Browsed by
Category: India

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-५

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-५

तीन जून- चढाई का तीसरा दिन- बुद्धि से गुंजी

तीसरे दिन हमे बुद्धि से गुंजी तक का सत्रह किलोमीटर का सफर करना था। ये रास्ता पिछले दिनो के मुकाबले आसान था। रोज की तरह से ही हमारा दिन सुबह चार बजे ही शुरु हो गया सुबह की चाय के साथ। उसके बाद जल्दी से तैयार होकर साढे पांच बजे तक हम चल पडे अपने सफर पर। बुद्धि से पांच किलोमीटर आगे छियालेख घाटी पडती थी। जहां तक जाने का पहले दो किलोमीटर का रास्ता तो आसान और ह्लकी चढाई वाला था। लेकिन उसके बाद के तीन किलोमीटर का बेहद कठिन और लगभग सीधी चढाई वाला रास्ता था। इस तीन किलोमीटर तक हमें सीधे उपर ही चढते जाना था।
चढाई इतनी मुश्किल भरी थी कि हर कदम के साथ दम फूलने लगता था। एक तो हम पहले ही काफी ऊंचाई पर आ चुके थे एसे मै इतनी कठिन चढाई करना आसान काम नही था। थोडी थोडी दूर पर रुक कर आराम करते हुए धीरे धीरे आगे बढ रहे थे।
रास्ते का अंदाजा आप इस बाद से लगा सकते है कि कुछ जगहो पर तो घोडे से भी लोगो को उतरना पड रहा था। खैर सुबह आठ बजे चढाई पूरी कर हम लोग छियालेख पहुंच गये। छियालेख मे घुसने से पहले बडा ही संकरा रास्ता था, लग रहा था जैसे किसी घर का दरवाजा हो। हमे तो अभी तक पता नही था कि इस रास्ते के पार क्या छिपा है। जैसे ही हम छियालेख पहुंचे मेरा तो दिमाग ही चकरा गया। ऐसा लगा कि जैसे दूसरी ही दुनिया मे पहुंच गये हैं।


स्वर्ग मे पहुंचने का अभास दे रही थी छियालेख घाटी। घाटी मे हरे घास की मखमली चादर बिछी हुई थी। चारो तरफ तरह तरह के रंग बिरंगे फूल खिले हुए थे। खुशबू ऐसी की जो जाये मदहोश हो जाए। पता चला की इसको फूलो की घाटी भी कहा जाता है। हमारे साथ चल रहे घोडे वालो ने बताया कि अभी तो बहुत कम फूल दिखाई दे रहे है अगस्त के महीने मे अगर आये तो यहा हर तरफ बस रंग बिरगे फूल हि दिखाई देते हैं। मै तो यहा आकर जैसे खो ही गया। मेरा मन तो यहा से आगे जाने का भी नही कर रहा था। यही पर हमारे नाश्ते का इंतजाम भी था। नाश्ता करने के बाद मै तो निकल गया घाटी की सैर पर। घाटी के और अंदर जाने पर तो जो नजारे मुझे दिखाई दिये उनके बारे मे तो मै बयान ही नही कर सकता। आप लोग फोटो देखकर खुद ही अंदाजा लगा सकते है।


घाटी के चारो और फैले बर्फ के पहाड इसको अलग ही रुप दे रहे थे। यहा हमने दो घंटे से भी ज्यादा का समय बिताया। ये समय कैसे बीत गया पता ही नही चला। लेकिन आज ही हमे गुंजी पहुंचना था इसलिए आगे तो जाना ही था……..
छियालेख के बाद रास्ता सीधी और उतराई वाला ही था। इसलिए चलने मे दिक्कत नही हो रही थी। पूरा ही रास्ता घास के मैदानो से भरा पडा था जगह जगह से निकल रहे झरने इसे और भी खूबसूरत बना रहे थे।

छियालेख से चार किलोमीटर चलने के बाद हम छोटे से गांव गर्बयांग मे पहुचे। इस गांव मे बने लकडी के मकान और खास तौर पर इनके नक्काशी दार दरवाजे देखने के लायक थे। इस गांव को धसकने वाले गांव के तौर पर भी जाना जाता है। ये पूरा गांव ही पहाड के जिस हिस्से पर है वो धीरे धीरे खिसक रहा है। इसके कारण यहा के गांव वालों को उत्तराखंड के तराई ईलाके में जमीने दी गई है।

गर्बयांक से निकलते ही भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस की जांच चौकी बनी है जहां पर हमारे कागजात का जांच की गई। धारचुला से चले आज तीसरा दिन था और तीन दिन से घर पर मेरी कोई बात नही हुई थी। मोबाईल फोन तो कभी के बंद हो चुके थे। अभी तक किसी भी कैंप मे सैटेलाईट फोन भी हमे नही मिला था। क्याकि छोटा कैलाश का हमारा पहला ही दल था और कैलाश यात्रा का दल आने मे कुछ दिन बाकी थे इसलिए गाला औऱ बुद्धि दोनो कैंपो मे अभी तक फोन नही लगे थे ।

हमे बताया गया कि शायद गुजी मे फोन लगा चुका होगा इसलिए वहा से बात हो पायेगी। लेकिन कोई भरोसा नही था कि गुजी मे फोन मिलेगा। मुझे चौकी से पता लगा की गर्बयांग के तिब्बत सीमा पुलिस के कैप मे सैटेलाईट फोन है। ये कैंप रास्ते से सीधी खडी चढाई के बाद था। मैने किसी तरह से ये चढाई पूरी करके कैप मे पहुचा। जहा से मैने तीन दिन के बाद घर पर बात की। भारत तिब्बत पुलिस के लोग यात्रियो की जहा तक हो सके सहायता करने की कोशिक करते है। मेरे एक बार कहते ही कैप के अधिकारी ने बात करने की इजाजत दे दी। इतने दिन बात करके अच्छा तो लगा ही साथ ही मैने घर पर बता दिया कि अब आगे कब बात होगी पता नही इसलिए किसी भी तरह की चिंता ना करें।

गर्बयांग से पांच किलोमीटर दूर सीधी गांव मे दोपहर का खाना खाकर हम गुजी के लिए चल पडे। शाम को करीब चार बजे हम आखिरकार गुजी पहुच गये। गुजी तक के रास्ते काली नदी लगातार साथ बनी रहती है। गुजी मे कुमाऊं पर्यटन का थोडी बडा कैप है क्योकि ऊपर के कैपो के लिए खाने पीने का सामान यही से आगे भेजा जाता है।

गुंजी समुद्र सतह से बत्तीस सौ मीटर से भी ज्यादा की ऊंचाई पर बसा है। इस कारण यहा ठंड बहुत ज्यादा थी। साथ ही गुजी की स्थिति कुछ इस तरह की है कि यहा बहुत ही तेज हवाये चलती है। कभी कभी तो इतनी तेज की बात करना भी मुश्किल हो जाता है। अगले दिन हमे चीन सीमा पर ऊं पर्वत के लिए सफर करना था।……… एक बात और गुजी मे भी अभी तक सैटेलाईट फोन नहीं लगा था।

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-४

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-४

दो जून – चढाई का दूसरा दिन- गाला से बुद्धि

गाला मे सुबह चार बजे ही हमे चाय दे दी गई। जिससे हम लोग समय से उठ कर तैयार हो सके। इस मामले में मै कुमाऊं पर्यटन के लोगों की सेवा भावना की दाद दूंगा। इतनी ठंड में भी वो हर वक्त हमारी जरुरत को पूरा करने के लिए तैयार रहते थे।
इतनी ऊंचाई पर ठंड में काम करना आसान काम नही होता। हम सभी पांच बजे तक सफर के लिए तैयार हो चुके थे। सुबह सुबह बोर्नविटा मिला दूध पीने के बाद हम साढे पांच बजे तक चल पडे।
आज पूरे इक्कीस किलोमीटर का सफर था जिसमें लगभग पूरा दिन लगना था। इसलिए सुबह के मौसम का फायदा उठाते हु्ए मै, अजय और विश तो तेजी से आगे चल दिये। हमारे सुबह के नाश्ते का इंतजाम लखनपुर में एक ढाबे में था।


गाला से लखनपुर सात किलोमीटर था। लेकिन ये सात किलोमीटर सबसे कठिन था इस रास्ते में हमे एक बार थोडी चढाई के बाद चार हजार से ज्यादा सीढियां उतरनी थी। कहने के लिए तो ये सीढियां थी, लेकिन सीढियो के नाम पर ढेडे मेडे पत्थर पडे थे। पत्थरो पर लगातार उतरना आसान नही था। रास्ता भी कही कही तो बेहद खतरनाक हो रहा था। कुछ जगहो पर तो बस पैर रखने भर की जगह ही होती थी। अगर फिसले तो सीधे हजारो फीट गहरी खाई मे समा जाएगे। लेकिन रास्ते देखने लायक था। हरे भरे ऊंचे पहाड, जगह जगह निकलते झरने रास्तो को मनमोहक बनाये रखते हैं। चलते चलते थकान होती तो आराम करने के रुक जाते थे। सीढियां उतरते उतरते तो दम फूलन लगा था। लेकिन ज्यादा आराम भी नही कर सकते नही तो आप आगे बढ ही नही सकते। खैर ढाई घँटे तक चलने का बाद सुबह के आठ बजे हम लखनपुर पहुचे। लखनपुर मे पहाड के किनारे पर एक छोटे से पहाडी ढाबे में नाश्ते का इंतजाम था। वो गर्म पूरी जैसा कुछ बना रहा था लेकिन पूरे दिन के सफर के देखते हुए मैने तो रोटी खाना ही पसंद किया। नाश्तेा के कुछ देर तक हमने यही आराम किया। रास्ते के ढाबे गांव वालो के लिए रात को रुकने के होटल के तौर पर भी काम देते है।


लखनपुर पहुचने के एक घंटे बाद नौ बजे हम लोग आगे चल दिये। यहा से छ किलोमीटर दूर मालपा तक हमे जाना था। मालपा मे हमारे दोपहर के खाने का इंतजाम किया गया था। लखनपुर से मालपा का रास्ता बेहद खतरनाक था। रास्ते के साथ तेज बहाव के साथ बहती काली नदी इसे और भी खतरनाक बना रही थी। बहाव इतना तेज था कि उससे हो रहे शोर मे बात भी करना मुश्किल था। ये नदी अब पूरे रास्ते हमारे साथ बनी रहने वाली थी। रास्ता बेहद संकरा था। कही कही इन रास्तो पर झरने मिलते रहते हैं, इनमे बचते भीगते हम आगे बढते रहे। इन झरनो के कारण रास्ता फिसलन भरा हो जाता है। अगर फिसले तो सीधे नीचे बह रही नदी मे जा मिलेगे। इसलिए यहा हम धीरे धीरे एक दुसरे को देखते हुए आगे चलते रहे।


यहा एक जगह तो बहुत ही खूबसूरते झरना मिला जहा हमने आराम भी किया। ग्यारह बजते बजते हम मालपा पहुंच गये।

मालपा गांव को बारह साल पहले १९९८ मे यहा हुए एक हादसे के कारण जाना जाता है। उस समय कुमाऊं पर्यटन का कैलाश यात्रा का पडाव मालपा मे हुआ करता था। १९९८ मे कैलाश मानसरोवर के यात्री यहां रुके थे कि रात में बरसात के बाद भंयकर भूस्खलन हो गया। कैप की जगह से ठीक उपर का पूरा पहाड ही नीचे आ गिरा। इस मलबे में मालपा गांव के साथ ही पूरा कैप ही खत्म हो गया। कैप का हिस्सा अभी भी मलबे के नीचे ही दबा है। बहुत से लोगो की लाशो को आज तक निकाला नही जा सका है। जानी मानी नृत्यागंना और अभिनेता कबीर बेदी का पत्नी प्रोतिमा बेदी का भी इस दुर्घटना मे निधन हो गया था। मालपा में इन सभी लोगो की याद मे स्मारक भी बनाया गया है। मालपा हादसे के बाद से ही कैप को मालपा से बुद्दि ले जाया गया था।


मालपा के मलबे मे दबा कैंप




मालपा मे दोपहर के खाने के बाद हम बुद्धि के लिए चल पडे। मालपा से बुद्धि नौ किलोमीटर था। शाम को करीब पांच बजे हम बुद्धि पहुच गये। बुद्धि मे शिविर के लोगो ने हमारा स्वागत किया। हमारे लिए बुरांश का जूस तैयार रखा गया था। बुरांश कुमाऊं में मिलने वाला एक फूल होता है जिससे बेहत स्वादिष्ट शरबत तैयार किया जाता है। सुबह तो जल्दी मे कोई नहाया भी नही था। यहा पहले से ही हमारे लिए गर्म पानी रखा गया था इसलिए मैने तो सबसे पहले नहाने का काम ही कियाय गर्म पानी से नहाने के बाद पूरे दिन की थकान से भी आराम मिला।

कुछ आराम के बाद मै और अजय गांव देखने निकले। बुद्दि के चारो और बर्फ से ढके पहाड इसे बेहद खूबसूरत बना रहे थे । यहा गांव मे झरने पर पानी से चलने वाली आटा चक्की भी लगी थी। इस चक्की तो यहा घराट कहा जाता है।
गांव की दुकान मे ही हमने जौ से बनने वाली स्थानिय बीयर छंग और अनाज से बनने वाली वाईन जिसे चकती कहते है का स्वाद भी लिया। इनका स्वाद तो बिलकुल अलग ही था। ऐसी बीयर तो मैने कभी भी नही पी थी।

यहा की दुकाने की एक और खासियत थी कि सुपर स्टोर की तरह जरुरत का सारा सामान एक ही दुकान मे मिल जाता है। चीन के साथ होने वाले सालाना व्यापार मे भी ये लोग जाते है। इसलिए इनकी दुकानो मे हर तरह का चीनी सामान मौजूद था जिसमे कपडे, जूते, खाने के सामान से लेकर शराब और बीयर के कैन तक सब कुछ शामिल था। इतनी ऊँचाई पर ये सब भी मिलेगा मैने तो सोचा भी नही था। गांव वालो से भी खूब बातें हुई। इलाके के बारे मे बहुत कुछ जानने को मिला। रात का खाना खाकर हम जल्दी ही सो गये क्योकि अगले दिन आगे गुजी तक का सफर तय करना था।……………………..

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच ३

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच ३

धारचुला से १ जून को छोटा कैलाश का हमार सफर शुरु हुआ। आज के बाद से सभी को सुबह जल्दी उठने की आदत डालनी थी। इसलिए सभी सुबह चार बजे ही उठ गये। नाश्ता करने का बाद सभी को आगे के सफर की जानकारी दी गई। हमारे सफर की शुरुआत ही थोडी मुश्किलो से हुई। दरअसल आज के हमारे सफर में हमे धारचुला से गर्भाधार नामकी जगह तक गाडियो से जाना था उसके बाद गाला तक लगभग पांच किलोमीटर की चढाई ही पहले दिन करनी थी। लेकिन पिछले कुछ दिनो से तवाघाट से पहले पहाड के खिसकने से सडक बंद हो चुकी थी। सडक पर करीब सौ मीटर के रास्ते पर भूस्खलन हो रहा था। अब इस सौ मीटर के कारण हमे इस जगह से पहले चढाई करके इसके पार निकलना था। लेकिन इसके लिए लिए हमें आठ किलोमीटर का पैदल सफर करना पडा।

खैर धारचुला में चलने से पहले हमारे पिट्ठू और घोडे वाले हमसे मिले। हमारा सामान घोडो पर जाने वाला था। और अगर किसी को चलने में दिक्कत हो उसे भी यहा से ही घोडे करने थे जो हमें आगे गर्भाधार से मिलने वाले थे। मैने जरुरी सामान अपने बैकपैक मे लिया और बाकी का सामान घोडे वालो को दे दिया।
धारचुला की सुबह बहुत ही हलचल भरी थी। करीब सात बजे हम यात्रा के लिए रवाना हुए। हम भूस्खलन वाली जगह पर पहुचे जहा से आठ बजे हमने अपनी चढाई का पहला दौर शुरु किया। ये आठ किलोमीटर हमारे ट्रैकिग प्लान में नही थे लेकिन पहाड पर हमेशा इसके लिए तैयार रहना चाहिए। ये आने जाने का आम रास्ता नही था इसलिए कही कही तो ये एक फीट भी चौडा नही था। इस साल के छोटा कैलाश और कैलाश मानसरोवर की यात्रा इसी रास्ते से होनी था इसलिए रास्ते को ठीक किया जा रहा था। खैर तेजी से चलते हुए मै, अजय और विश तो करीब ग्यारह बजे ही नीचे पहुच गये। विश सर आस्ट्रैलिया मे रहने वाले एन आर आई थे। आजकल नौकरी छोड कर भारत वापस चुके थे और अब अपने गृहनगर बैगलोर में रह रहे थे। साठ की उम्र के बावजूद वो काफी फिट थे। हालाकि बाकी लोगो के लिए हमने दो बजे तक इंतजार किया।

दो बजे हमे गाडियो से गर्भाधार के लिए रवाना हुए। रास्ते मे कुमाऊ पर्यटन ने अपने कैप में दोपहर के खाने का इंतजाम किया था। खाना खाकर हम गर्भाधार से उस दिन के पहले पडाव गाला के लिए रवाना हुए। गाला तक के लिए पांच किलोमीटर से ज्यादा की चढाई करनी थी। चार बजे से कुछ पहले ही हमने चढाई शुरु कर दी थी। अब रास्ते के पेड पौधे भी बदलने लगे थे क्योकि ऊंचाई के साथ वो भी बदल रहे थे। रास्ता भी खुबसूरत होता जा रहा था। ये एक अलग ही दुनिया थी जहा हमारी जिंदगी की रोज रोज की भागमभाग नही थी। मोबाइल फोन को बहुत पहले ही साथ छोड चुके थे। ऐसा लग रहा था कि हम समय मे बहुत पीछे लौट आये हैं।

रास्ते मे बरसात भी होने लगी। शाम को करीब साढे सात बजे हम गाला में कुमाऊं पर्यटन के कैम्प मे पहुचे। कैम्प के अधिकारी और दूसरे लोगो मे हमारा स्वागत किया। हमारे लिए चाय और गर्म पानी तैयार रखा गया था। गाला २४०० मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है इसलिए शाम को वहा अच्छी ठंड हो गयी थी। पहले दिन का चढाई के बाद सभी लोग थक गये थे इसलिए खाना खाने के बाद जल्दी हम सब लोग सो गये। अब आगे से हमे जल्दी सोने की आदत डालनी था क्योकि रोज सुबह हमे पांच से छ बजे के बीच यात्रा शुरु करनी थी। जिससे सभी लोग रात होने से पहले ही अगले पडाव पहुंच जायें। गाला के बाद अगले दिन तो हमें बुद्धि जाना था जिसके लिए लिए २१ किलोमीटर का सफर करना था। गाला से बुद्धि तक का रास्ता पूरे सफर का सबसे कठिन हिस्सा था।……………

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच-२

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच-२

जागेश्वर में शाम को मंदिर के दर्शन के बाद हम घूमने निकले। यहा चारो तरफ देवदार के घने जंगल है जिनमे घूमने का अपना अलग ही मजा है। जंगल में तरह तरह की चिडिया दिखाई दी जिन्हे मैने पहले कभी नहीं देखा था। दिल्ली की गर्मी के बाद जागेश्वर की ठंडक बेहद सुकुन दे रही थी।

अगले दिन हमें जागेश्वर से २०० किलोमीटर दूर धारचूला जाना था। भारत नेपाल सीमा पर बसा धारचूला कैलाश मानसरोवर और छोटा कैलाश यात्रा के लिेए आधार शिविर का काम करता है। ये सफर करीब बारह घंटे का है इसलिए हमे सुबह सात बजे अपना सफर शुरु करना था। सुबह हम सही समय पर यात्रा शुरु कर दी क्योकि धारचूला तक रास्ता सीधी खडी घाटियो से गुजरता है और ऐसे में रात का सफर खतरनाक हो सकता है।

जागेश्वर से निकलते ही असली उत्तराखंड दिखाई देने लगता है। रास्ते में देवदार और चीड के जंगल मन खुश कर देते हैं। बर्फीले पहाड भी गाहे बगाहे दिखाई देते रहते हैं। इन सबको देखते हुए समय कब बीतता है इसका पता ही नहीं चलता।

हमारे दोपहर के खाने का इंतजाम पाताल भुवनेश्वर में किया गया था। पाताल भुवनेश्वर में जमीन से करीब १०० मीटर नीचे गुफाओ की पूरी कडी है जिनमें चूना पत्थर से अद्भूत सी दिखाई देती रचना बनी है। मान्यता है कि इन गुफाओ में चारों लोक, चारों धाम और तैतीस करोड देवी देवताओ का वास है। यहा के पुजारी बताते है कि भगवान शिव यही से कैलाश पर्वत जाया करते थे और ये गुफा सीधे कैलाश से जुडी है। इन गुफाओ में चूना पत्थर की रचनाऐ बनी है जिनको पुजारी देवताओ की अपने आप बनी मूर्तियां बताते हैं। इसलिए मानने वालो के लिए ये जगह तीर्थ से कम नही है।

लेकिन विग्यान के आधार पर देखें तो ये चूने पत्थर की बनी आकृतियां है। जो हजारो सालो से टपकते पानी में मौजूद चूने के जमने से बन जाती है। दुनिया के बहुत से हिस्सो में इस तरह की गुफाए मिलती है। मै पहले भी इस तरह की गुफा जम्मू के पास कटरा से करीब १०० किलोमीटर दूर देख चुका हूं। जिसे शिवखोडी कहा जाता है शिवखोडी मे भी वही कहानी बताई जाती है जो मैने पाताल भुवनेश्वर में सुनी ( शिवखोडी की यात्रा के बारे मे बाद में लिखूंगा)।


पंचाचूली का नजारा

पाताल भूवनेश्वर से पंचाचूली की पांचो चोटियो का खूबसूरत नजारा हमने देखा। दोपहर का खाना यहां के कुमाऊं पर्यटन के होटल में खाना खाकर हम चल पडे धारचूला के लिए। पहुचते पहुचते हमे करीब सात बज ही गये। धारचुला मे रात हो जाने के कारण हम कुछ देख नही सके। ये कस्बा काली नही के किनारे बसा है। काली नदी यहां भारत और नेपाल की सीमा बनाती है। काली नदी के एक ओर धारचूला तो दूसरी तरफ नेपाल का शहर है। हमारा होटल भी काली के किनारे ही था इसलिए अच्छा लग रहा था। सारे दिन के सफर से थके हम जल्दी ही आराम करने चले गये। अगले दिन से हमें छोटा कैलाश की पैदल यात्रा शुरु करनी थी। इस तरह हमारा दूसरा दिन खत्म हो गया…………………..

काली के दूसरी तरफ दिखाई देता नेपाल

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच- १

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच- १

छोटा कैलाश कुमाऊं में एक पवित्र स्थान है। इसको तिब्बत के कैलाश मानसरोवर के बराबर ही माना जाता है। छोटा कैलाश एक तीर्थ के साथ ही ट्रैकिंग के लिए भी बेहतरीन है। ये उत्तराखँड के पिथौरागढ जिले मे चीन-तिब्बत की सीमा पर है। यहां तक पहुंचने के लिए तवाघाट से पहाडो की चढाई शुर करनी पडती है। तवाघाट से आने और जाने मे कुल मिलाकर २०० किलोमीटर से भी ज्यादा की पैदल दूरी पहाडों में तय करनी पडती है। मेरा भी पिछले कई दिनो से यहां जाने के बारे में सोच रहा था। मुझे ट्रैकिंग का शौक है मेरे यहां जाने के पीछे मेरा ये शौक ही कारण बना। छोटे कैलाश के इस ट्रैक को ट्रैकिग के आधार पर देखे तो कडे ट्रैक की श्रेणी मे रखा जाता है। लेकिन ये पूरा ही ट्रैक बेहद खूबसूरत पहाडो, नदियो, झरनो, फूलो की घाटियो से भरा पडा है, इसलिए थकान का अहसास ही नहीं होता।


मुझे तो दिल्ली से जाना था। कुमाऊं पर्यटन निगम यहा के लिए टूर ले जाता है। इसलिए मैने कुमाऊं पर्यटन के दफ्तर से यहा कि बुकिंग करवाई। पता चला कि तीन दिन बाद ही एक छोटा सा ग्रुप जाने वाला है जिसमे कुल छ ही लोग है सातवे के तौर पर मैने बुकिंग करवा ली। दिल्ली से दिल्ली तक इस पूरे सफर मे सत्रह दिन लगते हैं।

छोटा कैलाश करीब साढे चार हजार मीटर की ऊंचाई पर है। मौसम बेहद ठंडा और रास्ता बेहद कठिन है इसलिए तीन दिन मे ही मुझे काफी तैयारी करनी थी। इतनी ऊचाई पर जाने के लिए ठंडे और बरसात से बचने के लिए अच्छे गर्म कपडे सबसे पहली जरुरत होती है। उनके इंतजाम के बाद जरुरी दवाईयां रखनी थी। क्योकि पूरे रास्ते में करीब बारह दिन आम दुनिया से दूर पहाडो के बीच बिताने थे जहा किसी भी तरह की मेडिकल सहायता मिलना मुश्किल है। खैर तीन दिन कैसे बीत गये पता थी नही चला। जाने वाले दिन हम सभी को एक होटल मे मिलना था जहा से रात को हमारी यात्रा शुरु होनी थी। यहा मै अपनी ग्रुप के दूसरे छ लोगो से मिला। मुझे देखकर ताजुब्ब हुआ कुल सात लोगो मे से चार लोग ऐसे थे जिनकी उम्र साठ साल से ज्यादा थी। मैने आने से पहले पता किया था कि छोटे कैलाश का ये ट्रैक काफी कठिन माना जाता है। अगर आप को ट्रैकिग की आदत नही है तो इसे पूरा करना खासा मुश्किल है। यहां तो मेरे अलावा किसी ने भी पहले ट्रैंकिग नही की थी। मुझे लगा कि यहा तो मै अकेला ही रह जाऊंगा क्योकि मेरे उम्र का यहा कोई दिखाई नही दिया सिवाय अमेरिका में रहने वाले एक भारतीय डाक्टर के। अजय नाम का ये डाक्टर कुछ दिन पहले ही अपनी पढाई पूरी करके किस्मत आजमाने अमेरिका गया था। और मेरी ही तरह ये ही ट्रैकिग के लिए जा रहा था। मेरी जल्दी ही उससे दोस्ती हो गयी। अब मुझे लगा कि ठीक है नही तो सत्रह दिन काटना मुश्किल हो जाएगा। जब अजय से बत हुई तो पता चला कि ये बात उसके भी दिमाग मे भी चल रही थी। यहां हमारे टूर गाइड जीतू से सबकी मुलाकात हुई आगे के सफर में जीतू ही हम सबको ले जाने वाला था। जीतू भी मेरी ही उम्र का था इसलिए तस्सली हुई कि कोई और मिला जो साथ रहेगा। खैर हमको जीतू ने रास्ते मे आने वाली मुश्किलो के बारे मे बताया। हमे बताया गया कि क्या क्या दिक्कते सामने आ सकती है और उनसे बचने के लिए क्या किया जा सकता है। हमे क्या क्या जरुरी सामान ले जाना था इसकी लिस़्ट पहले ही हमे मिल चुकी थी। सबने अपना सामान एक बार चैक किया। फिर रात का खाना खाने के बाद हम लोग अपनी यात्रा के लिेए चल पडे। मई के महीना खत्म होने को था और दिल्ली मे बेहद गर्मी पड रही थी। लेकिन हमारे निकलने से पहले ही मौसम भी बदलने लगा और बरसात होने लगी। बरसात बेहद अच्छी लग रही थी। रात को करीब दस बजे हम चल पडे उत्तराखंड के लिए। अगले दिन हमारा पहला पडाव बनने वाला था अलमोडा जिले का जागेश्वर। सुबह सुबह हम हलद्वानी पहुचे। रात के पूरे रास्ते बरसात होती रही थी और अभी भी बरसात जारी थी। मुझे थोडा सा डर लग रहा था कि अगर आगे भी बरसात होती रही तो कुछ दिन के बाद हमारी पैदल चढाई से समय दिक्कत आ सकती है। खैर हलद्वानी से थोडा आगे काठगोदाम मे हम लोग पर्यटन विभाग के होटल मे सुबह की चाय के लिए रुके। काठगोदाम से ही पहाडी सफर की शुरुआत भी हो जाती है। इसके आगे ये पहाड हमारे साथ बने रहने वाले थे।
अब तक अजय से अच्छी दोस्ती हो गयी थी इसलिए रास्ता आराम से कट रहा था। ये इलाका मेरे लिए जाना पहचाना था इसलिए मे इसके बारे मे अजय को बता रहा था। करीब दस बजे हम लोग अलमोडा पहुचे। अलमोडा उत्तराखंड का जाना पहचाना हिल स्टेशन है। पर हमे यहा के करीब तीस किलोमीटर आगे जागेश्वर जाना था।

जागेश्वर अपने शिव मंदिर के लिेए तीर्थ स्थान के तौर पर जाना जाता है। बेहद खूबसूरत जागेश्वर एक घाटी मे है जो चारो और देबदार के पेडो से घिरी है। दोपहर के खान से पहले हम जागेश्वन पहुचे गये। आज हमे यहा आराम करना था। आगे का सफर अगले दिन सुबह शुरु होना था………………………..

( जागेश्वर के बारे मे जानने के लिए मेरा जागेश्वर पर लिखा पुराना लेख पढे।)

बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन का सफर (२)

बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन का सफर (२)

खारदूँगला में हमें दोपहर के दो बज चुके थे और सियाचिन बैस कैम्प के लिए हमें लम्बा रास्ता तय करना था । इसलिए तेजी से हम आगे बढे। खारदूँगला से कुछ दूरी पर ही नोर्थ पुलु में सेना का कैम्प था जहा हमे दोपहर के खाने के लिए रुकना था। यहां हमारे लिए खाने का बेहतरीन इतंजाम सेना ने किया था। ये कैम्प समुद्र तल से सोलह हजार मीटर की ऊँचाई पर है। सियाचिन जाने वाले सैनिको को भी ऊंचाई की आदत डालने के लिए कुछ दिनो तक यहां रखा जाता है।

यहां से आगे शुरु होती है नुब्रा घाटी। ये घाटी खारदूंगला से लेकर सियाचिन बैस कैम्प तक फैली हुइ है। सियाचिन ग्लेशियर से निकलने वाली नुब्रा नदी के नाम पर ही इस घाटी का नाम रखा गया है। नुब्रा के साथ ही इस घाटी मे श्योक नदी भी बहती है। लगभग पूरे ही रास्ते सडक के एक और नदी का साथ लगातार बना ही रहता है।


घाटी में दूर दूर फैले छोटे छोटे गांव नजर आते हैं। दस बीस घर या उससे भी कम घरों के छोटे गांव । घरो की खासियत ये कि इनके चारों और ही खेत बने होते हैं जिनमें जरुरत के लायक अनाज उगाया जाता है। गायों की तरह खेतों में याक चरते नजर आते हैं। याक वहां के लोगों के लिए कामधेनू कि तरह से हैं जिससे का हर सामान इस्तेमाल किया जाता है । उसके दूध से लेकर मांस और उन तक।


यहां बुद्ध धर्म का साफ प्रभाव नजर आता है हर जगह पूजा के लिए धर्म चक्र लगे होते हैं। गांव के लोग बडे ही भोले भाले नजर आते हैं।


नुब्रा घाटी लेह से कुछ अलग लगती है लेह में जहां हरियाली दिखाई नहीं देती वही यहां पर नदी के किनारे पर पेड और झाडियां दिखाई देते हैं। ये पेड यहां के सूनेपन मे जिंदगी का अहसास सा भरते नजर आते है।


लद्दाख का स्थानिय फल सी-बक-थोर्न भी इस घाटी में दिखाई देता है। इसे लेह बेरी के नाम से भी जानते है। ये एक कांटेदार झाडी पर लगने वाला फल है। जो स्वाद में थोडी खट्टा होता है । लेकिन हैल्थ के लिए इसका जूस अच्छा माना जाता है। आजकल लेह बैरी के नाम से इसका जूस बाजार में मिल भी रहा है। लोगों नें इसके बागान भी लगाये हैजिससे इलाके के लोगो को रोजगार भी मिल रहा है।


इस इलाका के मजा लेते हुए हम रात को करीब नौ बजे सियाचिन बैस कैम्प पहुचे । यहां बर्फबारी ने हमारा स्वागत किया। ठंड भी बहुत ज्यादा थी। इसलिए खाना खा कर सभी लोग सोने के लिए चले गये।
यहां पहली बार हमे स्लीपिंग बैग में सोना पडा क्योकि वहां कि भंयकर ठंड का भगाने का और कोई जरिया नही है। कमरो को गर्म रखन के लिए यहां केरोसिन तेल से जलने वाले रुम हीटर का इस्तेमाल किया जाता है जिसे बुखारी कहते हैं। लेकिन रात को बुखारी को बंद कर दिया जाता है।

बैस कैम्प में हमे सेना के माउंटनियरिंग संस्थान में ठहराया गया था । अगले दिन सुबह से ही हमे अगले चार दिनों तक हमें यहीं पर ग्लेशियर पर चढने की ट्रेनिग लेनी थी।
पहला दिन शुरु हो गया। हमें दिखाया गया कि क्या क्या ले कर जाना है। पहनने के लिए विशेष जैकेट ( आस्ट्रिया के बने) ,थर्मल इनर वियर( ये ऐसा समान था जो डीआरडीओ ने बनाया था अच्छा लगा कि कुछ देश में भी बना है।) , स्लिपिंग बैग, बर्फ में पहनने के जूते ( इटली के बने), धूप का चश्मा( अमेरिकी नजर से सियाचिन देखना था)। इसके अलावा आईस एक्स, रस्सियां, और रुकसैक ।
देख कर लगा कि इतना सामान कैसे लेकर जायेगें क्योकि खूद ही ये सब लेकर चढाई करनी थी।

सारे सामान का वजन पन्द्रह किलो से ज्यादा होने वाला था । मेरे जैसे पतले दुबले आदमी के लिए ये तो बहुत था । खैर ये सब तो उठाना ही था। पहला दिन तो इस सब मे ही बीत गया। असली खेल तो अगले दिन से होना था। अगले दिन अपने सामान के साथ हमें पांच किलोमीटर चढाई करनी थी।

बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन का सफर (१)

बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन का सफर (१)

अभी भारतीय सेना के साथ सियाचिन जाने का मौका मिला। ये ऐसा मौका था जो जिंदगी में किस्मत वालों को ही मिलता है। मैने तो तुरन्त हां कर दी। दरअसल भारतीय सेना लगातार दूसरे साल आम लोगों के दल को लेकर सियाचिन जा रही थी। जिसमें मिडिया के साथ ही सेना के तीनो अंगो के अधिकारी , आम नागरिक और सैनिक स्कूल के बच्चे शामिल थे।

ये पूरे एक महीने का सफर था जिसमें पहले कुछ दिन हमें लेह में बिताने थे जहां पर रहकर हमें वहां के वाताबरण में अपने आप को ढालना था। दल में कुल मिलाकर करीब पैंतीस लोग शामिल हुए। सफर की शुरुआत हुई चंडीगढ से जहां से बायुसेना के विशाल मालवाहक जहाज ए एन ३२ से सभी लोगो को लेह तक जाना था। ये दुनिया के सबसे बडे जहाजो में से एक है जिसमें बै‌ठना अलग ही अनुभव रहा हालांकि मैं इस सफर में साथ नहीं था हां लेह से बापसी में मैने इस जहाज से सफर किया। कुछ कारणो से मै दो तीन दिन बाद लेह जा पाया ।

लेकिन दिल्ली से लेह का हवाई सफर भी कम रोमाचक नहीं है। इस पूरी उडान में लगभग एक घंटा लगता है। आधे घंटे बाद ही आप हिमाचल के रोहतांग दर्रे पर होते हैं और उसके बाद शूरू होता है बर्फ से ढके पहाडों का सिलसिला जो उपर से देखने में बेहद शानदार लगता है। आप भी देखिये इन नजारों को………………………..


सुबह करीब सात बजे हमारा विमान लेह में उतरा। पायलेट पहले ही बता चुके थे कि बाहर का तापमान दो डिग्री है सुनते ही मुझे तो ठंड लगने लगी क्योकि दिल्ली में तो तापमान चालिस के पार था और में तो टी शर्ट में ही था। उतरते ही तेज धूप से सामना हुआ मैने धूप का चश्मा लगा लिया । लेह में चश्मा लगाना बेहद जरुरी है लेकिन मेरा सामान आने में काफी देर लग गई और तब तक मै कापने लगा था । खैर सामने आने के बाद मैने जैकेट पहनी । लेह हवाई अड्डा बेहद छोटा है।

बाहर आते ही मै तो दूरर्दशन केन्द्र चला गया जो सामने ही था । यही से सेना का गाडी मुझे लेकर कारु चली गई। जो लेह से करीब चालीस किलोमीटर दूर लेह मनाली रोड पर सेना का कैम्प है। ये कैम्प सिन्धु नदी के किनारे बना है।


इस महान नदी को देखने का मेरा पहला अवसर था जिसके नाम पर ही हमारे देश को पहचान मिली है। शाम को देर तक मै इसके किनारे पर बैठा रहा। शाम के साथ ही ठंड भी बढने लगी थी।

अगले दिन ही हमे सियाचिन बैस कैम्प के लिए निकलना था जो कि लेह से दौ सो किलोमीटर दूर था। अगले दिन सुबह ही तैयार हो कर हम लेह पहुचे जहां हमारी रवानगी से पहले सेना ने छोटा सा कार्यक्रम रखा था। वहां फ्लैग आफ के बाद करीब बारह बजे हम सियाचिन बैस कैम्प के लिए चल दिये। साथ के सभी लोग पिछले पांच दिनो से लेह मे ही थे इसलिए सभी जगह घूम चुके थे मुझे तो गाडी से ही देखकर काम चलाना पडा।

लेह से निकलते ही आस पास की खूबसूरती दिखाई देने लगती है। दूर दूर तक सूने पहाड दिखाई देते है हरियाली का कही कोई नामों निशान नही है। इतनी ऊचाई पर ठंड औक बर्फ के सिवाये कुछ नही दिखाई देता है। लेकिन इन सूने पहाडो की अलग ही सुन्दरता है।

खैर लेह से चलने के दो घंटे बाद हम पहुचे खारदूंगला जो कि दुनिया मे सबसे ऊंचाई पर बनी सडक है। करीब १८३८० फीट पर है खारदूगला। जब हम यहां पहुचे तो बेहद ठंड पड रही थी यहा का तापमान शून्य से दस डिग्री नीचे था। साथ ही भारी बर्फ भी पड रही थी । यहा हमें पता चला कि आगे मौसम और भी खराब हो रहा है। कुछ देर यहां रुक कर हम आगे चल दिये…………….

सियाचिन और लद्दाख का सफर

सियाचिन और लद्दाख का सफर

पिछले काफी दिनो से ब्लाग की दुनिया से दूर था। लेकिन क्या करू यायावर हूँ इस बार एक महीने के लिए लद्दाख और सियाचिन के सफर पर चला गया था। पिछला पूरा महीना ही लद्दाख और सियाचिन की वादियो पर बिता कर बापस आया हूँ। जल्द आपने इस सफर के बारे में ब्लाग पर लिखूँगा। उससे पहले डीडी न्यूज पर सोमवार तीन नवम्बर को रात दस बजकर तीस मिनट पर देखिये सियाचिन के सफर पर मेरा विशेष कार्यक्रम- सियाचिन का सफर। ये अगले शनिबार को दोपहर तीन बजे फिर से दिखाया जायेगा।

छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (२)

छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (२)

शाम को हम पहुँचे नामग्याल मठ लेकिन मठ के दरवाजे पर आकर ही मैं ठिटक गया। मठ के दरवाजे पर तिब्बत की आजादी के सघर्ष के फोटो लगाये गये थे। चीन के अत्याचार की कहानी उनसे साफ नजर आ रही थी।

उसको देखते हुए हम आगे बढे और मठ के अन्दर पहुँचे तो वहां भी विरोध के वही स्वर दिखाई दे रहे थे। चारो और चीन विरोधी नारे लिखे गये थे। कुछ तस्वारे तो इतनी ज्यादा भयानक थी कि देखा ही नहीं जा रहा था।


खैर हम चले मठ को देखने के लिए। मठ में देखने के लिए दो मुख्य मंदिर हैं जिनमे से एक कालचक्र मंदिर है और दूसरा भगवान बुद्ध का है। मंदिर अंदर से निहायत ही खूबसूरत हैं। मूर्तियों को सोने के रंग से रंगा गया था।

तिब्बत की पूरी कला वहां नजर आती है। दीवारों पर तिब्बत की मशहूर थंका चित्रकारी की गई थी जो देखने के लायक है। उन मूर्तियो की खूबसूरती से आंखें हटाने का मन ही नहीं करता है।


थोडी देर में हम मंदिर देख कर बाहर निकले मंदिर के चारो और तिब्बती चक्र लगे हैं। इनमें लाखों की संख्या में मंत्र लिख कर रखे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन चक्रों को एक बार घूमाने से ही लाखों मंत्रों का फल मिल जाता है।

मंदिर के सामने के बरामदे में लोग बौद्ध तरीको से प्रार्थना और ध्यान कर रहे थे। सिर्फ तिब्बती ही नही वहां बडी संख्या में विदेशी भी थे जो ध्यान और प्रार्थना कर रहे थे। बरामदे के सामने से धौलाधार की पहाडियो को बडा ही सुन्दर नजारा दिखाई दे रहा था। हल्की हल्की बरसात भी हो रही थी ऐसे में घाटी से उठते बादलो को देखना दिल लुभाने वाला अनुभव था।
हम बहुत देर तक वहां खडे होकर तस्वीरें उतारते रहे। उसके बाद हम मठ की निचली मंजिल पर पहुँचे। शाम को वहां का नजारा ही बदला हुआ था । वहां बडी संख्या में बौद्ध भिक्षु धर्म और दर्शन पर चर्चा कर रहे थे।


उनका चर्चा करने का तरीका बडा ही अलग था। वही तरीका देखने के लायक था। दो या तीन भिक्षु एक साथ बैठकर किसी विषय पर बात करते हैं जिसमें से एक खडी रहता है जो बोलने के साथ ही हाथो से इशारे भी करता रहता है। इसको पूरी तरह से समझाया नहीं जा सकता है इसे देखने के लिए खुद आपको ही धर्मशाला जाना होगा।


मठ में हम कुछ घंटे बिता चुके थे जब शाम घिरने लगी तो हम बाहर चल दिये ।मठ के बाहर एक बार फिर तिब्बती विरोध दिखाई दिया। शाम को बडीं संख्या में तिब्बती आजादी के समर्थन में पूजा यात्रा निकाल रहे थे। हाथों में मोमबत्ती लिये ये लोग अपना शांत विरोध जता रहे थे।


वहां से निकल कर हम मैक्लोडगंज के बस अड्डे पहुँचे जो यहां का मुख्य चौक भी है। इसी चौक से एक सडक मठ की तरफ जाती है जिसे टेम्पल रोड कहा जाता है। इसी से लगी हुई दुसरी सडक है जिसे जोगीवारा रोड कहा जाता है।


दोनो ही सडको पर तिब्बती सामान की दुकाने हैं। यहां से बौद्ध पूजा का सामान और तरह तरह के वाद्य यंत्र खरीदे जा सकते हैं। तिब्बत की मशहूर थंका चित्र भी यहां से खरीद सकते हैं।


मुझे यहां पर कीमती पत्थरों से बने आभूषण लगभग हर दुकान पर बिकते दिखाई दिये। जोगीवारा सडक पर घुसते ही एक दुकान है जहां तिब्बती कपडे बनाये जाते हैं जहा से आप तिब्बती कपडे अपने हिसाब से खरीद सकते हैं।


साथ ही जोगीवारा सडक पर खाने के रेस्टोरेंट भी बडी संख्या में हैं जहा तिब्बती के साथ ही इटालियन और फ्रेच खाना भी खाया जा सकता है।
मैनें अच्छे तिब्बती रेस्टोरेंट का पता किया। तो पता चला कि स्नो लायन तिब्बती खाने के लिए अच्छी जगह है। ये भी जोगीवारा सडक पर घुसते ही है। यहां मैने मोमो खाये जो बाकई बेहतरीन था। हर तरह का तिब्बती खाना यहां मिलता है। इसलिए अगर घूमने आये है तो यहां जरुर आईये।
यहां के मैन्यू अलग चीज मुझे दिखाई दी सेब की चाय जो वाकई एक अलग स्वाद था । खा पीकर बाहर निकले तब तक रात के आठ बज चुके थे। बाजार देखते हुए होटल पहुँचे कुछ आराम करके खाना खाया और सोने के लिए चले गये ।
अगले दिन सुबह से ही बरसात हो रही थी इसलिए बाहर नहीं निकले और होटल में ही आराम किया। बारह बजे तक हमने होटल से चैक आउट किया। तब तक बरसात भी ऱुक चुकी थी हमारी वापसी की बस भी रात के आठ बजे थी इसलिए हम एक बार फिर मठ की तरफ चल दिये ।
उस मठ में कुछ ऐसी बात है जो आप को अपनी और खींचती है। वापस जाकर हमने जी भर के फोटो खींचे । दो तीन घंटे बिताकर होटल वापस आये और खाना खाकर सामान लेकर वहां से चल पडे। रास्ते में फिर स्नोलायन पर रुके इस बार मैने बनाना केक और तिब्बती चाय का मजा लिया। तब तक शाम के चार बज चुके थे।

तो हमने बस अड्डे से निचले धर्मशाला के लिए बस पकड ली क्योकि हमारी बस निचले धर्मशाला से ही थी। चलते चलते मेरी नजर इस दुकान पर पडी जो पिछ्ले डेढ सौ साल से इसी जगह पर कमोबेश इसी हालत में हैं। ये सब चीजे हैं जो किसी जगह को आम घूमने के इलाको से अलग बनाती है। वहां से बस लेकर इस जगह को अलविदा कर हम चल दिये ।

कहां ठहरे-

हिमाचल पर्यटन का होटल भागसू रुकने के लिए अच्छी जगह है। जहां नौसौ से दो हजार तक के कमरे हैं। इसी के पास पर्यटन विभाग ने नया क्लब हाउस बनाया है जहां जो रुकने के लिए अच्छा है। क्लब में डोरमैट्री सुविधा भी है। इसके अलावा होटल बडी संख्या मैं हैं जहां हर बजट के हिसाब से कमरे मिल जाते हैं।
क्या खायें-
होटल भागसू का खाना काफी अच्छा है । इसकी खासियत है कि पहले से बताकर यहां हिमाचली खाना बनवाया जा सकता है। तिब्बती खाने के लिए होटल भागसू के सामने पेमाथांग और जोगीवारा रोड पर स्नोलाईन रेस्टोरेंट में जाया जा सकता है। इटालियन के लिए स्नोलायन के पास ही निक्स ईटालियन किचन है।