Browsed by
Category: Uttarakhand

कुमाऊं के कारपेट साहब

कुमाऊं के कारपेट साहब

 जिम कॉर्बेट 

“The tiger is a
large hearted gentleman with boundless courage and that when he is
exterminated-as exterminated he will be, unless public opinion rallies to his
support-India will be the poorer by having lost the finest of her fauna.” – Jim Corbett

इन पंक्तियों का मतलब है – “बाघ बेहद साहसी और बड़े दिल का सज्जन जानवर है और अगर उसे जनता का समर्थन नहीं
मिला तो वह पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। और अपने बेहतरीन जीव के खोने के बाद भारत
और भी गरीब हो जाएगा” – जिम कॉर्बेट

कालाढूंगी में जिम कार्बेट संग्रहालय में बार्ड
पर इस बात ने तुरंत मेरा ध्यान खींचा । बार्ड पर लिखी कुछ पंक्तियां हमारे देश , हमारे पर्यावरण और बेशकीमती जानवरों को लेकर जिम कार्बेट को पूरी सोच को सामने
ला देती हैं। इसे पढ़ने के बाद एहसास होता है कि कैसे एक शिकारी से आदमखोर जानवरों
का शिकारी बनने वाला इंसान अपने बाद के जीवन में उनका रखवाला बन गया। 
जंगल और जानवरों पर आने वाले संकट की जो बात आज की जा रही है, उन्होंने उस संकट को आज से करीब 100 साल पहले ही समझ लिया था। पर्यावरण उस
समय बड़ा मुद्दा नहीं था लेकिन जंगल और जानवरों को  लेकर गहरी समझ रखने वाली पारखी नजरों ने आने
वाले खतरे को भांप लिया था।
जिम कॉर्बेट का घर
उसी ‘जिम कॉर्बेट’ या कहें कि ‘कारपेट साहब’ को जानने समझने के लिए कालाढूंगी के उनके घर
में बना संग्राहलय माकूल जगह है। स्थानीय लोगों में वे कारपेट साहब के नाम से ही मशहूर थे।

संग्राहलय में उनसे जुड़ी तस्वीरों और जानकारी
को सहेजा गया है। तस्वीरों से आप को उनके जीवन के बारे में बहुत कुछ जानने और
समझने को मिलता है।
वे एक शिकारी और प्रकृति प्रेमी थे ये तो सब
जानते हैं। पर यहां आकर मुझे पता चला कि नैनीताल इलाके के सफल व्यापारी के तौर
पर उन्होंने काफी पैसा भी कमाया। लेकिन जंगल से प्यार इतना गहरा था कि पहचान एक
प्रकृतिप्रेमी के तौर पर ही बनी। 
 कॉर्बेट अपनी बहन मैगी के साथ
यहां उनकी इस्तेमाल की गई बहुत सी चीजें भी
दिखाई गई हैं। उनके समय की मेज़, कुर्सी, उनका पलंग ,पालकी  जैसी चीजें यहां रखी गई हैं।एक बार को तो ऐसा लगता है कि जैसे आप फिर से
कारपेट साहब के समय में ही लौट गये हैं और यहीं कहीं से वे आकर आप से बात करने
लगेंगे।
नैनीताल के लिए भले ही वे बडे व्यापारी थे
लेकिन कालाढूंगी में  उनका दूसरा ही रुप
नजर आता है। यहां वे गांव वालों की मदद करने वाले इंसान के तौर पर पहचाने जाते थे ।
उन्होंने लोगों को खेती के लिए जमीनें  दीं। इलाके में केले की खेती की शुरुआत भी कारपेट
साहब ने ही की। उन्हें दवाईयों की जानकारी भी थी, किताबों में जिक्र मिलता है कि
उनकी लाल दवाई पीते ही गांव वालों का सर्दी जुकाम , बुखार छू मंतर हो जाया करता था।
तो ऐसे कारपेट साहब को तो लोग याद करेंगे ही।
उनकी सबसे बडी पहचान को आदमखोर जानवरों के
शिकारी के तौर पर बनी। इसी वजह से पूरे कुमाऊं और गढवाल में उनका बेहद सम्मान किया
जाता है।कालाढूंगी के पास छोटा
हल्द्वानी गांव भी उन्होंने ही बसाया ।
लोगों के दिलों में कारपेट साहब कि क्या जगह थी
इसका पता मुझे इंटरनेट पर उनके बारे में कुछ तलाश करते समय मिला। साल 1986 में
बीबीसी की टीम उन पर एक डाक्यूमेंटरी बनाने कालाढूंगी और नैनीताल आई। इसी
कालीढूंगी के घर में उसकी शूंटिंग हुई। उस समय तक कारपेट साहब भारत से गए 40 साल
हो चुके थे। लेकिन लोगों को दिलों में उनकी याद इतनी ताजा थी कि बीबीसी की टीम के
सम्मान में कुमाऊं के दूर दराज के गावों से लोग कालाढूंगी आए और उन्होंने कुमाऊंगी
नाच और गानों के साथ टीम का स्वागत किया। उस समय तक तो कारपेट साहब के साथ काम कर
चुके बहुत से स्थानीय लोग भी जिंदा थे।
कालाढूंगी के घर में आकर कारपेट साहब को लेकर
लोगों के इसी प्यार और सम्मान को आज भी महसूस किया जा सकता है। मुझे यहां आने वाले
लोगों में पर्यटक ही नहीं बल्कि आस-पास  के
लोग भी बड़ी संख्या में दिखाई दिए।
कार्बेट साहब पहचान एक शिकारी की थी लेकिन वे
मानते थे कि कोई जानवर आदमखोर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों के कारण वह आदमखोर बन
जाता है। 
उन्होंने अपनी पहली और सबसे मशहूर किताब मैन इटर्स ऑफ कुमाऊं की
प्रस्तावना में लिखा है – 

 “A man-eating tiger is a
tiger that has been compelled, through stress of circumstances beyond its
control, to adopt a diet alien to it. The stress of circumstances is, in nine
cases out of 10, wounds, and, in the 10th case, old age.  “Human beings are not the
natural prey of tigers, and it is only when tigers have been incapacitated
through wounds or old age that, in order to survive, they are compelled to take
to a diet of human flesh.”

यानि “ बाघ को परिस्थितियां
आदमखोर बनने के लिए मजबूर करती हैं, 10 में से 9 मामलो में बाघ के घाव इसका कारण
थे, और दसवें मामले में बाघ का बुढ़ापा इसकी वजह बना।”

“आदमी बाघों का प्राकृतिक आहार नहीं है, बुढापे, घाव या किसी
वजह से जिंदा रहने की लड़ाई में ही बाघ आदमी को खाना शरु करता है। ”

शिकारी कारपेट साहब ने  कैमरा भी
खरीदा था और जानवरों के चित्र लेने में उनका बहुत मजा आता था। उन्होनें लिखा है कि
रायफल से शूंटिग की बजाए कैमरे से शूट करना उनको कहीं ज्यादा पसंद था।
ऐसे अनोखे कारपेट साहब के बारे में कालाढूंगी
आकर बहुत कुछ जानने को मिला । लेकिन  कारपेट साहब को जानने का सफर अभी पूरा
नहीं हुआ था उसमें एक आश्चर्य और बाकी था।
Corbett Wild Iris Spa and Resort की तरफ से घूमने के लिए जो जगह
चुनी गई थी उसमें कालाढूंगी से कुछ किलोमीटर दूरी पर पवलगढ़ में बना का वन विभाग
का रेस्ट हाउस भी शामिल था। वन विभाग के रेस्ट हाउस  आमतौर पर जंगल के अंदर बहुत शांत इलाके में
होते हैं इसलिए मुझे लगा कि दोपहर के खाने के लिए इस जगह को चुना गया होगा। लेकिन
यहां पहुंचे तो पता चला कि इस रेस्ट हाउस का इतिहास भी कारपेट साहब से जुड़ा है।
पवलगढ़ रेस्ट हाउस
इस रेस्ट हाउस को 1912 में अंग्रेजी कॉटेज
स्टाइल में बनाया गया था। 1930 में  इस
रेस्ट हाउस में कारपेट साहब भी रुक चुके थे। यहीं रहते हुए उन्होने रेस्ट हाउस के
ठीक बगल में सेमल के पेड़ के नीचे अपने समय के सबसे मशहूर बाघ “बैचलर ऑफ पवलगढ़”को मारा था। वह
पेड़ आज भी मौजूद है।

इसी पेड़ के नीचे मारा था
बाघ
 कहा जाता है वह अपने समय का सबसे विशाल बाघ था।अपनी किताब
मैन इटर्स ऑफ कुमाऊं में वे लिखते है कि गांव वाले बताते हैं कि उन्होंने इससे बड़ा
बाघ पहले कभी देखा ही नहीं था।
लेकिन जानकारी मिलती है कि “बैचलर ऑफ पवलगढ़ आदमखोर” नहीं था।
फिर भी कार्बेट ने उसे क्यों मारा इसकी जानकारी मुझे कहीं नहीं मिली। लेकिन
स्थानीय लोगों में एक बात प्रसिद्ध है कि बाघ को मारने के बाद उसकी लाश के
पोस्टमार्टम के दौरान कार्बेट को पता चला कि बाघ आदमखोर नहीं था। उस घटना का उन पर
इतना गहरा उसर हुआ कि इस घटना के बाद वे और भी जोर शोर से जानवरों को बचाने के काम
में जुट गए।
उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि 1936 में
हेली नेशनल पार्क के नाम से देश का पहला संरक्षित पार्क बना। आजादी के बाद कार्बेट
के प्रति सम्मान जताते हुए भारत सरकार ने 1952 में उसका नाम बदल कर जिम कार्बेट
नेशनल पार्क कर दिया।
शायद यह कार्बेट साहब की ही विरासत थी कि देश
में बाघ बचाने के लिए जब काम शुरु किया गया। तो कार्बेट नेशनल पार्क में ही देश का
पहला बाघ अभ्यारण्य भी बनाया गया।
प्रकृति और जंगल के जानवरों से प्यार करने
वाले कारपेट साहब के लिए इससे बड़ी श्रंद्धांजलि कुछ और हो भी नहीं सकती थी।
तो सिर्फ बाघ को देखने के लिए कार्बेट पार्क घूमने
नहीं आएं। एक दिन उस इंसान के बारे में जानने की भी कोशिश करें जिसनें पूरी दुनिया
में बाघ संरक्षण के प्रयासों को एक दिशा दी।
कॉर्बेट नेशनल पार्क की अनोखी दुनिया

कॉर्बेट नेशनल पार्क की अनोखी दुनिया

राजस्थान के रणथम्बौर नेशनल पार्क से दिल्ली वापस आते ही अगले
दिन कॉर्बेट नेशनल पार्क जाने का मौका मिल गया। एक घूमने के शौकीन को और क्या
चाहिए । एक ही दिन में जाने की तैयारी की, कैमरे को संभाला और अगले सफर के लिए
तैयार । सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि रूकने की जगह के बारे में कुछ पता करने का मौका
ही नहीं मिला। मुझे वहां Corbett Wild Iris Spa and Resort में रुकना था।
 रिजोर्ट की तरफ जाते हुए मन में एक ही बात थी कि क्या यह भी कॉर्बेट
के दूसरे रिजोर्ट की तरह ही हुल्लड़ बाजी का अड्डा होगा। ढिकाला की तरफ के भीड भरे
पार्टियों के लिए मशहूर इलाके में जाने का कोई मन नहीं था। रामनगर पहुंचने पर
गाड़ी ढिकाला की तरफ ना जाकर सीधे हाथ की तरफ मुड़ी तो कुछ सूकून मिला कि चलो उस
इलाके से तो बच गए। रामनगर में कोसी का बैराज पार करने के बाद कुछ किलोमीटर
नैनीताल की तरफ चलने के बाद गाडी उलटे हाथ पर मुड़ी और जंगल में खो सी गई। हम सीधे
जंगल के बीचों बीच आ गए थे। अब हमारे सामने एक पतली
सी सड़क थी। दोनों तरफ साल और टीक के घने पेड थे।
घने जंगल से गुजरती सड़क
अब महसूस हुआ कि हम सही मायने
में जंगल में थे। पता चला कि सड़क भी हाल ही में बनी थी। जंगल में 7 किलोमोटर चलने के बाद हम
क्यारी गांव में पहुंचे। वही गांव के पास बना था Corbett Wild Iris Spa and Resort । 
यहां तक
पहुंचने के लिए गाड़ी को नदी के उबड़-खाबड़ रास्ते पर भी चलना पडा। चारों तरफ की
शांति को सिर्फ चिडियों की चहचहाट ही तोड रही थी। हमारा जंगल का सफर शुरु हो चुका
था। कुछ अलग तरीके से।
घने जंगल के बीच बना है यह रिजोर्ट। दिल्ली से 6 घंटे के सफर के बाद यहां
पहुंचे थे। थकान का जो थोडा बहुत असर  था
वह भी ठंडे शर्बत के स्वागत के साथ उतर गया।
ज्यादा कुछ नहीं करके सीधे अपने कमरों में पहुंचे थोड़ा सा आराम करने के लिए।
बडे से इलाके में कुछ- कुछ दूर पर कमरे और कॉटेज बने थे। 
मेरा कमरा खासा बडा और
अच्छे तरीके से सजा था। कमरे में वह सब कुछ मौजूद था जो एक- दो दिन के लिए आराम की
चाह रखने वाले लोग चाहते हैं।
कुछ देर आराम के बाद सभी लोग दोपहर के खाने पर मिले। बेहतर तरीके बना स्वादिष्ट खाना, भरपेट खाया । डायनिंग हॉल में जंगल के बीच
रहने का ही आभास होता है। लकड़ी का फर्नीचर, बड़ी- बडी कांच की खिड़कियां
जिनसे  बाहर की हरियाली का मजा लिया जा
सकता है।
खुला-खुला डायनिंग हॉल
खाने के बाद रिजोर्ट को देखने निकल गया। आम का तो पूरा बगीचा था
यहां। पता चला कि बगीचे के बीच ही इस रिजोर्ट को बनाया गया है। 
जंगल में रुकने को
कुछ और बेहतर तरीके से महसूस करना चाहते हैं यहां छप्पर वाले कॉटेज भी हैं।  एक तरफ स्पा था और स्पा के बगल में बड़ा सा
स्विमिंग पूल।
यहां
एक एक्टिविटी रूम भी है। इस बड़े से हॉल में पूल टेबल, टेबिल-टेनिस , और कैरम
बार्ड जैसी चीजें रखी हुई हैं। खेलों के शौकीन हैं तो यहां बड़ा अच्छा समय बिताया
जा सकता  है।

आस पास देखते हुए ही नेचर वॉक पर जाने का समय हो गया। रिजोर्ट के पास ही है
क्यारी नाम छोटा सा कुमाऊंनी गांव । इसी गांव में हमें नेचर वॉक पर जाना था।
विनोद नेचर वॉक के बारे में बताते हुए
इस वॉक से पहले हमारी मुलाकात हुई विनोद बुधानी से। विनोद क्यारी गांव के ही
रहने वाले हैं और अब रिजोर्ट के साथ गाईड और नैचरलिस्ट का काम करते है। पहली ही नजर
में विनोद पक्के नैचरलिस्ट नजर आते  हैं।
खाकी पैंट , सफेद टी-शर्ट, गले में एक तरफ दूरबीन और दूसरी तरफ छोटे से बैग में
स्थानीय चिंडियों की प्रजातियों पर लिखी एक किताब। अगले दो दिन हमें विनोद के साथ
ही रहना था। दोस्ती तो मिलते ही हो गई। विनोद को स्थानीय पशु पक्षियों की
प्रजातियों और पेड़-पौधों  की बहुत अच्छी
जानकारी थी।
यह जानकर अच्छा लगा कि गांव के बहुत से लोग रिजोर्ट में ही काम करते हैं। गांव
में ही रहकर अगर पर्यटन से रोजगार पैदा होता है तो इससे अच्छा भला क्या हो सकता
है। । गांव में कई लोगों के पास जिप्सी भी हैं जो पर्यटकों को सफारी पर ले जाने का
काम करती है। पर्यटकों के आने से अब गांव में कई होमस्टे भी खुल गए हैं। एक पूरी
अर्थव्यवस्था है जो पर्यटन के इर्द-गिर्द पनपने लगी है।
विनोद के साथ हम चले क्यारी गांव की तरफ। खिचड़ी नदी को पार कर हम पहुचे इस
गांव में, नदी में ज्यादा पानी नहीं था इसलिए पैदल ही इसको पार कर लिया।
खिचड़ी नदी 
( Image courtesy- Abhinav Singh)
 गांव में
लोगों की जिंदगी को करीब से देखने का मौका। गांव के खेतों में गेहूँ की कटाई का
काम चल रहा था। 
विनोद ने हमें गांव के पास उगे बहुत से पेड़-पौधों के बारे में बताया। 
हाथी कान नाम का पौधा
रोजमर्रा की जिंदगी में डॉक्टर से ज्यादा लोग इन्हीं पेड़ पौधों पर भरोसा करते
हैं। जब 24 घंटे का डॉक्टर घर में ही मौजूद हो तो फिर चिंता किस बात की। कोई पौधा
दर्द दूर करता है तो कोई चोट पर एंटी सेप्टिक का काम करता है। किसी से गठिया का
इलाज हो सकता है तो किसी से गैस की समस्या रफूचक्कर हो जाती है।

पेड़ पर लगा नींबू
हम शहर में रहने
वालों का तो इन चीजों से नाता टूट गया है लेकिन अगर इन चीजों के बारे में जानने का
कोई ऐसा मौका मिले तो उसका पूरा फायदा उठाना चाहिए। प्रकृति ने अपने खजाने में
बहुत कुछ छिपा रखा है हमारे लिए, बस पहचानने की जरुरत है।
नेचर वॉक के आखिर में गांव की एक दुकान में हमारी शाम की चाय का इंतजाम था।
गर्मागरम पकौड़े , समोसे और चाय की चुस्कियों के साथ अपनी इस नेचर वॉक को खत्म
किया।
वापस लौटते – लौटते अंधेरा हो गया। शाम को बड़े से लॉन में खाने का इंतजाम था। 
 Image courtesy- Iris Resort
भारतीय से लेकर कॉन्टीनेन्टल तक शाम के खाने का इंतजाम शानदार था। खास बात यह थी
कि यह बनाने वाले खानसामा यहीं आसपास के थे ।
शाम के खाने के साथ ही संगीत का
कार्यक्रम भी रखा गया । एक से एक गाने सुनने को मिले। कलाकारों की यहां कोई
कमी नहीं थी। सब मिल कर शाम को खूबसूरत बना रहे थे। खाना खाते, घूमने फिरने की
बातें करते करते आधी रात हो गई। घुमक्कड़ी के किस्से शुरु हो तो फिर रुकते कहां
हैं। लेकिन सोना भी जरुरी था क्योंकि अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर फिर से क्यारी
गांव में ही जाना था।  इस तरह से कॉर्बेट
के जंगल में पहला दिन पूरा हुआ। लेकिन अभी दो दिन और बाकी थे। उन दिनों में हमें
ताज्जुब में डालने वाली कई चीजें थी।  उसके
बारे में अगली पोस्ट में बात करेंगे।
कैसे पहुंचे – रामनगर दिल्ली से करीब 250 किलोमीटर दूर है। दिल्ली से ट्रेन और बस की सुविधा से जुड़ा है। ट्रेन और बस से करीब 6 घंटे में यहां पहुंचा जा सकता है।  Corbett Wild Iris Spa and Resort  रामनगर से   करीब 12 किलोमीटर दूर है। रामनगर से टैक्सी
लेकर यहां पहुंचा जा सकता है।

( Travel correspondent blogger group(TCBG) organised this visit and Corbett Wild Iris Spa and Resort sponsored it.)

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच- 7

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच- 7

चढाई का छटा दिन

पांचवे
दिन हम लोग ऊँ पर्वत को देखकर वापस गुंजी के लिए चल दिये ।  शाम होते होते
हम गुंजी पहुंच गये। रास्ते में कई जगह पर भुस्खलन के चलते रास्ते को बदल
कर सीधी खडी चढाई भरे रास्तों से चढना उतरना पडा। खैर गुंजी पहुंच कर आराम
आया। गुंजी इस इलाके का एक बडा कैंप है। कुमाऊं विकास निगम के इस कैंप में
सुविधायें दूसरे कैंपों से बेहतर हैं। हां एक बात बताना जरुरी है कि यहां
लगे सैटेलाईट फोन ने अभी भी काम करना शुरु नहीं किया था। दो दिन से घर बात
नहीं हुई थी। आगे कितने दिन तक नहीं होगी ये भी पता नहीं था क्योंकि अगर
गुंजी में फोन काम नहीं कर रहा था तो छोटा कैलाश की चढाई के रास्ते में फोन
मिलने की तो बिल्कुल उम्मीद नही थी। लेकिन अब कुछ कर भी नही सकते थे।

योजना
के हिसाब से तो हमें छटे दिन गुंजी में आराम करना था । लेकिन हमारे दल के
सभी लोग अब ट्रेकिंग के मुख्य पडाव छोटे-कैलाश पुहंचने के लिए उतावले थे।
इसलिए सबने आराम ना करके आगे बढने का फैसला किया। तय किया गया कि अगले पडाव
कुट्टी तक पहुंचा जाये, फिर वहां जा कर ही सोचा जायेगा कि एक दिन आराम
करना है या नहीं। मेरा मन यही था कि गुंजी की जगह कुट्टी में ही आराम किया
जाये। गुंजी मे तो पहले ही हम दो रात रुक चुके थे और कुट्टी में रुकना अपने
आप में अलग अनुभव होता । कुट्टी बहुत पुराने समय से तिब्बत से होने वाले
व्यापार का केन्द्र रहा था । एक ऐतिहासिक गांव था कुट्टी। छटे दिन हम सब
लोग सुबह छह बजते बजते कुट्टी के लिए निकल गये। पहाड पर ट्रेकिंग कर रहे हो
तो सुबह जितना जल्दी ट्रेक शुरु कर दिया जाये बेहतर होता है क्योंकि सुबह
की ठंडक में चढाई करना आसान होता है। दिन चढने पर धूप तेज हो जाती है जिससे
आपकी रफ्तार कम पड जाती है। DSCN1004नाबि गांव
गुजीं से कुट्टी 19 किलोमीटर दूर है।    गुंजी से निकलते ही सबसे पहले हमने नाबि गांव को पार किया। छोटा सा
खूबसूरत पहाडी गांव। कुछ देर इस गांव मे रुककर पुराने घरों के कुछ फोटो
लिए, उसके बाद हम आगे बढे। रास्ता बेहद खूबसूरत था लेकिन कहीं कहीं खतरनाक
भी।
रास्ते की खूबसूरती
Copy of DSCN1010

 

रास्ते
के एक तरफ नदी बह रही थी और दुसरी तरफ उंचे पहाड। दोपहर में रास्ते के एक
छोटे से ढाबे पर खाना खाया। ढाबा के नाम से ये मत सोचिये कि दिल्ली –
चंडीगढ के रास्ते जैसा कोई ढाबा होगा। यहां ढाबे का मतलब है एक छोटी सी
खाने की जगह जहां  आते जाते गांव वाले खाना खा सके। खाना भी गिनती के लोगों
के लिए ही बनाया जाता है। गुंजी से कुट्टी के बीच बस एक यही खाने की जगह
थी। इन ढाबे वालों को अनूमन पता होता है कि कितने लोग आज आ सकते हैं उस
हिसाब से ही खाना बनता है। खैर हमारे लिए पहले ही कुमाऊं मंडल की तरफ से
बताया जा चुका था इसलिए हमारे लिए पूरा इंतजाम था।
रास्ते का ढाबा

 

खाना
खा कर कुछ आराम करके हम आगे बढे। जैसे जैसे उंचाई बढ रही थी रास्ते के पेड
पौधे बदलते जा रहे था।  सामने के पहाडों पर अब पेडो के नाम पर बस भोजपत्र
के ही पेड नजर आ रहे थे। रास्ते में भी बस भोजपत्र के ही जंगल थे। इतनी
उंचाई पर यहां भोजपत्र के अलावा बस कुछ घास ही उगती है। ये भोजपत्र वही है
जिस पर पुराने जमाने में लिखा जाता था। कागज की जगह इस्तेमाल होना वाला
भोजपत्र हजारों साल पहले इन्ही पहाडों से नीचे ले जाया जाता होगा जहां ऋषि
मुनी उन पर ग्रंथो की रचना करते होगें।

अब धीरे धीरे शाम होने लगी
थी और हम कुट्टी की तरफ बढ रहे थे तभी कुट्टी से कुछ किलोमीटर पहले हम एक
ऐसी जगह पहुंच जहां चारों तरफ छोटे छोटे रंग बिरंगे फूल खिले थे। हम अचानक
ही एक फूलों की घाटी में थे।
फूलों की घाटी
  

उस
जगह की खूबसूरती को शब्दो में नही बताया जा सकता। लेख के साथ लगे फोटो को
देखकर आपको शायद कुछ अंदाजा मिले। फूलों की घाटी में कुछ देर बैठकर उसकी
खूबसूरती को कैमरे के साथ ही आंखो में कैद कर मैं आगे बढा। शाम होने से
पहले ही हम कु्ट्टी पहुंच गये । कुट्टी पहुंच कर क्या किया इसकी जानकारी
अगले लेख में …

 

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-६

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-६

चार जून- चढाई का चौथा दिन
चार जून- चढाई का चौथा दिन
चार तारीख को हमें नबीढांग जाना था। नबीढांग वो जगह थी जहां से हमें हमारी यात्रा के पहले दर्शन होने थे। नबीढांग में हमें ऊँ पर्वत के दर्शन करने थे। गुंजी से नबीढांग करीब अठारह किलोमीटर का सफर है। गुंजी से नौ किलोमीटर दूर कालापानी तक का सफर आसान है और काली नदी के किनारे लगभग सपाट रास्ते पर ही चलता है। इसलिए इस रास्ते पर ज्यादा थकान महसूस नहीं होती। ये रास्ता जल्दी ही पूरा हो जाता है। इसलिए यात्रा मे पहली बार हम सुबह को आराम से उठे।

गुजी मे सुबह का नजारा बेहद जबरदस्त था। कैम्प के सामने ही बर्फीले पहाडो का नजारा देखने के लायक था। हमने खूब सारे फोटो लिए। फिर नाश्ता करके सब साढे आठ बजे नबीढांग के लिए चल पडे। एक तो आसान रास्ता और दूसरा इतने दिन तक चलने की आदत के कारण हम तेजी से चल रहे थे। रास्ता बेहद खूबसूरत था। चारो और घना जंगल था जिसमे हम तेजी से चले जा रहे थे। साथ बहती काली नदी भी माहौल के शानदार बनाये रखती है। अब काली नदी अपना भयावह रुप छोड कर शान्त हो चुकी थी। हालांकि बहाव अब भी तेज था लेकिन ये उतना खतरनाक नही था जितना गुजी से पहले के रास्ते पर था। हम कालापानी के लिए बढ रहे थे। गुजी से कालापानी का नौ किलोमीटर की दूरी तय करने में हमें बस तीन घंटे ही लगे।


कालापानी दरअसल काली नदी का उद्गम स्थान है। काली नदी के निकलने की जगह पर काली मां का मंदिर बना हुआ है। यहां भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस का बडा कैम्प है। ये लोग ही मंदिर की देखभाल भी करते हैं। यहां हमने मंदिर के दर्शन किये।

मां काली की मूर्ति के नीचे से ही नदी का उद्गम माना जाता है। यहा से निकलने वाले पानी को यात्री घर भी ले जाते है। ये पानी इतना मीठा है कि लगता है जैसे किसी ने चीनी मिला दी है। मंदिर से आगे ही कुमांऊँ पर्यटन का कैम्प है जहा पर हमारे दोपहर के खाने का इंतजाम था।

कालापानी मे ही हमे नाग नागिन पर्वत दिखाई देते है। इस पर्वत की ऊँचाई ऊँ पर्वत के बराबर ही है। ऐसा माना जाता है कि अगर आप को ये पर्वत साफ दिखाई दे रहा है तो आगे ऊँ पर्वत के दर्शन भी आसानी से हो जायेगें।

ऊँ पर्वत के दर्शन आसानी से नही होते और ज्यादातर समय ये बादलो से घिरा रहता है। आज हमे नाग नागिन पर्वत साफ दिखाई दे रहा था इसलिए कैम्प के लोगो ने बताया कि आप को ऊँ पर्वत के दर्शन भी हो जायेंगे
खैर थो़डे आराम और खाना खाने के बाद हम चल दिये नबीढांग के लिए जो कालापानी से नौ किलोमीटर दूर है। यहा से रास्ता कठिन है क्योकि नबीढांग काफी ऊचाई पर हो है हमे भी अब ऊचाई के लिए बढना था। ये रास्ता घास के खूबसूरत मैदानो से होकर जाता है। यहां पर ऊँचाई के कारण पेड पौधे साथ छोड देते है। सिर्फ घास और छोटी झाडियां ही दिखाई देती है। पहाड भी बिल्कुल नंगे हो जाते है। हल्की धूप होने के बावजूद अब हवा मे ठंडक होने लगी थी। इस इलाके मे हमेशा ही ठंडी और तेज हवाये चलती रहती है जिनसे बचना जरुरी है नही तो बीमार होने का खतरा बना रहता है।

नबीढांग से दो किलोमीटर पहले ही वो जगह आती है जहां से ऊँ पर्वत के पहले दर्शन होते है। नीचे कैम्प के लोगों की बात सही थी ऊँ पर्वत बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था। मै तो इसे देखता ही रह गया। ऊँ पर्वत को एक बार देखा तो आखे हटाने का मन ही नही कर रहा था। जिस के दर्शन के लिए हम इतने दिन से चल रहे थे वो विशाल पर्वत अपने पूरे रुप मे मेरे सामने था। विग्यान भले ही कुछ भी कहे कि ये पर्वत एक भौगोलिक रचना है। लेकिन मुझे तो आध्यात्मिक अनुभव हो रहा था। ऐसा लगता था कि जैसे सचमुच ही भगवान मेरे सामने खडे है।

कुछ देर बाद मै हमारे कुमाऊँ पर्यटन के कैम्प के लिए चल दिया। शाम के चार बजे हम लोग नबीढांग पहुचे। कैम्प के लोगो मे भोल शंकर के जयघोष के साथ हमारा स्वागत किया। नबीढांग का ये कैम्प तेरह हजार फीट से भी ज्यादा की ऊँचाई पर बना है। इसलिए पहली बार हमे यहा फाईबर ग्लास के बने हट मे रहना था। इतनी ऊँचाई पर भी ये हट काफी गर्म बने रहते है।

जाते ही हमने चाय पी थोडी धूप बची थी इसलिए सबने ऊँ पर्वत के साथ फोटो लिए। यहा कैंम्प के लोगो ने बताया कि आप लोग वाकई भाग्यशाली है जो आप को इतने आराम से दर्शन हो रहे हैं। उन्होने बताया कि कई बार तो ऐसा भी हुआ है लोगो ने दो तीन दिन तक भी दर्शन का इंतजार किया फिर भी उन्हे मायूस ही लौटना पडा।
थोडी ही देर मे धूप चली गई और कुछ ही मिनट मे इतनी ठंड हो गयी कि बाहर बैठना भी मुश्किल होने लगा। हम सभी लोग अपने हट मे आराम करने चले गये । रात के समय वहा का तापमान शून्य सो दो तीन डिग्री नीचे चल रहा था।
इतनी ऊँचाई पर कुछ लोगों को परेशानी होने लगी तो पास के तिब्बत सीमा पुलिस के डाक्टर ने आकर सभी की मे़डिकल जांच की। इतनी ऊचाई पर खून का दबाव काफी बढ जाता है। इसलिए जांच जरुरी होती है। रात को सभी जल्दी ही सो गये।

सुबह उठे तो मौसम खुला था। हमे ऊँ पर्वत फिर से साफ दिखाई दे रहा था। नबीढांग कैलाश मानसरोवर की यात्रा मे भारत की तरफ आखिरी पडाव है। यहा से यात्री आठ किलोमीटर दूर लिपूलेख दर्रे तक जाते है। लिपूलेख के बाद ही सब चीन की सीमा शुरु हो जाती है। हमारे कैम्प से लिपूलेख का रास्ता साफ दिखाई दे रहा था। सुबह कुछ फोटो और लेने और नाश्ता करने के बाद हम वापस चल दिये गुजी के लिए।

हमारे यात्रा कार्यक्रम के हिसाब से हमे आज कालापानी रुकना था लेकिन कैलाश मानसरोवर के पहले यात्रा दल आने का कारण कुछ बदलाव किया गया। हमे अब सीधे ही गुजी जाना था। सुबह आठ बजे यात्रा शुरु करके रास्ते मे कालापानी रुकते हुए हम शाम चार बजे तक गुंजी पहुच गये। अगले दिन आदि कैलाश के लिए सफर शुरु करना था।

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-५

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-५

तीन जून- चढाई का तीसरा दिन- बुद्धि से गुंजी

तीसरे दिन हमे बुद्धि से गुंजी तक का सत्रह किलोमीटर का सफर करना था। ये रास्ता पिछले दिनो के मुकाबले आसान था। रोज की तरह से ही हमारा दिन सुबह चार बजे ही शुरु हो गया सुबह की चाय के साथ। उसके बाद जल्दी से तैयार होकर साढे पांच बजे तक हम चल पडे अपने सफर पर। बुद्धि से पांच किलोमीटर आगे छियालेख घाटी पडती थी। जहां तक जाने का पहले दो किलोमीटर का रास्ता तो आसान और ह्लकी चढाई वाला था। लेकिन उसके बाद के तीन किलोमीटर का बेहद कठिन और लगभग सीधी चढाई वाला रास्ता था। इस तीन किलोमीटर तक हमें सीधे उपर ही चढते जाना था।
चढाई इतनी मुश्किल भरी थी कि हर कदम के साथ दम फूलने लगता था। एक तो हम पहले ही काफी ऊंचाई पर आ चुके थे एसे मै इतनी कठिन चढाई करना आसान काम नही था। थोडी थोडी दूर पर रुक कर आराम करते हुए धीरे धीरे आगे बढ रहे थे।
रास्ते का अंदाजा आप इस बाद से लगा सकते है कि कुछ जगहो पर तो घोडे से भी लोगो को उतरना पड रहा था। खैर सुबह आठ बजे चढाई पूरी कर हम लोग छियालेख पहुंच गये। छियालेख मे घुसने से पहले बडा ही संकरा रास्ता था, लग रहा था जैसे किसी घर का दरवाजा हो। हमे तो अभी तक पता नही था कि इस रास्ते के पार क्या छिपा है। जैसे ही हम छियालेख पहुंचे मेरा तो दिमाग ही चकरा गया। ऐसा लगा कि जैसे दूसरी ही दुनिया मे पहुंच गये हैं।


स्वर्ग मे पहुंचने का अभास दे रही थी छियालेख घाटी। घाटी मे हरे घास की मखमली चादर बिछी हुई थी। चारो तरफ तरह तरह के रंग बिरंगे फूल खिले हुए थे। खुशबू ऐसी की जो जाये मदहोश हो जाए। पता चला की इसको फूलो की घाटी भी कहा जाता है। हमारे साथ चल रहे घोडे वालो ने बताया कि अभी तो बहुत कम फूल दिखाई दे रहे है अगस्त के महीने मे अगर आये तो यहा हर तरफ बस रंग बिरगे फूल हि दिखाई देते हैं। मै तो यहा आकर जैसे खो ही गया। मेरा मन तो यहा से आगे जाने का भी नही कर रहा था। यही पर हमारे नाश्ते का इंतजाम भी था। नाश्ता करने के बाद मै तो निकल गया घाटी की सैर पर। घाटी के और अंदर जाने पर तो जो नजारे मुझे दिखाई दिये उनके बारे मे तो मै बयान ही नही कर सकता। आप लोग फोटो देखकर खुद ही अंदाजा लगा सकते है।


घाटी के चारो और फैले बर्फ के पहाड इसको अलग ही रुप दे रहे थे। यहा हमने दो घंटे से भी ज्यादा का समय बिताया। ये समय कैसे बीत गया पता ही नही चला। लेकिन आज ही हमे गुंजी पहुंचना था इसलिए आगे तो जाना ही था……..
छियालेख के बाद रास्ता सीधी और उतराई वाला ही था। इसलिए चलने मे दिक्कत नही हो रही थी। पूरा ही रास्ता घास के मैदानो से भरा पडा था जगह जगह से निकल रहे झरने इसे और भी खूबसूरत बना रहे थे।

छियालेख से चार किलोमीटर चलने के बाद हम छोटे से गांव गर्बयांग मे पहुचे। इस गांव मे बने लकडी के मकान और खास तौर पर इनके नक्काशी दार दरवाजे देखने के लायक थे। इस गांव को धसकने वाले गांव के तौर पर भी जाना जाता है। ये पूरा गांव ही पहाड के जिस हिस्से पर है वो धीरे धीरे खिसक रहा है। इसके कारण यहा के गांव वालों को उत्तराखंड के तराई ईलाके में जमीने दी गई है।

गर्बयांक से निकलते ही भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस की जांच चौकी बनी है जहां पर हमारे कागजात का जांच की गई। धारचुला से चले आज तीसरा दिन था और तीन दिन से घर पर मेरी कोई बात नही हुई थी। मोबाईल फोन तो कभी के बंद हो चुके थे। अभी तक किसी भी कैंप मे सैटेलाईट फोन भी हमे नही मिला था। क्याकि छोटा कैलाश का हमारा पहला ही दल था और कैलाश यात्रा का दल आने मे कुछ दिन बाकी थे इसलिए गाला औऱ बुद्धि दोनो कैंपो मे अभी तक फोन नही लगे थे ।

हमे बताया गया कि शायद गुजी मे फोन लगा चुका होगा इसलिए वहा से बात हो पायेगी। लेकिन कोई भरोसा नही था कि गुजी मे फोन मिलेगा। मुझे चौकी से पता लगा की गर्बयांग के तिब्बत सीमा पुलिस के कैप मे सैटेलाईट फोन है। ये कैंप रास्ते से सीधी खडी चढाई के बाद था। मैने किसी तरह से ये चढाई पूरी करके कैप मे पहुचा। जहा से मैने तीन दिन के बाद घर पर बात की। भारत तिब्बत पुलिस के लोग यात्रियो की जहा तक हो सके सहायता करने की कोशिक करते है। मेरे एक बार कहते ही कैप के अधिकारी ने बात करने की इजाजत दे दी। इतने दिन बात करके अच्छा तो लगा ही साथ ही मैने घर पर बता दिया कि अब आगे कब बात होगी पता नही इसलिए किसी भी तरह की चिंता ना करें।

गर्बयांग से पांच किलोमीटर दूर सीधी गांव मे दोपहर का खाना खाकर हम गुजी के लिए चल पडे। शाम को करीब चार बजे हम आखिरकार गुजी पहुच गये। गुजी तक के रास्ते काली नदी लगातार साथ बनी रहती है। गुजी मे कुमाऊं पर्यटन का थोडी बडा कैप है क्योकि ऊपर के कैपो के लिए खाने पीने का सामान यही से आगे भेजा जाता है।

गुंजी समुद्र सतह से बत्तीस सौ मीटर से भी ज्यादा की ऊंचाई पर बसा है। इस कारण यहा ठंड बहुत ज्यादा थी। साथ ही गुजी की स्थिति कुछ इस तरह की है कि यहा बहुत ही तेज हवाये चलती है। कभी कभी तो इतनी तेज की बात करना भी मुश्किल हो जाता है। अगले दिन हमे चीन सीमा पर ऊं पर्वत के लिए सफर करना था।……… एक बात और गुजी मे भी अभी तक सैटेलाईट फोन नहीं लगा था।

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-४

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-४

दो जून – चढाई का दूसरा दिन- गाला से बुद्धि

गाला मे सुबह चार बजे ही हमे चाय दे दी गई। जिससे हम लोग समय से उठ कर तैयार हो सके। इस मामले में मै कुमाऊं पर्यटन के लोगों की सेवा भावना की दाद दूंगा। इतनी ठंड में भी वो हर वक्त हमारी जरुरत को पूरा करने के लिए तैयार रहते थे।
इतनी ऊंचाई पर ठंड में काम करना आसान काम नही होता। हम सभी पांच बजे तक सफर के लिए तैयार हो चुके थे। सुबह सुबह बोर्नविटा मिला दूध पीने के बाद हम साढे पांच बजे तक चल पडे।
आज पूरे इक्कीस किलोमीटर का सफर था जिसमें लगभग पूरा दिन लगना था। इसलिए सुबह के मौसम का फायदा उठाते हु्ए मै, अजय और विश तो तेजी से आगे चल दिये। हमारे सुबह के नाश्ते का इंतजाम लखनपुर में एक ढाबे में था।


गाला से लखनपुर सात किलोमीटर था। लेकिन ये सात किलोमीटर सबसे कठिन था इस रास्ते में हमे एक बार थोडी चढाई के बाद चार हजार से ज्यादा सीढियां उतरनी थी। कहने के लिए तो ये सीढियां थी, लेकिन सीढियो के नाम पर ढेडे मेडे पत्थर पडे थे। पत्थरो पर लगातार उतरना आसान नही था। रास्ता भी कही कही तो बेहद खतरनाक हो रहा था। कुछ जगहो पर तो बस पैर रखने भर की जगह ही होती थी। अगर फिसले तो सीधे हजारो फीट गहरी खाई मे समा जाएगे। लेकिन रास्ते देखने लायक था। हरे भरे ऊंचे पहाड, जगह जगह निकलते झरने रास्तो को मनमोहक बनाये रखते हैं। चलते चलते थकान होती तो आराम करने के रुक जाते थे। सीढियां उतरते उतरते तो दम फूलन लगा था। लेकिन ज्यादा आराम भी नही कर सकते नही तो आप आगे बढ ही नही सकते। खैर ढाई घँटे तक चलने का बाद सुबह के आठ बजे हम लखनपुर पहुचे। लखनपुर मे पहाड के किनारे पर एक छोटे से पहाडी ढाबे में नाश्ते का इंतजाम था। वो गर्म पूरी जैसा कुछ बना रहा था लेकिन पूरे दिन के सफर के देखते हुए मैने तो रोटी खाना ही पसंद किया। नाश्तेा के कुछ देर तक हमने यही आराम किया। रास्ते के ढाबे गांव वालो के लिए रात को रुकने के होटल के तौर पर भी काम देते है।


लखनपुर पहुचने के एक घंटे बाद नौ बजे हम लोग आगे चल दिये। यहा से छ किलोमीटर दूर मालपा तक हमे जाना था। मालपा मे हमारे दोपहर के खाने का इंतजाम किया गया था। लखनपुर से मालपा का रास्ता बेहद खतरनाक था। रास्ते के साथ तेज बहाव के साथ बहती काली नदी इसे और भी खतरनाक बना रही थी। बहाव इतना तेज था कि उससे हो रहे शोर मे बात भी करना मुश्किल था। ये नदी अब पूरे रास्ते हमारे साथ बनी रहने वाली थी। रास्ता बेहद संकरा था। कही कही इन रास्तो पर झरने मिलते रहते हैं, इनमे बचते भीगते हम आगे बढते रहे। इन झरनो के कारण रास्ता फिसलन भरा हो जाता है। अगर फिसले तो सीधे नीचे बह रही नदी मे जा मिलेगे। इसलिए यहा हम धीरे धीरे एक दुसरे को देखते हुए आगे चलते रहे।


यहा एक जगह तो बहुत ही खूबसूरते झरना मिला जहा हमने आराम भी किया। ग्यारह बजते बजते हम मालपा पहुंच गये।

मालपा गांव को बारह साल पहले १९९८ मे यहा हुए एक हादसे के कारण जाना जाता है। उस समय कुमाऊं पर्यटन का कैलाश यात्रा का पडाव मालपा मे हुआ करता था। १९९८ मे कैलाश मानसरोवर के यात्री यहां रुके थे कि रात में बरसात के बाद भंयकर भूस्खलन हो गया। कैप की जगह से ठीक उपर का पूरा पहाड ही नीचे आ गिरा। इस मलबे में मालपा गांव के साथ ही पूरा कैप ही खत्म हो गया। कैप का हिस्सा अभी भी मलबे के नीचे ही दबा है। बहुत से लोगो की लाशो को आज तक निकाला नही जा सका है। जानी मानी नृत्यागंना और अभिनेता कबीर बेदी का पत्नी प्रोतिमा बेदी का भी इस दुर्घटना मे निधन हो गया था। मालपा में इन सभी लोगो की याद मे स्मारक भी बनाया गया है। मालपा हादसे के बाद से ही कैप को मालपा से बुद्दि ले जाया गया था।


मालपा के मलबे मे दबा कैंप




मालपा मे दोपहर के खाने के बाद हम बुद्धि के लिए चल पडे। मालपा से बुद्धि नौ किलोमीटर था। शाम को करीब पांच बजे हम बुद्धि पहुच गये। बुद्धि मे शिविर के लोगो ने हमारा स्वागत किया। हमारे लिए बुरांश का जूस तैयार रखा गया था। बुरांश कुमाऊं में मिलने वाला एक फूल होता है जिससे बेहत स्वादिष्ट शरबत तैयार किया जाता है। सुबह तो जल्दी मे कोई नहाया भी नही था। यहा पहले से ही हमारे लिए गर्म पानी रखा गया था इसलिए मैने तो सबसे पहले नहाने का काम ही कियाय गर्म पानी से नहाने के बाद पूरे दिन की थकान से भी आराम मिला।

कुछ आराम के बाद मै और अजय गांव देखने निकले। बुद्दि के चारो और बर्फ से ढके पहाड इसे बेहद खूबसूरत बना रहे थे । यहा गांव मे झरने पर पानी से चलने वाली आटा चक्की भी लगी थी। इस चक्की तो यहा घराट कहा जाता है।
गांव की दुकान मे ही हमने जौ से बनने वाली स्थानिय बीयर छंग और अनाज से बनने वाली वाईन जिसे चकती कहते है का स्वाद भी लिया। इनका स्वाद तो बिलकुल अलग ही था। ऐसी बीयर तो मैने कभी भी नही पी थी।

यहा की दुकाने की एक और खासियत थी कि सुपर स्टोर की तरह जरुरत का सारा सामान एक ही दुकान मे मिल जाता है। चीन के साथ होने वाले सालाना व्यापार मे भी ये लोग जाते है। इसलिए इनकी दुकानो मे हर तरह का चीनी सामान मौजूद था जिसमे कपडे, जूते, खाने के सामान से लेकर शराब और बीयर के कैन तक सब कुछ शामिल था। इतनी ऊँचाई पर ये सब भी मिलेगा मैने तो सोचा भी नही था। गांव वालो से भी खूब बातें हुई। इलाके के बारे मे बहुत कुछ जानने को मिला। रात का खाना खाकर हम जल्दी ही सो गये क्योकि अगले दिन आगे गुजी तक का सफर तय करना था।……………………..

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच ३

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच ३

धारचुला से १ जून को छोटा कैलाश का हमार सफर शुरु हुआ। आज के बाद से सभी को सुबह जल्दी उठने की आदत डालनी थी। इसलिए सभी सुबह चार बजे ही उठ गये। नाश्ता करने का बाद सभी को आगे के सफर की जानकारी दी गई। हमारे सफर की शुरुआत ही थोडी मुश्किलो से हुई। दरअसल आज के हमारे सफर में हमे धारचुला से गर्भाधार नामकी जगह तक गाडियो से जाना था उसके बाद गाला तक लगभग पांच किलोमीटर की चढाई ही पहले दिन करनी थी। लेकिन पिछले कुछ दिनो से तवाघाट से पहले पहाड के खिसकने से सडक बंद हो चुकी थी। सडक पर करीब सौ मीटर के रास्ते पर भूस्खलन हो रहा था। अब इस सौ मीटर के कारण हमे इस जगह से पहले चढाई करके इसके पार निकलना था। लेकिन इसके लिए लिए हमें आठ किलोमीटर का पैदल सफर करना पडा।

खैर धारचुला में चलने से पहले हमारे पिट्ठू और घोडे वाले हमसे मिले। हमारा सामान घोडो पर जाने वाला था। और अगर किसी को चलने में दिक्कत हो उसे भी यहा से ही घोडे करने थे जो हमें आगे गर्भाधार से मिलने वाले थे। मैने जरुरी सामान अपने बैकपैक मे लिया और बाकी का सामान घोडे वालो को दे दिया।
धारचुला की सुबह बहुत ही हलचल भरी थी। करीब सात बजे हम यात्रा के लिए रवाना हुए। हम भूस्खलन वाली जगह पर पहुचे जहा से आठ बजे हमने अपनी चढाई का पहला दौर शुरु किया। ये आठ किलोमीटर हमारे ट्रैकिग प्लान में नही थे लेकिन पहाड पर हमेशा इसके लिए तैयार रहना चाहिए। ये आने जाने का आम रास्ता नही था इसलिए कही कही तो ये एक फीट भी चौडा नही था। इस साल के छोटा कैलाश और कैलाश मानसरोवर की यात्रा इसी रास्ते से होनी था इसलिए रास्ते को ठीक किया जा रहा था। खैर तेजी से चलते हुए मै, अजय और विश तो करीब ग्यारह बजे ही नीचे पहुच गये। विश सर आस्ट्रैलिया मे रहने वाले एन आर आई थे। आजकल नौकरी छोड कर भारत वापस चुके थे और अब अपने गृहनगर बैगलोर में रह रहे थे। साठ की उम्र के बावजूद वो काफी फिट थे। हालाकि बाकी लोगो के लिए हमने दो बजे तक इंतजार किया।

दो बजे हमे गाडियो से गर्भाधार के लिए रवाना हुए। रास्ते मे कुमाऊ पर्यटन ने अपने कैप में दोपहर के खाने का इंतजाम किया था। खाना खाकर हम गर्भाधार से उस दिन के पहले पडाव गाला के लिए रवाना हुए। गाला तक के लिए पांच किलोमीटर से ज्यादा की चढाई करनी थी। चार बजे से कुछ पहले ही हमने चढाई शुरु कर दी थी। अब रास्ते के पेड पौधे भी बदलने लगे थे क्योकि ऊंचाई के साथ वो भी बदल रहे थे। रास्ता भी खुबसूरत होता जा रहा था। ये एक अलग ही दुनिया थी जहा हमारी जिंदगी की रोज रोज की भागमभाग नही थी। मोबाइल फोन को बहुत पहले ही साथ छोड चुके थे। ऐसा लग रहा था कि हम समय मे बहुत पीछे लौट आये हैं।

रास्ते मे बरसात भी होने लगी। शाम को करीब साढे सात बजे हम गाला में कुमाऊं पर्यटन के कैम्प मे पहुचे। कैम्प के अधिकारी और दूसरे लोगो मे हमारा स्वागत किया। हमारे लिए चाय और गर्म पानी तैयार रखा गया था। गाला २४०० मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है इसलिए शाम को वहा अच्छी ठंड हो गयी थी। पहले दिन का चढाई के बाद सभी लोग थक गये थे इसलिए खाना खाने के बाद जल्दी हम सब लोग सो गये। अब आगे से हमे जल्दी सोने की आदत डालनी था क्योकि रोज सुबह हमे पांच से छ बजे के बीच यात्रा शुरु करनी थी। जिससे सभी लोग रात होने से पहले ही अगले पडाव पहुंच जायें। गाला के बाद अगले दिन तो हमें बुद्धि जाना था जिसके लिए लिए २१ किलोमीटर का सफर करना था। गाला से बुद्धि तक का रास्ता पूरे सफर का सबसे कठिन हिस्सा था।……………

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच-२

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच-२

जागेश्वर में शाम को मंदिर के दर्शन के बाद हम घूमने निकले। यहा चारो तरफ देवदार के घने जंगल है जिनमे घूमने का अपना अलग ही मजा है। जंगल में तरह तरह की चिडिया दिखाई दी जिन्हे मैने पहले कभी नहीं देखा था। दिल्ली की गर्मी के बाद जागेश्वर की ठंडक बेहद सुकुन दे रही थी।

अगले दिन हमें जागेश्वर से २०० किलोमीटर दूर धारचूला जाना था। भारत नेपाल सीमा पर बसा धारचूला कैलाश मानसरोवर और छोटा कैलाश यात्रा के लिेए आधार शिविर का काम करता है। ये सफर करीब बारह घंटे का है इसलिए हमे सुबह सात बजे अपना सफर शुरु करना था। सुबह हम सही समय पर यात्रा शुरु कर दी क्योकि धारचूला तक रास्ता सीधी खडी घाटियो से गुजरता है और ऐसे में रात का सफर खतरनाक हो सकता है।

जागेश्वर से निकलते ही असली उत्तराखंड दिखाई देने लगता है। रास्ते में देवदार और चीड के जंगल मन खुश कर देते हैं। बर्फीले पहाड भी गाहे बगाहे दिखाई देते रहते हैं। इन सबको देखते हुए समय कब बीतता है इसका पता ही नहीं चलता।

हमारे दोपहर के खाने का इंतजाम पाताल भुवनेश्वर में किया गया था। पाताल भुवनेश्वर में जमीन से करीब १०० मीटर नीचे गुफाओ की पूरी कडी है जिनमें चूना पत्थर से अद्भूत सी दिखाई देती रचना बनी है। मान्यता है कि इन गुफाओ में चारों लोक, चारों धाम और तैतीस करोड देवी देवताओ का वास है। यहा के पुजारी बताते है कि भगवान शिव यही से कैलाश पर्वत जाया करते थे और ये गुफा सीधे कैलाश से जुडी है। इन गुफाओ में चूना पत्थर की रचनाऐ बनी है जिनको पुजारी देवताओ की अपने आप बनी मूर्तियां बताते हैं। इसलिए मानने वालो के लिए ये जगह तीर्थ से कम नही है।

लेकिन विग्यान के आधार पर देखें तो ये चूने पत्थर की बनी आकृतियां है। जो हजारो सालो से टपकते पानी में मौजूद चूने के जमने से बन जाती है। दुनिया के बहुत से हिस्सो में इस तरह की गुफाए मिलती है। मै पहले भी इस तरह की गुफा जम्मू के पास कटरा से करीब १०० किलोमीटर दूर देख चुका हूं। जिसे शिवखोडी कहा जाता है शिवखोडी मे भी वही कहानी बताई जाती है जो मैने पाताल भुवनेश्वर में सुनी ( शिवखोडी की यात्रा के बारे मे बाद में लिखूंगा)।


पंचाचूली का नजारा

पाताल भूवनेश्वर से पंचाचूली की पांचो चोटियो का खूबसूरत नजारा हमने देखा। दोपहर का खाना यहां के कुमाऊं पर्यटन के होटल में खाना खाकर हम चल पडे धारचूला के लिए। पहुचते पहुचते हमे करीब सात बज ही गये। धारचुला मे रात हो जाने के कारण हम कुछ देख नही सके। ये कस्बा काली नही के किनारे बसा है। काली नदी यहां भारत और नेपाल की सीमा बनाती है। काली नदी के एक ओर धारचूला तो दूसरी तरफ नेपाल का शहर है। हमारा होटल भी काली के किनारे ही था इसलिए अच्छा लग रहा था। सारे दिन के सफर से थके हम जल्दी ही आराम करने चले गये। अगले दिन से हमें छोटा कैलाश की पैदल यात्रा शुरु करनी थी। इस तरह हमारा दूसरा दिन खत्म हो गया…………………..

काली के दूसरी तरफ दिखाई देता नेपाल

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच- १

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच- १

छोटा कैलाश कुमाऊं में एक पवित्र स्थान है। इसको तिब्बत के कैलाश मानसरोवर के बराबर ही माना जाता है। छोटा कैलाश एक तीर्थ के साथ ही ट्रैकिंग के लिए भी बेहतरीन है। ये उत्तराखँड के पिथौरागढ जिले मे चीन-तिब्बत की सीमा पर है। यहां तक पहुंचने के लिए तवाघाट से पहाडो की चढाई शुर करनी पडती है। तवाघाट से आने और जाने मे कुल मिलाकर २०० किलोमीटर से भी ज्यादा की पैदल दूरी पहाडों में तय करनी पडती है। मेरा भी पिछले कई दिनो से यहां जाने के बारे में सोच रहा था। मुझे ट्रैकिंग का शौक है मेरे यहां जाने के पीछे मेरा ये शौक ही कारण बना। छोटे कैलाश के इस ट्रैक को ट्रैकिग के आधार पर देखे तो कडे ट्रैक की श्रेणी मे रखा जाता है। लेकिन ये पूरा ही ट्रैक बेहद खूबसूरत पहाडो, नदियो, झरनो, फूलो की घाटियो से भरा पडा है, इसलिए थकान का अहसास ही नहीं होता।


मुझे तो दिल्ली से जाना था। कुमाऊं पर्यटन निगम यहा के लिए टूर ले जाता है। इसलिए मैने कुमाऊं पर्यटन के दफ्तर से यहा कि बुकिंग करवाई। पता चला कि तीन दिन बाद ही एक छोटा सा ग्रुप जाने वाला है जिसमे कुल छ ही लोग है सातवे के तौर पर मैने बुकिंग करवा ली। दिल्ली से दिल्ली तक इस पूरे सफर मे सत्रह दिन लगते हैं।

छोटा कैलाश करीब साढे चार हजार मीटर की ऊंचाई पर है। मौसम बेहद ठंडा और रास्ता बेहद कठिन है इसलिए तीन दिन मे ही मुझे काफी तैयारी करनी थी। इतनी ऊचाई पर जाने के लिए ठंडे और बरसात से बचने के लिए अच्छे गर्म कपडे सबसे पहली जरुरत होती है। उनके इंतजाम के बाद जरुरी दवाईयां रखनी थी। क्योकि पूरे रास्ते में करीब बारह दिन आम दुनिया से दूर पहाडो के बीच बिताने थे जहा किसी भी तरह की मेडिकल सहायता मिलना मुश्किल है। खैर तीन दिन कैसे बीत गये पता थी नही चला। जाने वाले दिन हम सभी को एक होटल मे मिलना था जहा से रात को हमारी यात्रा शुरु होनी थी। यहा मै अपनी ग्रुप के दूसरे छ लोगो से मिला। मुझे देखकर ताजुब्ब हुआ कुल सात लोगो मे से चार लोग ऐसे थे जिनकी उम्र साठ साल से ज्यादा थी। मैने आने से पहले पता किया था कि छोटे कैलाश का ये ट्रैक काफी कठिन माना जाता है। अगर आप को ट्रैकिग की आदत नही है तो इसे पूरा करना खासा मुश्किल है। यहां तो मेरे अलावा किसी ने भी पहले ट्रैंकिग नही की थी। मुझे लगा कि यहा तो मै अकेला ही रह जाऊंगा क्योकि मेरे उम्र का यहा कोई दिखाई नही दिया सिवाय अमेरिका में रहने वाले एक भारतीय डाक्टर के। अजय नाम का ये डाक्टर कुछ दिन पहले ही अपनी पढाई पूरी करके किस्मत आजमाने अमेरिका गया था। और मेरी ही तरह ये ही ट्रैकिग के लिए जा रहा था। मेरी जल्दी ही उससे दोस्ती हो गयी। अब मुझे लगा कि ठीक है नही तो सत्रह दिन काटना मुश्किल हो जाएगा। जब अजय से बत हुई तो पता चला कि ये बात उसके भी दिमाग मे भी चल रही थी। यहां हमारे टूर गाइड जीतू से सबकी मुलाकात हुई आगे के सफर में जीतू ही हम सबको ले जाने वाला था। जीतू भी मेरी ही उम्र का था इसलिए तस्सली हुई कि कोई और मिला जो साथ रहेगा। खैर हमको जीतू ने रास्ते मे आने वाली मुश्किलो के बारे मे बताया। हमे बताया गया कि क्या क्या दिक्कते सामने आ सकती है और उनसे बचने के लिए क्या किया जा सकता है। हमे क्या क्या जरुरी सामान ले जाना था इसकी लिस़्ट पहले ही हमे मिल चुकी थी। सबने अपना सामान एक बार चैक किया। फिर रात का खाना खाने के बाद हम लोग अपनी यात्रा के लिेए चल पडे। मई के महीना खत्म होने को था और दिल्ली मे बेहद गर्मी पड रही थी। लेकिन हमारे निकलने से पहले ही मौसम भी बदलने लगा और बरसात होने लगी। बरसात बेहद अच्छी लग रही थी। रात को करीब दस बजे हम चल पडे उत्तराखंड के लिए। अगले दिन हमारा पहला पडाव बनने वाला था अलमोडा जिले का जागेश्वर। सुबह सुबह हम हलद्वानी पहुचे। रात के पूरे रास्ते बरसात होती रही थी और अभी भी बरसात जारी थी। मुझे थोडा सा डर लग रहा था कि अगर आगे भी बरसात होती रही तो कुछ दिन के बाद हमारी पैदल चढाई से समय दिक्कत आ सकती है। खैर हलद्वानी से थोडा आगे काठगोदाम मे हम लोग पर्यटन विभाग के होटल मे सुबह की चाय के लिए रुके। काठगोदाम से ही पहाडी सफर की शुरुआत भी हो जाती है। इसके आगे ये पहाड हमारे साथ बने रहने वाले थे।
अब तक अजय से अच्छी दोस्ती हो गयी थी इसलिए रास्ता आराम से कट रहा था। ये इलाका मेरे लिए जाना पहचाना था इसलिए मे इसके बारे मे अजय को बता रहा था। करीब दस बजे हम लोग अलमोडा पहुचे। अलमोडा उत्तराखंड का जाना पहचाना हिल स्टेशन है। पर हमे यहा के करीब तीस किलोमीटर आगे जागेश्वर जाना था।

जागेश्वर अपने शिव मंदिर के लिेए तीर्थ स्थान के तौर पर जाना जाता है। बेहद खूबसूरत जागेश्वर एक घाटी मे है जो चारो और देबदार के पेडो से घिरी है। दोपहर के खान से पहले हम जागेश्वन पहुचे गये। आज हमे यहा आराम करना था। आगे का सफर अगले दिन सुबह शुरु होना था………………………..

( जागेश्वर के बारे मे जानने के लिए मेरा जागेश्वर पर लिखा पुराना लेख पढे।)

उत्तराखंड के ऐतिहासिक शहर काशीपुर का सफऱ

उत्तराखंड के ऐतिहासिक शहर काशीपुर का सफऱ

आज चलते हैं उत्तरांचल के ऐतिहासिक शहर काशीपुर के सफ़ऱ पर। काशीपुर उत्तरांचल के तराई इलाके में बसा छोटा सा खूबसूरत शहर है। इस शहर का इतिहास हर्षवर्धन ( ६०६-६४७) से लेकर महाभारत काल तक जाता है। हर्ष के समय के पुरास्थल अभी भी यहा देखे जा सकते है।

पुराणों में इसको उज्जनक नाम से लिखा गया है। हर्ष के समय काशीपुर को गोविषाण के नाम से जाना जाता था। चीनी यात्री ह्वेन सांग (६३१-६४१) ने भी काशीपुर की यात्रा की थी। मेरा ननिहाल भी काशीपुर का ही है इसलिए पिछले दिनो यहां जाना हुआ। सोचा की यहां से आप सबका भी परिचय करवा दिया जाए।
काशीपुर के इतिहास को खोजने के लिए यहां सबसे पहले १९५२ में खुदाई की गई। उसके बाद १९७०-७२ और सबसे आखिर में २००२-०३ में यहां खुदाई की गई। यहां हुई खुदाई में हर्ष के समय के मंदिर और शहर के अवशेष मिले हैं।आज के शहर से लगभग दो किलोमीटर दूर पुरानी बसावट मिली है। यहां मिले मिट्टी के बर्तनो, सिक्को, इमारतों की बनावट से ये पता चलता है कि शहर महाभारत काल से ही अस्तित्व में है।

अभी जो फोटो आप देख रहें हैं वो वहां मिले मंदिर के हैं जो कि हर्ष के समय का है। इस को पक्की ईंटो से बनया गया है। बाहरी दीवारो पर लगी ईटो की चमक आज पन्द्रह सौ साल बाद भी बरकरार है।

ये इलाका लगभग छ सौ एकड में फैला हुआ है। यहा आज भी पूरा शहर दबा पडा है। पुरे इलाके में उस जमाने की ईटें बिखरी पडी हैं। आप को एहसास होगा कि जैसे सदियों पुराना इतिहास आप के साथ चल रहा है

इस के पास ही द्रोणासागर ये एक झील है और उसके चारों मंदिर बने हैं। ये बेहद खूबसूरत जगह है सुबह सुबह यहां टहलने का मजा ही कुछ और है। द्रोणसागर का सम्बन्ध पाडवों के गुरु द्रोण से बताया जाता है। कहा जाता है कि ये गुरु द्रोण का आश्रम था । इसमें सच्चाई भी लगती है क्योकि यहां से महाभीरत कालीन अवशेष मिले हैं।

द्रोणसागर में ही भारतीय पुरातत्व विभाग का संग्राहलय भी है जिसमें काशीपुर की खुदाई से मिली चीजो को रखा गया है। यहा से काशीपुर के इतिहास की जानकारी ली जा सकती है।

भीमशंकर महादेव

भीमशंकर महादेव काशीपुर में भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर और तीर्थ स्थान है। यहां का शिवलिंग काफी मोटा है जिसके कारण इन्हे मोटेश्वर महादेव भी कहा जाता है। पुराणो में भी इसका वर्णन मिलता है। आसाम में शिव के द्वाद्श ज्योर्तिलिगों में एक भीमशंकर महादेव का मंदिर है। काशीपुर के मंदिर का उन्हीं का रुप बताया जाता है।

चैतीमंदिर-

मोटेश्वर महादेव के पास ही है माता बालसुंदरी का मंदिर है जिसे चैती माता भी कहा जाता है। इस मंदिर की पूरे उत्तरांचल में बेहद मान्यता है।

गिरीताल-

ये भी एक झील है। यहां पर चामुंडा देवी का मंदिर है । पेडों से घिरी बेहद मनोरम जगह है गिरीताल। यहां झील में बोटिंग करने का अलग ही मजा है।

अभी पर्यटन मानचित्र पर काशीपुर को सही तरह से नहीं लाया गया है। लेकिन यहां देखने के किए इतना कुछ है कि अगर सही तरीके से बताया जाए तो बडी संख्या में पर्यटक यहां आ सकते हैं। खासतौर पर इतिहास मे रुचि रखने वाले पर्यटक यहां जरुर आना चाहेगें।

काशीपुर साल के किसी भी समय घूमने के लिए आया जा सकता है। जिम कार्बेट नेशनल पार्क यहां से साठ किलोमीटर की दूरी पर है इसलिए उसके साथ यहां भी आया जा सकता है। ये दिल्ली से जिम कार्बेट जाने वाले रास्ते पर ही है। प्रसिद्ध हिल स्टेशन नैनीताल यहां से लगभग अस्सी किलोमीटर है। तो नैनीताल आते समय काशीपुर आसानी से आया जा सकता है ।

कहां ठहरें-

गिरीताल में कुमाउं मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस है। इसके अलावा शहर के बस अड्डे के पास कई अच्छे होटल है। अभी चैती मंदिर जाने वाले रास्ते पर नया होटल द मेनर खुला है। लेकिन ये छोडा मंहगा है।

कैसे पहुचें-

दिल्ली से लगभग सवा दो सौ किलोमीटर दूर है। दिल्ली से आने के लिए रेल और बस सुविधा आसानी मिल जाती है।दिल्ली से एक ही रेल है लेकिन बस सुविधा हर समय मिल जाती है।