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क्राउन प्लाजा जयपुर – एक साल पूरा होने का जश्न

क्राउन प्लाजा जयपुर – एक साल पूरा होने का जश्न

क्राउन प्लाजा जयपुर के एक साल पूरा होने के मौके पर वहां जाने का निमंत्रण मिला। बचपन से ही जयपुर से एक जुड़ाव रहा है तो वहां जाने का मौका मेरे लिए हमेशा ही खास होता है।
जब मेरी गाड़ी होटल के नजदीक पहुंची तो क्राउन प्लाजा की विशाल इमारत नजर आई। जयपुर जैसे शहर में जहां हेरिटज या हेरिटेज हवेली जैसे दिखाई देने वाले होटल बडी संख्या में हैं वहीं क्राउन प्लाजा ने पूरी तरह से आधुनिक आर्किटेक्टर का सहारा लिया है।

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होटल में प्रवेश करते ही नजर आती है इसकी बडी सी लॉबी और रिसेप्शन एरिया। लॉबी का इलाका खासा बडा है और इसमें घुसते ही एहसास हो जाता है कि आप किसी लक्जरी होटल में आ गए हैं। मेरा कमरा पहले से ही बुक था । रिसेप्शन पर मुझे मुश्किल से 2 मिनट लगे और मेरे चेक-इन पूरा हो गया। इसके बाद मैं अपने कमरे में पहुंचा। कमरा खासा बडा था।

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कमरे में घुसते ही एक छोटा सा गलियारा है, जिसके बांयी तरफ बाथरूम और ड्रेसिंग के लिए जगह दी गई थी। इसके बाद पूरा बडा कमरा आपके सामने आता है। कमरे में फर्श पर एक बढिया रंगबिरंगा कालीन बिछा था ।

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कमरे को पूरी तरह से एक आधुनिक रूप दिया गया था। एक तरह बड़ा सा बिस्तर लगा था। बिस्तर पर कुछ कार्ड रखे थे जिन्होंने मेरा ध्यान खींचा। एक कार्ड दरअसल तकियों का मेन्यू था जिसमें बताया गया था कि आप सुविधानुसार कितने तरह के तकिए इस्तेमाल के लिए मंगा सकते हैं।

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दूसरे कार्ड पर टर्नडाउन सर्विस की जानकारी दी गई थी। टर्नडाउन सर्विस लक्जरी होटल्स में दी जाती है जिसमें शाम के समय आपके सोने के लिए कमरे को तैयार किया जाता है। जिसमें आपका बिस्तर बदलने से लेकर कमरे की कुछ दूसरी चीजों को बदला जाता है जिससे आप सुकून और शांति से सो सके।
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कमरे के एक तरफ शीशे की बड़ी सी दीवार थी जिससे होटल के पीछे हरा-भरा जंगल जैसा इलाका नजर आ रहा था। जयपुर शहर के सीतापुर जैसे इंडस्ट्रियल इलाके में इतना हरा भरा जमीन का टुकडा आंखों को काफी रास आया।
कमरें में जरूरत की सभी चीजें थी जिनकी एक बिजनेस ट्रेवलर को जरूरत पड सकती है।

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अब तक दोपहर हो चुकी थी। इसी समय होटल के एक साल पूरा होने के मौके पर केक काटा गया। केक काटने के बाद हमारा खाना होटल के चायनीज रेस्टोरेंट हाउस ऑफ हान में रखा गया था ।

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इसी दिन से रेस्टोरेंट में मंगोलियन ग्रिल्स खाने की शुरूआत भी हुई । चायनीय खाना पंसद करने वालों के लिए हाउस ऑफ हान एक अच्छी जगह है। यहां बने खाने को चाइनीज तरीके से ही बनाने और परोसने की कोशिश की जाती है। इसके लिए यहां एक मलेशिया से विशेष शेफ को भी बुलाया गया है। खाना तो मुझे बहुत अच्छा लगा।
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सबसे ज्यादा लुभाया खाने से पहले पेश की जाने वाली जैसमीन टी परोसने के तरीके ने। इस चाय को पीतल की केतली के जरिए परोसा गया जिसके आगे कई फीट लंबी नली लगी थी। पता नहीं कि चीन या मंगोलिया में इस तरह से चाय परोसी जाती है या नहीं लेकिन यहां यह तरीका देखने में मजेदार लगा।

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हाउस ऑफ हान के अलावा होटल में एक दूसरा रेस्टोरेंट भी है जिसे सिरोको नाम दिया गया है। रात का खाना सिरोको में ही था। रात को सिरोको के खाने में हर तरह का खाना मौजूद था लेकिन मैंने यहां राजस्थानी खाना खाया।

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अब दाल-बाटी चूरमा, गट्टे की सब्जी, कैर सांगरी की सब्जी मिले तो कोई दूसरी खाने की तरफ देख की कैसे सकता है। राजस्थानी खाने को खाने के बाद मुंह से वाह के अलावा कोई दूसरा शब्द नहीं निकला। यहां का राजस्थानी खाना पूरी तरह से पारंपरिक राजस्थानी स्वाद और विशेषता लिए हुए था।
इतने बेहतरीन स्वाद वाला राजस्थानी खाने यहां कैसे बना इसकी वजह पूछे बिना मुझसे नहीं रहा गया तो पता लगा कि होटल ने यहां राजस्थानी खाना बनाने के लिए किसी शेफ को नहीं बल्कि राजस्थानी महाराज को रखा है। महाराज ही यहां ये खाना राजस्थानी खाना बनाते हैं। राजस्थानी मिठाई बनाने के लिए खासतौर से जोधपुर के हलवाईयों को रखा गया है।
सिरोको में अगले दिन सुबह का नाश्ता भी बेहतरीन रहा ।
इस तरह अच्छी यादों के साथ एक दिन का जयपुर क्राउन प्लाजा का यह सफर खत्म हुआ।

आमोद अलवर बाग( Aamod Alwar Bagh) में दो दिन

आमोद अलवर बाग( Aamod Alwar Bagh) में दो दिन

चारों तरफ अरावली की पहाडियां और हरे- भरे खेतों के बीच बना है आमोद अलवर बाग रिसॉर्ट। सरिस्का टाइगर रिजर्व से नजदीकी इसे और भी खास बनाती है। यह रिसॉर्ट अलवर से करीब 15 किलोमीटर और सरिस्का टाइगर रिजर्व से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। जंगल के नजदीक होने के कारण यहां पूरी शांति और सुकून का अनुभव कर सकते हैं। अलवर बाग में दाखिल होते ही वाकई किसी जंगल में आने का एहसास होता है।

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पांच एकड में फैले इस रिसोर्ट के करीब दो तिहाई हिस्से में पूरी तरह से हरियाली और उसमें भी आवंला, नींबू और शहतूत जैसे पेडों को लगाया गया है। इसी हरियाली के बीच से होकर आप अपने कमरों तक पहुंचते हैं।

कमरे –

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यहां कुल 37 कमरे बने हैं। इन कमरों को राजस्थानी हवेली की तरह बनी चार इमारतों में बांटा गया है। इन इमारतों को रावला, जयगढ़, भंवर विला और गुलाब विला का नाम दिया गया है। जयगढ में सबसे ज्यादा 19 कमरे हैं। बाकी तीनों में 6-6 कमरे हैं। इनसे से कुछ कमरे Super Deluxe हैं तो बाकि के कमरे Deluxe श्रेणी के हैं। मैं जयगढ़ के Super Deluxe कमरे में रूका था। जब में अपने कमरे में पहुचा तो एहसास हुआ कि सही मायने में किसी लक्जरी रिसॉर्ट में आया हूँ। कमरा क्या , शहर के किसी अच्छे खासे फ्लैट से भी बडा हॉल था। कमरे की जरूरत के मुताबिक सभी चीजे वहां रखी गई थी।

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खासियत यह थी कि लक्जरी दिखाने की होड में कमरे को चीजों से भरा नहीं गया था इसलिए कमरे के बड़े आकार को महसूस किया जा सकता था। कमरे के अंदर की खाली जगह सुकून दे रही थी। कमरे के साथ लग बाथरूम भी खासा बडा था। कमरे में साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा गया था। Super Deluxe की तरह ही Deluxe कमरे भी बेहद शालीनता से सजाए गए हैं । ये कमरे भी खासे बड़े हैं। अपनी जरूरत के हिसाब से कमरे चुन सकते हैं।

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यहां भंवर विला और गुलाब विला में बने कमरे आकर्षक हैं। इन सभी कमरों को राजस्थानी चित्रकारी से सजाया गया है। पूरे रिसॉर्ट के सुपर डीलक्स और डीलक्स कमरों का किराया एक समान है फिर भी भंवर विला में रूकने को तरजीह दी जा सकती है। भंवर विला के कमरे के बाहर राजस्थानी तरीके की छत बनी है जिसमें जाली और झरोखे बनाए गए हैं। इसके कारण जहां खुली छत का मजा लिया जा सकता है वहीं आप सबकी नजरों से दूर रहकर शांति के पल बिता सकते हैं।
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खाना – पीना –

रिसॉर्ट के रेस्टोरेंट में उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, राजस्थानी और कॉन्टीनेन्टल हर तरह का खाना परोसा जाता है। दोपहर में मैंने उत्तर भारतीय खाना ही खाया, दाल , पनीर और सब्जी और तंदूर रोटी । खाना स्वाद से भरा था। रात के खाने के लिए बताया गया कि राजस्थानी थाली का इंतजाम किया गया है। खाने का असली मजा रात को ही मिलने वाला था। रात को राजस्थानी थाली में राजस्थान की मशहूर दाल-बाटी, गट्टे की सब्जी, लहसन की चटनी , पापड की सब्जी सभी कुछ था । राजस्थानी खाने का स्वाद लाजवाब था। अलवर बाग के मुख्य शेफ गौरव भनोट खुद भी खाने को नया बनाने की कोशिश करते रहते हैं।

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क्या कर सकते हैं यहां-

अलवर बाग में मनोरंजन के लिए इतने इंतजाम किए गए हैं कि आप चाहें को यहीं अपना पूरा समय बिता सकते हैं। रिसॉर्ट में पेंटबॉल, शूटिंग, रॉक क्लाइंबिंगस, रोप कॉर्स, रिमोट कार रेसिंग जैसे रोमांचक खेलों का मजा लिया जा सकता है। इतने तरह के खेल एक रिसॉर्ट में मुश्किल से ही देखने को मिलते हैं। इसके अलावा बेडमिंटन और बास्केटबाल और क्रिकेट खेल कर भी समय बिताया जा सकता है। इतना सब कुछ करने के बाद थक जाएं तो यहां को स्पा में जाकर थकान उतारी जा सकती है। स्पा में कई तरह की मसाज उपलब्ध हैं।

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शाम के साथ रिसॉर्ट का माहौल और भी खूबसूरत हो जाता है। हरे भरे लॉन के बीच बने स्विमिंग पूल में शाम का पूरा मजा लिया जा सकता है। पूल के साथ ही रिसॉर्ट का आडटडोर किचन काउंटर है जहां से आपकी फरमाइश पर तरह तरह के स्नैक्स परोसे जा सकते हैं।

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इतना सब कुछ को रिसॉर्ट में ही है कि दो दिन भी कम नजर आते हैं। फिर भी अगर बाहर घूमना चाहते हैं तो अलवर और सरिस्का टाइगर रिजर्व की सफारी पर जाया जा सकता है। अलवर यहां के करीब 15 किलोमीटर दूर है जहां अलवर संग्राहलय और किला देख सकते हैं। अलवर राजस्थान का बेहद ऐतिहासिक शहर है । अलवर की प्रसिद्ध सिलीसेंढ झील भी रिसॉर्ट के पास ही है।

सरिस्का टाइगर रिजर्व रिसॉर्ट से 20 किलोमीटर की दूर पर ही है। जंगल देखने का शौक है तो यहां सफारी कर सकते हैं। रिसॉर्ट को बताने पर वे इसकी बुकिंग करने में मदद कर देंगें। मैं भी अपने साथी ट्रेवल ब्लागर्स के साथ दोपहर को जंगल देखने के लिए गया। हालांकि सितम्बर के महीने में टाइगर सफारी बंद रहती है लेकिन जंगल के करीब 20 किलोमीटर अंदर एक प्राचीन हनुमान मंदिर है और मंगलवार और शनिवार को वहां जाने की अनुमति दी जाती है। हम लोग भी शनिवार को ही अलवर बाग में ही थे इसलिए एक छोटा चक्कर जंगल का भी लगाया। वैसे सफारी अक्टूबर से जून तक खुली रहती है।

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दिल्ली से मात्र 150 किलोमीटर दूर होने के कारण सप्ताह के आखिर दिन बिताने के लिए अलवर बाग माकूल जगह है। दिल्ली के करीब 3 घंटे का सडक का सफर करके आराम से यहां पहुंच सकते हैं। अलवर के लिए दिल्ली से बहुत सी ट्रेन भी उपल्बध हैं।

ध्यान रखें की सप्ताह के आखिरी दिनों शनिवार तथा रविवार और छुट्टी के दिनों में रिसॉर्ट आमतौर पर पूरी तरह भरा होता है। इसलिए इन दिनों में जाने से पहले बुकिंग जरूर करवा लें। सप्ताह के बीच में जाने पर ज्यादा शांति से समय बिता सकेंगे।

क्या खरीदें –

अलवर अपने मिल्क केक के लिए प्रसिद्ध है। तो अलवर का मिल्क केक सफर की यादगार के तौर पर साथ ले जाना ना भूंलें । अलवर में मिल्क केक बनाने की कई दुकाने हैं जिनमें बाबा ठाकुर दास एंड संस और दूध मिष्ठान भंडार बहुत प्रसिद्ध हैं। बाबा ठाकुर दास को ही अलवर की प्रसिद्ध मिल्क केक की शुरूआत करने का श्रेय दिया जाता है। बाबा ठाकुरदास की दुकान एक दुकान अलवर के घंटाघर के पास है और दूध मिष्ठान भंडार की एक दुकान तिजारा फ्लाईओवर के नजदीक है।

Note- यह यात्रा आमोद अलवर बाग के निमंत्रण पर की गई थी ।

जयपुर का खान पान.. (२)…..

जयपुर का खान पान.. (२)…..

जयपुर के नाश्ते के सफर को आगे बढाते हैं। असल में राजस्थान के खाने की बात ही कुछ और है। यहां के खानें में सूखी सब्जियों का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। चाहे वो कैर सांगरी की सब्जी हो या लहसुन की चटनी( बात करते ही मुंह में पानी आ जाता है।)

राजस्थान की खासियत दाल बाटी और चूरमा है जिसे खाये बिना तो आपका राजस्थान में घूमना ही बेकार है। जयपुर में राजस्थानी खाने के लिए पोलोविक्ट्री सिनेमा के पास संतोष भोजनालय में जा सकते हैं। यहां पर ‌ठेठ राजस्थानी खाना खाया जा सकता है।

यहां पर मिलने वाली थाली में दाल बाटी चूरमा, बाजरे की रोटी, गट्टे की सब्जी सभी कुछ लिया जा सकता है। घी के साथ दाल बाटी खाने का मजा ही अलग है। वैसे बाटी को बनाने के बाद घी से भरी कटोरी में डुबोया जाता है जिससे उसका स्वाद कई गुना बढ जाता है। हालांकि संतोष में घी में डूबी बाटी तो नहीं मिलेगी लेकिन अलग से घी दिया जाता है।

गट्टे को बेसन से बनाया जाता है बहुत सारे मसालों के साथ इसकी सब्जी बनाई जाती है। संतोष में पैंतीस से चालिस रुपये में ये थाली खायी जा सकती है।
इसके अलावा जौहरी बाजार के लक्ष्मी मिष्ठान भंडार में भी राजस्थानी थाली खायी जा सकती है। यहां थाली में कई तरह के चूरमें दिये जाते हैं। ये जयपुर की सबसे प्रसिद्ध मिठाई की दूकान है। इसके कारण थोडा मंहगा भी है। थाली के लिए करीब दो सो रुपये देने होगें।

इसके अलावा लक्ष्मी मिष्ठान भंडार की मिठाई भी स्वादिष्ट होती है। यहां का घेवर बहुत अच्छा होता है। राजस्थान का मजा लेने के लिए जयपुर में एक और जगह है। इसका नाम है चोखी ढाणी। ये एक फाइव स्टार रिजोर्ट है।

जिसे राजस्थानी तौर तरीकों पर बनाया है। लेकिन यहां पर शाम बिताने के लिए भी जाया जा सकता है।जिसके लिए करीब दौ सो रुपये का टिकट लेना होगा। इसमें आप राजस्थानी खाने के साथ ही मनोरंजन का मजा भी ऊठा सकते हैं। ये तो है जयपुर के खाने का सफर, हो सकता है कि कुछ रह गया हो जिसें में फिर कभी बताऊंगा।

जयपुर का खान पान…………

जयपुर का खान पान…………

जयपुर एक अनोखा शहर है। अपना आधुनिक बसावट के लिए इसको दुनिया भर मे जाना जाता है। इसके साथ ही यहां का खान पान भी सबसे अलग और अनोखा है। तो आज सैर करते हैं जयपुर के खान पान की।
रंगीले राजस्थान की तरह ही इसकी राजधानी जयपुर का खान पान भी रंग बिंरगा ही है। खाने में तेज मसाले और चटपटा होना इसकी पहचान है। शुरुआत करते हैं सुबह के नाश्ते के साथ।
कचौडी, मिर्ची बडा और जलेबी यहां के पारम्परिक नाश्ते का हिस्सा है। सुबह के समय हर मिठाई की दुकान पर इसे खाते हुए लोग मिल जायेगे। अगर आप चार दिवारी के अंदर पुराने जयपुर में हैं तो फिर तो दुकानों की कोई कमी नहीं होगी।
कचौडी दो तरह की बनाई जाती हैं एक तो हैं प्याज आलू की कचौडी और दूसरी है दाल की कचौडी। दाल की कचौडी के अन्दर की उडद दाल भरी जाती है। कुछ दुकाने अपने कचौडीयो के लिए प्रसिद्ध हैं।
सबसे पहले को जिक्र करना होगा रावत कचौडी का। ये दुकान जयपुर बस अड्डे के पास पोलोविक्ट्री सिनेमा के दूसरी ओर है। दूर दूर के लोग यहां कचौडी खाने आते हैं। राबत के यहां एक खास कचौडी बनती है जिसे मावा कचौडी कहते हैं। इस में दूध से बनाया मीठा मावा भरा जाता है। बहुत ही स्वादिष्ट होती है ये लेकिन आप इसे एक से ज्यादा चाह कर भी नहीं खा सकते हैं।
एक और प्रसिद्ध दुकान पुराने जयपुर के चौडा रास्ता पर हैं। चौडा रास्ता के स्टेट बैंक के विपरीत सडक के दूसरी और ये दुकान है इसका नाम अभी याद नहीं आ रहा, बहुत समय हो गया है जयपुर छोडे । यहां कचौडी, के साथ मिर्ची बडे और समोसे भी खाये जा सकते हैं। चौडा रास्ता जयपुर में किताबों का सबसे बडा बाजार है। जिसके चलते यहां कई तरह के कोचिंग सेन्टर खुल गये हैं।
मैने भी बारहवी के बाद इंजिनियरिंग के कोचिंग मे दाखिला लिया था। ये कोचिंग स्टेट बैंक के पास ही था। ये कहानी मैने इसलिए बताई की बता सकूं कि कोचिंग में सुबह जाते समय हमारा नाश्ता कचौडी ही हुआ करती थी। बीच में आकर हम लस्सी के साथ समोसे खाया करते थे।
इसके अलावा एक और दुकान जयपुर की प्रसिद्ध एमआई रोड पर है। पांच बत्ती चौराहे से जैसे ही रोड पर आगे बढेंगें सीधे हाथ पर छोटी सी दुकान है। जहां तक मुझे याद है इस का कोई नाम भी नहीं है। सुबह के समय यहां जलेबी भी बनती हैं।
इस दुकान पर भी कचौडी खाना मेरा रोज की आदत में था। ये बात अलग है कि यहां आना भी एक कोचिंग के सिलसिले में ही हुआ।
दुकान से कुछ पहले पांच बत्ती चौराहे पर एक दुकान में बादाम का दूध मिलता है। इस छोटी सी दुकान को घूमने फिरने की जानकारी देने किताब लोनली प्लेनेट ने भी अपनी लिस्ट में जगह दी है। ये तो हुआ जयपुर के नाश्ते का सफर लेकिन खाने का सफर पूरा नहीं हुआ है…. जारी……………….
रेत पर फैली सुन्दरता……

रेत पर फैली सुन्दरता……





राजस्थान भारत का सबसे बडा राज्य है। इसकी रेतीली खूबसूरती देखते ही बनती है। सूरज की किरणों में ये धरती सोने सी चमकती नजर आती है। इस बार की छुट्टियों में अपने घर गया था राजस्थान में। वहां रेगिस्तान के लिए कुछ फोटो आप सबके लिए। इससें आपको रेतीली धरती और दूर दूर दिखाई देने वाले पेड दिखाई देंगें।
राजस्थान शेखावाटी का होली नृत्य… गीन्दड

राजस्थान शेखावाटी का होली नृत्य… गीन्दड


राजस्थान के शेखावाटी इलाके में होली पर एक खास नाच किया जाता है। इसको गीन्दड कहा जाता है। इस में लडके गोल घेरे में घूमते हुए नृत्य करते हैं। ये बहुत कुछ गुजरात के डांडिया से मिलता है। इसके कुछ फोटो औऱ वि़डियो आपके लिए।

करणी माता बीकानेर….चूहों का मंदिर

करणी माता बीकानेर….चूहों का मंदिर





बीकानेर के पास है छोटा सा कस्बा देशनोक। देशनोक करणी माता के मंदिर के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इस मंदिर में एक खास बात है जिसने इसे दुनिया में अलग जगह खडा कर दिया है। वो है मंदिर में पाये जाने वाले हजारों चूहे।
चूहे इस मंदिर में सदियों से रहते आ रहे हैं। देशनोक बीकानेर से तीस किलोमीटर दूर है। मैं करीब सात आठ साल पहले बीकानेर गया था उस समय मैंने करणी माता के मंदिर को भी देखा था। असल में मेरे बीकानेर जाने की वजह ये मंदिर ही था।
करणी माता बीकानेर राज घराने की कुल देवी हैं। कहा जाता है उनके आर्शीवाद से ही बीकानेर की स्थापना राव बीका ने की थी। मंदिर की खासियत यहां रहने वाले चूहे है। इन चूहों को मां का सेवक माना जाता है इसलिए इनको कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाता।
यहां रहने वाले इन चूहों के काबा कहा जाता है। मां को चढाये जाने वाले प्रसाद को भी पहले चूहे ही खाते है उसके बाद ही उसे बांटा जाता है। मंदिर हर तरफ चूहे चूहे दिखाई देते हैं। यहां पर अगर सफेद चूहा दिखाई दे जाए तो उसे भाग्यशाली माना जाता है। मुझे भी सफेद चूहे के दर्शन हो ही गये।
खास बात ये भी है कि इतने चुहे होते हुए भी मंदिर परिसर में बदबू का एहसास भी नहीं होता है। इतने चूहे होते हुए भी आज तक कोई भी मंदिर में आकर या प्रसाद खा कर बीमार नहीं पडा है। ये अपने आप में आश्चर्य है। यहां के पुजारी के घर में तो मैने चूहे किसी बच्चे की तरह ही घूमते देखे। उनके घर के कपडों से लेकर खाने के सामान तक सबमें चूहे ही चूहे दिखाई दे रहे थे।
इसके अलावा मंदिर का स्थापत्य भी देखने के लायक है। संगमरमर का बेहद खूबसूरत इस्तेमाल मंदिर में किया गया है। मंदिर के जालीदार झरोखों पर किया बारीक कुराई का काम बेहद सुन्दर है। मंदिर के विशाल मुख्य दरवाजे चांदी के बने हैं।
भारत की अद्भुत परम्परा और विश्वास का सबसे बडा उदाहरण हैं करणी माता का मंदिर। हमारे कुछ विश्वासों को सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है उनका तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता।

शेखावाटी राजस्थान खुली कला दीर्घा

शेखावाटी राजस्थान खुली कला दीर्घा




राजस्थान को जाना जाता है अपनी एतिहासिक विरासत के लिए। इसी राजस्थान में एक इलाका है जिसे शेखावाटी कहा जाता है। शेखावाटी को खुली कला दीर्घा भी कहा जाता है। इसका कारण है यहां कि हवेलियों की दीवारों पर बने चित्र। शेखावाटी राजस्थान के मरुस्थलीय भाग में पडता है। मेरा बचपन इसी इलाके में बीता है इसलिए आज चलते हैं इसकी सैर पर। शेखावाटी का इलाकी राजस्थान के सीकर,झुँन्झुँनु, और चूरु जिलों को मिलाकर बनता है। इस इलाके अपने अमीर सेठों के लिए प्रसिद्घ है।ये सेठ अठारहवीं सदी के शुरुआत से ही यहां से बाहर व्यापार के लिए जाने लगे। इन्होने बम्बई, कलकत्ता, मद्रास जैसे शहरों में व्यापार शुरु किया। वहां से कमाये गये पैसे से इन्होने शेखावाटी में बडी बडी हवेलिया बनाई। उन दिनों में हवेलियों को खूबसूरत चित्रों से सजाया। अपनी इन्हीं हवेलियों के लिए शेखावाटी का इलाका पूरी दूनिया में जाना जाने लगा है। विदेशी सैलानी बडी संख्या में यहां घूमने आते है। यहां के मंडावा, फतेहपुर,नवलगढ,महनसर, बिसाऊ जैसे कस्बे हवेलियों के लिए ही जाने जाते हैं। इन कस्बों की पूरी गलियां ही इन हवेलियों से भरी पडी हैं। इसके कारण इस इलाके को खुली कला दीर्घी कहा जाने लगा है।महनसर की तो सोने की दुकान देखने विदेशी बहुत आते हैं। इस दुकानें में सोने के इस्तेमाल से पूरी रामायण को दीवारों पर जिवंत लगते चित्रों में उकेरा गया है।हालांकि इन हवेलियों के अधिकतर मालिक बाहर ही रहते हैं। जिसके कारण इनकी हालत बिगडती जा रही है। पर्यटन को इस तरफ बढा कर इन को खत्म होने से बचाया जा सकता है। अब कई मालिक इनकी सुध ले रहे हैं। नवलगढ कस्बे में मोरारका फाउन्डेशन ने हवेलियों को सवांरने में बहुत योगदान दिया है। एक बार इधर भी जरुर आयें।कैसे पहुचें-सीकर और झुँन्झुँनु दिल्ली से सीधी बस और रेल सेवा से जुडें हैं। दिल्ली से करीब तीन सौ किलोमीटर दूर है। जयपुर से ये महज दो सौ किलोमीटर की दूरी पर है।कहां ठहरें-इस इलाके हर कस्बे में पुराने किले हैं जिन्हे अब हैरिटेज होटलो में बदल दिया गया है। मंडावा का किला में बना हैरिटेज होटल तो काफी पुराना है। इसलिए रहना की समस्या नहीं है।राजस्थान टूरिज्म के होटल भी कई जगह हैं जिनमें रुका जा सकता है।