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भूटान की पहचान – टाइगर नेस्ट – Trek to Tiger’s nest ( Taktsang) Monastery

भूटान की पहचान – टाइगर नेस्ट – Trek to Tiger’s nest ( Taktsang) Monastery

टाइगर नेस्ट मठ आज पूरी दुनिया में भूटान की पहचान है। यह भूटान के सबसे पवित्र बौद्ध मठों में से एक है। इस बौद्ध मठ को तक्तसांग मठ ( Taktsang Monastery) भी कहा जाता है। पारो घाटी में एक ऊंची पहाड़ी चट्टान पर टंगा सा दिखाई देता यह मठ यहां आने की इच्छा रखने वालों को चुनौती सी देता लगता है। यह मठ करीब 3120 मीटर की ऊंचाई पर एक पहाडी कगार पर बना है। पारो शहर से मठ की चढाई शुरू करने की जगह करीब 12 किलोमीटर दूर है। रास्ते में कुछ जगहों से टाइगर नेस्ट दिखाई देता है। सड़क से देखने पर पहाड की सीधी कगार पर टंगे मठ पर चढना अंसभव सा ही लगता है।

मैं और मेरे ट्रेवल ब्लागर दोस्तो ने टाइगर नेस्ट का सफर सुबह जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी शुरु करने का सोचा। सुबह जल्दी चढ़ाई करने पर सुबह की ठंडक और कम भीड के बीच आराम से चढाई कर सकते हैं। हम सब तैयार होकर करीब आठ बजे होटल से निकले। चढाई शुरू करने की जगह से करीब 8.30 बजे हमने मठ के लिए 5.5 किलोमीटर की चढ़ाई शुरू की। जहां से चढ़ाई शुरू होती है वह जगह घने जंगल के बीच है।

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रास्ते से ठीक पहले एक पटरी बाजार है जहां से यादगार के तौर पर टाइगर नेस्ट से जुडी चीजों की खरीदारी की जा सकती है। इसी छोटे से बाजार से होकर हम आगे बढ़े। आगे बढ़ते ही चीड़ और दूसरे पहाडी पेडों का जंगल शुरू हो जाता है। घने और शांत जंगल के बीच थोड़ा सा आगे बढने के बाद पानी का एक झरना है जिस पर पानी मदद से घूमने वाले बौद्ध प्रार्थना चक्र बने हैं।

 प्रार्थना चक्र
प्रार्थना चक्र

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बौद्ध धर्म में पवित्र माने जाने वाले रंग बिरगी पताकाएं भी खूब दिखाई देती है। जंगल में रूककर थोडे फोटो लिए और आगे बढे। कुछ आगे बढने पर चढाई से सामना होता है। रास्ता कच्चा है और संभल कर आगे बढने में ही समझदारी है। लेकिन आराम से चलते रहे तो चढ़ाई का पता नहीं चलता। कई जगहों से पारो घाटी का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। आंखों से सामने पूरी पारो घाटी नजर आती है।

पारो घाटी का नजारा
पारो घाटी का नजारा
रास्ता
रास्ता

लगभग आधा सफर तय करने के बाद एक बडा प्रार्थना चक्र आता है। हम यहां कुछ देर रूके पीछे से आ रहे सब लोगो को साथ लिया और आगे बढे। यहां मुझे पानी पीने की खाली प्लास्टिक बोतलों से बने बहुत से प्रार्थना चक्र भी दिखाई दिए।

प्लास्टिक बोतलों से बने प्रार्थना चक्र
प्लास्टिक बोतलों से बने प्रार्थना चक्र

पर्यटकों की बढती तादात से पर्यावरण पर पडते प्रभाव को कुछ कम करने का यह अच्छा प्रयास है। अच्छी बात यह है कि पर्यावरण और स्थानीय संस्कृति पर पडने वाले प्रभाव को देखते हुए ही भूटान में बहुत देर से और धीर-धीरे देश के इलाकों को पर्यटकों के लिए खोला गया है। और आज भी इस देश में पर्यटक के तौर पर आने पर बहुत से नियम और कायदों का पालन करना पडता है।
इसी जगह के पास एक रेस्टोरेंट भी बना है जो मुख्य रास्ते से थोड़ा हट कर है। चाहें तो वहां आराम कर सकते हैं लेकिन अधिकतर पर्यटक मठ से वापसी के दौरान वहां खाना खाने के लिए रूकते हैं। हम भी सीधे आगे बढे और वापसी में रूकने का तय किया।

व्यपांइट से टाइगर नेस्ट
व्यूपांइट से टाइगर नेस्ट

मठ से करीब एक किलोमीटर पहले एक व्यूपांइट आता है। यह जगह ऊंचाई में मठ के लगभग बराबर और उसके ठीक सामने हैं। इसलिए यहां से मठ की सबसे शानदार तस्वीरें ली जा सकती हैं। इसी वजह से इस जगह को व्यू पाइट कहते हैं। व्यूपांइंट पर हम सबने भी फोटो खिंचवाए। मठ के बहुत सारे फोटो लिए। सुनहरा छत से बना मठ बेहद शानदार लगता है। नीचे से जिस मठ तक पहुचना असंभव लग रहा था यहां पहुंच कर लगता है कि मंजिल पर पहुंच ही जाएंगे।

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व्यूपाइंट के बाद मठ तक पहुंचने के लिए सीधे घाटी में उतराई शुरू होती है। यहां से उतरने के लिए सीढियां बनी हैं। सीढियों से उतरते ही एक बडा विशाल झरना है जिसे पुल से पार किया जाता है। इस झरने को पवित्र माना जाता है।

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घाटी में उतरने के बाद मठ से पहुंचने के लिए करीब 150 सीढियां चढनी पडती हैं। इस तरह से करीब 750 सीढियों का सफर तय करके मठ तक पहुंचा जा सकता है।
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मठ पर पहुंच कर अनोखी शांति का एहसास होता है बस झरने के पानी गिरने की आवाज सुनाई देती है। मठ के बाहर से खडे होकर फोटो लिए जा सकते हैं। मठ के अंदर कैमरा या मोबाइल ले जाना मना है। इसलिए यहां बाहर बने लॉकर में सब सामान रखा। लॉकर पर कोई देखभाल करने वाला या कोई ताला नहीं है अलमारी में बने छोटे – छोटे लॉकर हैं जिनमें सामान रखिए भगवान भरोसे सामान छोडिए और चले जाइए। शायद बौद्ध धर्म का असर है कि भूटान में अपराध बेहद कम होते हैं इसलिए मठ जैसी जगहों पर चोरी के बारे में किसी ने नहीं सोचा होगा। लेकिन बेहतर होगा कि आप एक छोटा ताला साथ ले जाएं और लॉकर पर लगा दें। मैं एक छोटा ताला अपने साथ रखता हूं तो यहां वह काम आया, सबका सामान लॉकर में रखा और बिना चिन्ता के मठ में चले गए।
पहाडी की कगार पर बना मठ कई हिस्सों में बना है। कगार से साथ ऊपर उठते कई मंदिरों का समूह है। यहां कुल चार मुख्य मंदिर हैं। इसमें सबसे प्रमुख भगवान पद्मसंभव का मंदिर है जहां उन्होंने तपस्या की थी। इस मठ के बनने की कहानी भी भगवान पद्मसंभव से ही जुडी है।

कैसे बना टाइगर नेस्ट

भूटान की लोककथाओं के अनुसार इसी मठ की जगह पर 8वीं सदी में भगवान पद्मंसभव ने तपस्या की थी। पहाडी की कगार पर बनी एक गुफा में रहने वाले राक्षस को मारने के लिए भगवान पद्मसंभव एक बाघिन पर बैठ तिब्बत से यहां उड़कर आए थे। यहां आने के बाद उन्होंने राक्षस को हराया और इसी गुफा में तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन और तीन घंटे तक तपस्या की । भगवान पद्मसंभव बाघिन पर बैठ कर यहां आए थे इसी कारण इस मठ को टाइगर नेस्ट भी बुलाया जाता है। भगवान पद्मसंभव को स्थानीय भाषा में गुरू रिम्पोचे की कहा जाता है।

यहां सबसे पहले वर्ष 1692 में मठ परिसर बनाया गया। उसके बाद समय – समय पर यहां निर्माण का काम होता रहा। कुछ वर्ष पहले 19 अप्रेल 1998 के दिन मठ में भयानक आग लगी जिसके बाद मठ का बडा हिस्सा नष्ट हो गया था। जिसके बाद इसे फिर से बनाया गया है।

मठ सभी मंदिरों को देखते हुए करीब 2 घंटे बिताने के बाद वापसी का सफर शुरू किया। कुछ देर में व्यूपांइट पर पहुंचे। इस समय तक दोपहर बाद का समय हो चुका था। इस समय सूरज मठ के सामने था इसलिए मठ के अच्छे फोटो आ रहे थे। दरअसल सूरज मठ के ठीक पीछे से ही निकलता है इसलिए सुबह के समय अच्छे फोटो लेना मुश्किल है, दोपहर बाद सूरज मठ के सामने आ जाता है जिससे व्यूपांइंट से मठ के अच्छे फोटो लिए जा सकते हैं।

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वापसी में हम सब लोग खाना खाने के लिए आधे रास्ते में बने रेस्टोरेंट में रूके। रेस्टोरेंट से मठ का नजारे लेते हुए खाना खाने का आनंद लिया जा सकता है। यहां से भी मठ के अच्छे फोटो आते हैं कई लोग जो टाइगर नेस्ट तक नहीं जा पाते यहीं से फोटो लेकर वापस चले जाते हैं।
टाइगर नेस्ट के पूरे रास्ते में खाने की यही एक जगह है , 400 रूपये की एक थाली जिसमें भरपेट खा सकते हैं। खाना साधारण लेकिन बेहतर था। इतना थककर आने के बाद इस खाने की बहुत जरुरत पडती है।

भूटान की इस मामले में दाद देनी पडेगी कि पर्यटन के दबाव के बावजूद उन्होंने अपने नियमों से समझौता नहीं किया है। 5.5 किलोमीटर की चढाई के पूरे रास्ते में एक ही रेस्टोरेंट को इजाजत दी गई है। इसके उलट भारत में किसी भी धार्मिक जगह की चढाई पर चले जाइए पूरा रास्ता खाने पानी का दुकानों से भरा मिलेगा। जिसके कारण हर जगह गंदगी और प्लास्टिक नजर आती है।
एक बात और पता चली कि यहां के स्थानीय गाइड और लोग मिलकर अकसर रविवार के दिन चढाई के पूरे रास्ते की सफाई करते हैं। रास्ते में पडे कचरे और प्लास्टिक की बोतलों को एक जगह जमा करके नीचे लाया जाता है। पर्यावरण के महत्व को भूटान के लोगों ने अच्छे से समझा है। ये कुछ अच्छी बातें हैं जो भूटान से सीखी जा सकती हैं।

खाना खाने के बाद हमने भी थोडा तेजी से उतरना शुरू किया। शाम होने के साथ आसमान में बादल दिखाई देने लगे थे। बरसात होने पर परेशानी खड़ी हो सकती थी। एक बार हल्की बूंदा-बांदी तो जरूर मिली लेकिन तेज बरसात का सामना नहीं करना पडा। करीब 4 बजे तक हम नीचे आ चुके थे। नीचे बने पटरी बाजार से मठ की यादगार के तौर पर कुछ चीजें खरीदी और पारो के लिए निकल गए।

Note- मेरी भूटान यात्रा को ट्रेवल कंपनी भूटान बुकिंग ने प्रायोजित किया था।
My trip to Bhutan was sponsored by travel company Bhutan Bookings. For any booking you can contact them.


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फुनशलिंग से थिम्पू की ओर…

फुनशलिंग से थिम्पू की ओर…

फुनशलिंग में एक रात बिताने के बाद अगले दिन सुबह हम सभी थिम्पू के लिए निकले। फुनशलिंग से थिम्पू करीब 170 किलोमीटर दूर है और इसे तय करने में पांच से छ: घंटे लगते हैं । फुनशलिंग से पहाड़ों का असली सफर भी शुरू हो जाता है। फुनशलिंग से निकलते ही थिम्पू जाने वाले रास्ते से कुछ हट कर करबंदी बौद्ध मठ ( karbandi Monastry) बना है इसे रिचेनडिंग मठ (Richending Gompa) भी कहते हैं।

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यह हमारी भूटान यात्रा का सबसे पहला मठ था। शहर से कुछ ऊंचाई पर बने इस मठ से फुनशलिंग , भारत के शहर जयगांव और बंगाल के नदियों से घिरे मैदानी इलाकों का जबरदस्त नजारा देखने को मिला। दूर- दूर तक बंगाल के हरे- भरे जंगल दिखाई दे रहे थे। हम शायद सही समय पर नहीं पहुंचे थे इसलिए यह मठ बंद मिला। लेकिन चारों तरफ दिखाई दे रहे दृश्यों ने मन मोह लिया। कुछ देर रूक कर फोटो लिए और थिम्पू के लिए रवाना हुए।

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सफर पर आगे बढ़ने के साथ ही रास्ते के दृश्य भी बदलने लगे। ऊंचाई बढ़ने के साथ सड़क के दोनों तरफ पहाड़ी पेड़ पौधे नजर आने लगे। जंगल भी ज्यादा हरा और घना दिखाई दे रहा था। दूर-दूर जहां तक नजर जाए पहाड़ पेड़ों से भरे नजर आ रहे थे। भारत के पहाडी इलाकों में भी जंगल नजर आते हैं लेकिन इतने घने पहाड़ी जंगल मैंने इससे पहले केवल अरूणाचल प्रदेश में ही देखे थे। शायद हिमाचल या उत्तराखंड जैसे पहाडी राज्यों में आबादी का दबाव ज्यादा है जिसके कारण जंगल कम नजर आने लगे हैं। थिम्पू के आधे रास्ते पर चूखा नाम की जगह पड़ती है। चाय पीने का मन करने लगा तो सब लोग चूखा में ही रूके।

बटर वाली चाय
बटर वाली चाय

सड़क के किनारे के रेस्टोरेंट में चाय पीने पहुंचे तो पता चला की भूटान की नमकीन बटर चाय भी मिल जाएगी। तो बस बटर वाली चाय का ही आर्डर दे दिया। मक्खन वाली चाय जिसे लद्दाख में गुड़गुड़ चाय भी कहते हैं , ऊंचाई वाले सभी हिमालयी इलाकों में पी जाती है। इसे लकड़ी से बने एक खोखले बेलनाकार बरतन में चाय के उबले पानी, मक्खन और नमक डालकर बनाया जाता है। बरतन में सबकुछ डालने के बाद काफी देर तक उसे लकड़ी से हिला कर मिलाया जाता है जिससे गुड-गुड जैसी आवाज निकलती है। इसलिए इसे गुड-गुड चाय भी कहते हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में सर्दी से बचने के लिए कैलोरी की काफी जरूरत होती है और मक्खन वाली चाय उस जरूरत को पूरा करती है।

चूखा परियोजना
चूखा परियोजना

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चाय पीने के बाद बाहर आए तो सड़क से चूखा जलविद्युत परियोजना का कुछ हिस्सा दिखाई दिया। चूखा में वांग-चू (नदी) पर जलविद्युत परियोजना बनी है। भूटानी भाषा में नदी को चू(Chu) कहा जाता है। दूर से ही सही परियोजना के कुछ फोटो लिए। साथ में बताता चलूं कि 336 मेगावाट की चूखा जलविद्युत परियोजना भारत के सहयोग से ही बनाई गई है। यह भूटान की सबसे बड़ी और शुरूआती परियोजनाओं में से एक हैं।
भूटान इस मामले में खास है कि यहां बिजली का उत्पादन खपत से ज्यादा है। इसलिए बिजली की कटौती कहीं दिखाई नहीं देती। इसके साथ यही बिजली भूटान की कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी है। भारत बड़े पैमाने पर भूटान से बिजली खरीदता है।

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यहीं पहली बार समझ में आया की भूटान सिर्फ देखने में ही नहीं बल्कि काम करने के तरीकों में भी हमसे बेहतर है। सड़क के दूसरी और एक लंबा प्लेटफार्म बना था जिस पर भूटान की पारम्परिक स्थापत्य कला की याद दिलाती छत पडी थी। उस प्लेटफार्म पर कुछ स्थानीय महिलाएं छोटी सी दुकान लगाकर रोजमर्रा की जरूरत का सामान बेच रहीं थी। कुछ फल, सब्जियां, स्थानीय पनीर, और भूटान में सबका पसंदीदा सूखा चीज। सड़क के किनारे का यह बाजार भारत में जगह-जगह दिखाई देने वाले बेतरतीब ठेलों से कहीं अलग और खूबसूरत था। कल फुनशलिंग की शांति में मन मोह लिया था तो आज भूटान में लोगों के काम करने के तरीके ने।

चूखा में ही भारत सीमा सड़क संगठन का कैम्प भी था। फुनशलिंग से थिम्पू जाने वाले हाईवे का निर्माण और इसकी देखभाल भारतीय सीमा सड़क सगठन ही करता है। सडक काफी बेहतर बनी हुई थी। सिर्फ यही नहीं आगे भी हमें जो भी हाईवे भूटान में दिखाई दिए सभी का जिम्मा भारतीय सीमा सड़क संगठन के ही पास है। चूखा में समय बिताने के बाद हम थिम्पू के लिए निकल लिए।

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दोपहर होते –होते गाड़ी थिम्पू पहुंची। थिम्पू छोटा शहर है। आबादी भी ज्यादा नहीं है। पहली ही नजर में शहर बहुत व्यवस्थित नजर आता है। साफ सुथरी सड़कें, सड़कों के किनारे बने खूबसूरत घर और दुकानें। हर तरफ एक व्यवस्था दिखाई देती है।
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भूटान के कानून के अनुसार इमारत को बाहर से भूटानी स्थापत्य के हिसाब से ही बनाना पड़ता है। इसलिए रंगबिरंगी इमारतें बहुत सुन्दर दिखाई देती हैं। भूटान भूकम्प के लिहाज से बेहद संवेदनशील है इसलिए भूकम्प को लेकर यहां कड़े कानूनों का पालन किया जाता है। कोई भी इमारत पांच मंजिल से ऊंची नहीं हो सकती। इसके साथ ही इमारत का भूकम्परोधी तकनीक से बना होना जरूरी है। इसकी मंजूरी के बिना आप इमारत बना ही नहीं सकते।

थिम्पू पहुंचते – पहुंचते दोपहर हो चुकी थी। तो पहले होटल ताज ताशी पहुंचे। भूटान के जोंग ( किला) के नमूने पर इस होटल को बनाया गया है। होटल में खाना खाने के बाद थिम्पू को देखने का सफर शुरू हुआ।

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सबसे पहले थिम्पू के मोटीथांग टाकिन संरक्षण केन्द्र (Motithang Takin Preserve) में पहुंचे। थिम्पू आने से पहले तक मैंने टाकिन(Takin) नाम के जानवर के बारे में सुना ही नहीं था। जानकर चौंक गया कि टाकिन भूटान का राष्ट्रीय पशु है। कुछ-कुछ गाय जैसा दिखाई देने वाले टाकिन बेहद सुस्त जीव होता है। भारी – भरकम टाकिन गाय और बकरे का मिलाजुला रूप लगता है। इसी वजह से टाकिन को लेकर कई किवदंतियां भी प्रचलित हैं।

टाकिन
टाकिन

भूटान की लोककथा है कि टाकिन को तिब्बत से आए एक संत द्रुपका कुनले ने उत्पन्न किया था। उन्होंने एक बकरे के सिर को गाय की हड्डियों से जोड़ दिया जिससे टाकिन की उत्पत्ति हुई। इसी महत्व को देखते हुए टाकिन को भूटान का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया।

शाक्यमुनि बुद्ध
शाक्यमुनि बुद्ध

टाकिन को देखने के बाद अगली जगह थी शाक्यमुनी बुद्ध की मूर्ति। हाल ही में थिम्पू शहर की ऊंची पहाड़ी पर भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा बनाई गई है। प्रतिमा 51.5 मीटर ऊंची है और विश्व की सबसे ऊंची बुद्ध प्रतिमाओं में से एक है। अभी भी उस जगह को बनाने का काम चल ही रहा है। ऊंचाई पर होने के कारण यहां से पूरे थिम्पू शहर का शानदार नजारा दिखाई देता है। सिर्फ थिम्पू ही नहीं पिछले कुछ वर्षों में विशाल बुद्ध मूर्तियां भारत के लद्दाख और स्पिति में भी बनाई गई हैं। अंधेरा होने लगा था इसलिए आज का सफर यहीं खत्म करके वापस होटल पहुंच गए। होटल में कुछ देर आराम के बाद थिम्पू की नाइट लाइफ को देखने के लिए निकलना था। थिम्पू की नाइट लाइफ सुनकर आप चौंक गए होंगें। तो अगले पोस्ट में बात थिम्पू की रात की चमचमाती जिंदगी पर…..

कैसे पहुंचें- फुनशलिंग से थिम्पू के लिए आसानी से टैक्सी मिल जाती है।
भूटान की बस सेवा से भी थिम्पू पहुंचा जा सकता है। फुनशलिंग बस अड्डे से थिम्पू के लिए बस मिल जाती हैं। किराया करीब 230 रूपये। भूटान में बस सेवा निजी हाथों में हैं और कई कम्पनियां बसों को चलाती हैं। बसों के रूप में टोयाटा की छोटी कोस्टर बसों का इस्तेमाल किया जाता है। जो आरामदायक भी हैं।

भूटान की बस सेवा
भूटान की बस सेवा

नोट – भूटान की यह यात्रा भूटान बुकिंग की तरफ से प्रायोजित की गई थी।

भूटान के रास्ते पर…

भूटान के रास्ते पर…

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बौद्ध धर्म से जुड़ी तीन जगहों ने बचपन से मेरा ध्यान खींचा है। एक अनोखी दुनिया जिनके साथ रहस्य, कहानियां और अनेक किवदंतियां जुडी हैं। जहां मठों में बौद्ध भिक्षु रहते है, असीम शक्तियों के साथ। कोई उड़ सकता है कोई पानी पर चल सकता है तो कोई पल झपकते गायब हो सकता है। ऐसी कहानियों से एक रहस्य भरी दुनिया का खाका बचपन से ही मेरे दिमाग में बन गया था।

इन तीन जगहों में से एक था लद्दाख, दूसरा तिब्बत और तीसरा था भूटान। दुनिया बदल गई। मैं भी बचपन से बाहर आ गया लेकिन इन जगहों के लिए दीवानापन बना रहा। कुछ साल पहले लद्दाख जाने का सपना तो पूरा हुआ, दिमाग में बने कुछ पुराने खाके मिटे तो कुछ नए बने। तिब्बत जाना अभी दूर है शायद एक दिन पूरा होगा । इसी बीच भूटान जाने का मौका मिल गया। मेरा दिल खुशी से भरा था क्योंकि सपने के एक और हिस्से को पूरा करने और देखने का मौका मिल रहा था। कई दिन पहले से भूटान की तैयारियां शुरू हुई। आखिरकार दिल्ली से हवाई जहाज में बैठ 4 ब्लॉगर साथियों के साथ भूटान के सफर पर निकल गया । पहले दिल्ली से पश्चिम बंगाल के शहर बागडोगरा तक हवाई जहाज और फिर वहां से सड़क के जरिए भूटान जाना था। मैं इस इलाके में पहले कभी नहीं गया था इसलिए उत्साह ज्यादा था।

सुना था कि भूटान बहुत रोमांचक होगा लेकिन मेरे सफर का रोमांच तो हवाई जहाज में ही शुरू हो गया। मानसून के इन दिनों में पूर्वी भारत के ऊपर उड़ान भर रहा हमारा हवाईजहाज घने बरसते बादलों के दबाव में कई जगह हिचकोले खा रहा था। बागडोगरा उतरने से कुछ पहले तो यह हालत थी कि पिछली सीट पर बैठे एक महाशय बाकायदा जोर-जोर से भगवान को याद कर रहे थे और उनके साथ आए सज्जन दिलासा दे रहे थे कि मैं हूं ना साथ कुछ नहीं होगा। मैंने मन ही मन सोचा कि भईए कुछ होगा तो तुम ही कौनसा बचा लोगे । सुपरमैन तो बन नहीं जाओगे। खैर कुछ मिनट तक यह दौर चला और उसके बाद हम सही सलामत बागडोगरा उतर गए। पर आगे के लिए सावधानी रखने का सबक भी मिला, साफ था कि भूटान में बरसात का ज्यादा जोर झेलने के लिए तैयार रहना होगा।

करीब दो घंटे की उड़ान के बाद मैं दोपहर करीब 12.20 बजे बागडोगरा पहुंचा । बागडोगरा छोटा सा हवाई अड्डा है। वायु सेना इसे अपने लिए इस्तेमाल करती है और यहां से सामान्य हवाईसेवा भी चलती है। बागडोगरा के हवाई अड्डे से एक के बाद एक उड़ते दिखाई देते हेलिकॉप्टरों को देखकर यह बात साफ थी कि यह वायुसेना के लिए यह हवाईअड्डा बेहद अहम है। ऐसा होना जरूरी भी है क्योंकि बागडोगरा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन इन चार देशों की सीमा के पास है।

हवाईअड्डे से बाहर निकलने में ज्यादा देर नहीं लगी। बाहर भूटान बुकिंग की तरफ से दीपांजन हम लोगों को लेने के लिए कलकत्ता से आए थे। और आगे भूटान के पूरे सफर में दीपांजन हमारे साथ ही रहने वाले थे। यहां आप को बता दूं कि मेरे को मिलाकर कुल पांच ट्रैवल ब्लॉगर भूटान बुकिंग नाम की ट्रेवल कंपनी के निमंत्रण पर भूटान जा रहे थे। भूटानबुकिंग भूटान के कुछ अनछुए हिस्सों से हमारा परिचय करवाना चाहती थी।

बागडोगरा से निकल कर मुझे वहां से भारत और भूटान की सीमा पर पहले भूटान के शहर फुनशलिंग पहुंचना था। आज रात को फुनशलिंग में ही रूककर अगले दिन भूटान की राजधानी थिम्पू जाना था। बागडोगरा से फुनशलिंग करीब 170 किलोमीटर दूर है। सड़क के रास्ते भारत से भूटान जाने वालों के लिए सबसे आम रास्ता यही है। भारत के निवासियों को भूटान जाने के लिए किसी तरह के वीजा की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन आपको एक परमिट जरूर बनवाना होता है। अगर आपने पहले से परमिट नहीं बनवाया है तो यह काम फुनशलिंग पहुंच कर किया जा सकता है।

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बागडोगरा हवाईअड्डे से बाहर निकल कर हम दोपहर का खाना खाने के लिए एक छोटे से रेस्टोरेंट में रूके। यहां पूरी तरह उत्तर भारत का पंजाबी स्टाइल खाना मिल गया । दीपांजन ने पहले ही बता दिया कि आज जी भर कर खा लीजिए कल से उत्तर भारत का दिल्ली वाला पंजाबी स्वाद वाला खाना नहीं मिलेगा। अगले दिन से हमें भूटान के खाने की आदत डालनी थी। रेस्टोरेंट का खाना काफी अच्छा था। खाना खाने के बाद हम लोग चल पड़े ।

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पश्चिम बंगाल के इस इलाके को द्वार या डूअर्स के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल भूटान ,सिक्किम और दार्जिलिंग जैसे ऊंचे पहाड़ी जगहों तक जाने का रास्ते यहीं से होकर जाता है इसलिए इसे द्वार (दरवाजा) कहा जाने लगा शायद अंग्रेजों के आने के बाद द्वार से डोर (Door) और आखिर में डूअर्स(Dooars) हो गया। दार्जिलिंग से लगता डूअर्स का इलाका अपने चाय बागानों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

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रास्ते के दोनों तरफ बड़े-बड़े चाय बागान दिखाई देते हैं। उन काम करते लोग तन्मयता से चाय की पत्तियां तोड़ते नजर आ रहे थे। चाय के बागान, हरे- भरे जंगल और नदियों से भरे डूअर्स के इलाके को पर्यटकों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार भी भरपूर कोशिश कर रही है। मैं यहां रूक तो नहीं पाया लेकिन इस इलाके में फिर से आने का पक्का इरादा बन गया । बारिश इस इलाके में बहुत होती है और शायद पानी का जमाव भी। इसलिए अधिकर घरों को जमीन से कुछ फीट ऊंचा उठाकर बनाया गया था। कंक्रीट के बने मकान पक्के खंभों पर बने थे तो बांस के बने घरों को बांस की ही बल्लियों पर बनाया गया था।

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पूरा रास्ता बेहद हरा-भरा और नदी नालों से घिरा है। इस खूबसूरत रास्ते पर चलने में मजा आ रहा था। रास्ते में कई जगह घने जंगल भी पड़े। जलदापाड़ा राष्ट्रीय उद्यान भी इसी रास्ते में पड़ता है । इस उद्यान में हाथी और गैंड़े देखे जा सकते हैं। पश्चिम बंगाल के किसी इलाके में भी गैंड़े मिलते हैं यह जलदापाड़ा से गुजरने के दौरान ही पता चला । यह भी जानकारी मिली कि जिस हाइवे पर हम जा रहे हैं उस पर हाथियों की अकसर आवाजाही होती रहती है। थोड़ी देर में बादल छा गए और तेज बरसात भी होने लगी। अब तो रास्ते का मजा और भी बढ़ गया।

तीस्ता नदी
तीस्ता नदी

दार्जिलिंग जिले से गुजरते हुए तीस्ता नदी पर बने कॉरोनेशन ब्रिज को पार करना पडता है। इस पुल से पूरे वेग से बहती हुई तीस्ता नदी का शानदार नजारा दिखाई देता है। यहीं से एक रास्ता गंगटोक ( सिक्किम) के लिए निकल जाता है। अगर समय हो तो कुछ देर रुक पुल के पास रूका जा सकता है। 1941 में बना यह पुल इंजीनियरिंग का भी बेहतरीन नमूना है।

जयगांव
जयगांव

बारिश के बीच मौसम का मजा उठाते हुए अंधेरा होते-होते जयगांव पहुंचा। जयगांव भूटान की सीमा पर आखिरी भारतीय शहर है। हलचल शोर शराबे और ट्रैफिक जाम से भरा जयगांव भी किसी दूसरे भारतीय शहर की तरह ही था। ट्रैफिक जाम में घिसटते , फिसलते जयगांव से लगी भूटान की सीमा पर पहुंचा। दो देशों के बीच सीमा रेखा की जैसी तस्वीरें अब तक देखी थी उन सबसे बिल्कुल उलट थी यह सीमा। ना तो हथियारबंद जवान दिखाई देंगे, ना भयानक सुरक्षा के तामझाम और तो और कंटील तारों की बाड़ भी नहीं मिलेगी। बस अपनी गाड़ी को भूटान की सीमा पर लगे गेट तक ले जाइए। वहां खड़ा भूटान पुलिस का जवान पूछेगा कि कहां जाना है उसे बताइए और भूटान में दाखिल हो जाइए। तो इसी तरह मेरी गाड़ी भी भूटान में दाखिल हो गई। भूटान में दाखिल क्या हुए एकदम से सब कुछ जैसे शांत हो गया। अभी दो मिनट पहले मैं जयगांव में था शोरशराबे , भीड़ भरी सड़कें और ट्रैफिक जाम देख रहा था और अब ना तो भीड़ थी और ना ही शोरशराब और ट्रेफिक जाम उसे तो भूल ही जाइए। अब तो अगले 10 दिन ट्रैफिक जाम क्या होता है इसका पता भी नहीं चलना था।

शांत फुनशलिंग शहर
शांत फुनशलिंग शहर

एक पल में जैसे दुनिया बदल गई थी। भूटान की संस्कृति से हिसाब से सजी दूकानें और घर। सब कुछ व्यवस्थित। सड़क पर शांति से चलती गाडियां। जी हां भूटान में गाडियों के हॉर्न का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर ही किया जाता है। शहरों में चलते समय शायद ही कभी हॉर्न सुनाई देगा।
मन ही मन मैं सोच रहा था कि दो करीबी देश लेकिन कितना कितना गहरा अंतर। एक तरफ अव्यवस्था हावी थी तो दूसरी तरफ सब कुछ व्यवस्थित सजा संवरा। रात को यहीं एक होटल में रूकना था। होटल के बाहर करमा हमारा इंतजार कर रहे थे। करमा से परिचय बहुत जरुरी था क्योंकि करमा अगले दस दिनों तक भूटान में गाइड के तौर पर साथ रहने वाले थे। भूटान के बारे में सारे प्रश्नों को जवाब करमा से ही मिलना था। करमा से मुलाकात हुई। करमा ने पारंपरिक सफेद कपड़े के दुप्पटा पहना कर सभी लोगों का स्वागत किया।
आज खाना खाने के बाद जल्दी ही सोना था क्योंकि कल सुबह जल्दी ही थिम्पु के लिए निकलना था। होटल में रात को खाना तो भारतीय ही था लेकिन इमादाशी नाम की भूटान डिश भी खाने के साथ मिली। स्थानीय चीज़ में भूटान की मिर्चों को मिलाकर यह सब्जी बनती है । खाने में इमादाशी स्वादिष्ट तो थी लेकिन उतनी ही तीखी भी। पहले ही दिन भूटान के खाने का स्वाद चखकर अच्छा लगा। एक तरह से इमाताशी भूटान का राष्ट्रीय व्यंजन ही है।
तो इस तरह पहला दिन पूरा हुआ। अगले दिन से असली सफर शुरू करना था।
अगले पोस्ट में फुंशलिंग से थिम्पू का सफर होगा और थिम्पू में बिताए पहले दिन की कुछ बाते होंगी।

कैसे पहुंचें-
1- बागडोगरा हवाईअड्डे से फुनशलिंग के लिए प्री-पेड टैक्सी ली जा सकती है। इंडिका का किराया करीब 2800 रूपये होगा।
2- बागडोगरा हवाईअड्डे से सिलीगुडी के लिए टैक्सी ले सकते हैं, किराया करीब 400 रूपये। फिर सिलीगुडी बस अड्डे से फुनशलिंग के लिए बस ली जा सकती है। बस करीब 6 घंटे लेगी।

नोट – भूटान की यह यात्रा भूटान बुकिंग की तरफ से प्रायोजित की गई थी।

देखिए खूबसूरत भूटान को

देखिए खूबसूरत भूटान को

भूटान की यात्रा की मेरे पत्रकार मित्र नीरज सिंह ने। वे वहां प्रधानमंत्री के साथ गये थे। लेकिन उन्होने इसकी सुन्दरता को अपने कैमरे में उतारा है । उसके कुछ चित्र आपको भूटान को जानने में मदद करेंगें।

चाय बागन
थिम्पू का नजारा

हिमालय की गोद में बसा है छोटा सा खूबसूरत देश भूटान। इस देश को भगवान ने अद्भुत सुन्दरता दी है। प्रकृति की अनछुई सुन्दरता को भूटान आकर महसूस किया जा सकता है। नैसर्गित सुन्दरता के धनी इस देश ने बडी ही मेहनत से अपनी सभ्यता और संस्कृति संवार कर रखा है। एक दिव्यता है जो यहां चहुँ और बिखरी है।