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अल फ़हीदी- दुबई का इतिहास झाँकता है जहाँ….

अल फ़हीदी- दुबई का इतिहास झाँकता है जहाँ….

मिट्टी,पत्थर,लकड़ी के इस्तेमाल से बनी एक मंजिला या दुमंजिला इमारतें। इमारतों के बीच से निकलती पतली सड़कें। इमारतों को ठंडा रखने के लिए बनी ऊंची पुरानी मीनारें किसी भी तरह से दुबई में होने का आभास नहीं देती। जिसने भी आज की आधुनिक दुबई को तस्वीरों या असल में देखा हो अगर उसे आँखें बंद करके इस इलाके में छोड़ दिया जाए तो वह कभी यह नहीं बता पाएगा कि यह दुबई का इलाका है। यही बात अल-फ़हीदी को ख़ास बनाती है। दुनिया के हर विकसित देश की तरह दुबई ने भी सीधे आज के दौर में कदम नहीं रखा। दुबई का भी अपना एक अतीत रहा है और इस अतीत को जानने समझने का एक ज़रिया है- दुबई का अल-फ़हीदी इलाका। यह जगह दुबई के इतिहास से आपको रूबरू करवाती है। मुझे इतिहास से लगाव रहा है इसलिए अपनी हाल की दुबई यात्रा में मैं भी अल-फ़हीदी जा पहुंचा।

क्या है अल-फहीदी—-

अल-फ़हीदी दुबई की शुरूआती बसावटों में से एक है जिसे दुबई खाड़ी के किनारे करीब 150 वर्ष पहले बसाया गया था। उस वक्त दुबई मछुआरों की एक छोटी सी बस्ती हुआ करता था। यहाँ रहने वाले लोग मछलियां पकड़ने और समुद्र से मोती निकालने का काम करते थे। खाड़ी से निकले पत्थरों, जिप्सम और मिट्टी के इस्तेमाल से इन इमारतों को बनाया गया था। क्रीक के किनारे बसे होने के कारण यहां से नावों के जरिए समुद्र में आना-जाना आसान था। फिर दुबई में तेल मिलने में और समुद्री व्यापार में तरक्की होने पर यह जगह पीछे छूट गई।अब दुबई अमीरों की दुनिया थी जहां हर कोई आना चाहता था। इसके साथ ही अल-फ़हीदी में रहने वाले लोगों ने भी इस इलाके को छोड़ दिया। काफी समय तक यूँही पड़ा रहने के बाद दुबई सरकार ने अपने इतिहास की इस धरोहर को संभाला और आज का अल-फ़हीदी हिस्टोरिकल नेबरहुड सामने आया।

अल-फ़हीदी की गलियां

1980 के दशक में अल फ़हीदी के संरक्षण का काम शुरू किया गया था। उस समय इस इलाके को नए सिरे से संवारा गया। आज यहाँ पुराने दौर के करीब 50 घर हैं जिन्हें पुराने तरीके से मरम्मत करके तैयार किया गया है। धीरे-धीरे और भी घरों को ठीक करने का काम किया जा रहा है। यहां के पुराने घरों में आर्ट गैलरी, कैफे, म्यूजियम, हेरिटेज होटल आदि खोले गए हैं जो हर वक्त मेहमानों का स्वागत करने के लिए तैयार रहते हैं। यहां आप दुबई के पुराने जीवन, संस्कृति और रहन-सहन के तरीकों को करीब से देख सकते हैं।

अल-फहीदी में क्या देखें

अल-फ़हीदी में घुसते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है शेख़ मोहम्मद सेंटर फॉर कल्चर अंडरस्टैंडिंग ( Sheikh Mohammed Centre for Cultural Understanding ) पर। इस केन्द्र को दुबई की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से अल-फहीदी की एक पुरानी इमारत में खोला गया है। सेन्टर की टैग लाइन है “ओपन डोर्स, ओपन माइंड्स ( Open doors, Open minds)”। इस लाइन का मतलब है कि यहां आपका खुले दिल से स्वागत है और आप यहां दुबई की संस्कृति , सभ्यता, रहन-सहन और खान-पान से जुड़े कोई भी सवाल बिना किसी झिझक के पूछ सकते हैं।

मैं सितम्बर के आखिरी हफ्ते में दुबई गया था और वहां खासी गर्मी थी। गर्मी की वजह से सेन्टर का मुख्य दरवाजा बंद था। जैसे ही में दरवाज़ा खोल कर अंदर दाखिल हुआ पारम्परिक कपड़े पहने एक व्यक्ति ने मुस्करा कर मेरा स्वागत किया और तुरंत ठंडा पानी पीने को दिया। उसके बाद उसने मुझे बताया कि इस केन्द्र में क्या- क्या किया जाता है। इस केन्द्र से पर्यटकों के लिए हैरिटेज वॉक चलाए जाते हैं । इन हैरिटेज वॉक के जरिए आप अल-फ़हीदी के इतिहास को समझ सकते हैं। करीब 1.5 घंटे के हैरिटेज वॉक के लिए 100 दिरहम की राशि ली जाती है। इसके साथ ही यहां पारम्परिक अमीराती भोजन भी किया जा सकता है। यहां आप स्थानीय अमीराती भोजन जैसे, सुबह का नाश्ता, दोपहर या रात का खाना और शाम की चाय का मज़ा ले सकते हैं। इसके लिए आपको 120 से लेकर 150 दिरहम के बीच राशि चुकानी होगी।

मैं जब तक यहाँ पहुंचा तब तक हैरिटेज वॉक का समय खत्म हो चुका था इसलिए यहाँ से अल-फ़हीदी के इलाके की जानकारी लेकर मैं खुद ही आगे घूमने के लिए निकल गया। सेन्टर से मुझे अल-फ़हीदी का एक नक्शा दे दिया गया जिसमें यहां के हर घर के बारे में जानकारी और वहां तक पहुंचने का रास्ता समझाया गया था। सेन्टर पर मिले व्यक्ति ने बताया कि हर घर देखने के लिए खुला है, जिसका घर का दरवाजा भी खुला मिले उसमें जाया जा सकता है। घरों में म्यूजियम, आर्ट गैलरी, कैफे, म्यूजियम और होटल जैसी चीजें खोली गई हैं। हां, किसी भी घर में कोई परिवार नहीं रहता। हर घर के आगे नंबर लिए हुए हैं, नक्शे में उस नंबर के घर को खोजते हुए आप आराम से मनचाही जगह पर पहुंच सकते हैं।

दुबई की पारंपरिक नाव डाउ( Dhow)

सेन्टर से आगे बढ़ने पर मैं आस-पास की इमारतों को देखते हुए यहां खाड़ी के किनारे पहुँचा। खाड़ी के किनारे पर दुबई में चलने वाली लकड़ी की नाव को यहां दिखाया गया है। इस लकड़ी की नाव को डाउ (Dhow) कहा जाता है। इन्हीं लकड़ी की नावों के सहारे करीब एक-डेढ़ सदी पहले दुबई में व्यापार की शुरूआत हुई थी। भारत और आस-पास के देशों से इन्हीं नावों के सहारे माल समुद्री रास्ते से दुबई पहुँचता था।


यहीं घूमते हुए एक घर के बाहर मुझे दिखाई दिया आर्किटेक्चरल हेरिटेज एंड एंटिक्वटीज़ डिपार्टमेंट ( Architectural Heritage and Antiquities Department) लिखा दिखाई दिया। नाम से लग रहा था कि यह प्राचीन वस्तुओं की देखभाल से जुड़ी जगह है। यहां अंदर जाने पर मेरी मुलाकात अब्दुल्लानाज़री से हुई। अब्दुल्ला ने मुझे देखते ही हिन्दी में कहा, ‘आप हिन्दुस्तान से हैं। आप तो हमारे भाई जैसे हैं।’

अब्दुल्लानाज़री के साथ मेरा फ़ोटो

अब्दुल्लानाज़री यहां वालंटियर गाइड के तौर पर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि उनका बचपन इसी अल-फ़हीदी की गलियों में बीता है। दुबई के वर्तमान शेख भी उनके ही पड़ोसी थे। बाद में सब लोगों की तरह अब्दुल्लानाज़री का परिवार भी यहां से चला गया। लेकिन अब वे लोगों को यहां के बारे में बताने के लिए वालंटियर गाइड के तौर पर काम करते है जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती है। उनके पुराने घर में अब अरेबियन कॉफी सेंटर चलता है जो काफी मशहूर कैफे है। अब्दुल्ला इस पूरे इलाके को दिखाने के लिए मेरे साथ चल दिए। अब्दुल्ला अपने शौक के लिए गाइड का काम करते हैं और इसके लिए कोई फीस नहीं लेते। सबसे पहले उन्होंने एंटिक्वटीज़ डिपार्टमेंट की इमारत के बारे में ही बताया। समुद्र के किनारे बनी इस इमारत में दुबई के पुराने घरों में बनी सबसे लंबी बालकनी है। बालकनी से खाड़ी का शानदार नजारा दिखाई देता है।

पुराने घरों में सबसे लंबी बालकनी
दुबई खाड़ी के किनारे बसा अल-फ़हीदी

बरजील या कमरा ठंडा करने वाली मीनारें

बरजील- घर ठंडा करने की मीनार

मैं इमारतों के ऊपर बनी मीनारें के बारे में जानना चाहता था। अब्दुल्ला ने बताया कि ये मीनारें पुराने समय के एयरकंडीशन की तरह हैं। इन मीनारों को बरजील (Barjeel) कहा जाता है। इन चौकोर मीनारों में बने खांचों से गर्म हवा बाहर निकलती है और चारों तरफ की ठंडी हवा कमरे के अंदर जाती है और उसे ठंडा रखती है।। आज भी यह सिस्टम बखूबी काम करता है। पुराने समय में खाड़ी देशों में गर्मी के समय इस तरह के मीनारों वाले कमरे और सर्दी के समय मिट्टी, लकड़ी और पत्तियों से बनी छत वाले कमरों का इस्तेमाल किया जाता था। हर घर में इसी तरह दो अलग-अलग तरह के कमरे बनाए जाते थे। घर ठंडा करने के लिए इस तरह की इमारतों को पूरे खाड़ी देशों में बनाया जाता था। दुबई और बहरीन से लेकर ईरान और अफगानिस्तान तक इन्हें बनाया जाता था । प्रचीन मिस्त्र में करीब 5000 वर्ष पहले भी इन्हें बनाने के सबूत पाए गए हैं। दुबई के इलाके में शुरूआत में इन मीनारों और घरों को खजूर की पत्तियों से बनाया जाता था। जिसे बेट अरीश ( Bait Areesh) कहा जाता था। दुबई के देरा इलाके में वर्ष1894 में लगी एक आग में घरों के जल जाने के बाद पत्थर और मिट्टी जैसी आग प्रतिरोधी और ज़्यादा मजबूत चीजों का इस्तेमाल घरों और मीनारों को बनाने में होने लगा।

कॉइन म्यूजियम

अब अब्दु्ल्ला मेरे साथ हो गए थे इसलिए नक्शे को देखने की जरूरत नहीं थी। वे मुझे यहां के कॉइन म्यूजियम में ले गए। इस म्यूजियम में दुबई में चलने वाले प्राचीन सिक्कों को सहेजा गया है। इस तरह के कई म्यूजियम पूरे इलाके में बने हैं। कॉइन म्यूजियम के बाद हमने कॉफी म्यूजियम देखा। कॉफी पीना अरब की संस्कृति का हिस्सा है। इसे दर्शाने के लिए यहाँ एक घर में कॉफी म्यूजियम बनाया गया है। इसमें कॉफी से जुड़ी पुरानी मशीनों और कॉफी बनाने की जानकारी को समेटा गया है। यहां आप कई तरह की कॉफी को पीने का मज़ा भी ले सकते हैं।

कॉफी म्यूजियम

Coffee trivia – कॉफी पीना अरब की संस्कृति का अहम हिस्सा है। यहां किसी के यहाँ जाने पर मेहमानों को कॉफी पेश की जाती है। किसी की पेश की गई कॉफी के लिए मना करना अच्छा नहीं माना जाता है। इसलिए आप अरब में किसी के यहाँ जाएं तो कॉफी पेश करने पर उसके लिए मना ना करें।

XAV आर्ट कैफे

दो सौ साल पहले बनी किले की सुरक्षा दीवार

इसके बाद मैंने कई घरों को देखा जिनमें आर्ट कैफे , आर्ट गैलरी और हेरिटेज होटल खुले हैं। यहां अंदर जाने पर आपको सभी तरह की आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी लेकिन बाहर से देखने पर ऐसा ही लगेगा जैसे अरेबियन नाइट्स के दौर में घूम रहे हैं।
अगर आप दुबई आ रहे हैं और इतिहास में रूचि रखते हैं तो अल-फहीदी आपके लिए बढ़िया जगह हो सकती है। अल-फ़हीदी से ही लगा है दुबई म्यूजियम । दुबई म्यूजियम को अल-फहीदी किले में बनाया गया है। इस म्यूजियम की बात अगले ब्लॉग पोस्ट में।

कैसे पहुंचे— अल-फ़हीदी दुबई के बर दुबई इलाके में पड़ता है। बर दुबई एक महत्वपूर्ण रिहायशी और व्यवसायिक इलाका है। यहां दुबई मैट्रो से आसानी से पहुंचा जा सकता है। अल-फहीदी दुबई मैट्रो के अल-फहीदी स्टेशन से 10 मिनट की पैदल दूरी पर है। अल-फहीदी दुबई मैट्रो की ग्रीन लाइन पर पड़ता है। वैसे रेड लाइन पर पड़ने वाला बुर्ज़मान स्टेनश भी अल-फहीदी के पास ही है। बुर्ज़मान स्टेशन से भी पैदल यहां तक पहुंचा जा सकता है।

क्या देखें– कॉफी म्यूजियम, कॉइन म्यूजियम, आर्ट गैलेरी और आर्ट कैफे। पुराने शहर की गलियों में घूमें। पास ही दुबई म्यूजियम देखना ना भूलें।

कहां ठहरें– अगर हेरिटज होटल में रूकने का मन है तो अल-फ़हीदी में रूका जा सकता है। यहां फिलहाल दो हेरिटेज होटल चलाए जा रहे हैं। एक्सएवी (XAV) यहां का मशहूर हेरिटेज होटल है।

त्रिपुरारी पूर्णिमा- गोवा का नाव उत्सव ( Boat Festival)

त्रिपुरारी पूर्णिमा- गोवा का नाव उत्सव ( Boat Festival)

उत्सव- गोवा नाव उत्सव ( Goa Boat Festival), विठ्ठलपुर गांव, गोवा
Date- 14 November 2016

अपने मस्त-मौला अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले गोवा में त्रिपुरारी पूर्णिमा को भी खास अंदाज में मनाया जाता है। यही वजह है कि त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन गोवा में होने वाला नाव उत्सव धीरे-धीरे पर्यटकों के बीच अपनी पहचान बनाने लगा है। इस दिन गोवा के विठ्ठलपुर गांव में वलवंती नदी के किनारे इसका आयोजन किया जाता है। इस साल यह नाव उत्सव 14 नवबंर को मनाया जाएगा।

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समुद्र, नदियां और नावें गोवा के जनजीवन के साथ गहराई से जुड़े हैं। लोक जीवन या संस्कृति से जुड़े हर पहलू में यह जुडाव साफ दिखाई देता है। यही कारण है कि त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन नाव उत्सव मनाया जाता है। यह एक नाव बनाने की प्रतियोगिता होती है, जिसमें थर्मोकोल या कार्डबोर्ड से छोटे-छोटे खूबसूरत जहाज या नावें बनाई जाती हैं। बिल्कुल बडे जहाजों की तरह दिखाने देने वाले इन छोटे जहाजों को बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है। जहाजों को रंगबिरंगों कागजों से सजाया जाता है। आजकल इन जहाजों पर रोशनी का इंतजाम भी किया जाता है। रोशनी से जगमगाते रंगबिरंगे जहाज अनोखा समा बांध देते हैं। पूरे गोवा से लोग इस नाव प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए जुटते हैं। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले लोगों की संख्या 1000 तक पहुंच जाती है। आखिर में सबसे खूबसूरत नाव को पुरूस्कार भी दिए जाते हैं।

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उत्सव की शुरूआत शाम के समय भगवान कृष्ण की डोली को गाजे-बाजे के साथ नदी के किनारे लाए जाने से होती है। प्रतियोगिता के खत्म होने तक भगवान की डोली वहीं रहती है। इस दौरान पारम्परिक नाच गाने का दौर चलता है। उसके बाद नदी में जलते दीए प्रवाहित किए जाते हैं। पूरी नदी दीओं से जगमगाती है उस बीच जोर शोर के साथ नावें नदी के पानी में उतारी जाती हैं। नदी में उतरी रंगबिंरगी नावें बेहद खूबसूरत दिखाई देती हैं। धीरे – धीरे यह उत्सव इतना लोकप्रिय हो गया है कि इसे देखने बड़ी संख्या में पर्यटक भी जुटने लगे हैं। गोवा पर्यटन विभाग की तरफ से इस यात्रा को दिखाने के लिए विशेष टूर आयोजित किए जाते हैं।

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गोवा की स्थानीय संस्कृति की अनूठी झलक इस उत्सव के दौरान देखने को मिलती है। नाव प्रतियोगिता के साथ तरह के पारम्परिक संगीत और नृत्यों का प्रदर्शन होता है। पूरे विठ्ठलपुर गांव को रंगबिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है। देर रात को आतिशबाजी का कार्यक्रम भी होता है ।
हिन्दु मान्यता के अनुसार त्रिपुरारी पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा को बेहद पवित्र माना जाता है। इस दिन देश भर में मेलों और उत्सवों का आयोजन होता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था।

तो अगर आप गोवा की अनूठी और मस्त मौला जिंदगी की एक झलक देखना चाहते हैं, वहां के स्थानीय जन-जीवन से रूबरू होना चाहते हैं तो एक बार गोवा के नाव उत्सव में जरूर शामिल हों।

ज्यादा जानकारी के लिए गोवा पर्यटन विभाग की वेबसाइट देख सकते हैं।

Picture courtesy – Goa Tourism