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Category: Uttar Pradesh

श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट एंड स्पा (Shri Radha Brij Vasundhara Resort and Spa)

श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट एंड स्पा (Shri Radha Brij Vasundhara Resort and Spa)

श्री ब्रज राधा वसुधंरा रिसॉर्ट ब्रज की धरती पर बना एक सुन्दर रिसॉर्ट है। यह रिसॉर्ट मथुरा से करीब 30 किलोमीटर दूर गोवर्धन में है। गोवर्धन में ही वह गोवर्धन पर्वत है जिसे भगवान कृष्ण ने अपनी अंगुली पर उठाकर ब्रज वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। आज भी भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। इसी गोवर्धन पर्वत के करीब ही बना है यह रिसॉर्ट । यही इस रिसॉर्ट की खासियत भी है। बस रिसॉर्ट में रूकिए आराम कीजिए और रिसॉर्ट से बाहर आकर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा शुरू कर दीजिए।

TCBG के ट्रेवल ब्लॉगर्स का हमारा छोटा सा ग्रुप भी पहुंचा था इस रिसॉर्ट में रहने के लिए। मथुरा स्टेशन से गोवर्धन का रास्ता हरा भरा और खूबसूरत हैं इसका मजा लेते हुए करीब 30 मिनट में हम गोवर्धन रिसॉर्ट पहुंचे। बड़े से दरवाजे से रिसॉर्ट के अंदर जाते ही माहौल बदल जाता है।

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पेड़-पौधों से भरा इलाका, चौडी सड़क और एक कोने में खड़ी गोल्फ गाड़ी ( ये रिसॉर्ट में एक जगह से दूसरी जगह जाने के काम आती हैं) दिखाई देती हैं। दरअसल यह हॉलिडे रिसॉर्ट होने के साथ एक रिहायशी सोसाइटी भी है। 25 एकड़ में फैले इसके कैम्पस में कुल 240 कॉटेज बने हैं जिसमें से 50 का इस्तेमाल रिसॉर्ट की तरह किया जाता है। बाकि बचे कॉटेज निजी प्रयोग के लिए लोगों को बेचे गए हैं। इन सभी कॉटेज को 24 – 24 के गोलाकार ग्रुप में एक पेड़ के आकार में बनाया है। हर ग्रुप का नाम देश की एक प्रमुख नदी के नाम पर रखा गया है।

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कॉटेज-

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रिसॉर्ट में कमरे के कॉटेज और कॉटेज स्वीट बने हैं। स्वीट में में डबल बेड रूम के साथ ही एक लिविंग रूम भी दिया गया है। जबकि सामान्य कॉटेज में आपको एक डबलबेड रूम मिलता है। यहां पूरे परिवार के लिए 2 कमरे का कॉटेज भी उपल्बध है । मैं कॉटेज स्वीट में रूका था। कमरा खासा बडा था ।

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कॉटेज स्वीट होने के कारण बाहर एक लिविंग रुम और उसके अंदर एक कमरा दिया गया था। कमरे के ठीक बाहर बने लॉन से कॉटेज और भी सुन्दर लग रहा था। शाम के समय लान में आराम से बैठिए और चाय का मजा लिजिए। कमरे में जरूरत की सभी चीजें लगाई गई हैं। हां सुबह-सुबह आप की आवाज चिडियों की चहचहाट से ही खुल जाएगी।

खाना—

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रिसॉर्ट का अपना रेस्टोरेंट हैं जहां हर तरह के खाने का इंतजाम है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, चायनीज या कान्टीनेन्टल सब कुछ यहां मिल जाएगा। मैंने यहां सभी तरह का खाना खाया। उत्तर भारतीय खाना मुझे सबसे बेहतर लगा ।
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सुबह के नाश्ते में बना इडली, सांभर या पोहा भी स्वादिष्ट थे। हां यहां के चायनीज खाने में अभी कुछ सुधार की गुंजाइश हैं। इसके अलावा रेस्टोरेंट कुल मिलाकर बढिया है और ज्यादा मंहगा नहीं है। शहर के बाहर बने रिसॉर्ट के साथ यह परेशानी आती है कि खाना अक्सर मंहगा होता है लेकिन श्री ब्रज वसुंधरा में ऐसा करने की कोशिश नहीं की गई है।

अनुभूति स्पा-

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श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट के स्पा के बारे में जरूर बताना चाहूंगा। अनुभूति नाम का यह स्पा वाकई अलग अनुभूति देता है। इस छोटे से स्पा को बडी सुन्दर से सजाया गया है और अंदर जाते ही शांति का एहसास होता है।

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आप स्पा के बेहद बढिया मसाज का आंनद उठा कर यात्रा की थकान को उतार सकते हैं। अगर गोवर्धन पर्वत की पैदल यात्रा करके यहां आए हो तो फिर स्पा में कुछ समय बिताना अच्छा रहेगा। अनुभूति स्पा सही मायने में इस रिसॉर्ट की एक खासियत है।

रिसॉर्ट में और क्या करें –

रिसॉर्ट में एक छोटा सा इंडोर स्विमिंग पूल भी है जहां समय बिताया जा सकता है। इसके अलावा यहां एक जिम भी है। रिसॉर्ट के क्लब में पूल टेबिल, टेबल टेनिस और एयर हॉकी खेल सकते हैं।

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सुबह उठ कर सैर करने का शौक है तो रिसॉर्ट सबसे बेहतर है। 25 एकड के पूरे केैंम्पस में सड़क बनी है जिस पर पैदल टहला जा सकता है। यहां पर घूमने के लिए साइकिल भी उपलब्ध हैं।

क्या घूमें-

रिसॉर्ट के ठीक सामने से ही गोवर्धन पर्वत की यात्रा का रास्ता है । यात्रा 21 किलोमीटर की है अगर पैदल नहीं करना चाहें तो आजकल गाड़ी या रिक्शा से भी यह यात्रा कर सकते हैं। यात्रा के पूरे रास्ते में मंदिरों की भरमार है जिन में कुछ वाकई पुराने हैं तो कुछ के साथ भगवान कृष्ण की कोई कहानी जुडी है इनको देखते हुए यात्रा पूरी कर सकते हैं।

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एक दिन मथुरा और वृंदावन को देखने के लिए अलग से रखा जा सकता है। अगर पुराने इतिहास में रुचि है तो मथुरा संग्रहालय से बेहतर जगह नहीं हो सकती।

कैसे जाएं-

दिल्ली से मथुरा के लिए बस और ट्रेन आसानी से मिल जाती हैं। ट्रेन करीब 2 घंटे का समय लेगी। बस से भी लगभग इतने ही समय में पहुंच सकते हैं। इसके अलावा अपनी गाड़ी है तो यमुना एक्सप्रेस का इस्तेमाल करके आसानी से पुहंच सकते हैं। रेलवे स्टेशन से गोवर्धन करीब 30 किलोमीटर दूर हैं।

श्री ब्रज राधा वसुंधरा घूमने से ज्यादा आराम करने की जगह है। अगर आप दिल्ली के पास कोई जगह चाहते हैं जहां आधुनिक सुविधाओं के बीच आराम कर सके तो यह बढिया जगह हो सकती है। हां साथ में धार्मिक जगह के दर्शन का फायदा तो है ही। मैंने यहां चार दिन बिताए और वाकई मैंने हर पल का मजा उठाया।

Note- यह यात्रा श्री ब्रज राधा वसुंधरा रिसॉर्ट के निमंत्रण पर TCBG ने आयोजित की थी।

अशोक का सारनाथ सिंह स्तंभ

अशोक का सारनाथ सिंह स्तंभ

अशोक स्तंभ
भारत के राजकीय चिन्ह सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ को देखने
की इच्छा ना जाने कब से मन में थी। मेरे वाराणसी जाने की एक वजह अशोक का सारनाथ स्तंभ
भी था। आखिरकार सारनाथ पहुंचने के साथ ही मेरी हसरत पूरी हुई।
अशोक के स्तंभों के मुख्यत दो हिस्से होते थे। ऊपरी हिस्से
में बने किसी पशु की आकृति और नीचे का सपाट स्तंभ।
सारनाथ के सिंह स्तंभ का ऊपरी हिस्सा या शीर्ष सारनाथ में
पुरात्तव विभाग के संग्राहलय में रखा हुआ है और उसका बाकी हिस्सा या स्तंभ संग्राहालय
के पास ही में सारनाथ स्तूप के पास रखा गया है। संग्राहलय के अंदर जाते ही पहली
नजर इसी सिंह स्तंभ पर पडी और नजर पडने के साथ ही जैसे इसी पर ठहर गयी। भारतीय कला
का अद्भुत नमुना आंखों के सामने था।
प्राचीन भारतीय विज्ञान और कला को बेजोड़ उदाहरण है यह सारनाथ
का सिंह शीर्ष ( lion- capitol) । इस की खासियत इस पर की गई चमकदार पालिश है जो करीब
2250 वर्षों के बाद भी जस की तस है। आज भी इस पर प्रकाश डालेंगें तो निकलने वाली
चमक से आखें चुंधिया जायेंगी। सारनाथ के करीब 70 किलोमीटर दूर चुनार की खदानों में
मिलने वाले बलुआ पत्थर से इसे बनाया गया है। इस पत्थर में काली चित्तियां हैं जो
साफ दिखाई देती हैं।  लेकिन इस पर यह चमक
कैसे लाई गई होगी इसका जवाब आज तक कोई नहीं ढूंढ पाया है। कुछ इतिहासकार इसे कला
को ईरान से आया मानते हैं और कुछ का मानना है कि पत्थर को चमकाने की कला भारत में
पहले से ही मौजूद थी। 

इतिहासकारों का मानना है कि मौर्य काल में चुनार पत्थर की कला का केन्द्र रहा होगा जिसे मौर्य दरबार के संरक्षण मिलता था। चुनार में ही अशोक के समय के लगभग ज्यादातर स्तभों को बनावाया गया था। चुनार के गंगा नदी के किनारे होने के कारण इन्हे यहां से ले जाना आसान था। स्तंभों की लंबाई 40 से 50 फुट तक है। अब तक अशोक के समय के 20 के करीब स्तंभ मिले हैं। सम्राट अशोक के बनवाये गये स्तंभों की खासियत यह है कि इन्हें एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है। इसलिए इन्हें एकाश्म ( Monolithic) स्तंभ कहा जाता है। ये स्तंभ से ऊपर से नीचे की ओर मोटे होते चले गये हैं। सारनाथ का स्तंभ अब कई हिस्सों में टूट चुका है। सारनाथ स्तंभ पर अशोक का ब्राह्मी लिपी में लिखा शासनादेश भी खुदा हुआ है। 

ब्राह्मी लिपी में खुदा शासनादेश

                                                         

                       









सिंह-शीर्ष ( lion- capitol)
सम्राट अशोक के बनवाये गये स्तंभों में सारनाथ के सिंह
शीर्ष वाले स्तंभ को सबसे बेहतर माना जाता है। इसमें सबसे ऊपर चारों दिशाओ में चार
सिंह बने हैं। लेकिन अपनी बनावट में यह सिंहों की आकृति बेहद सौम्य नजर आती है। शेरों
की मासंपेशियों, उनके बालों और शारीरिक बारिकियों के बेहद कुशलता के साथ पत्थर पर
उकेरा गया है। इन्हें सम्राट अशोक की शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है। इन सिंहों
के नीचे एक पट्टी पर चारों दिशाओं में चार चक्र बने हुए हैं जिनमें 32 तीलियां
हैं। इन चक्रों को धर्मचक्रप्रवर्तन का प्रतीक माना जाता है। भारत के झंडें के बीच
में अशोक चक्र का चिन्ह यहीं से लिया गया है। इसी पट्टी पर चार पशु, हाथी, घोड़ा, बैल
और सिंह बने हुए हैं। जो देखने में बेहद वास्तविक लगते हैं। इन चारों पशुओं को
क्या सोचकर बनाया गया इसके लेकर इतिहासकारों में बहुत से मत हैं। कुछ इसे भगवान
बुद्द से जोडतें हैं तो कुछ इसे प्राचीन हिन्दु धर्म से जुड़ा बताते हैं। कारण कुछ
भी रहा हो लेकिन इनकी कला लाजवाब है।
कैसे पहुंचें
 सारनाथ वाराणसी से
13 किलोमीटर दूर है। वाराणसी से यहां तक आने के लिए बस और टैक्सी आसानी से मिल
जाती हैं। वारणसी पूरे देश के बडें शहरों से रेल या हवाई मार्ग से जुड़ा है।
नोट- सिहं शीर्ष संग्राहलय में रखा है और उसकी तस्वीर
लेने  की इजाज़त नहीं हैं।