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भारतीय स्वाद से भरी जापानी सुशी

भारतीय स्वाद से भरी जापानी सुशी

खाने में मुझे भारतीय खाना ही पसंद है। दाल, चावल , सब्जी
रोटी से ज्यादा कभी इच्छा भी नहीं रही। विदेशी खाने में मेरी पसंद चायनीज से आगे
नहीं जाती। और भारत में बनने वाला चायनीज खाना अब चायनीज कम और भारतीय ज्यादा हो
गया है। ऐसे में कोई मुझे जापानी खाने के लिए कहे तो मेरा चौंकना तो स्वाभाविक है।
ऊपर से मेरे जैसे शाकाहारी के लिए जापानी खाना बात कुछ जमती नहीं। लेकिन खाने का
शौक तो मुझे है और जब पता लगा की शाकाहारी जापानी खाना है मैंने भी चखने का मन बना
ही लिया।
दोस्तों के साथ था तो दिल्ली के मालवीय नगर में  सुशी जंक्शन नाम से खुले एक जापानी रेस्टोरेंट से सुशी के शेफ सलेक्शन प्लेटर का आर्डर दिया
गया। रेस्टोरेंट की तरफ से पक्का भरोसा मिला कि पूरी तरह से शाकाहारी सुशी ही
मिलेगी। हालांकि उनके पास मासांहारी सुशी भी मौजूद हैं।  

आर्डर करने के थोडी ही देर
में ताजा बनी सुशी के डिब्बे हमारे सामने थे। हर डिब्बे में तीन तरह की सुशी का
मिक्स बनाकर रखा गया था। पैंकेजिंग देखकर मन खुश हो गया। कहा भी गया है कि खाने की
थाली जितनी सुन्दरता से सजी होगी खाने वाले को भी उतना ही आनंद मिलेगा। तो डिब्बे
की सजावट और उसमें करीने से रखी सुशी ने पहले ही दिल जीत लिया।
अब बारी थी उसे खाने की , खाने
के लिए साथ में चॉपस्टिक दी गई थी। जापान के लोग सुशी खाने के लिए चॉपस्टिक का
कितना इस्तेमाल करते हैं यह तो मुझे नहीं पता लेकिन इंटरनेट पर ढूंढने से पता चला
कि पारम्परिक तौर से इसे हाथ से ही खाया जाता है। लेकिन मैंने सोचा की पहली बार
सुशी खा ही रहे हैं तो लगे हाथ पहली बार चॉपस्टिक का इस्तेमाल भी  करके देख लिया जाए। मेरे दोस्त अभिनव का साथ
होना काम आया क्योंकि होटल मेनेजमेंट की पढ़ाई कर चुके अभिनव का खाने की चीजों के
साथ लंबा रिश्ता रहा था , अभिनव ने चॉपस्टिक इस्तेमाल करने का तरीका भी सिखा दिया
अब हाथ में चॉपस्टिक पकडकर
कर पहली सुशी को उठाया । साथ में आए सोया सॉस और वसावी में डुबाया और सफाई के साथ
सुशी मुंह के अंदर। पहली बार में ही चॉपस्टिक से बिना कुछ गिराये में सुशी खाने
में सफल रहा था।

अब मेरे मुंह में गई सुशी
का स्वाद भी पता चलने लगा था। भारतीय सब्जियों को चावल में लपेट कर अच्छी सी
भारतीय स्वाद से भरी सुशी तैयार की गई थी। स्वाद लाजवाब था। सुशी पहले पहले टेस्ट
में सफल और मैं तो उसके बाद खाने में जुट गया। उसके बाद नंबर आया पनीर से भरी सुशी
का स्वाद में वह पहले वाले से भी अव्वल। भई जापानी खाना तो मुझे भा गया। फिर तो एक
के बाद एक जितनी मिली मैं खाता ही चला गया। भारतीय स्वाद के हिसाब से बेहतरीन
शाकाहारी सुशी तैयार की गई थी। पहले हमने डरते – डरते सुशी के कम ही डिब्बे मंगवाए
थे पर अब लगने लगा कि शायद कुछ और मंगा लेते तो ज्यादा अच्छा रहता। खैर अब तो
फिलहाल जो था उन्ही से काम चलाना था तो जिसके हिस्से में जितना आया मजे से स्वाद
लेकर खाया।
सुशी के साथ मेरा पहला
एनकाउंटर तो बेहद सफल रहा। इतनी बढिया चीज की फिर मौका मिले तो जरूर खाऊंगा।
सुशी होता क्या है –
यह एक जापानी भोजन है जिसे
खास तरह से जापानी चावल ( स्टिकी राइस) के बीच में मछली भर कर तैयार किया जाता है।
पारम्परिक रूप से सुशी मांसाहारी ही होती है। लेकिन शाकाहारी सुशी भी
बनाई जाती है ।
सुशी का मजा उसके साथ मिलने
वाला सोया सॉस और वसावी के कारण और भी बढ जाता है। वसावी एक तरह की तीखी जापानी
चटनी होती है जिसे वसाबी नाम के पौधे के तने से बनाया जाता है।

नोट – यहां इस्तेमाल की गई फोटो सुशी जंक्शन से ली गई हैं। उनकी अनुमति के बाद ही
यहां इस्तेमाल किया गया।
सुशी जंक्शन की वेबसाइट से इसकी ज्यादा जानकारी ली जा
सकती है। 

फिर से ब्लाग मे…….

फिर से ब्लाग मे…….

एक साल से भी ज्यादा समय के बाद एक बार फिर से ब्लाग की दुनिया में वापस कदम रख रहा हूँ। किसी कारण से में इस इससे दूर हो गया था। लेकिन अब में फिर यहां वापस आया हूँ। लेकिन इस बीच भी मेरा दुनिया देखने का सिलसिला रुका नहीं और मैने भारत के बहुत से हिस्सो की यात्रा की। मैने जो कुछ भी देखा जल्द ही वो सब आप के सामने होगा। मेरे ना लिखने के बावजूद भी मेरे ब्लाग को पढते रहने के लिए आप सब का शुक्रिया।

डीडी न्यूज पर देखिये सियाचिन की जिंदगी

डीडी न्यूज पर देखिये सियाचिन की जिंदगी

आज रात दस बजकर तीस मिन‍ट पर देखिये सियाचिन और वहां की जिंदगी पर खास कार्यक्रम- सियाचिन एक झलक बर्फीली जिंदगी की। मैं पिछले महीने सियाचिन के सफर पर गया था । वहां हमारे दल ने पन्द्रह हजार फीट की उंचाई पर सियाचिन के बेस कैम्प तीन तक की चढाई की थी। ये कार्यक्रम हमारे सफर और वहा रह रहे सेना के जवानों पर है।

मुसाफिर की सफाई

मुसाफिर की सफाई

पिछला पोस्ट बिना टेक्स्ट के चला गया, गुनहगार -सा महसूस कर रहा हूं। लेकिन सच तो ये है कि तकनीकी नॉलेज में लिद्दड़ होना और ऐन वक्त पर अभिकलित्र यानी कंप्यूटर के धोखे की वजह से ऐसा हुआ। फिर अपने एक भाई की मदद से तस्वीरें लोड करनी चाहीं तो पोस्ट पब्लिश हो गईँ।

पर्यावरण के अनुकूल टाईल्स का प्रयोग करें

पर्यावरण के अनुकूल टाईल्स का प्रयोग करें

आज हमारे शहरों में पीने के पानी की कमा होती जा रही है। जमीन के नीचे का पानी इतनी तेजी से निकाला जा रहा है कि भू जल कम होता जा रहा है। जमीन के नीचे पानी की कमी को पूरा किया जा सकता है अगर सही तरीके से वर्षा के पानी को जमीन के नीचे पहुँचाया जा सके।

ये समस्या हमारे शहरों में कुछ ज्यादा ही देखी जा रही है क्योंकि यहां पानी जमीन के नीचे नहीं जा पाता है। यहां हर तरफ तारकोल की सडकें और पक्के फर्श हैं जिसके कारण पानी जमीन में ना जा कर बह जाता है। इस समस्या एक समाधान है पर्यावरण के अनुकूल टाइलस का इस्तेमाल ।
इन टाईल्स को सडकों के किनारे बने फुटपाथ और घरों के खुली जगहों पर प्रयोग किया जा सकता है।इनकी खासियत ये है (जैसा कि आप फोटो में भी देख रहें हैं) इन टाईल्स को पूरा पक्का ना बनाकर इनके बीच में जगह छोडी जाती है।
इस खाली जगह में से पानी आसानी से जमीन के नीचे जा सकता है। इस तरह की टाईल्स का इस्तेमाल शुरु हो गया है लेकिन अभी बडी ही कम जगहों में इसे प्रयोग में लाया जा रहा है। अब अगर आप को भी घर के बाहर पक्का फर्श बनवाना हो तो इनका इस्तेमाल कर पर्यावरण को बचाने में सहयोग दें।
एक कविता

एक कविता

अभी मेरे दोस्त नें एक कविता सुनाई देश के हालात को साफ बयां करता हैं। ये तो पता नही है कि किसने लिखी लेकिन आप भी पढिये।

मेरा पहला लडका डाक्टर होकर बीमार हो गया,

मेरा दूसरा लडका इंजीनियर होकर बेकार हो गया,

मेरा तीसरा लडका आईएएस होकर लाचार हो गया,

मेरा चौथा लडका नालायक लडका नेता बनकर देश का कर्णधार हो गया।

हजार के पार मेरा ब्लाग……..

हजार के पार मेरा ब्लाग……..

आज दोपहर को जब मैंने अपना ब्लाग देखा तो बेहद खुशी हुई। ढाई महीने के छोटे से समय में मेरा ब्लाग को पढने या देखने वालों की संख्या एक हजार को पार कर गई।
रीडर मीटर पूरे १००० दिखा रहा था और मेरा मन खुशी से भरा जा रहा था। भले ही ये बहुत बडी संख्या नही है, दूसरों के ब्लाग इससे भी ज्यादा देखे और पढे गये होंगें।
फिर भी एक हजार का आंकडा छूना मेरे लिए बडी बात थी। मेरा ख्याल है कि हर ब्लागर के लिए ये खुशी का लमहा होता होगा।
मेरा ये ब्लाग मेरे देश भर मे घूमने फिरने के अनुभवो पर है जिसे मैने सबके साथ बांटा है। न केवल घूमना फिरना बल्कि हर जगह की अलग कला और संस्कृति को ब्लाग पर जगह देने की मेरी कोशिश रही है।
मुझे अच्छा इस बात से भी लग रहा है कि पूरी दुनिया मैं इसे पढा जा रहा है। आगे भी अपने आप सबके साथ यायावरी के नये- नये अनुभव बांटता रहूँगा।
आपके सुझाव भी सादर आमंत्रित हैं।

बंगाल के मुखौटे……

बंगाल के मुखौटे……



हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता देखने के लायक है। आज एक सेमिनार के सिलसिले में दिल्ली के विग्यान भवन में जाना हुआ। वहां दिवार को बंगाल के पारम्परिक मुखौटों से सजाया गया था। देखते ही आखें ठहर गई उनकी खुबसूरती पर। इसमें मां काली, दुर्गा, भगवान गणेश, के मुखौटे थे। ये बंगाल में पूजा के लिए रखे जाते हैं। हालांकि पूरा पता मेरे को भी नहीं है। आप में से किसी को पता हो तो बताईये। उनके के फोटो आप सब के लिए।