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कुमाऊं के कारपेट साहब

कुमाऊं के कारपेट साहब

 जिम कॉर्बेट 

“The tiger is a
large hearted gentleman with boundless courage and that when he is
exterminated-as exterminated he will be, unless public opinion rallies to his
support-India will be the poorer by having lost the finest of her fauna.” – Jim Corbett

इन पंक्तियों का मतलब है – “बाघ बेहद साहसी और बड़े दिल का सज्जन जानवर है और अगर उसे जनता का समर्थन नहीं
मिला तो वह पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। और अपने बेहतरीन जीव के खोने के बाद भारत
और भी गरीब हो जाएगा” – जिम कॉर्बेट

कालाढूंगी में जिम कार्बेट संग्रहालय में बार्ड
पर इस बात ने तुरंत मेरा ध्यान खींचा । बार्ड पर लिखी कुछ पंक्तियां हमारे देश , हमारे पर्यावरण और बेशकीमती जानवरों को लेकर जिम कार्बेट को पूरी सोच को सामने
ला देती हैं। इसे पढ़ने के बाद एहसास होता है कि कैसे एक शिकारी से आदमखोर जानवरों
का शिकारी बनने वाला इंसान अपने बाद के जीवन में उनका रखवाला बन गया। 
जंगल और जानवरों पर आने वाले संकट की जो बात आज की जा रही है, उन्होंने उस संकट को आज से करीब 100 साल पहले ही समझ लिया था। पर्यावरण उस
समय बड़ा मुद्दा नहीं था लेकिन जंगल और जानवरों को  लेकर गहरी समझ रखने वाली पारखी नजरों ने आने
वाले खतरे को भांप लिया था।
जिम कॉर्बेट का घर
उसी ‘जिम कॉर्बेट’ या कहें कि ‘कारपेट साहब’ को जानने समझने के लिए कालाढूंगी के उनके घर
में बना संग्राहलय माकूल जगह है। स्थानीय लोगों में वे कारपेट साहब के नाम से ही मशहूर थे।

संग्राहलय में उनसे जुड़ी तस्वीरों और जानकारी
को सहेजा गया है। तस्वीरों से आप को उनके जीवन के बारे में बहुत कुछ जानने और
समझने को मिलता है।
वे एक शिकारी और प्रकृति प्रेमी थे ये तो सब
जानते हैं। पर यहां आकर मुझे पता चला कि नैनीताल इलाके के सफल व्यापारी के तौर
पर उन्होंने काफी पैसा भी कमाया। लेकिन जंगल से प्यार इतना गहरा था कि पहचान एक
प्रकृतिप्रेमी के तौर पर ही बनी। 
 कॉर्बेट अपनी बहन मैगी के साथ
यहां उनकी इस्तेमाल की गई बहुत सी चीजें भी
दिखाई गई हैं। उनके समय की मेज़, कुर्सी, उनका पलंग ,पालकी  जैसी चीजें यहां रखी गई हैं।एक बार को तो ऐसा लगता है कि जैसे आप फिर से
कारपेट साहब के समय में ही लौट गये हैं और यहीं कहीं से वे आकर आप से बात करने
लगेंगे।
नैनीताल के लिए भले ही वे बडे व्यापारी थे
लेकिन कालाढूंगी में  उनका दूसरा ही रुप
नजर आता है। यहां वे गांव वालों की मदद करने वाले इंसान के तौर पर पहचाने जाते थे ।
उन्होंने लोगों को खेती के लिए जमीनें  दीं। इलाके में केले की खेती की शुरुआत भी कारपेट
साहब ने ही की। उन्हें दवाईयों की जानकारी भी थी, किताबों में जिक्र मिलता है कि
उनकी लाल दवाई पीते ही गांव वालों का सर्दी जुकाम , बुखार छू मंतर हो जाया करता था।
तो ऐसे कारपेट साहब को तो लोग याद करेंगे ही।
उनकी सबसे बडी पहचान को आदमखोर जानवरों के
शिकारी के तौर पर बनी। इसी वजह से पूरे कुमाऊं और गढवाल में उनका बेहद सम्मान किया
जाता है।कालाढूंगी के पास छोटा
हल्द्वानी गांव भी उन्होंने ही बसाया ।
लोगों के दिलों में कारपेट साहब कि क्या जगह थी
इसका पता मुझे इंटरनेट पर उनके बारे में कुछ तलाश करते समय मिला। साल 1986 में
बीबीसी की टीम उन पर एक डाक्यूमेंटरी बनाने कालाढूंगी और नैनीताल आई। इसी
कालीढूंगी के घर में उसकी शूंटिंग हुई। उस समय तक कारपेट साहब भारत से गए 40 साल
हो चुके थे। लेकिन लोगों को दिलों में उनकी याद इतनी ताजा थी कि बीबीसी की टीम के
सम्मान में कुमाऊं के दूर दराज के गावों से लोग कालाढूंगी आए और उन्होंने कुमाऊंगी
नाच और गानों के साथ टीम का स्वागत किया। उस समय तक तो कारपेट साहब के साथ काम कर
चुके बहुत से स्थानीय लोग भी जिंदा थे।
कालाढूंगी के घर में आकर कारपेट साहब को लेकर
लोगों के इसी प्यार और सम्मान को आज भी महसूस किया जा सकता है। मुझे यहां आने वाले
लोगों में पर्यटक ही नहीं बल्कि आस-पास  के
लोग भी बड़ी संख्या में दिखाई दिए।
कार्बेट साहब पहचान एक शिकारी की थी लेकिन वे
मानते थे कि कोई जानवर आदमखोर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों के कारण वह आदमखोर बन
जाता है। 
उन्होंने अपनी पहली और सबसे मशहूर किताब मैन इटर्स ऑफ कुमाऊं की
प्रस्तावना में लिखा है – 

 “A man-eating tiger is a
tiger that has been compelled, through stress of circumstances beyond its
control, to adopt a diet alien to it. The stress of circumstances is, in nine
cases out of 10, wounds, and, in the 10th case, old age.  “Human beings are not the
natural prey of tigers, and it is only when tigers have been incapacitated
through wounds or old age that, in order to survive, they are compelled to take
to a diet of human flesh.”

यानि “ बाघ को परिस्थितियां
आदमखोर बनने के लिए मजबूर करती हैं, 10 में से 9 मामलो में बाघ के घाव इसका कारण
थे, और दसवें मामले में बाघ का बुढ़ापा इसकी वजह बना।”

“आदमी बाघों का प्राकृतिक आहार नहीं है, बुढापे, घाव या किसी
वजह से जिंदा रहने की लड़ाई में ही बाघ आदमी को खाना शरु करता है। ”

शिकारी कारपेट साहब ने  कैमरा भी
खरीदा था और जानवरों के चित्र लेने में उनका बहुत मजा आता था। उन्होनें लिखा है कि
रायफल से शूंटिग की बजाए कैमरे से शूट करना उनको कहीं ज्यादा पसंद था।
ऐसे अनोखे कारपेट साहब के बारे में कालाढूंगी
आकर बहुत कुछ जानने को मिला । लेकिन  कारपेट साहब को जानने का सफर अभी पूरा
नहीं हुआ था उसमें एक आश्चर्य और बाकी था।
Corbett Wild Iris Spa and Resort की तरफ से घूमने के लिए जो जगह
चुनी गई थी उसमें कालाढूंगी से कुछ किलोमीटर दूरी पर पवलगढ़ में बना का वन विभाग
का रेस्ट हाउस भी शामिल था। वन विभाग के रेस्ट हाउस  आमतौर पर जंगल के अंदर बहुत शांत इलाके में
होते हैं इसलिए मुझे लगा कि दोपहर के खाने के लिए इस जगह को चुना गया होगा। लेकिन
यहां पहुंचे तो पता चला कि इस रेस्ट हाउस का इतिहास भी कारपेट साहब से जुड़ा है।
पवलगढ़ रेस्ट हाउस
इस रेस्ट हाउस को 1912 में अंग्रेजी कॉटेज
स्टाइल में बनाया गया था। 1930 में  इस
रेस्ट हाउस में कारपेट साहब भी रुक चुके थे। यहीं रहते हुए उन्होने रेस्ट हाउस के
ठीक बगल में सेमल के पेड़ के नीचे अपने समय के सबसे मशहूर बाघ “बैचलर ऑफ पवलगढ़”को मारा था। वह
पेड़ आज भी मौजूद है।

इसी पेड़ के नीचे मारा था
बाघ
 कहा जाता है वह अपने समय का सबसे विशाल बाघ था।अपनी किताब
मैन इटर्स ऑफ कुमाऊं में वे लिखते है कि गांव वाले बताते हैं कि उन्होंने इससे बड़ा
बाघ पहले कभी देखा ही नहीं था।
लेकिन जानकारी मिलती है कि “बैचलर ऑफ पवलगढ़ आदमखोर” नहीं था।
फिर भी कार्बेट ने उसे क्यों मारा इसकी जानकारी मुझे कहीं नहीं मिली। लेकिन
स्थानीय लोगों में एक बात प्रसिद्ध है कि बाघ को मारने के बाद उसकी लाश के
पोस्टमार्टम के दौरान कार्बेट को पता चला कि बाघ आदमखोर नहीं था। उस घटना का उन पर
इतना गहरा उसर हुआ कि इस घटना के बाद वे और भी जोर शोर से जानवरों को बचाने के काम
में जुट गए।
उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि 1936 में
हेली नेशनल पार्क के नाम से देश का पहला संरक्षित पार्क बना। आजादी के बाद कार्बेट
के प्रति सम्मान जताते हुए भारत सरकार ने 1952 में उसका नाम बदल कर जिम कार्बेट
नेशनल पार्क कर दिया।
शायद यह कार्बेट साहब की ही विरासत थी कि देश
में बाघ बचाने के लिए जब काम शुरु किया गया। तो कार्बेट नेशनल पार्क में ही देश का
पहला बाघ अभ्यारण्य भी बनाया गया।
प्रकृति और जंगल के जानवरों से प्यार करने
वाले कारपेट साहब के लिए इससे बड़ी श्रंद्धांजलि कुछ और हो भी नहीं सकती थी।
तो सिर्फ बाघ को देखने के लिए कार्बेट पार्क घूमने
नहीं आएं। एक दिन उस इंसान के बारे में जानने की भी कोशिश करें जिसनें पूरी दुनिया
में बाघ संरक्षण के प्रयासों को एक दिशा दी।
कॉर्बेट नेशनल पार्क की अनोखी दुनिया

कॉर्बेट नेशनल पार्क की अनोखी दुनिया

राजस्थान के रणथम्बौर नेशनल पार्क से दिल्ली वापस आते ही अगले
दिन कॉर्बेट नेशनल पार्क जाने का मौका मिल गया। एक घूमने के शौकीन को और क्या
चाहिए । एक ही दिन में जाने की तैयारी की, कैमरे को संभाला और अगले सफर के लिए
तैयार । सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि रूकने की जगह के बारे में कुछ पता करने का मौका
ही नहीं मिला। मुझे वहां Corbett Wild Iris Spa and Resort में रुकना था।
 रिजोर्ट की तरफ जाते हुए मन में एक ही बात थी कि क्या यह भी कॉर्बेट
के दूसरे रिजोर्ट की तरह ही हुल्लड़ बाजी का अड्डा होगा। ढिकाला की तरफ के भीड भरे
पार्टियों के लिए मशहूर इलाके में जाने का कोई मन नहीं था। रामनगर पहुंचने पर
गाड़ी ढिकाला की तरफ ना जाकर सीधे हाथ की तरफ मुड़ी तो कुछ सूकून मिला कि चलो उस
इलाके से तो बच गए। रामनगर में कोसी का बैराज पार करने के बाद कुछ किलोमीटर
नैनीताल की तरफ चलने के बाद गाडी उलटे हाथ पर मुड़ी और जंगल में खो सी गई। हम सीधे
जंगल के बीचों बीच आ गए थे। अब हमारे सामने एक पतली
सी सड़क थी। दोनों तरफ साल और टीक के घने पेड थे।
घने जंगल से गुजरती सड़क
अब महसूस हुआ कि हम सही मायने
में जंगल में थे। पता चला कि सड़क भी हाल ही में बनी थी। जंगल में 7 किलोमोटर चलने के बाद हम
क्यारी गांव में पहुंचे। वही गांव के पास बना था Corbett Wild Iris Spa and Resort । 
यहां तक
पहुंचने के लिए गाड़ी को नदी के उबड़-खाबड़ रास्ते पर भी चलना पडा। चारों तरफ की
शांति को सिर्फ चिडियों की चहचहाट ही तोड रही थी। हमारा जंगल का सफर शुरु हो चुका
था। कुछ अलग तरीके से।
घने जंगल के बीच बना है यह रिजोर्ट। दिल्ली से 6 घंटे के सफर के बाद यहां
पहुंचे थे। थकान का जो थोडा बहुत असर  था
वह भी ठंडे शर्बत के स्वागत के साथ उतर गया।
ज्यादा कुछ नहीं करके सीधे अपने कमरों में पहुंचे थोड़ा सा आराम करने के लिए।
बडे से इलाके में कुछ- कुछ दूर पर कमरे और कॉटेज बने थे। 
मेरा कमरा खासा बडा और
अच्छे तरीके से सजा था। कमरे में वह सब कुछ मौजूद था जो एक- दो दिन के लिए आराम की
चाह रखने वाले लोग चाहते हैं।
कुछ देर आराम के बाद सभी लोग दोपहर के खाने पर मिले। बेहतर तरीके बना स्वादिष्ट खाना, भरपेट खाया । डायनिंग हॉल में जंगल के बीच
रहने का ही आभास होता है। लकड़ी का फर्नीचर, बड़ी- बडी कांच की खिड़कियां
जिनसे  बाहर की हरियाली का मजा लिया जा
सकता है।
खुला-खुला डायनिंग हॉल
खाने के बाद रिजोर्ट को देखने निकल गया। आम का तो पूरा बगीचा था
यहां। पता चला कि बगीचे के बीच ही इस रिजोर्ट को बनाया गया है। 
जंगल में रुकने को
कुछ और बेहतर तरीके से महसूस करना चाहते हैं यहां छप्पर वाले कॉटेज भी हैं।  एक तरफ स्पा था और स्पा के बगल में बड़ा सा
स्विमिंग पूल।
यहां
एक एक्टिविटी रूम भी है। इस बड़े से हॉल में पूल टेबल, टेबिल-टेनिस , और कैरम
बार्ड जैसी चीजें रखी हुई हैं। खेलों के शौकीन हैं तो यहां बड़ा अच्छा समय बिताया
जा सकता  है।

आस पास देखते हुए ही नेचर वॉक पर जाने का समय हो गया। रिजोर्ट के पास ही है
क्यारी नाम छोटा सा कुमाऊंनी गांव । इसी गांव में हमें नेचर वॉक पर जाना था।
विनोद नेचर वॉक के बारे में बताते हुए
इस वॉक से पहले हमारी मुलाकात हुई विनोद बुधानी से। विनोद क्यारी गांव के ही
रहने वाले हैं और अब रिजोर्ट के साथ गाईड और नैचरलिस्ट का काम करते है। पहली ही नजर
में विनोद पक्के नैचरलिस्ट नजर आते  हैं।
खाकी पैंट , सफेद टी-शर्ट, गले में एक तरफ दूरबीन और दूसरी तरफ छोटे से बैग में
स्थानीय चिंडियों की प्रजातियों पर लिखी एक किताब। अगले दो दिन हमें विनोद के साथ
ही रहना था। दोस्ती तो मिलते ही हो गई। विनोद को स्थानीय पशु पक्षियों की
प्रजातियों और पेड़-पौधों  की बहुत अच्छी
जानकारी थी।
यह जानकर अच्छा लगा कि गांव के बहुत से लोग रिजोर्ट में ही काम करते हैं। गांव
में ही रहकर अगर पर्यटन से रोजगार पैदा होता है तो इससे अच्छा भला क्या हो सकता
है। । गांव में कई लोगों के पास जिप्सी भी हैं जो पर्यटकों को सफारी पर ले जाने का
काम करती है। पर्यटकों के आने से अब गांव में कई होमस्टे भी खुल गए हैं। एक पूरी
अर्थव्यवस्था है जो पर्यटन के इर्द-गिर्द पनपने लगी है।
विनोद के साथ हम चले क्यारी गांव की तरफ। खिचड़ी नदी को पार कर हम पहुचे इस
गांव में, नदी में ज्यादा पानी नहीं था इसलिए पैदल ही इसको पार कर लिया।
खिचड़ी नदी 
( Image courtesy- Abhinav Singh)
 गांव में
लोगों की जिंदगी को करीब से देखने का मौका। गांव के खेतों में गेहूँ की कटाई का
काम चल रहा था। 
विनोद ने हमें गांव के पास उगे बहुत से पेड़-पौधों के बारे में बताया। 
हाथी कान नाम का पौधा
रोजमर्रा की जिंदगी में डॉक्टर से ज्यादा लोग इन्हीं पेड़ पौधों पर भरोसा करते
हैं। जब 24 घंटे का डॉक्टर घर में ही मौजूद हो तो फिर चिंता किस बात की। कोई पौधा
दर्द दूर करता है तो कोई चोट पर एंटी सेप्टिक का काम करता है। किसी से गठिया का
इलाज हो सकता है तो किसी से गैस की समस्या रफूचक्कर हो जाती है।

पेड़ पर लगा नींबू
हम शहर में रहने
वालों का तो इन चीजों से नाता टूट गया है लेकिन अगर इन चीजों के बारे में जानने का
कोई ऐसा मौका मिले तो उसका पूरा फायदा उठाना चाहिए। प्रकृति ने अपने खजाने में
बहुत कुछ छिपा रखा है हमारे लिए, बस पहचानने की जरुरत है।
नेचर वॉक के आखिर में गांव की एक दुकान में हमारी शाम की चाय का इंतजाम था।
गर्मागरम पकौड़े , समोसे और चाय की चुस्कियों के साथ अपनी इस नेचर वॉक को खत्म
किया।
वापस लौटते – लौटते अंधेरा हो गया। शाम को बड़े से लॉन में खाने का इंतजाम था। 
 Image courtesy- Iris Resort
भारतीय से लेकर कॉन्टीनेन्टल तक शाम के खाने का इंतजाम शानदार था। खास बात यह थी
कि यह बनाने वाले खानसामा यहीं आसपास के थे ।
शाम के खाने के साथ ही संगीत का
कार्यक्रम भी रखा गया । एक से एक गाने सुनने को मिले। कलाकारों की यहां कोई
कमी नहीं थी। सब मिल कर शाम को खूबसूरत बना रहे थे। खाना खाते, घूमने फिरने की
बातें करते करते आधी रात हो गई। घुमक्कड़ी के किस्से शुरु हो तो फिर रुकते कहां
हैं। लेकिन सोना भी जरुरी था क्योंकि अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर फिर से क्यारी
गांव में ही जाना था।  इस तरह से कॉर्बेट
के जंगल में पहला दिन पूरा हुआ। लेकिन अभी दो दिन और बाकी थे। उन दिनों में हमें
ताज्जुब में डालने वाली कई चीजें थी।  उसके
बारे में अगली पोस्ट में बात करेंगे।
कैसे पहुंचे – रामनगर दिल्ली से करीब 250 किलोमीटर दूर है। दिल्ली से ट्रेन और बस की सुविधा से जुड़ा है। ट्रेन और बस से करीब 6 घंटे में यहां पहुंचा जा सकता है।  Corbett Wild Iris Spa and Resort  रामनगर से   करीब 12 किलोमीटर दूर है। रामनगर से टैक्सी
लेकर यहां पहुंचा जा सकता है।

( Travel correspondent blogger group(TCBG) organised this visit and Corbett Wild Iris Spa and Resort sponsored it.)

गुनेहड़ – कला दीर्घा में बदलता गांव

गुनेहड़ – कला दीर्घा में बदलता गांव

गुनेहड़ की एक सुबह मुझे मेरे होटल की बालकनी से कुछ
महिलाएं आती दिखाई दी। खूबसूरत रंग बिंरंगे कपड़ों में सजी, काफी कुछ राजस्थानी
पहनावे जैसा। वे महिलाएं नीचे की तरफ बने खेतों में चली गई। एक घंटे बाद जब वे फिर
से आती दिखाई दी तो मेरी साथी ब्लागर श्री और मंजुलिका ने उनके फोटो लेने की इजाजत
मांगी। वे आराम से तैयार हो गई, बोली, ले लो जी, जितने फाटो लेने हैं। अभिनव और
मैं भी अपना कैमरा लेकर पहुंचे। 

उन महिलाओं ने हमें अपने घर आने का न्यौता दिया और
साथ में प्यार से हमें उलाहना भी कि आप पहले बताते तो हम अच्छे तैयार होकर आते पूरे गद्दी पहनावे और श्रंगार के
साथ। आज कि दुनिया में इतना प्यार और अपनापन वो भी चार अनजान लोगों से कोई गांव
वाला ही दिखा सकता है।  

इस पर हममें से
किसी ने कहा कि हम फिर  आएंगे फ्रेंक वाले
मेले में
, उस समय आप के घर भी चलेंगे। ‘फ्रेंक वाला मेला’ सुनते ही उनकी आंखों में
चमक आ गई, बोली कि उस समय तो हम भी तैयार होकर आएंगें, आप जरुर आना।

‘फ्रेंक वाला मेला’ यह शब्द सुनकर जो चमक उन गद्दी महिलाओं के चहरे
पर दिखाई दी,यही वह जुड़ाव है जो इस मेले को शुरु करने वाले फ्रेंक चाहते भी थे। मेला
गांव वालों के साथ जुड़े, उनको साथ लेकर चले।

 फ्रेंक वाला मेला
दरअसल एक कला उत्सव ( आर्ट फेस्टिवल) है जिसे फ्रेंक हिमाचल की कांगड़ा घाटी के छोटे
से गांव गुनेहड़ में करवाते हैं। देश-विदेश के कलाकार उसमें जुड़ते हैं, अपनी कला
दिखाते हैं। फ्रेंक चाहते तो इस कला उत्सव को भी दूसरे शहरों में होने वाले आर्ट
फेस्टिवल की तरह बुद्धिजीवियों का अड्डा बना सकते थे । जहां देश दुनिया के लोग
जुटते तो जरुर हैं लेकिन आस-पास के परिवेश या लोगों से उनका जुडाव कम ही हो पाता
है।

यहीं पर आकर फ्रेंक का मेला सबसे अलग और ख़ास हो जाता है।
इस आर्ट फेस्टिवल में कलाकार आते तो दुनिया भर से हैं लेकिन वे स्थानीय लोगों के
साथ मिलकर अपनी कला को दिखाते हैं। फैशन डिजाइनर स्थानीय गद्दी पहनावे को मिलाकर
कपड़े तैयार कर रहा है, उसके बाद गद्दी महिलाओं का पारम्परिक कपड़ों में फैशन शो
होता है। 
फोटोग्राफर गांव के लोगों की जिंदगी को अपने कैमरे में उतार रहे हैं।
फिल्म बनाने वाले गांव के बच्चों को अभिनय करवा कर उनके साथ फिल्म बना रहे हैं। 
पूरा गुनेहड़ गांव जैसे एक बड़ी सी कला दीर्घा में बदल जाता है। कोई एक जगह नहीं
गांव का चौराहे, नुक्कड़, गली मोहल्ले हर जगह कला की कोई अभिव्यक्ति चलती रहती है।
ये दुकानें बनती हैं फेस्टिवल का हिस्सा

पिछले आर्ट फेस्टिवल की कलाकारी

कुछ रंग अभी भी ताज़ा हैं
कोई कलाकार लोगों के साथ मिलकर गांव की दुकानों और खाली
पड़ी दिवारों को अपनी कूंची से नए रंग दे रहा होता है। तो कोई दरवाजों को सजाने
में व्यस्त है। और इन सब में गांव के लोगों का हिस्सा लेना वाकई अनोखी बात है।

फ्रेंक बताते हैं कि 2013 में हुए पहले उत्सव में शुरु में
तो गांव के लोगों थोड़ा दूर-दूर रहे लेकिन कुछ ही दिन में सब ऐसे घुल मिल गए कि
लगता नहीं कि बाहर से आए कलाकार वहां काम कर रहें हैं।
इस उत्सव को फ्रेंक ने नाम दिया है शॉपआर्टआर्टशॉप 
( ShopartartShop) । नाम इसलिए पड़ा कि गांव
में खाली पड़ी दुकानों को एक महीने के लिए बाहर से आए कलाकारों को दे दिया जाता
है। इन दुकानों में कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। गांव से इनका जुड़ाव
इतना ज्यादा है कि पहले शॉपआर्टआर्टशॉप में तो गांव वालों में खुद ही अपनी दुकाने
फ्रेंक को दे दी वो भी बिना कोई पैसा लिए।
खाली दुकानों में आती है रौनक

2013 में हुए पहले उत्सव के समय आस-पास के गांवों के 5000
लोगों मेला देखने आए। अब तीन साल के बाद 14 मई से 14 जून तक यह दूसरा शॉपआर्टआर्टशॉप
कला उत्सव होने जा रहा है। फ्रेंक को उम्मीद है कि इस बार इससे भी ज्यादा लोग मेले
को देखने आएंगे।

इन्होंने पिछले मेले में फिल्म बनाई थी

कला के कुछ नमूने

आप भी चाहें को इस शॉपआर्टआर्टशॉप ( ShopartartShop)  कला उत्सव की मदद कर सकते
हैं।
मदद के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

हां, मेला देखने के लिए सबका स्वागत है। गुनेहड़ हिमाचल में
पैराग्लाइडिंग के लिए प्रसिद्ध जगह बिर-बिलिंग के बिल्कुल पास ही है, इसलिए यहां
रुकने और खाने पीने की जगहों की कमी नहीं है।   
कैसे पहुंचें-

रेल- बड़ी लाइन का सबसे नजदीकी स्टेशन पठानकोट है। गुनेहड़
से पठानकोट करीब 150 किलोमीटर दूर है। पठानकोट से टैक्सी और हिमाचल परिवहन की बस
उपलब्ध हैं। टैक्सी करीब 3,000 हजार रुपये में मिल जाएगी। 

बस- दिल्ली, चंड़ीगढ़ जैसे शहरों से यहां के लिए सीधी बस
सेवा है। वोल्वो से लेकर साधारण बस तक जैसा आप चाहें। बस आपको गुनेहड़ से कुछ पहले
बिर में उतारगी।
दिल्ली से बस का किराया बस की सुविधा के हिसाब से करीब 600 रुपये से लेकर 1200 रुपये तक है। 

हवाई जहाज- कागंडा में हवाई उड्डा है जहां दिल्ली से नियमित
उड़ान आती है। 
अमृतसर का खाना

अमृतसर का खाना

पंजाब का नाम सुनते ही ध्यान में आती है मौज मस्ती और
पंजाबियों की जिंदादिली, और जितने जिंदादिल हैं यहां के लोग, उतना ही जानदार है
यहां का खाना।
मक्खन, घी, दूध, दही और लस्सी तो यहां के रोजमर्रा के खाने
का हिस्सा है। । इस बार पंजाब की यात्रा में जी भर कर पंजाब का खाना खाया। पंजाबी
खाना खाने के लिए अमृतसर से बढ़िया जगह कौन सी हो सकती है भला। तो आज बात अमृतसर
के पंजाबी खाने की ।
अमृतसर के खाने को 
खाने की शुरुआत हुई वाघा बार्डर से कुछ पहले बने सरहद रेस्टोरेंट से। शाम
को होने का बीटिंग रिट्रीट को देखने से पहले दोपहर का खाना यहीं खाने का कार्यक्रम
था।
सरहद
 जैसा नाम है वैसी ही है सरहद की खासियत। यहां सीमा के दोनों तरफ के शहरों यानी
अमृतसर और लाहौर के खाने का मजा लिया जा सकता है। रेस्टोरेंट के बाहर दो छोटे
टैम्पों खड़े हैं जिनको  पाकिस्तान का
प्रसिद्ध ट्रक आर्ट से सजा या गया है।

पंजाब का खाना तो अमृतसर में कहीं भी खाया जा सकता था लेकिन
जब सरहद में थे तो लाहौरी खाना का मजा क्यों हाथ से जाने दिया जाए यह सोचकर लाहौर
से जुड़ा शाकाहारी खाना मंगवाया। ( पता नहीं कभी लाहौर जाने को मिले या नहीं)
लाहौरी मिंया जी दाल , लाहौरी नजाकत कोफ्ते और लाहौरी
कलौंजी वाले नान। जितने अनोखा नाम है इनके उतना ही बेहतर उनका स्वाद भी था। पेटभर
कर खाया।  और भी चीजे थीं जिन्हें खाने का
मन था लेकिन वाघा पर होने वाले कार्यक्रम के लिए देर हो रही थी इसलिए जल्दी ही
वहां से निकल गए।

      सरहद का खाना
वाघा से आकर रात को हरमदिंर साहिब के दर्शन  किए। उसके बाद रात के खाने के लिए एक ही नाम
दिमाग में था अमृतसर का प्रसिद्ध केसर दा ढ़ाबा। 
यह मशहूर ढ़ाबा चौक पासिंया के
पास है।  केसर दा ढ़ाबा पहुंचे तो देखा की
ढ़ाबे में बैठने की जगह नहीं है। 20 मिनट इंतजार करने के बाद हमारा नंबर आया। यहां
खाने के लिए बहुत कुछ है। पर केसर की थाली में सभी स्वाद मिल जाते हैं। तो केसर की
थाली मंगवाई। दाल फ्राई, छोले, रायता और तंदूरी लच्छा परांठा।
 थाली को परोसने का
अंदाज भी सबसे अलग था, थाली के आते ही लाने वाले ने परांठों को हाथ से दबा कर थाली
में रखा। शायद उसमें मक्खन को अंदर तक पहुंचाने के लिए। स्वाद तो वाकई लाजवाब था।
थाली में इतना कुछ है कि उसको खत्म करना किसी एक के बस की बात नहीं है। इसके साथ
ही मंगवाई लस्सी। इतना सब खाने के बाद तो उठने की हिम्मत भी नहीं बची थी लेकिन
खाना का आखिर में फिरनी खाना नहीं छोड़ सकते थे। इनकी फिरनी भी खाने के जितनी ही
स्वादिष्ट थी।
केसर के ढाबे पर दाल को पूरे 12 घंटे तक पकाया जाता, इतना
पकाने से उसका स्वाद में अनोखापन आ जाता है जो आम दाल में नहीं मिलता।
   इस देग में पकती है दाल
खाना बनाने की जगह पर लगे तंदूर में लगातार परांठें और
रोटिया बनती रहती हैं। आप चाहें तो जाकर देख भी सकते हैं कि यहां खाना कैसे बनाया
जाता है।

अगले दिन सुबह अमृतसर के छोले कुलचे का नाश्ता करना था। इसे
खाने के लिए हम पहुंचे भाई कुलवंत सिंह कुलचे वाले के यहां। स्वर्णमंदिर जाने वाली
सड़क पर जलियांवाला बाग से कुछ पहले एक गली में यह दुकान है। मक्खन लगे आलू से भरे
कुलचे और साथ में छोले और चटनी। 

सुबह सुबह गर्मागरम तंदूर  से निकले कुलचे खाकर मजा आ गया। कुलचा बनाने का
तरीका भरवां नान से कुछ अलग होता है। इसे पूरे दिन कभी भी खाया जा सकता है। अभी तो
पेट भर चुका था लेकिन आज पूरे दिन अमृतसर के खाने की अच्छी दुकानों का भी सफर था
इसलिए तय किया कि अब बस थोड़ा ही खाना है जिससे ज्यादा से ज्यादा स्वाद लिए जा
सकें। कुछ देर घूमने के बाद थोड़ा खाना पचा तो हम पहुंचे हिंदु कॉलेज के पास आहूजा
लस्सी
पर। वैसे तो लस्सी पंजाब का ऐसा तोहफा है जो भारत में कहीं भी जाएं आपको मिल
ही जाएगा लेकिन अमृतसर की लस्सी बात ही कुछ और है। आहूजा लस्सी यहां लस्सी की सबसे
प्रसिद्ध दुकान है। बड़ा सा लस्सी का गिलास और ऊपर रखी मलाई , पीते ही मजा आ जाता
है।
अमृतसर के खाने की दुकानों में अगला नंबर था लोहगढ़ गेट के
पास मनु फ्रूट क्रीम आइसक्रीम का ।
 दिसंबर का महीना और ठंडी आइसक्रीम, दोनों का
आपस में कोई मेल नहीं। लेकिन कुछ छूट नहीं जाए इसलिए इसका स्वाद लेना तो बनता ही
था। मुझे फ्रूट क्रीम में बहुत मजा नहीं आया, स्वाद लगभग वैसा ही था जैसा किसी
दूसरी फ्रूट क्रीम में होता है। हो सकता है कि ठंडे मौसम की वजह से ज्यादा आनंद
नहीं ले पाया , अगली बार कभी कुछ गर्म मौसम में गया तो एक बार फिर खाकर जरुर
देखूंगा।
यहां से कारवां बढ़ा मक्खन चिकन की तरफ। यहां मासांहारी
खाने की सबसे अच्छी दुकानों में से एक है मक्खन चिकन। हालांकि मेरा मासांहारी खाने
से कुछ लेना देना नहीं है तो यहां मेरे बताने लायक कुछ नहीं है। आप मासांहारी खाना
खाते हो तो यहां होकर आएं।
पेट में कुलचे और  लस्सी का असर अभी तक था। लेकिन वापसी से पहले
एक जगह और बच गई थी। अमृतसर की मशहूर ब्रजवासी चाट जो क्रिस्टल चौक के पास में है
। यहां पर हमने टिक्की, पापडी चाट और भल्ले खाए। चाट खाने में मजेदार थी।
इस तरह से हमारा अमृतसरी
खाने का सफर पूरा हुआ।
अमृतसर में खाने की दुकानों
की कमी नहीं है। जब भी जाएं अपनी पसंद के हिसाब से चुनें और अमृतसरी खाने का मजा
उठाएं।

अमृतसर में हो तो हरमिंदर साहिब
के लंगर का प्रसाद जरुर चखें। दावे के साथ कह सकता हूँ कि इतना स्वादिष्ट खाना
आपने पहले शायद ही खाया होगा। 
इनको भी पढ़कर देखें
अमृतसर हेरिटेज वॉक- झरोखे से झांकता इतिहास

अमृतसर हेरिटेज वॉक- झरोखे से झांकता इतिहास

अमृतसर अनोखा शहर है। इसकी शुरुआत एक धार्मिक जगह के तौर पर
हुई। गुरु रामदास जी ने सन् 1574 में इसकी नींव रखी थी।  शहर बढने के साथ ही यहां राजस्थान जैसे
इलाकों से व्यापारियों को बसाया गया। जिससे यह उत्तर भारत से अफगानिस्तान तक के
इलाके की प्रमुख व्यापारिक मंडी में बदल गया। एक धार्मिक शहर से व्यापारिक शहर बनने तक के दौर में अमृतसर ने बहुत उतार चढ़ाव देखे। अमृतसर के विकास की यह कहानी यहां कि
गलियों, बाजारों, हवेलियों और किलो में साफ दिखाई देती है।
इस कहानी को देखने का सबसे  बेहतर जरिया है अमृतसर हेरिटेज वॉक। कुछ साल पहले पंजाब पर्यटन विभाग ने इसको शुरु किया है।
सुबह सवेरे शुरु होने वाले इस वॉक के लिए हमारे गाइड थे
देवेन्द्र सिंह जी। आप इन्हें अमृतसर के इतिहास का चलता फिरता इनसाइक्लोपीडिया भी
कह सकते हैं।
देवेन्द्र जी हेरिटेज वॉक के बारे में बताते हुए
देवेन्द्र जी के साथ सभी लोग अमृतसर के टाउन हॉल पर जमा
हुए। टाउन हॉल से ही हैरिटेज वॉक की शुरुआत होती है। तो सबसे पहले बात टाउन हॉल की
। फिलहाल जो टाउन हॉल हमें दिखाई  देता है
इसको पंजाब की जीत के बाद अंग्रेजो में प्रशासनिक कार्यालय के तौर से काम करने के
लिए सन् 1866 में बनवाया था। 
टाउन हॉल
अंग्रेजी वास्तुकला की झलक इसके स्थापत्य में भी
दिखाई देती है। लेकिन इस का इतिहास और भी पुराना है। इसी जगह पर सबसे पहले महाराजा
रणजीत सिंह ने प्रशासनिक भवन बनवाया। महाराज रणजीत सिंह के समय बनी इमारत सिक्ख
वास्तुकला के अनुसार बनी थी। लेकिन सिक्ख विरासत को मिटा कर अपनी पहचान स्थापित
करने के लिए उस इमारत को  बाद में अंग्रेजो
ने गिराकर टाउन हॉल का निर्माण किया।  अभी
भी इसमें प्रशासनिक दफ्तर काम कर रहे हैं। लेकिन टाउन हॉल की  बेहद जर्जर हालत में  है। अब धीरे-धीरे यहां से सभी कार्यालयों को
हटाया जा रहा है। उसके बाद इमारत को फिर से सहेज कर इसे पर्यटकों के लिए खोला
जाएगा।
यहां अंग्रजों के समय के समय रहे प्रशासनिक कार्यालयों के
कुछ निशान अभी भी दिखाई देते हैं।
अंग्रेजों के समय की निशानी
टाउन हॉल से कुछ आगे बढते ही आता है गुरुद्वारा सारागढ़ी।
गुरुद्वारा सारागढ़ी
 गुरुद्वारे की खासियत
यह है कि अपने 21 बहादुर सिक्ख सैनिकों की याद में खुद अंग्रेजो में 1902 में इसे
बनवाया था। इन 21 सैनिकों ने वजीरस्तान के इलाके में सारागढ़ी के किले को बचाने के
लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी।
गुरुद्वारा सारागढ़ी
सारागढ़ी के बारे में जानने के लिए सारागढ़ी गुरुद्वारे पर
लिखा मेरा पोस्ट पढ़ें।

किला अहालूवालिया

सारागढ़ी गुरुद्वारा से कुछ आगे है किला आहलूवालिया। अमृतसर
की रक्षा के लिए इसके चारों तरफ बनाए गए किलों में एक है किला आहलूवालिया। बीते
वक्त में कभी शानदार रहा यह किला समय की मार के आगे बेदम हो चुका है।
किला अहालूवालिया की जर्जर हालत
किले के अंदर एक बड़ा चौक है जिसके चारो तरफ हवेलियां और
मकान बने हैं। इन हवेलियों में कभी सैनिक और किले की अधिकारी रहा करते थे। बाद में
अंग्रेजों के समय यहां बाहर से आए व्यापारियों को बसा दिया गया। वक्त से आगे यहां
की हवेलिया अपनी चमक खो रही है। अधिकतर मकानों को आधुनिक सीमेंट से लीप दिया गया
है लेकिन फिर भी पुराने दिनों के अवशेष नजर आ ही जाते हैं।

किला अहालूवालिया की हालत 
किला एक तरह से थोक बाजार और गोदाम में बदल गया है। हर तरफ
दुकानों के बोर्ड लगे नजर आते हैं। हमारे विरासत के साथ हम किस हद तक खिलवाड़ कर
सकते हैं इसका जीता जागता उदाहरण है किला आहलूवालिया।
सरकार अगर चाहे तो किले के पुराने वैभव को लौटा कर इसे
पर्यटकों की चहेती जगह के रुप में बदला जा सकता है। किले की बुरी हालत से रुबरु
होकर गंदी गलियों में होकर हम आगे बढे।
आगे की गलियों हवेलियों से भरी
पड़ी हैं। शहर बनना शुरु होने के बाद गुरुओं और बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने देश
के दूसरे इलाकों से व्यापारियों को यहां लाकर बसाया। जिसमें राजस्थान के मारवाड़ी
भी शामिल थे। उन्हीं व्यापारियों ने यहां शानदार हवेलियां बनवाई। इन हवेलियों की
खूबसूरती देखते ही बनती हैं। लकड़ी पर कुराई के काम के साथ बने झरोखे और खिडकियां,
शेखावटी शैली में बने भित्ती चित्र आपके अनायास उस पुराने दौर में ले जाते हैं जब
इन हवेलियों में व्यापारियों की चहल – पहल रहती होगी।
किला अहालूवालिया के दरवाजे पर लकड़ी का सुंदर काम

हवेलियों पर बने झरोखे
हवेलियों पर बने भित्ति चित्र- रेलगाड़ी दिखाई दे रही है
इन हवेलियों के स्थापत्य में कहीं-कहीं यूरोपीय प्रभाव भी साफ नजर आता है। घरों और दुकानों को सजाने के लिए यूरोप से लाई गई टाइल्स का बखूबी इस्तेमाल हुआ है। 
यूरोपियन टाइल्स का इस्तेमाल
 आज ज्यादातर हवेलियां बुरी हालात में हैं। बहुतों पर ताले
पड़े हैं। या फिर इनमें रहने वाले किसी तरह से इनका वजूद बचाए हुए हैं।
हवेलियों की हालत
 इसी तरह की
राजस्थान से आए सिंघानिया परिवार की हवेली में हमें जाने का मौका मिला। देवेन्द्र
जी हवेली में रहने वाले सिंघानिया परिवार को जानते थे।
हवेली  में पहली
मंजिल पर जाने के लिए बनी लकड़ी की सीढ़ियों से ही इसकी भव्यता का अंदाजा लग रहा
था। ऊपर जाकर हवेली के कमरों में बेल्जियम के स्टेन ग्लास से बनी खिड़कियां दिखाई
दी, जो आज भी सूरज की रोशनी में कमरे को सतरंगी रोशनी से भर देती हैं। 
स्टेन ग्लास की खिड़कियां
कमरों में
आज भी उस दौर का पुराना फर्नीचर रखा है। सिंघानिया परिवार अपनी आय से इसको बचाने
की कोशिश कर रहा है। लेकिन इसकी भव्यता को बनाए रखना आसान काम नहीं है। सरकार चाहे
तो इनकी हवेलियों को किस्तम पलट सकती है। अमृतसर की उजाड़ होती हवेलियों को पर्यटन
की शान बनाया जा सकता है।
खैर हवेलियों को देखते हुए हम पहुंचते हैं जलेबीवाला चौक।
चौक पर मौजूद जलेबी की प्रसिद्ध दुकान के कारण इसका यह नाम पडा। किसी जमाने में यह
चौक चाय की सबसे बड़ी मंडियों में से एक था। चौक में चारों तरफ दुकानों के ऊपर की
पहली मंजिल पर लोग खड़े होकर चाय का भाव लगाते है। चाय के भाव लगाने वालों के शोर से
यह चौक गुलजार रहता था।
जलेबीवाला चौक 
आपको की पढ़कर कुछ अज़ीब लगा होगा कि पंजाब का शहर अमृतसर
चाय की मंडी कैसे बना,  जिसका चाय से दूर-दूर तक
लेना देना नहीं है। दरअसल अमृतसर के विकास के दौर में देश के दूसरे इलाकों के
व्यापारियों के आने का सिलसिला अंग्रेजो के समय में भी चालू रहा। उस दौरान अमृतसर आज
के पाकिस्तान, अफगानिस्तान और कश्मीर जाने वाले माल की बड़ी मंडी हुआ करता था। इसी
समय यहां बसे व्यापारी आसाम से खुली चाय मंगावाकर उसे अफगानिस्तान और कश्मीर तक
भेजा करते थे। चाय का यह व्यापार इतना फैल चुका था कि आजादी से पहले तक अमृतसर चाय
की ग्रेडिंग करने का सबसे बड़ा केन्द्र हुआ करता था। यहां की हरी चाय ( ग्री टी)
की बहुत मांग थी। चाय के इस कारोबार की कुछ निशानियां आज भी बाजार में दिखाई दे
जाती है।
80 साल से है यह चाय की दुकान

इतिहास की इन्हीं पन्नो को पढते हुए हम आगे बढते रहे। लेकिन
रास्ते में दिखाई देती पुरानी दुकानों या हवेलियों को देखते ही कदम फिर से रुक
जाते थे।
गलियां
यहां से निकल कर अखाड़ा संगल वाला पर पहुंच कर हमें समय की
कमी के कारण अमृतसर हैरिटेज वॉक का अपनी सफर खत्म करना पड़ा। 
अखाड़ा संगल वाला
लेकिन अमृतसर हैरिटेज
वॉक में अभी और भी कई जगहें जिन्हें अगर आप जाएं तो जरुर देखें।
कैसे जाएं– अमृतसर हैरिटेज वॉक पंजाब पर्यटन विभाग आयोजित
करता है। हर सुबह और शाम को यह वॉक होती है। ज्यादा जानकारी के लिए पर्यटन विभाग
से संपर्क करें।
पर्यटन विभाग के कार्यालय रेलवे स्टेशन, हवाईअड्डे, और श्री
हरमिंदर साहब पर हैं।
पंजाब पर्यटन की वेबसाइटwww.punjabtourism.gov.in

हैरिटेज वॉक के लिए देविन्दर जी से भी संपर्क किया जा सकता
है उनकी वेबसाइट –  http://heritagewalk.webs.com
सारागढ़ी गुरुद्वारा – सिक्ख वीरता की अमिट निशानी

सारागढ़ी गुरुद्वारा – सिक्ख वीरता की अमिट निशानी

सारागढ़ी गुरुद्वारा , अंमृतसर
सारागढ़ी गुरुद्वारा अमृतसर के  टाउन हाल और स्वर्णमंदिर के पास ही बना है।
गुरुद्वारा इतना छोटा है कि शायद इस पर आपकी नजर ही नहीं पड़ेगी। लेकिन इस छोटे से
गुरुद्वारे से सिक्ख वीरता की अमिट कहानी जुड़ी है । यह कहानी है सारागढ़ी की लड़ाई
और उसमें सिक्ख सैनिकों की बहादुरी की।
खास बात यह है कि इस गुरुद्वारे को सन् 1902 में  खुद अंग्रेजों ने अपने 21 बहादुर सिक्ख सैनिकों
की याद में बनवाया था । इन सैनिकों ने सारागढ़ी पोस्ट को बचाने के लिए अपनी जान
कुर्बान कर दी थी।
क्या थी सारागढ़ी की लड़ाई
सारागढी की लड़ाई 12 सितम्बर 1897 को 36वीं सिक्ख रेजीमेंट
के 21 सिपाहियों और 10000 अफगान कबाइलियों के बीच लड़ी गई थी।
सारागढ़ी एक उस समय के भारत के नार्थ वेस्ट फ़्रंटियर  प्रांत ( वर्तमान में पाकिस्तान) में अग्रेजों
की एक सैनिक पोस्ट थी । अफगानिस्तान से लगने वाले इलाकों पर कब्जा बनाए रखने के
लिए अंग्रेज सेना यहां तैनात की गई थी। इस इलाके में कब्जे को लेकर अफगानों और
अंग्रेजों के बीच लगातार लड़ाईयां होती रहती थी।
इसकी दौरान 12 सितम्बर 1897 के दिन अफ़रीदी और औरकज़ई कबीले
के 10,000 से 12,000 अफगानों ने सारागढ़ी पोस्ट पर हमला किया । सारागढ़ी पोस्ट आसपास
के किलों के बीच सिगनल देने का काम करती थी । इसे पास के दो किलों लॉकहर्ट और
गुलिस्तान के बीच में एक पहाड़ी पर बनाया गया था । सारागढ़ी की सुरक्षा के लिए हवलदार
ईशर सिंह के साथ 20 सिपाहियों को दस्ता तैनात था। अफगानों का घेरा ऐसा था कि पास
के किलों से मदद  भी नहीं भेजी जा सकती थी।
कहा जाता है कि अफगानों के हमले के बाद इन सिपाहियों से पोस्ट
खाली करके पीछे हटने के लिए भी कहा गया था,  लेकिन इन सिपाहियों ने सिक्ख परम्परा को अपनाते
हुए मरते दम तक दुश्मन से  लड़ने का फैसला
किया।
ईशर सिंह और उनके सिपाहियों ने बहादुरी से हमले का सामना
किया। 21 सिपाही पूरे दिन हजारों की संख्या में आए अफगानो से लड़ते रहे। गोली
बारूद से खत्म होने पर उन्होनें हाथों और संगीनों से आमने सामने की लडाई लडी। आखिरकार
अफगानों ने सारागढ़ी पर कब्जा तो किया लेकिन इस लडाई में अफगानों को बहुत जान का
बहुत नुकसान उठाना पड़ा।
अगले दिन आए अंग्रेजों के दस्ते ने अफगानों को हरा कर फिर
से सारागढ़ी पर कब्जा कर लिया।
अंग्रेजों के फिर से कब्जे के बाद सिक्ख सैनिकों की बहादुरी
दुनिया के सामने आई। अंग्रेज सैनिकों को वहां 600 से 1400 के बीच अफगानों की लाशें
मिली। सारागढ़ी पर बचे आखिरी सिपाही गुरमुख सिंह ने सिगनल टावर के अंदर से लडते
हुए 20 अफगानों को मार गिराया। जब अफगान गुरमुख पर काबू नहीं पा सके तो उन्होंने
टावर में आग लगा दी और गुरमुख जिंदा ही जल कर शहीद हो गए।
सिक्ख सैनिकों को इस बहादुरी की चर्चा ब्रिटिश संसद में भी
हुई । यहां शहीद हुए सभी 21 बहादुर सिक्ख सैनिकों को उस समय भारतीय सैनिकों को दिए
जाने वाले सबसे बड़े वीरता पुरुस्कार इंडियन आर्डर ऑफ मैरिट से सम्मानित किया गया।
बाद में इसी लड़ाई के स्मारक के रुप में अंग्रजों ने  अमृतसर, फिरोजपुर और वजीरस्तान में तीन
गुरुद्वारे बनवाए।
इस लड़ाई की याद में आज भी 12 सितम्बर को सारागढी दिवस
मनाया जाता है।
यूनिस्को ने सारागढ़ी की लडाई की गिनती दुनिया में आजतक सबसे
वीरतापूर्ण तरीके से लड़ी गई 8 लड़ाईयों में की है।
जब भी अमृतसर आएं तो सिक्ख वीरता के इस स्मारक को देखना ना
भूलें।

  

अशोक का सारनाथ सिंह स्तंभ

अशोक का सारनाथ सिंह स्तंभ

अशोक स्तंभ
भारत के राजकीय चिन्ह सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ को देखने
की इच्छा ना जाने कब से मन में थी। मेरे वाराणसी जाने की एक वजह अशोक का सारनाथ स्तंभ
भी था। आखिरकार सारनाथ पहुंचने के साथ ही मेरी हसरत पूरी हुई।
अशोक के स्तंभों के मुख्यत दो हिस्से होते थे। ऊपरी हिस्से
में बने किसी पशु की आकृति और नीचे का सपाट स्तंभ।
सारनाथ के सिंह स्तंभ का ऊपरी हिस्सा या शीर्ष सारनाथ में
पुरात्तव विभाग के संग्राहलय में रखा हुआ है और उसका बाकी हिस्सा या स्तंभ संग्राहालय
के पास ही में सारनाथ स्तूप के पास रखा गया है। संग्राहलय के अंदर जाते ही पहली
नजर इसी सिंह स्तंभ पर पडी और नजर पडने के साथ ही जैसे इसी पर ठहर गयी। भारतीय कला
का अद्भुत नमुना आंखों के सामने था।
प्राचीन भारतीय विज्ञान और कला को बेजोड़ उदाहरण है यह सारनाथ
का सिंह शीर्ष ( lion- capitol) । इस की खासियत इस पर की गई चमकदार पालिश है जो करीब
2250 वर्षों के बाद भी जस की तस है। आज भी इस पर प्रकाश डालेंगें तो निकलने वाली
चमक से आखें चुंधिया जायेंगी। सारनाथ के करीब 70 किलोमीटर दूर चुनार की खदानों में
मिलने वाले बलुआ पत्थर से इसे बनाया गया है। इस पत्थर में काली चित्तियां हैं जो
साफ दिखाई देती हैं।  लेकिन इस पर यह चमक
कैसे लाई गई होगी इसका जवाब आज तक कोई नहीं ढूंढ पाया है। कुछ इतिहासकार इसे कला
को ईरान से आया मानते हैं और कुछ का मानना है कि पत्थर को चमकाने की कला भारत में
पहले से ही मौजूद थी। 

इतिहासकारों का मानना है कि मौर्य काल में चुनार पत्थर की कला का केन्द्र रहा होगा जिसे मौर्य दरबार के संरक्षण मिलता था। चुनार में ही अशोक के समय के लगभग ज्यादातर स्तभों को बनावाया गया था। चुनार के गंगा नदी के किनारे होने के कारण इन्हे यहां से ले जाना आसान था। स्तंभों की लंबाई 40 से 50 फुट तक है। अब तक अशोक के समय के 20 के करीब स्तंभ मिले हैं। सम्राट अशोक के बनवाये गये स्तंभों की खासियत यह है कि इन्हें एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है। इसलिए इन्हें एकाश्म ( Monolithic) स्तंभ कहा जाता है। ये स्तंभ से ऊपर से नीचे की ओर मोटे होते चले गये हैं। सारनाथ का स्तंभ अब कई हिस्सों में टूट चुका है। सारनाथ स्तंभ पर अशोक का ब्राह्मी लिपी में लिखा शासनादेश भी खुदा हुआ है। 

ब्राह्मी लिपी में खुदा शासनादेश

                                                         

                       









सिंह-शीर्ष ( lion- capitol)
सम्राट अशोक के बनवाये गये स्तंभों में सारनाथ के सिंह
शीर्ष वाले स्तंभ को सबसे बेहतर माना जाता है। इसमें सबसे ऊपर चारों दिशाओ में चार
सिंह बने हैं। लेकिन अपनी बनावट में यह सिंहों की आकृति बेहद सौम्य नजर आती है। शेरों
की मासंपेशियों, उनके बालों और शारीरिक बारिकियों के बेहद कुशलता के साथ पत्थर पर
उकेरा गया है। इन्हें सम्राट अशोक की शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है। इन सिंहों
के नीचे एक पट्टी पर चारों दिशाओं में चार चक्र बने हुए हैं जिनमें 32 तीलियां
हैं। इन चक्रों को धर्मचक्रप्रवर्तन का प्रतीक माना जाता है। भारत के झंडें के बीच
में अशोक चक्र का चिन्ह यहीं से लिया गया है। इसी पट्टी पर चार पशु, हाथी, घोड़ा, बैल
और सिंह बने हुए हैं। जो देखने में बेहद वास्तविक लगते हैं। इन चारों पशुओं को
क्या सोचकर बनाया गया इसके लेकर इतिहासकारों में बहुत से मत हैं। कुछ इसे भगवान
बुद्द से जोडतें हैं तो कुछ इसे प्राचीन हिन्दु धर्म से जुड़ा बताते हैं। कारण कुछ
भी रहा हो लेकिन इनकी कला लाजवाब है।
कैसे पहुंचें
 सारनाथ वाराणसी से
13 किलोमीटर दूर है। वाराणसी से यहां तक आने के लिए बस और टैक्सी आसानी से मिल
जाती हैं। वारणसी पूरे देश के बडें शहरों से रेल या हवाई मार्ग से जुड़ा है।
नोट- सिहं शीर्ष संग्राहलय में रखा है और उसकी तस्वीर
लेने  की इजाज़त नहीं हैं।

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच- 7

छोटा कैलाश- ट्रैंकिग का रोमांच- 7

चढाई का छटा दिन

पांचवे
दिन हम लोग ऊँ पर्वत को देखकर वापस गुंजी के लिए चल दिये ।  शाम होते होते
हम गुंजी पहुंच गये। रास्ते में कई जगह पर भुस्खलन के चलते रास्ते को बदल
कर सीधी खडी चढाई भरे रास्तों से चढना उतरना पडा। खैर गुंजी पहुंच कर आराम
आया। गुंजी इस इलाके का एक बडा कैंप है। कुमाऊं विकास निगम के इस कैंप में
सुविधायें दूसरे कैंपों से बेहतर हैं। हां एक बात बताना जरुरी है कि यहां
लगे सैटेलाईट फोन ने अभी भी काम करना शुरु नहीं किया था। दो दिन से घर बात
नहीं हुई थी। आगे कितने दिन तक नहीं होगी ये भी पता नहीं था क्योंकि अगर
गुंजी में फोन काम नहीं कर रहा था तो छोटा कैलाश की चढाई के रास्ते में फोन
मिलने की तो बिल्कुल उम्मीद नही थी। लेकिन अब कुछ कर भी नही सकते थे।

योजना
के हिसाब से तो हमें छटे दिन गुंजी में आराम करना था । लेकिन हमारे दल के
सभी लोग अब ट्रेकिंग के मुख्य पडाव छोटे-कैलाश पुहंचने के लिए उतावले थे।
इसलिए सबने आराम ना करके आगे बढने का फैसला किया। तय किया गया कि अगले पडाव
कुट्टी तक पहुंचा जाये, फिर वहां जा कर ही सोचा जायेगा कि एक दिन आराम
करना है या नहीं। मेरा मन यही था कि गुंजी की जगह कुट्टी में ही आराम किया
जाये। गुंजी मे तो पहले ही हम दो रात रुक चुके थे और कुट्टी में रुकना अपने
आप में अलग अनुभव होता । कुट्टी बहुत पुराने समय से तिब्बत से होने वाले
व्यापार का केन्द्र रहा था । एक ऐतिहासिक गांव था कुट्टी। छटे दिन हम सब
लोग सुबह छह बजते बजते कुट्टी के लिए निकल गये। पहाड पर ट्रेकिंग कर रहे हो
तो सुबह जितना जल्दी ट्रेक शुरु कर दिया जाये बेहतर होता है क्योंकि सुबह
की ठंडक में चढाई करना आसान होता है। दिन चढने पर धूप तेज हो जाती है जिससे
आपकी रफ्तार कम पड जाती है। DSCN1004नाबि गांव
गुजीं से कुट्टी 19 किलोमीटर दूर है।    गुंजी से निकलते ही सबसे पहले हमने नाबि गांव को पार किया। छोटा सा
खूबसूरत पहाडी गांव। कुछ देर इस गांव मे रुककर पुराने घरों के कुछ फोटो
लिए, उसके बाद हम आगे बढे। रास्ता बेहद खूबसूरत था लेकिन कहीं कहीं खतरनाक
भी।
रास्ते की खूबसूरती
Copy of DSCN1010

 

रास्ते
के एक तरफ नदी बह रही थी और दुसरी तरफ उंचे पहाड। दोपहर में रास्ते के एक
छोटे से ढाबे पर खाना खाया। ढाबा के नाम से ये मत सोचिये कि दिल्ली –
चंडीगढ के रास्ते जैसा कोई ढाबा होगा। यहां ढाबे का मतलब है एक छोटी सी
खाने की जगह जहां  आते जाते गांव वाले खाना खा सके। खाना भी गिनती के लोगों
के लिए ही बनाया जाता है। गुंजी से कुट्टी के बीच बस एक यही खाने की जगह
थी। इन ढाबे वालों को अनूमन पता होता है कि कितने लोग आज आ सकते हैं उस
हिसाब से ही खाना बनता है। खैर हमारे लिए पहले ही कुमाऊं मंडल की तरफ से
बताया जा चुका था इसलिए हमारे लिए पूरा इंतजाम था।
रास्ते का ढाबा

 

खाना
खा कर कुछ आराम करके हम आगे बढे। जैसे जैसे उंचाई बढ रही थी रास्ते के पेड
पौधे बदलते जा रहे था।  सामने के पहाडों पर अब पेडो के नाम पर बस भोजपत्र
के ही पेड नजर आ रहे थे। रास्ते में भी बस भोजपत्र के ही जंगल थे। इतनी
उंचाई पर यहां भोजपत्र के अलावा बस कुछ घास ही उगती है। ये भोजपत्र वही है
जिस पर पुराने जमाने में लिखा जाता था। कागज की जगह इस्तेमाल होना वाला
भोजपत्र हजारों साल पहले इन्ही पहाडों से नीचे ले जाया जाता होगा जहां ऋषि
मुनी उन पर ग्रंथो की रचना करते होगें।

अब धीरे धीरे शाम होने लगी
थी और हम कुट्टी की तरफ बढ रहे थे तभी कुट्टी से कुछ किलोमीटर पहले हम एक
ऐसी जगह पहुंच जहां चारों तरफ छोटे छोटे रंग बिरंगे फूल खिले थे। हम अचानक
ही एक फूलों की घाटी में थे।
फूलों की घाटी
  

उस
जगह की खूबसूरती को शब्दो में नही बताया जा सकता। लेख के साथ लगे फोटो को
देखकर आपको शायद कुछ अंदाजा मिले। फूलों की घाटी में कुछ देर बैठकर उसकी
खूबसूरती को कैमरे के साथ ही आंखो में कैद कर मैं आगे बढा। शाम होने से
पहले ही हम कु्ट्टी पहुंच गये । कुट्टी पहुंच कर क्या किया इसकी जानकारी
अगले लेख में …

 

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-६

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-६

चार जून- चढाई का चौथा दिन
चार जून- चढाई का चौथा दिन
चार तारीख को हमें नबीढांग जाना था। नबीढांग वो जगह थी जहां से हमें हमारी यात्रा के पहले दर्शन होने थे। नबीढांग में हमें ऊँ पर्वत के दर्शन करने थे। गुंजी से नबीढांग करीब अठारह किलोमीटर का सफर है। गुंजी से नौ किलोमीटर दूर कालापानी तक का सफर आसान है और काली नदी के किनारे लगभग सपाट रास्ते पर ही चलता है। इसलिए इस रास्ते पर ज्यादा थकान महसूस नहीं होती। ये रास्ता जल्दी ही पूरा हो जाता है। इसलिए यात्रा मे पहली बार हम सुबह को आराम से उठे।

गुजी मे सुबह का नजारा बेहद जबरदस्त था। कैम्प के सामने ही बर्फीले पहाडो का नजारा देखने के लायक था। हमने खूब सारे फोटो लिए। फिर नाश्ता करके सब साढे आठ बजे नबीढांग के लिए चल पडे। एक तो आसान रास्ता और दूसरा इतने दिन तक चलने की आदत के कारण हम तेजी से चल रहे थे। रास्ता बेहद खूबसूरत था। चारो और घना जंगल था जिसमे हम तेजी से चले जा रहे थे। साथ बहती काली नदी भी माहौल के शानदार बनाये रखती है। अब काली नदी अपना भयावह रुप छोड कर शान्त हो चुकी थी। हालांकि बहाव अब भी तेज था लेकिन ये उतना खतरनाक नही था जितना गुजी से पहले के रास्ते पर था। हम कालापानी के लिए बढ रहे थे। गुजी से कालापानी का नौ किलोमीटर की दूरी तय करने में हमें बस तीन घंटे ही लगे।


कालापानी दरअसल काली नदी का उद्गम स्थान है। काली नदी के निकलने की जगह पर काली मां का मंदिर बना हुआ है। यहां भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस का बडा कैम्प है। ये लोग ही मंदिर की देखभाल भी करते हैं। यहां हमने मंदिर के दर्शन किये।

मां काली की मूर्ति के नीचे से ही नदी का उद्गम माना जाता है। यहा से निकलने वाले पानी को यात्री घर भी ले जाते है। ये पानी इतना मीठा है कि लगता है जैसे किसी ने चीनी मिला दी है। मंदिर से आगे ही कुमांऊँ पर्यटन का कैम्प है जहा पर हमारे दोपहर के खाने का इंतजाम था।

कालापानी मे ही हमे नाग नागिन पर्वत दिखाई देते है। इस पर्वत की ऊँचाई ऊँ पर्वत के बराबर ही है। ऐसा माना जाता है कि अगर आप को ये पर्वत साफ दिखाई दे रहा है तो आगे ऊँ पर्वत के दर्शन भी आसानी से हो जायेगें।

ऊँ पर्वत के दर्शन आसानी से नही होते और ज्यादातर समय ये बादलो से घिरा रहता है। आज हमे नाग नागिन पर्वत साफ दिखाई दे रहा था इसलिए कैम्प के लोगो ने बताया कि आप को ऊँ पर्वत के दर्शन भी हो जायेंगे
खैर थो़डे आराम और खाना खाने के बाद हम चल दिये नबीढांग के लिए जो कालापानी से नौ किलोमीटर दूर है। यहा से रास्ता कठिन है क्योकि नबीढांग काफी ऊचाई पर हो है हमे भी अब ऊचाई के लिए बढना था। ये रास्ता घास के खूबसूरत मैदानो से होकर जाता है। यहां पर ऊँचाई के कारण पेड पौधे साथ छोड देते है। सिर्फ घास और छोटी झाडियां ही दिखाई देती है। पहाड भी बिल्कुल नंगे हो जाते है। हल्की धूप होने के बावजूद अब हवा मे ठंडक होने लगी थी। इस इलाके मे हमेशा ही ठंडी और तेज हवाये चलती रहती है जिनसे बचना जरुरी है नही तो बीमार होने का खतरा बना रहता है।

नबीढांग से दो किलोमीटर पहले ही वो जगह आती है जहां से ऊँ पर्वत के पहले दर्शन होते है। नीचे कैम्प के लोगों की बात सही थी ऊँ पर्वत बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था। मै तो इसे देखता ही रह गया। ऊँ पर्वत को एक बार देखा तो आखे हटाने का मन ही नही कर रहा था। जिस के दर्शन के लिए हम इतने दिन से चल रहे थे वो विशाल पर्वत अपने पूरे रुप मे मेरे सामने था। विग्यान भले ही कुछ भी कहे कि ये पर्वत एक भौगोलिक रचना है। लेकिन मुझे तो आध्यात्मिक अनुभव हो रहा था। ऐसा लगता था कि जैसे सचमुच ही भगवान मेरे सामने खडे है।

कुछ देर बाद मै हमारे कुमाऊँ पर्यटन के कैम्प के लिए चल दिया। शाम के चार बजे हम लोग नबीढांग पहुचे। कैम्प के लोगो मे भोल शंकर के जयघोष के साथ हमारा स्वागत किया। नबीढांग का ये कैम्प तेरह हजार फीट से भी ज्यादा की ऊँचाई पर बना है। इसलिए पहली बार हमे यहा फाईबर ग्लास के बने हट मे रहना था। इतनी ऊँचाई पर भी ये हट काफी गर्म बने रहते है।

जाते ही हमने चाय पी थोडी धूप बची थी इसलिए सबने ऊँ पर्वत के साथ फोटो लिए। यहा कैंम्प के लोगो ने बताया कि आप लोग वाकई भाग्यशाली है जो आप को इतने आराम से दर्शन हो रहे हैं। उन्होने बताया कि कई बार तो ऐसा भी हुआ है लोगो ने दो तीन दिन तक भी दर्शन का इंतजार किया फिर भी उन्हे मायूस ही लौटना पडा।
थोडी ही देर मे धूप चली गई और कुछ ही मिनट मे इतनी ठंड हो गयी कि बाहर बैठना भी मुश्किल होने लगा। हम सभी लोग अपने हट मे आराम करने चले गये । रात के समय वहा का तापमान शून्य सो दो तीन डिग्री नीचे चल रहा था।
इतनी ऊँचाई पर कुछ लोगों को परेशानी होने लगी तो पास के तिब्बत सीमा पुलिस के डाक्टर ने आकर सभी की मे़डिकल जांच की। इतनी ऊचाई पर खून का दबाव काफी बढ जाता है। इसलिए जांच जरुरी होती है। रात को सभी जल्दी ही सो गये।

सुबह उठे तो मौसम खुला था। हमे ऊँ पर्वत फिर से साफ दिखाई दे रहा था। नबीढांग कैलाश मानसरोवर की यात्रा मे भारत की तरफ आखिरी पडाव है। यहा से यात्री आठ किलोमीटर दूर लिपूलेख दर्रे तक जाते है। लिपूलेख के बाद ही सब चीन की सीमा शुरु हो जाती है। हमारे कैम्प से लिपूलेख का रास्ता साफ दिखाई दे रहा था। सुबह कुछ फोटो और लेने और नाश्ता करने के बाद हम वापस चल दिये गुजी के लिए।

हमारे यात्रा कार्यक्रम के हिसाब से हमे आज कालापानी रुकना था लेकिन कैलाश मानसरोवर के पहले यात्रा दल आने का कारण कुछ बदलाव किया गया। हमे अब सीधे ही गुजी जाना था। सुबह आठ बजे यात्रा शुरु करके रास्ते मे कालापानी रुकते हुए हम शाम चार बजे तक गुंजी पहुच गये। अगले दिन आदि कैलाश के लिए सफर शुरु करना था।

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-५

छोटा कैलाश- ट्रैकिंग का रोमांच-५

तीन जून- चढाई का तीसरा दिन- बुद्धि से गुंजी

तीसरे दिन हमे बुद्धि से गुंजी तक का सत्रह किलोमीटर का सफर करना था। ये रास्ता पिछले दिनो के मुकाबले आसान था। रोज की तरह से ही हमारा दिन सुबह चार बजे ही शुरु हो गया सुबह की चाय के साथ। उसके बाद जल्दी से तैयार होकर साढे पांच बजे तक हम चल पडे अपने सफर पर। बुद्धि से पांच किलोमीटर आगे छियालेख घाटी पडती थी। जहां तक जाने का पहले दो किलोमीटर का रास्ता तो आसान और ह्लकी चढाई वाला था। लेकिन उसके बाद के तीन किलोमीटर का बेहद कठिन और लगभग सीधी चढाई वाला रास्ता था। इस तीन किलोमीटर तक हमें सीधे उपर ही चढते जाना था।
चढाई इतनी मुश्किल भरी थी कि हर कदम के साथ दम फूलने लगता था। एक तो हम पहले ही काफी ऊंचाई पर आ चुके थे एसे मै इतनी कठिन चढाई करना आसान काम नही था। थोडी थोडी दूर पर रुक कर आराम करते हुए धीरे धीरे आगे बढ रहे थे।
रास्ते का अंदाजा आप इस बाद से लगा सकते है कि कुछ जगहो पर तो घोडे से भी लोगो को उतरना पड रहा था। खैर सुबह आठ बजे चढाई पूरी कर हम लोग छियालेख पहुंच गये। छियालेख मे घुसने से पहले बडा ही संकरा रास्ता था, लग रहा था जैसे किसी घर का दरवाजा हो। हमे तो अभी तक पता नही था कि इस रास्ते के पार क्या छिपा है। जैसे ही हम छियालेख पहुंचे मेरा तो दिमाग ही चकरा गया। ऐसा लगा कि जैसे दूसरी ही दुनिया मे पहुंच गये हैं।


स्वर्ग मे पहुंचने का अभास दे रही थी छियालेख घाटी। घाटी मे हरे घास की मखमली चादर बिछी हुई थी। चारो तरफ तरह तरह के रंग बिरंगे फूल खिले हुए थे। खुशबू ऐसी की जो जाये मदहोश हो जाए। पता चला की इसको फूलो की घाटी भी कहा जाता है। हमारे साथ चल रहे घोडे वालो ने बताया कि अभी तो बहुत कम फूल दिखाई दे रहे है अगस्त के महीने मे अगर आये तो यहा हर तरफ बस रंग बिरगे फूल हि दिखाई देते हैं। मै तो यहा आकर जैसे खो ही गया। मेरा मन तो यहा से आगे जाने का भी नही कर रहा था। यही पर हमारे नाश्ते का इंतजाम भी था। नाश्ता करने के बाद मै तो निकल गया घाटी की सैर पर। घाटी के और अंदर जाने पर तो जो नजारे मुझे दिखाई दिये उनके बारे मे तो मै बयान ही नही कर सकता। आप लोग फोटो देखकर खुद ही अंदाजा लगा सकते है।


घाटी के चारो और फैले बर्फ के पहाड इसको अलग ही रुप दे रहे थे। यहा हमने दो घंटे से भी ज्यादा का समय बिताया। ये समय कैसे बीत गया पता ही नही चला। लेकिन आज ही हमे गुंजी पहुंचना था इसलिए आगे तो जाना ही था……..
छियालेख के बाद रास्ता सीधी और उतराई वाला ही था। इसलिए चलने मे दिक्कत नही हो रही थी। पूरा ही रास्ता घास के मैदानो से भरा पडा था जगह जगह से निकल रहे झरने इसे और भी खूबसूरत बना रहे थे।

छियालेख से चार किलोमीटर चलने के बाद हम छोटे से गांव गर्बयांग मे पहुचे। इस गांव मे बने लकडी के मकान और खास तौर पर इनके नक्काशी दार दरवाजे देखने के लायक थे। इस गांव को धसकने वाले गांव के तौर पर भी जाना जाता है। ये पूरा गांव ही पहाड के जिस हिस्से पर है वो धीरे धीरे खिसक रहा है। इसके कारण यहा के गांव वालों को उत्तराखंड के तराई ईलाके में जमीने दी गई है।

गर्बयांक से निकलते ही भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस की जांच चौकी बनी है जहां पर हमारे कागजात का जांच की गई। धारचुला से चले आज तीसरा दिन था और तीन दिन से घर पर मेरी कोई बात नही हुई थी। मोबाईल फोन तो कभी के बंद हो चुके थे। अभी तक किसी भी कैंप मे सैटेलाईट फोन भी हमे नही मिला था। क्याकि छोटा कैलाश का हमारा पहला ही दल था और कैलाश यात्रा का दल आने मे कुछ दिन बाकी थे इसलिए गाला औऱ बुद्धि दोनो कैंपो मे अभी तक फोन नही लगे थे ।

हमे बताया गया कि शायद गुजी मे फोन लगा चुका होगा इसलिए वहा से बात हो पायेगी। लेकिन कोई भरोसा नही था कि गुजी मे फोन मिलेगा। मुझे चौकी से पता लगा की गर्बयांग के तिब्बत सीमा पुलिस के कैप मे सैटेलाईट फोन है। ये कैंप रास्ते से सीधी खडी चढाई के बाद था। मैने किसी तरह से ये चढाई पूरी करके कैप मे पहुचा। जहा से मैने तीन दिन के बाद घर पर बात की। भारत तिब्बत पुलिस के लोग यात्रियो की जहा तक हो सके सहायता करने की कोशिक करते है। मेरे एक बार कहते ही कैप के अधिकारी ने बात करने की इजाजत दे दी। इतने दिन बात करके अच्छा तो लगा ही साथ ही मैने घर पर बता दिया कि अब आगे कब बात होगी पता नही इसलिए किसी भी तरह की चिंता ना करें।

गर्बयांग से पांच किलोमीटर दूर सीधी गांव मे दोपहर का खाना खाकर हम गुजी के लिए चल पडे। शाम को करीब चार बजे हम आखिरकार गुजी पहुच गये। गुजी तक के रास्ते काली नदी लगातार साथ बनी रहती है। गुजी मे कुमाऊं पर्यटन का थोडी बडा कैप है क्योकि ऊपर के कैपो के लिए खाने पीने का सामान यही से आगे भेजा जाता है।

गुंजी समुद्र सतह से बत्तीस सौ मीटर से भी ज्यादा की ऊंचाई पर बसा है। इस कारण यहा ठंड बहुत ज्यादा थी। साथ ही गुजी की स्थिति कुछ इस तरह की है कि यहा बहुत ही तेज हवाये चलती है। कभी कभी तो इतनी तेज की बात करना भी मुश्किल हो जाता है। अगले दिन हमे चीन सीमा पर ऊं पर्वत के लिए सफर करना था।……… एक बात और गुजी मे भी अभी तक सैटेलाईट फोन नहीं लगा था।