिन सुबह हम सभी थिम्पू के लिए निकले। फुनशलिंग से थिम्पू करीब 170 किलोमीटर दूर है और इसे तय करने में पांच से छ: घंटे लगते हैं । फुनशलिंग से पहाड़ों का असली सफर भी शुरू हो जाता है। फुनशलिंग से निकलते ही थिम्पू जाने वाले रास्ते से कुछ हट कर करबंदी बौद्ध मठ ( karbandi Monastry) बना है इसे रिचेनडिंग मठ (Richending Gompa) भी कहते हैं।

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यह हमारी भूटान यात्रा का सबसे पहला मठ था। शहर से कुछ ऊंचाई पर बने इस मठ से फुनशलिंग , भारत के शहर जयगांव और बंगाल के नदियों से घिरे मैदानी इलाकों का जबरदस्त नजारा देखने को मिला। दूर- दूर तक बंगाल के हरे- भरे जंगल दिखाई दे रहे थे। हम शायद सही समय पर नहीं पहुंचे थे इसलिए यह मठ बंद मिला। लेकिन चारों तरफ दिखाई दे रहे दृश्यों ने मन मोह लिया। कुछ देर रूक कर फोटो लिए और थिम्पू के लिए रवाना हुए।

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सफर पर आगे बढ़ने के साथ ही रास्ते के दृश्य भी बदलने लगे। ऊंचाई बढ़ने के साथ सड़क के दोनों तरफ पहाड़ी पेड़ पौधे नजर आने लगे। जंगल भी ज्यादा हरा और घना दिखाई दे रहा था। दूर-दूर जहां तक नजर जाए पहाड़ पेड़ों से भरे नजर आ रहे थे। भारत के पहाडी इलाकों में भी जंगल नजर आते हैं लेकिन इतने घने पहाड़ी जंगल मैंने इससे पहले केवल अरूणाचल प्रदेश में ही देखे थे। शायद हिमाचल या उत्तराखंड जैसे पहाडी राज्यों में आबादी का दबाव ज्यादा है जिसके कारण जंगल कम नजर आने लगे हैं। थिम्पू के आधे रास्ते पर चूखा नाम की जगह पड़ती है। चाय पीने का मन करने लगा तो सब लोग चूखा में ही रूके।

बटर वाली चाय
बटर वाली चाय

सड़क के किनारे के रेस्टोरेंट में चाय पीने पहुंचे तो पता चला की भूटान की नमकीन बटर चाय भी मिल जाएगी। तो बस बटर वाली चाय का ही आर्डर दे दिया। मक्खन वाली चाय जिसे लद्दाख में गुड़गुड़ चाय भी कहते हैं , ऊंचाई वाले सभी हिमालयी इलाकों में पी जाती है। इसे लकड़ी से बने एक खोखले बेलनाकार बरतन में चाय के उबले पानी, मक्खन और नमक डालकर बनाया जाता है। बरतन में सबकुछ डालने के बाद काफी देर तक उसे लकड़ी से हिला कर मिलाया जाता है जिससे गुड-गुड जैसी आवाज निकलती है। इसलिए इसे गुड-गुड चाय भी कहते हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में सर्दी से बचने के लिए कैलोरी की काफी जरूरत होती है और मक्खन वाली चाय उस जरूरत को पूरा करती है।

चूखा परियोजना
चूखा परियोजना

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चाय पीने के बाद बाहर आए तो सड़क से चूखा जलविद्युत परियोजना का कुछ हिस्सा दिखाई दिया। चूखा में वांग-चू (नदी) पर जलविद्युत परियोजना बनी है। भूटानी भाषा में नदी को चू(Chu) कहा जाता है। दूर से ही सही परियोजना के कुछ फोटो लिए। साथ में बताता चलूं कि 336 मेगावाट की चूखा जलविद्युत परियोजना भारत के सहयोग से ही बनाई गई है। यह भूटान की सबसे बड़ी और शुरूआती परियोजनाओं में से एक हैं।
भूटान इस मामले में खास है कि यहां बिजली का उत्पादन खपत से ज्यादा है। इसलिए बिजली की कटौती कहीं दिखाई नहीं देती। इसके साथ यही बिजली भूटान की कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी है। भारत बड़े पैमाने पर भूटान से बिजली खरीदता है।

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यहीं पहली बार समझ में आया की भूटान सिर्फ देखने में ही नहीं बल्कि काम करने के तरीकों में भी हमसे बेहतर है। सड़क के दूसरी और एक लंबा प्लेटफार्म बना था जिस पर भूटान की पारम्परिक स्थापत्य कला की याद दिलाती छत पडी थी। उस प्लेटफार्म पर कुछ स्थानीय महिलाएं छोटी सी दुकान लगाकर रोजमर्रा की जरूरत का सामान बेच रहीं थी। कुछ फल, सब्जियां, स्थानीय पनीर, और भूटान में सबका पसंदीदा सूखा चीज। सड़क के किनारे का यह बाजार भारत में जगह-जगह दिखाई देने वाले बेतरतीब ठेलों से कहीं अलग और खूबसूरत था। कल फुनशलिंग की शांति में मन मोह लिया था तो आज भूटान में लोगों के काम करने के तरीके ने।

चूखा में ही भारत सीमा सड़क संगठन का कैम्प भी था। फुनशलिंग से थिम्पू जाने वाले हाईवे का निर्माण और इसकी देखभाल भारतीय सीमा सड़क सगठन ही करता है। सडक काफी बेहतर बनी हुई थी। सिर्फ यही नहीं आगे भी हमें जो भी हाईवे भूटान में दिखाई दिए सभी का जिम्मा भारतीय सीमा सड़क संगठन के ही पास है। चूखा में समय बिताने के बाद हम थिम्पू के लिए निकल लिए।

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दोपहर होते –होते गाड़ी थिम्पू पहुंची। थिम्पू छोटा शहर है। आबादी भी ज्यादा नहीं है। पहली ही नजर में शहर बहुत व्यवस्थित नजर आता है। साफ सुथरी सड़कें, सड़कों के किनारे बने खूबसूरत घर और दुकानें। हर तरफ एक व्यवस्था दिखाई देती है।
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भूटान के कानून के अनुसार इमारत को बाहर से भूटानी स्थापत्य के हिसाब से ही बनाना पड़ता है। इसलिए रंगबिरंगी इमारतें बहुत सुन्दर दिखाई देती हैं। भूटान भूकम्प के लिहाज से बेहद संवेदनशील है इसलिए भूकम्प को लेकर यहां कड़े कानूनों का पालन किया जाता है। कोई भी इमारत पांच मंजिल से ऊंची नहीं हो सकती। इसके साथ ही इमारत का भूकम्परोधी तकनीक से बना होना जरूरी है। इसकी मंजूरी के बिना आप इमारत बना ही नहीं सकते।

थिम्पू पहुंचते – पहुंचते दोपहर हो चुकी थी। तो पहले होटल ताज ताशी पहुंचे। भूटान के जोंग ( किला) के नमूने पर इस होटल को बनाया गया है। होटल में खाना खाने के बाद थिम्पू को देखने का सफर शुरू हुआ।

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सबसे पहले थिम्पू के मोटीथांग टाकिन संरक्षण केन्द्र (Motithang Takin Preserve) में पहुंचे। थिम्पू आने से पहले तक मैंने टाकिन(Takin) नाम के जानवर के बारे में सुना ही नहीं था। जानकर चौंक गया कि टाकिन भूटान का राष्ट्रीय पशु है। कुछ-कुछ गाय जैसा दिखाई देने वाले टाकिन बेहद सुस्त जीव होता है। भारी – भरकम टाकिन गाय और बकरे का मिलाजुला रूप लगता है। इसी वजह से टाकिन को लेकर कई किवदंतियां भी प्रचलित हैं।

टाकिन
टाकिन

भूटान की लोककथा है कि टाकिन को तिब्बत से आए एक संत द्रुपका कुनले ने उत्पन्न किया था। उन्होंने एक बकरे के सिर को गाय की हड्डियों से जोड़ दिया जिससे टाकिन की उत्पत्ति हुई। इसी महत्व को देखते हुए टाकिन को भूटान का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया।

शाक्यमुनि बुद्ध
शाक्यमुनि बुद्ध

टाकिन को देखने के बाद अगली जगह थी शाक्यमुनी बुद्ध की मूर्ति। हाल ही में थिम्पू शहर की ऊंची पहाड़ी पर भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा बनाई गई है। प्रतिमा 51.5 मीटर ऊंची है और विश्व की सबसे ऊंची बुद्ध प्रतिमाओं में से एक है। अभी भी उस जगह को बनाने का काम चल ही रहा है। ऊंचाई पर होने के कारण यहां से पूरे थिम्पू शहर का शानदार नजारा दिखाई देता है। सिर्फ थिम्पू ही नहीं पिछले कुछ वर्षों में विशाल बुद्ध मूर्तियां भारत के लद्दाख और स्पिति में भी बनाई गई हैं। अंधेरा होने लगा था इसलिए आज का सफर यहीं खत्म करके वापस होटल पहुंच गए। होटल में कुछ देर आराम के बाद थिम्पू की नाइट लाइफ को देखने के लिए निकलना था। थिम्पू की नाइट लाइफ सुनकर आप चौंक गए होंगें। तो अगले पोस्ट में बात थिम्पू की रात की चमचमाती जिंदगी पर…..

कैसे पहुंचें- फुनशलिंग से थिम्पू के लिए आसानी से टैक्सी मिल जाती है।
भूटान की बस सेवा से भी थिम्पू पहुंचा जा सकता है। फुनशलिंग बस अड्डे से थिम्पू के लिए बस मिल जाती हैं। किराया करीब 230 रूपये। भूटान में बस सेवा निजी हाथों में हैं और कई कम्पनियां बसों को चलाती हैं। बसों के रूप में टोयाटा की छोटी कोस्टर बसों का इस्तेमाल किया जाता है। जो आरामदायक भी हैं।

भूटान की बस सेवा
भूटान की बस सेवा

नोट – भूटान की यह यात्रा भूटान बुकिंग की तरफ से प्रायोजित की गई थी।