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गुजरात के डेडियापाडा में टीकाकरण की सफलता

गुजरात के डेडियापाडा में टीकाकरण की सफलता

घने जंगलों, नदियों और पहाडों से घिरा है गुजरात के नर्मदा जिले का डेडियापाडा तालुका। देखने में यह जगह किसी दूसरी प्रसिद्ध पहाड़ी जगह का मुकाबला करती नजर आती है। जहां तक नजर जाती हैं बस सागौन के जंगल नजर आते हैं। जंगलों के बीच छोटे-छोटे आदिवासी गांव बसे हैं। धान के खेत जंगल के बीच किसी हरी चादर से बिछे नजर आते हैं। यहां कुछ दिन बिताने हों तो जगह स्वर्ग से कम नहीं लगती। लेकिन कुछ दिन रूकें तो सच्चाई से वास्ता पड़ने लगता है। ऐसी ही एक सच्चाई है बच्चों में टीकाकरण की कमी। इस इलाके की दुर्गम स्थिति और आदिवासियों में जागरूकता की कमी के कारण यहां बच्चों के टीकाकरण की दर करीब 50 फीसदी ही थी। इस दर को बढाने की खासा जरुरत थी। इलाके में टीकाकरण को सफल बनाने के लिए यूनिसेफ, स्वास्थ्य विभाग और स्वंयसेवी सस्थाओ को मिलाकर टीकाकरण बढ़ाने के अभियान की शुरूआत वर्ष 2013 में की गई। अभियान का मकसद ज्यादा से ज्यादा बच्चों को टीकाकरण की जद में लाने का था। आज 2017 में अभियान के चार साल पूरा होने पर इलाके में टीकाकरण करीब 97 फीसदी पर पहुंच गया है। इस आंकडों को देखकर वाकई खुशी होती है। देश के दूरदराज के इलाकों तक टीकाकरण कार्यक्रम को सफलता से लागू करना बहुत बडी उपलब्धि है। लेकिन यहां तक पहुचने का सफर इतना आसान नहीं था।

डेडियापाडा तालुका के 65 गांवों में यह अभियान शुरू किया गया। इन गांवों की आबादी करीब 65 हजार है। यहां काम कर रही संस्थाओं को समझ आया कि बिना स्थानीय लोगों की भागीदारी के टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं है। इसके लिए सरकार के स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं और यूनिसेफ ने मिल कर एक रणनीति बनाई । इसके तहत आदिवासी लोगों पर प्रभाव रखने वाले लोगों की पहचान की गई। इसमें स्थानीय जंगल समिति, पंचायत सदस्य, गांव प्रधान, भगत भुवा और फलिया स्वयंसेवकों को जोडकर एक नेटवर्क बनाया गया। इस नेटवर्क ने मिल कर टीककरण के लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास किया।

साभार- INRECA

टीकाकरण के सिपहसालार

1- जंगल समिति– डेडियापाडा के अंधिकाश इलाके में घने जंगल हैं। गांव सड़कों से दूर घने जंगलो और पहाडों पर बसे हैं। वन अभ्यारण्य का हिस्सा होने के कारण वन विभाग यहां काफी सक्रिय रहता है। ऐसे में स्थानीय जंगल समीति के लोगों को इस अभियान का हिस्सा बनाने का काफी फायदा मिला। वे लोग लगातार गांव वालों के संपर्क में रहते हैं। जिससे अभियान के मकसद को अंदरूनी इलाकों तक पहुचाने में मदद मिली।

2- पंचायत सदस्य– पंचायत सदस्य गांवों के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं। ऐसे में इन लोगों का गांव के हर व्यक्ति के साथ सीधा संपर्क होता है। पंचायत सदस्य असरदार तरीके से टीकाकरण के महत्व को लोगों तक पहुंचा सके।

3- भगत भुवा– ये लोग स्थानीय पंडित की तरह होते हैं। आदिवासी गांवों में भगत भुवा की बहुत मान्यता है। ये गांव के असरदार लोगों में से होते हैं। भगत भुवा के कहने का आदिवासियों पर काफी सकारात्मक असर दिखाई दिया।

भगत भुवाओं से चर्चा , फोटो साभार- INRECA

4- फलिया स्वयंसेवक – आदिवासी गांवों में कई छोटे टोले होते हैं। उन टोलों को फलिया कहा जाता है। उसी के नाम पर फलिया स्वंयसेवक बनाए गए। फलिया स्वसंसेवक गांव के लिए युवक युवतियां होते हैं। इन्हें टीकाकरण के प्रचार प्रसार का प्रशिक्षण दिया गया। स्थानीय होने के कारण गांव वाले इनकी बात आसानी से समझ जाते हैं। उसी टोले से होने के कारण इनकी पहुंच टोले के हर घर तक होती है। इसके साथ ही घर की महिलाओं को समझाना और उन्हें बच्चों के साथ टीकाकरण के लिए टीकाकरण केन्द्र तक लाना भी आसान हो। गया।

5- स्वंयसेवी संस्था– यूनिसेफ ने टीकाकरण के काम को आगे बढ़ाने के लिए स्वंयसेवी संस्थाओं का सहारा लिया। इस तरह की संस्थाओं को चुना गया जो इलाके में बेहतर काम कर रही हों। उनके पिछले कार्यों को जांच कर उन्हें टीकाकरण के काम के साथ जोड़ा गया। डेडियापाडा में आईएनआरईसीए ( INRECA) संस्था को यह काम दिया गया। संस्था ने टीकाकरण के प्रसार में लगे लोगों को प्रशिक्षण दिया और उन्हें जागरुक किया। उन्हें प्रचार प्रसार के तरीकों के बारे में सिखाया गया।

फोटो साभार- INRECA

डेडियापाडा तालुका में अधिकांश आदिवासी आबादी है। यहां के 65 गांवों में से 40 ऐसे हैं जिनसे बरसात के महीनों में संपर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। पहाड़ों और जंगलों में बसे ये गांव बरसाती नदियों से घिर जाते हैं। ऐसे में सभी के मिले जुले प्रयासों से ही इस इलाके में टीकाकरण की सफलता सुनिश्चित हो पाई। टीकाकरण का ही नतीजा है कि डेडियापाड़ा तालुका में शिशु और मातृमृत्यु दर में खासी कमी आई है। डेडियापाड़ा में प्रति हजार पर शिशु मृत्यु दर 28 है जबकि नर्मदा जिले की 36 और गुजरात राज्य की 33 है। डेडियापाड़ा की सफलता से साफ है कि अगर मिलजुल कर प्रयास किए जाएं तो किसी भी अभियान को सफल बनाया जा सकता है।

पर्यटन का बदलता बाज़ार

पर्यटन का बदलता बाज़ार

जब से मैंने दुबई पोर्ट से मैजेस्टिक प्रिंसेस क्रूज का अपना सफर शुरू किया तब से जहाज पर कुछ ऐसा था जो मुझे अलग सा लग रहा था। जहाज पर मौज मस्ती का माहौल था, बढिया खाना था। धूप सेकने के लिए शानदार डेक और भरपूर समुद्री नजारे। हाथ में हाथ डालकर घूमते बहुत से जोडे दिखाई दे रहे थे। उनसे आंखे मिलती तो वे मुस्करा भर देते और अपनी दुनिया में खो जाते। कुछ लोग किताबें पढने में मग्न थे तो कुछ दुनिया की बेहतरीन शराब से अपने गला तर करने में लगे थे।

मैजेस्टिक प्रिसेंस का डेक 16

सब कुछ वैसा ही जैसा किसी भी लक्जरी रिसोर्ट में देखा जा सकता है। लेकिन जो अलग था वो थे यहां मस्ती कर रहे ये लोग। आप शायद हैरान होंगे की इन लोगों में ऐसा क्या अलग हो सकता है।
अलग बात यह थी कि क्रूज पर दिखाई दिए लोगों में से करीब 60-70 फीसदी ऐसे थे जो शायद अपनी रिटारमेंट के बाद की जिंदगी जी रहे थे। इन सब की उम्र लगभग 60 के पार थी। लेकिन जिंदगी को जीने के उनके जोश में कोई कमी नहीं थी। वे यूं ही बेपरवाह मस्ती में थे जितना कोई युवा जोडा हो सकता है। सिर्फ जोडे ही क्यों जहाज पर इस उम्र के ऐसे भी बहुत से लोग थे जो अकेले ही खुशियां बटोरने के लिए निकल पडे थे।


ऐसा नहीं था कि क्रूज किसी खास उम्र के लोगों को लेकर निकला हो। जहाज पर युवा जोडे और दूसरे लोगों की भी खासी तादाद थी। बहुत से भारतीय परिवार मिले जो एक साथ क्रूज पर निकले थे। उन परिवारों में भी मुझे बुजुर्ग भी दिखाई दिए। लेकिन फिर भी इतनी बडी संख्या में बुजुर्गों का क्रूज पर होना मुझे चौंका गया।
क्रूज पर कुछ दिन बिताने और लोगों के बात करने के बाद मुझे समझ आया कि ऐसा क्यों है।

बुजुर्गों के लिए क्यों खास है क्रूज का सफर

इस उम्र के लोगों में भी घूमने की चाह किसी से कम नहीं लेकिन वे ऐसी जगह चाहते हैं जो सुरक्षित हो, साफ हो,रखरखाव बेहतर हो और जहां उनका ध्यान रखने के लिए लोग हो। इस मायने में क्रूज पूरी तरह खरा उतरता था। वहां के कर्मचारी हर वक्त लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार रहते थे।

सेहत का ध्यान

मैंने देखा कि कितने ही बुजुर्ग थे जो व्हीलचेयर या इलेक्ट्रिक साइकिल पर वहां घूम रहे थे। लेकिन उन्हें कोई परेशानी नहीं हो रही थी। जहाज में आने जाने के लिए बने चौडे गलियारे और बडी लिफ्ट किसी तरह की परेशानी नहीं पैदा करते, जो आमतौर पर शहर में घूमने पर सामने आती है। क्रूज के सुरक्षित माहौल में मर्जी से कहीं भी आने जाने की आजादी उन्हें क्रूज के लिए आकर्षित करती है।

क्रूज में रहने से हर दिन नई जगह जाने और होटल तलाश करने की समस्या से पूरी मुक्ति मिल जाती है। क्रूज अपने सफर के दौरान लगभग हर दिन या किसी नए बंदरगाह पर पहुंचते हैं । उस नए शहर में घुमाने का इंतजाम पूरी सुरक्षा के साथ क्रूज कंपनी के द्वारा ही किया जाता है। पूरा दिन घूमने के बाद आप वापस आ जाते हैं अपने क्रूज की दुनिया में जहां शानदार शामें बिता सकते हैं। दुनिया के शहरों को इतनी बेफिक्री से देखने का मजा शायद क्रूज ही दे सकता है।

एट्रियम में डांस क्लास

क्रूज पर समय बिताना बहुत आसान है। वहां बहुत से मनोरंजक कार्यक्रम और गतिविधियां होती रहती हैं। आप अपनी पंसद के मुताबिक उनमें हिस्सा ले सकते हैं। वहां के एट्रियम में रोजाना लोगों को बॉल डांस सिखाया जाता था। वहां डांस सीखने वालों में बड़ी संख्या बुजुर्ग जोड़े थे। ये जोड़े बडे मजे से सिखाने वाले के निर्देशों का पालन करते थे। एट्रियम की सुनहरी बॉलकनी से उनको सीखते देखना भी एक अलग अनुभव था।

क्रूज पर होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेते लोग

मैंने वापस आकर इंटरनेट पर आंकडों को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि दुनिया भर में क्रूज के सबसे बड़े ग्राहक 60 से ऊपर की उम्र के लोग हैं। इन लोगों ने अपनी जिंदगी में पैसा कमाया है और अब वे उसे खर्च करना चाहते हैं। क्रूज उन्हें लक्जरी के साथ उन्हें वह सुविधा और सुरक्षा दे रहा है जो उन्हें चाहिए।
हम ये भी कह सकते हैं कि बुजुर्ग लोगों का एक बडा बाजार है जिसे क्रूज इंडस्ट्री ने शायद बहुत पहले ही समझ लिया।

लेकिन खास बात यह कि अभी भी दुनिया में घूमने के लिए तैयार इस सबसे बडे हिस्से पर ध्यान नहीं दिया गया है। यही वजह है कि अब होटल से लेकर एयरलाइन्स तक इस बढ़ते बाजार को अपनी तरफ खींचने में लगे हैं। बढ़ता बाजार शब्द सुनकर चौंकिए मत। दुनिया भर में बुजुर्ग की बढती संख्या वाकई एक बडा बाजार है। आज बेहतर होती स्वास्थ्य सुविधाओं, खान-पान और रहन सहन के कारण आम आदमी की औसत आयु बढती जा रही है। लोग लंबा और स्वस्थ जीवन जीने लगे हैं। ऐसे में जीवन की जिम्मदारियों को पूरा करने के बाद वे घर से बाहर निकलना चाहते हैं। इसलिए यह बाजार पक्के तौर पर बढने ही वाला है।

मैं करीब दस साल पहले हिमालय के एक ट्रेक पर गया था। खासा मुश्किल ट्रेक था । सुविधाएं भी ना के बराबर। उस ट्रेक पर मेरे साथ बैंगलोर से आए एक दंपत्ति थे । दोनों ही रिटायर्ड जिंदगी के दौर में थे। पति वैज्ञानिक रह चुके थे तो पत्नी कॉलेज प्रिंसिपल से रिटायर हुई थी। उनसे बात हुई तो पता चला कि उस समय तक वे दुनिया के दसियों देशों का चक्कर लगा चुके थे। शायद ही कोई महीना जाता हो जिसमें वे घूमने ना जाते हों। चाहे वह चक्कर विदेश का हो या देश में किसी जगह का। उस समय मैंने भले भी नहीं सोचा लेकिन क्रूज के सफर के बाद में कह सकता हूँ कि हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बाहर निकल खुली आंखों से दुनिया को निहारना चाहते हैं।

जरा आंकडों पर नजर डालें

एक अनुमान के मुताबकि साल 2050 तक अमेरिका और चीन में 60 साल से ऊपर के लोगों की संख्या प्रत्येक देश में 100 मिलियन को पार कर जाएगी। और ये वो आबादी है जिसने वैश्विकरण के दौर में खासा कमाई भी की है। अब वे उस कमाई को अपने आराम पर खर्च करना चाहते हैं।

एक और आंकडा देखिए अमेरिका की अगर बात करें तो वहां खर्च होने वाले पैसे का 70% हिस्सा 60 साल से ऊपर की आयु वाले लोगों के पास ही है।

क्या बदलाव हो रहे हैं
दुनिया भर के होटल और हवाई जहाज कंपनियां विशेष सुविधाएं देने की कोशिश कर रही हैं। खास उम्र के हिसाब से इमारतों को बनाया जा रहा है।
लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट का उदाहरण लिया जा सकता है। हीथ्रो दुनिया का पहला डिमेंशिया फ्रेंडली एयरपोर्ट है। यहां के कर्मचारियों को डिमेंशिया के मरीजों की सहायता के लिए खास तौर से प्रशिक्षित किया गया है।
शंघाई एयरपोर्ट पर इस तरह के बदलाव किए गए हैं कि हर उम्र के लोग आराम से सफर कर सकें ।

भारत के आंकडे भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। हमारे यहां तीर्थ यात्रा का प्रचलन तो सदियों से रहा है। लेकिन अब बुजुर्गों के समूह दुनिया को भी नापने के लिए निकल रहे हैं। और उन कंपनियों के लिए बड़ा बाजार खडा कर रहे है जो उन्हें प्यार और दुलार के साथ घुमा सकता है। और फिलहाल तो इस बाजार में क्रूज लाइनर का कब्जा नजर आता है। घूमने निकले पड़े ये बुजुर्ग साबित कर रहे हैं कि उम्र महज एक आंकडा भर है।

( This trip was organised by Cruise Professionals)

भारतीय स्वाद से भरी जापानी सुशी

भारतीय स्वाद से भरी जापानी सुशी

खाने में मुझे भारतीय खाना ही पसंद है। दाल, चावल , सब्जी
रोटी से ज्यादा कभी इच्छा भी नहीं रही। विदेशी खाने में मेरी पसंद चायनीज से आगे
नहीं जाती। और भारत में बनने वाला चायनीज खाना अब चायनीज कम और भारतीय ज्यादा हो
गया है। ऐसे में कोई मुझे जापानी खाने के लिए कहे तो मेरा चौंकना तो स्वाभाविक है।
ऊपर से मेरे जैसे शाकाहारी के लिए जापानी खाना बात कुछ जमती नहीं। लेकिन खाने का
शौक तो मुझे है और जब पता लगा की शाकाहारी जापानी खाना है मैंने भी चखने का मन बना
ही लिया।
दोस्तों के साथ था तो दिल्ली के मालवीय नगर में  सुशी जंक्शन नाम से खुले एक जापानी रेस्टोरेंट से सुशी के शेफ सलेक्शन प्लेटर का आर्डर दिया
गया। रेस्टोरेंट की तरफ से पक्का भरोसा मिला कि पूरी तरह से शाकाहारी सुशी ही
मिलेगी। हालांकि उनके पास मासांहारी सुशी भी मौजूद हैं।  

आर्डर करने के थोडी ही देर
में ताजा बनी सुशी के डिब्बे हमारे सामने थे। हर डिब्बे में तीन तरह की सुशी का
मिक्स बनाकर रखा गया था। पैंकेजिंग देखकर मन खुश हो गया। कहा भी गया है कि खाने की
थाली जितनी सुन्दरता से सजी होगी खाने वाले को भी उतना ही आनंद मिलेगा। तो डिब्बे
की सजावट और उसमें करीने से रखी सुशी ने पहले ही दिल जीत लिया।
अब बारी थी उसे खाने की , खाने
के लिए साथ में चॉपस्टिक दी गई थी। जापान के लोग सुशी खाने के लिए चॉपस्टिक का
कितना इस्तेमाल करते हैं यह तो मुझे नहीं पता लेकिन इंटरनेट पर ढूंढने से पता चला
कि पारम्परिक तौर से इसे हाथ से ही खाया जाता है। लेकिन मैंने सोचा की पहली बार
सुशी खा ही रहे हैं तो लगे हाथ पहली बार चॉपस्टिक का इस्तेमाल भी  करके देख लिया जाए। मेरे दोस्त अभिनव का साथ
होना काम आया क्योंकि होटल मेनेजमेंट की पढ़ाई कर चुके अभिनव का खाने की चीजों के
साथ लंबा रिश्ता रहा था , अभिनव ने चॉपस्टिक इस्तेमाल करने का तरीका भी सिखा दिया
अब हाथ में चॉपस्टिक पकडकर
कर पहली सुशी को उठाया । साथ में आए सोया सॉस और वसावी में डुबाया और सफाई के साथ
सुशी मुंह के अंदर। पहली बार में ही चॉपस्टिक से बिना कुछ गिराये में सुशी खाने
में सफल रहा था।

अब मेरे मुंह में गई सुशी
का स्वाद भी पता चलने लगा था। भारतीय सब्जियों को चावल में लपेट कर अच्छी सी
भारतीय स्वाद से भरी सुशी तैयार की गई थी। स्वाद लाजवाब था। सुशी पहले पहले टेस्ट
में सफल और मैं तो उसके बाद खाने में जुट गया। उसके बाद नंबर आया पनीर से भरी सुशी
का स्वाद में वह पहले वाले से भी अव्वल। भई जापानी खाना तो मुझे भा गया। फिर तो एक
के बाद एक जितनी मिली मैं खाता ही चला गया। भारतीय स्वाद के हिसाब से बेहतरीन
शाकाहारी सुशी तैयार की गई थी। पहले हमने डरते – डरते सुशी के कम ही डिब्बे मंगवाए
थे पर अब लगने लगा कि शायद कुछ और मंगा लेते तो ज्यादा अच्छा रहता। खैर अब तो
फिलहाल जो था उन्ही से काम चलाना था तो जिसके हिस्से में जितना आया मजे से स्वाद
लेकर खाया।
सुशी के साथ मेरा पहला
एनकाउंटर तो बेहद सफल रहा। इतनी बढिया चीज की फिर मौका मिले तो जरूर खाऊंगा।
सुशी होता क्या है –
यह एक जापानी भोजन है जिसे
खास तरह से जापानी चावल ( स्टिकी राइस) के बीच में मछली भर कर तैयार किया जाता है।
पारम्परिक रूप से सुशी मांसाहारी ही होती है। लेकिन शाकाहारी सुशी भी
बनाई जाती है ।
सुशी का मजा उसके साथ मिलने
वाला सोया सॉस और वसावी के कारण और भी बढ जाता है। वसावी एक तरह की तीखी जापानी
चटनी होती है जिसे वसाबी नाम के पौधे के तने से बनाया जाता है।

नोट – यहां इस्तेमाल की गई फोटो सुशी जंक्शन से ली गई हैं। उनकी अनुमति के बाद ही
यहां इस्तेमाल किया गया।
सुशी जंक्शन की वेबसाइट से इसकी ज्यादा जानकारी ली जा
सकती है। 

फिर से ब्लाग मे…….

फिर से ब्लाग मे…….

एक साल से भी ज्यादा समय के बाद एक बार फिर से ब्लाग की दुनिया में वापस कदम रख रहा हूँ। किसी कारण से में इस इससे दूर हो गया था। लेकिन अब में फिर यहां वापस आया हूँ। लेकिन इस बीच भी मेरा दुनिया देखने का सिलसिला रुका नहीं और मैने भारत के बहुत से हिस्सो की यात्रा की। मैने जो कुछ भी देखा जल्द ही वो सब आप के सामने होगा। मेरे ना लिखने के बावजूद भी मेरे ब्लाग को पढते रहने के लिए आप सब का शुक्रिया।

डीडी न्यूज पर देखिये सियाचिन की जिंदगी

डीडी न्यूज पर देखिये सियाचिन की जिंदगी

आज रात दस बजकर तीस मिन‍ट पर देखिये सियाचिन और वहां की जिंदगी पर खास कार्यक्रम- सियाचिन एक झलक बर्फीली जिंदगी की। मैं पिछले महीने सियाचिन के सफर पर गया था । वहां हमारे दल ने पन्द्रह हजार फीट की उंचाई पर सियाचिन के बेस कैम्प तीन तक की चढाई की थी। ये कार्यक्रम हमारे सफर और वहा रह रहे सेना के जवानों पर है।

मुसाफिर की सफाई

मुसाफिर की सफाई

पिछला पोस्ट बिना टेक्स्ट के चला गया, गुनहगार -सा महसूस कर रहा हूं। लेकिन सच तो ये है कि तकनीकी नॉलेज में लिद्दड़ होना और ऐन वक्त पर अभिकलित्र यानी कंप्यूटर के धोखे की वजह से ऐसा हुआ। फिर अपने एक भाई की मदद से तस्वीरें लोड करनी चाहीं तो पोस्ट पब्लिश हो गईँ।

पर्यावरण के अनुकूल टाईल्स का प्रयोग करें

पर्यावरण के अनुकूल टाईल्स का प्रयोग करें

आज हमारे शहरों में पीने के पानी की कमा होती जा रही है। जमीन के नीचे का पानी इतनी तेजी से निकाला जा रहा है कि भू जल कम होता जा रहा है। जमीन के नीचे पानी की कमी को पूरा किया जा सकता है अगर सही तरीके से वर्षा के पानी को जमीन के नीचे पहुँचाया जा सके।

ये समस्या हमारे शहरों में कुछ ज्यादा ही देखी जा रही है क्योंकि यहां पानी जमीन के नीचे नहीं जा पाता है। यहां हर तरफ तारकोल की सडकें और पक्के फर्श हैं जिसके कारण पानी जमीन में ना जा कर बह जाता है। इस समस्या एक समाधान है पर्यावरण के अनुकूल टाइलस का इस्तेमाल ।
इन टाईल्स को सडकों के किनारे बने फुटपाथ और घरों के खुली जगहों पर प्रयोग किया जा सकता है।इनकी खासियत ये है (जैसा कि आप फोटो में भी देख रहें हैं) इन टाईल्स को पूरा पक्का ना बनाकर इनके बीच में जगह छोडी जाती है।
इस खाली जगह में से पानी आसानी से जमीन के नीचे जा सकता है। इस तरह की टाईल्स का इस्तेमाल शुरु हो गया है लेकिन अभी बडी ही कम जगहों में इसे प्रयोग में लाया जा रहा है। अब अगर आप को भी घर के बाहर पक्का फर्श बनवाना हो तो इनका इस्तेमाल कर पर्यावरण को बचाने में सहयोग दें।
एक कविता

एक कविता

अभी मेरे दोस्त नें एक कविता सुनाई देश के हालात को साफ बयां करता हैं। ये तो पता नही है कि किसने लिखी लेकिन आप भी पढिये।

मेरा पहला लडका डाक्टर होकर बीमार हो गया,

मेरा दूसरा लडका इंजीनियर होकर बेकार हो गया,

मेरा तीसरा लडका आईएएस होकर लाचार हो गया,

मेरा चौथा लडका नालायक लडका नेता बनकर देश का कर्णधार हो गया।

हजार के पार मेरा ब्लाग……..

हजार के पार मेरा ब्लाग……..

आज दोपहर को जब मैंने अपना ब्लाग देखा तो बेहद खुशी हुई। ढाई महीने के छोटे से समय में मेरा ब्लाग को पढने या देखने वालों की संख्या एक हजार को पार कर गई।
रीडर मीटर पूरे १००० दिखा रहा था और मेरा मन खुशी से भरा जा रहा था। भले ही ये बहुत बडी संख्या नही है, दूसरों के ब्लाग इससे भी ज्यादा देखे और पढे गये होंगें।
फिर भी एक हजार का आंकडा छूना मेरे लिए बडी बात थी। मेरा ख्याल है कि हर ब्लागर के लिए ये खुशी का लमहा होता होगा।
मेरा ये ब्लाग मेरे देश भर मे घूमने फिरने के अनुभवो पर है जिसे मैने सबके साथ बांटा है। न केवल घूमना फिरना बल्कि हर जगह की अलग कला और संस्कृति को ब्लाग पर जगह देने की मेरी कोशिश रही है।
मुझे अच्छा इस बात से भी लग रहा है कि पूरी दुनिया मैं इसे पढा जा रहा है। आगे भी अपने आप सबके साथ यायावरी के नये- नये अनुभव बांटता रहूँगा।
आपके सुझाव भी सादर आमंत्रित हैं।

बंगाल के मुखौटे……

बंगाल के मुखौटे……



हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता देखने के लायक है। आज एक सेमिनार के सिलसिले में दिल्ली के विग्यान भवन में जाना हुआ। वहां दिवार को बंगाल के पारम्परिक मुखौटों से सजाया गया था। देखते ही आखें ठहर गई उनकी खुबसूरती पर। इसमें मां काली, दुर्गा, भगवान गणेश, के मुखौटे थे। ये बंगाल में पूजा के लिए रखे जाते हैं। हालांकि पूरा पता मेरे को भी नहीं है। आप में से किसी को पता हो तो बताईये। उनके के फोटो आप सब के लिए।