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Category: Himachal Pradesh

गुनेहड़ की वो शाम

गुनेहड़ की वो शाम

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गुनेहड़ में शाम होने वाली है। आसमान में बादल छाए हैं। हिमाचल के इस पहाड़ी गांव के लिए आज की शाम कुछ अलग होने वाली है। गांव के चौक में आज काफी हलचल है। चौक क्या , एक छोटा सा खुला चौकोर हिस्सा है जिसके चारों तरफ कुछ 5-7 दुकानें बनी हैं। यही गांव का बाज़ार भी है। चौक में एक तरफ मंच तैयार किया जा रहा है। मंच के पास ही एक घर के बाहरी अहाते में फैशन शो की तैयारियां चल रही हैं। गांव की लड़कियां रैंप पर चलने का अभ्यास कर रही हैं। लाइटें लग चुकी है, साउंट सिस्टम को दुरूस्त किया जा रहा है। पूरे दिन बरसात होने के बाद फिलहाल बारिश रुकी हुई है लेकिन आसमान बादलों से भरा पड़ा है। आधा जून बीत चुका है तो इस इलाके में मानसूनी बारिश कभी भी आ सकती है। लग रहा है कि बादल भी गुनहेड़ की माहौल का जायज़ा ले रहे हैं। चौक में लोगों का जुटना भी शुरू हो गया है। पूरे गांव की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपनी जगह पर बैठ गए हैं। सिर्फ गुनेहड ही नहीं आस पास के दूसरे इलाकों से भी लोग यहां आए हैं। कुछ पर्यटक भी अपनी सीट पर बैठे दिखाई दे रहे हैं।

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दरअसल यह सब गुनहेड़ में होने वाले फ्रेंक के मेले के आखिर दिन की तैयारियां हैं। गुनहेड में होनें वाले शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop) फेस्टिवल को गांव वाले फ्रेंक वाला मेला ही कहते हैं। क्योंकि इसे करवाने वाले हैं जर्मनी से गुनहेड़ आकर बसे फ्रेंक।

फ्रेंक और उनके मेले में जानने के लिए मेरा पुराना लेख पढें।

फ्रेंक मेले की आखिरी तैयारियों में व्यस्त दिखाई देते हैं। अंधेरा होते होते पूरा चौक लोगों से खचाखच भर जाता है। दुकानों के बाहर, छतों पर , जमीन पर , जिसको जहां जगह मिली वहीं जम गया है।

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मेले की शुरूआत होती है स्थानीय गद्दी और बड़ा भंगाली समुदाय के कपडों से जुडें फैशन शो से। इस फैशन शो को दिल्ली की फैशन डिजाइनर रेमा कुमार ने तैयार किया है। लेकिन खास बात यह है कि फैशन शो के रैंप पर चलने वाली सब लड़कियां इसी गांव की रहने वाली हैं। लड़कियां पारंपरिक गद्दी और बड़ा भंगाली कपड़ों से सजी हैं। मंच पर उनके आते ही तालियों से उनका स्वागत किया जाता है। लड़कियां गांव वालों के सामने फैशन शो कर रही हैं और गांव के लोग दिल से उनका स्वागत कर रहे हैं। साफ दिखाई देता है कि गुनेहड़ में यह मेला एक बदलाव ला रहा है। गांव के साथ जुडकर कला को आगे ले जाने की फ्रेकं की सोच की यहां साकार होती नजर आती है।

इसी फैशन शो के बाद मलेशिया से आए फिल्म निर्देशक के.एम.लो की फिल्म दिखाई गई। के.एम. दुनिया भर में टुकटुक सिनेमा के नाम से स्थानीय लोगों के साथ मिलकर फिल्म बनाने का प्रयोग करते हैं। इस बार के मेले में उन्होंने गांव के बच्चों को लेकर एलियन और पृथ्वी पर होने वाले उनके हमले को लेकर फिल्म तैयार है। गांव के हर बच्चे ने इसमें कुछ ना कुछ पात्र जरूर निभाया है। फिल्म से दिखाने से पहले के.एम. मंच पर आते हैं और उन्हें देखकर सबसे ज्यादा खुशी बच्चों को ही होती है।

इसके बाद दिखाई जाती है अमित वत्स की 3मिनट फिल्में। अमित ने पिछले एक महीने में गांव के रहने वालें तीन लोगों की जिंदगी पर 3 मिनट की तीन फिल्में तैयार की हैं। अमित अलग-अलग इलाकों में जाकर आम लोगों के विषयों से जुडी फिल्में छोटी फिल्में बनाते हैं।

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गांव के इस चौक की हर दुकान कांगड़ा की पारम्परिक चित्रकारी से सजी है। पूरा चौक अपने आप में एक कला दीर्घा नजर आता है। दीवारों पर सजे इन खूबसूरत चित्रों को गार्गी चंदोला ने स्थानीय कांगडा चित्रकारों की टीम के साथ मिल कर तैयार किया है।

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इसी चौक में गुनहेड़ पॉप नाम की एक दुकान भी खुली है जिसमें भड़कीले रंगों में चित्र सजे नजर आ रहे हैं। लंदन में स्टूडियो चलाने वाली केतना पटेल ने इसे तैयार किया है। इस बार फ्रेंक के साथ मेला आयोजित करने में केतना की भी भूमिका रही है। केतना के इस काम को गांव वालो ने इतना पसंद किया कि उन्होंने भी जी भर के पॉप आर्ट में अपना योगदान किया।

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इस बीच चौक में चल रहे रंगारंग कार्यक्रम में भी जोश बढ़ गया है। अब लोगों के बीच गुनेहड़ के स्थानीय गायकों की टोली अपनी गीत गा रही है और लोग उनका साथ देने के लिए नाचने लगे हैं। बीच- बीच में बारिश की भी फुहारें पड़ने लगती हैं। बारिश तेज होने लगती है लेकिन फिर भी सब लोग अपनी जगहों पर जमें हैं किसी तरह की अफरा-तफरी नहीं। बारिश के बीच ही इलाके के एक और प्रसिद्ध गायक मंच पर आते हैं भगवान शिव का एक भजन गाते हैं और आश्चर्यजनक रूप से बारिश थम जाती है। माहौल में और भी उत्साह आ जाता है। एक के बाद एक गानों का दौर जारी है।

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इसी चौक के कुछ दूरी पर दिल्ली के कलाकार पुनीत कौशिक का ग्लास आर्ट है जो रात की रोशनी में खूबसूरत दिखाई दे रहा है। यहां एक दुकान जयपुर से आई नीरजा और स्प्रिहा ने भी लगाई हैं। नीरजा रद्दी कागज के इस्तेमाल से कपड़ा बनती हैं। उसी कपड़े से बनी चीजों को उन्होंने अपनी दुकान में सजाया था। कागज के कपड़े से बनी दरियां, बैग और दूसरे सजावटी सामान । और आखिर में हैं टेरिकोटा आर्टिस्ट मुदिता की टेरिकोटा से बनी कलाकृतियां।

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अलग- अलग तरह के कलाकारों को एक जगह लाकर किसी गांव के बीचों बीच कला के प्रदर्शन का यह एक अनूठा प्रयोग है। शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop) का यह दूसरा आयोजन है इससे पहले 2013 में फ्रेंक ने इसे पहली बार आयोजित किया था। फ्रेंक का मकसद कला को आम लोगों के जीवन के साथ जोड़ने के साथ ही गांव के विकास में उसका इस्तेमाल करना था। धीरे-धीरे फ्रेंक अपने सपने को पूरा करने के करीब जा रहे हैं।

रात के गहराने के साथ ही कार्यक्रम को खत्म करने का समय हो जाता है। रात 10 बजे के बाद कार्यक्रम की इजाजत नहीं है। लेकिन नाच गाने के दौर के बीच कोई हटने के तैयार नहीं हैं। आखिरकार फ्रेंक किसी तरह गायकों को मंच से हटाकर कार्यक्रम को बंद करवाते हैं। मैं मंच के नीचे ही खड़ा था तो मुझसे मिलते हैं। मिलने पर फ्रेंक यह नहीं पूछते कि कार्यक्रम कैसा रहा ? शायद प्रशंसा लेना उनके स्वभाव में नहीं है। मुझे देखते ही फ्रेंक का पहला वाक्य होता है कि काश यह गांव ऐसा ही बना रहे , दूसरे कस्बों की तरह यहां भी हर घर में गाड़ियों का जमघट ना लगे। दरअसल गांव में मेला देखने के लिए इतने लोग आ गए थे कि गांव में पहली बार जाम जैसी स्थिति बन गई थी।
एक दिन बाद में फ्रेंक से विदा लेने के लिए मिलता हूं। मैंने पूछा, “तो अगला मेला कब होने जा रहा है?”
फ्रेंक का जवाब, “अभी तो मुझे कुछ दिनों तक खूब सोना है।”
फ्रेंक भले ही जवाब ना दें लेकिन पक्का है कि उनकी आंखों में अगले शॉपआर्ट आर्टशॉप (ShopArt ArtShop)के सपने ने आकार लेना शुरू कर दिया होगा।

गुनेहड़ – कला दीर्घा में बदलता गांव

गुनेहड़ – कला दीर्घा में बदलता गांव

गुनेहड़ की एक सुबह मुझे मेरे होटल की बालकनी से कुछ
महिलाएं आती दिखाई दी। खूबसूरत रंग बिंरंगे कपड़ों में सजी, काफी कुछ राजस्थानी
पहनावे जैसा। वे महिलाएं नीचे की तरफ बने खेतों में चली गई। एक घंटे बाद जब वे फिर
से आती दिखाई दी तो मेरी साथी ब्लागर श्री और मंजुलिका ने उनके फोटो लेने की इजाजत
मांगी। वे आराम से तैयार हो गई, बोली, ले लो जी, जितने फाटो लेने हैं। अभिनव और
मैं भी अपना कैमरा लेकर पहुंचे। 

उन महिलाओं ने हमें अपने घर आने का न्यौता दिया और
साथ में प्यार से हमें उलाहना भी कि आप पहले बताते तो हम अच्छे तैयार होकर आते पूरे गद्दी पहनावे और श्रंगार के
साथ। आज कि दुनिया में इतना प्यार और अपनापन वो भी चार अनजान लोगों से कोई गांव
वाला ही दिखा सकता है।  

इस पर हममें से
किसी ने कहा कि हम फिर  आएंगे फ्रेंक वाले
मेले में
, उस समय आप के घर भी चलेंगे। ‘फ्रेंक वाला मेला’ सुनते ही उनकी आंखों में
चमक आ गई, बोली कि उस समय तो हम भी तैयार होकर आएंगें, आप जरुर आना।

‘फ्रेंक वाला मेला’ यह शब्द सुनकर जो चमक उन गद्दी महिलाओं के चहरे
पर दिखाई दी,यही वह जुड़ाव है जो इस मेले को शुरु करने वाले फ्रेंक चाहते भी थे। मेला
गांव वालों के साथ जुड़े, उनको साथ लेकर चले।

 फ्रेंक वाला मेला
दरअसल एक कला उत्सव ( आर्ट फेस्टिवल) है जिसे फ्रेंक हिमाचल की कांगड़ा घाटी के छोटे
से गांव गुनेहड़ में करवाते हैं। देश-विदेश के कलाकार उसमें जुड़ते हैं, अपनी कला
दिखाते हैं। फ्रेंक चाहते तो इस कला उत्सव को भी दूसरे शहरों में होने वाले आर्ट
फेस्टिवल की तरह बुद्धिजीवियों का अड्डा बना सकते थे । जहां देश दुनिया के लोग
जुटते तो जरुर हैं लेकिन आस-पास के परिवेश या लोगों से उनका जुडाव कम ही हो पाता
है।

यहीं पर आकर फ्रेंक का मेला सबसे अलग और ख़ास हो जाता है।
इस आर्ट फेस्टिवल में कलाकार आते तो दुनिया भर से हैं लेकिन वे स्थानीय लोगों के
साथ मिलकर अपनी कला को दिखाते हैं। फैशन डिजाइनर स्थानीय गद्दी पहनावे को मिलाकर
कपड़े तैयार कर रहा है, उसके बाद गद्दी महिलाओं का पारम्परिक कपड़ों में फैशन शो
होता है। 
फोटोग्राफर गांव के लोगों की जिंदगी को अपने कैमरे में उतार रहे हैं।
फिल्म बनाने वाले गांव के बच्चों को अभिनय करवा कर उनके साथ फिल्म बना रहे हैं। 
पूरा गुनेहड़ गांव जैसे एक बड़ी सी कला दीर्घा में बदल जाता है। कोई एक जगह नहीं
गांव का चौराहे, नुक्कड़, गली मोहल्ले हर जगह कला की कोई अभिव्यक्ति चलती रहती है।
ये दुकानें बनती हैं फेस्टिवल का हिस्सा

पिछले आर्ट फेस्टिवल की कलाकारी

कुछ रंग अभी भी ताज़ा हैं
कोई कलाकार लोगों के साथ मिलकर गांव की दुकानों और खाली
पड़ी दिवारों को अपनी कूंची से नए रंग दे रहा होता है। तो कोई दरवाजों को सजाने
में व्यस्त है। और इन सब में गांव के लोगों का हिस्सा लेना वाकई अनोखी बात है।

फ्रेंक बताते हैं कि 2013 में हुए पहले उत्सव में शुरु में
तो गांव के लोगों थोड़ा दूर-दूर रहे लेकिन कुछ ही दिन में सब ऐसे घुल मिल गए कि
लगता नहीं कि बाहर से आए कलाकार वहां काम कर रहें हैं।
इस उत्सव को फ्रेंक ने नाम दिया है शॉपआर्टआर्टशॉप 
( ShopartartShop) । नाम इसलिए पड़ा कि गांव
में खाली पड़ी दुकानों को एक महीने के लिए बाहर से आए कलाकारों को दे दिया जाता
है। इन दुकानों में कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। गांव से इनका जुड़ाव
इतना ज्यादा है कि पहले शॉपआर्टआर्टशॉप में तो गांव वालों में खुद ही अपनी दुकाने
फ्रेंक को दे दी वो भी बिना कोई पैसा लिए।
खाली दुकानों में आती है रौनक

2013 में हुए पहले उत्सव के समय आस-पास के गांवों के 5000
लोगों मेला देखने आए। अब तीन साल के बाद 14 मई से 14 जून तक यह दूसरा शॉपआर्टआर्टशॉप
कला उत्सव होने जा रहा है। फ्रेंक को उम्मीद है कि इस बार इससे भी ज्यादा लोग मेले
को देखने आएंगे।

इन्होंने पिछले मेले में फिल्म बनाई थी

कला के कुछ नमूने

आप भी चाहें को इस शॉपआर्टआर्टशॉप ( ShopartartShop)  कला उत्सव की मदद कर सकते
हैं।
मदद के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

हां, मेला देखने के लिए सबका स्वागत है। गुनेहड़ हिमाचल में
पैराग्लाइडिंग के लिए प्रसिद्ध जगह बिर-बिलिंग के बिल्कुल पास ही है, इसलिए यहां
रुकने और खाने पीने की जगहों की कमी नहीं है।   
कैसे पहुंचें-

रेल- बड़ी लाइन का सबसे नजदीकी स्टेशन पठानकोट है। गुनेहड़
से पठानकोट करीब 150 किलोमीटर दूर है। पठानकोट से टैक्सी और हिमाचल परिवहन की बस
उपलब्ध हैं। टैक्सी करीब 3,000 हजार रुपये में मिल जाएगी। 

बस- दिल्ली, चंड़ीगढ़ जैसे शहरों से यहां के लिए सीधी बस
सेवा है। वोल्वो से लेकर साधारण बस तक जैसा आप चाहें। बस आपको गुनेहड़ से कुछ पहले
बिर में उतारगी।
दिल्ली से बस का किराया बस की सुविधा के हिसाब से करीब 600 रुपये से लेकर 1200 रुपये तक है। 

हवाई जहाज- कागंडा में हवाई उड्डा है जहां दिल्ली से नियमित
उड़ान आती है। 
छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (२)

छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (२)

शाम को हम पहुँचे नामग्याल मठ लेकिन मठ के दरवाजे पर आकर ही मैं ठिटक गया। मठ के दरवाजे पर तिब्बत की आजादी के सघर्ष के फोटो लगाये गये थे। चीन के अत्याचार की कहानी उनसे साफ नजर आ रही थी।

उसको देखते हुए हम आगे बढे और मठ के अन्दर पहुँचे तो वहां भी विरोध के वही स्वर दिखाई दे रहे थे। चारो और चीन विरोधी नारे लिखे गये थे। कुछ तस्वारे तो इतनी ज्यादा भयानक थी कि देखा ही नहीं जा रहा था।


खैर हम चले मठ को देखने के लिए। मठ में देखने के लिए दो मुख्य मंदिर हैं जिनमे से एक कालचक्र मंदिर है और दूसरा भगवान बुद्ध का है। मंदिर अंदर से निहायत ही खूबसूरत हैं। मूर्तियों को सोने के रंग से रंगा गया था।

तिब्बत की पूरी कला वहां नजर आती है। दीवारों पर तिब्बत की मशहूर थंका चित्रकारी की गई थी जो देखने के लायक है। उन मूर्तियो की खूबसूरती से आंखें हटाने का मन ही नहीं करता है।


थोडी देर में हम मंदिर देख कर बाहर निकले मंदिर के चारो और तिब्बती चक्र लगे हैं। इनमें लाखों की संख्या में मंत्र लिख कर रखे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन चक्रों को एक बार घूमाने से ही लाखों मंत्रों का फल मिल जाता है।

मंदिर के सामने के बरामदे में लोग बौद्ध तरीको से प्रार्थना और ध्यान कर रहे थे। सिर्फ तिब्बती ही नही वहां बडी संख्या में विदेशी भी थे जो ध्यान और प्रार्थना कर रहे थे। बरामदे के सामने से धौलाधार की पहाडियो को बडा ही सुन्दर नजारा दिखाई दे रहा था। हल्की हल्की बरसात भी हो रही थी ऐसे में घाटी से उठते बादलो को देखना दिल लुभाने वाला अनुभव था।
हम बहुत देर तक वहां खडे होकर तस्वीरें उतारते रहे। उसके बाद हम मठ की निचली मंजिल पर पहुँचे। शाम को वहां का नजारा ही बदला हुआ था । वहां बडी संख्या में बौद्ध भिक्षु धर्म और दर्शन पर चर्चा कर रहे थे।


उनका चर्चा करने का तरीका बडा ही अलग था। वही तरीका देखने के लायक था। दो या तीन भिक्षु एक साथ बैठकर किसी विषय पर बात करते हैं जिसमें से एक खडी रहता है जो बोलने के साथ ही हाथो से इशारे भी करता रहता है। इसको पूरी तरह से समझाया नहीं जा सकता है इसे देखने के लिए खुद आपको ही धर्मशाला जाना होगा।


मठ में हम कुछ घंटे बिता चुके थे जब शाम घिरने लगी तो हम बाहर चल दिये ।मठ के बाहर एक बार फिर तिब्बती विरोध दिखाई दिया। शाम को बडीं संख्या में तिब्बती आजादी के समर्थन में पूजा यात्रा निकाल रहे थे। हाथों में मोमबत्ती लिये ये लोग अपना शांत विरोध जता रहे थे।


वहां से निकल कर हम मैक्लोडगंज के बस अड्डे पहुँचे जो यहां का मुख्य चौक भी है। इसी चौक से एक सडक मठ की तरफ जाती है जिसे टेम्पल रोड कहा जाता है। इसी से लगी हुई दुसरी सडक है जिसे जोगीवारा रोड कहा जाता है।


दोनो ही सडको पर तिब्बती सामान की दुकाने हैं। यहां से बौद्ध पूजा का सामान और तरह तरह के वाद्य यंत्र खरीदे जा सकते हैं। तिब्बत की मशहूर थंका चित्र भी यहां से खरीद सकते हैं।


मुझे यहां पर कीमती पत्थरों से बने आभूषण लगभग हर दुकान पर बिकते दिखाई दिये। जोगीवारा सडक पर घुसते ही एक दुकान है जहां तिब्बती कपडे बनाये जाते हैं जहा से आप तिब्बती कपडे अपने हिसाब से खरीद सकते हैं।


साथ ही जोगीवारा सडक पर खाने के रेस्टोरेंट भी बडी संख्या में हैं जहा तिब्बती के साथ ही इटालियन और फ्रेच खाना भी खाया जा सकता है।
मैनें अच्छे तिब्बती रेस्टोरेंट का पता किया। तो पता चला कि स्नो लायन तिब्बती खाने के लिए अच्छी जगह है। ये भी जोगीवारा सडक पर घुसते ही है। यहां मैने मोमो खाये जो बाकई बेहतरीन था। हर तरह का तिब्बती खाना यहां मिलता है। इसलिए अगर घूमने आये है तो यहां जरुर आईये।
यहां के मैन्यू अलग चीज मुझे दिखाई दी सेब की चाय जो वाकई एक अलग स्वाद था । खा पीकर बाहर निकले तब तक रात के आठ बज चुके थे। बाजार देखते हुए होटल पहुँचे कुछ आराम करके खाना खाया और सोने के लिए चले गये ।
अगले दिन सुबह से ही बरसात हो रही थी इसलिए बाहर नहीं निकले और होटल में ही आराम किया। बारह बजे तक हमने होटल से चैक आउट किया। तब तक बरसात भी ऱुक चुकी थी हमारी वापसी की बस भी रात के आठ बजे थी इसलिए हम एक बार फिर मठ की तरफ चल दिये ।
उस मठ में कुछ ऐसी बात है जो आप को अपनी और खींचती है। वापस जाकर हमने जी भर के फोटो खींचे । दो तीन घंटे बिताकर होटल वापस आये और खाना खाकर सामान लेकर वहां से चल पडे। रास्ते में फिर स्नोलायन पर रुके इस बार मैने बनाना केक और तिब्बती चाय का मजा लिया। तब तक शाम के चार बज चुके थे।

तो हमने बस अड्डे से निचले धर्मशाला के लिए बस पकड ली क्योकि हमारी बस निचले धर्मशाला से ही थी। चलते चलते मेरी नजर इस दुकान पर पडी जो पिछ्ले डेढ सौ साल से इसी जगह पर कमोबेश इसी हालत में हैं। ये सब चीजे हैं जो किसी जगह को आम घूमने के इलाको से अलग बनाती है। वहां से बस लेकर इस जगह को अलविदा कर हम चल दिये ।

कहां ठहरे-

हिमाचल पर्यटन का होटल भागसू रुकने के लिए अच्छी जगह है। जहां नौसौ से दो हजार तक के कमरे हैं। इसी के पास पर्यटन विभाग ने नया क्लब हाउस बनाया है जहां जो रुकने के लिए अच्छा है। क्लब में डोरमैट्री सुविधा भी है। इसके अलावा होटल बडी संख्या मैं हैं जहां हर बजट के हिसाब से कमरे मिल जाते हैं।
क्या खायें-
होटल भागसू का खाना काफी अच्छा है । इसकी खासियत है कि पहले से बताकर यहां हिमाचली खाना बनवाया जा सकता है। तिब्बती खाने के लिए होटल भागसू के सामने पेमाथांग और जोगीवारा रोड पर स्नोलाईन रेस्टोरेंट में जाया जा सकता है। इटालियन के लिए स्नोलायन के पास ही निक्स ईटालियन किचन है।
छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (१)

छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (१)

कश्मीर से घूम कर आये लगभग दो महीने होने वाले थे। मेरा मन फिर कही जाने के लिए मचलने लगा था । तभी अगस्त में दो तीन दिन की छुट्टी भी मिल गई। अब तो मैं आस पास जगह तलाश करनें लगा जहां घूमने जाया जा सके। काफी दिनो से मेरा मन हिमाचल जाने का कर रहा था तो मैने धर्मशाला जाना तय किया। एक दोस्त भी चलने को तैयार हो गया।

हिमाचल पर्यटन के दिल्ली आफिस में फोन कर सारी जानकारी ले ली। हम दोनो तेरह की शाम को धर्मशाला के लिए निकल पडे। लेकिन मेरे दोस्त सुभाष को अपने आफिस से निकलने में देर हो गई। शाम को सात के बाद ही हम निकल पाये।
मैं पहले पता कर चुका थी कि आठ बजे वोल्वो बस चलती है लेकिन देर से निकलने के कारण हम उस में नहीं जा पाये। बस अड्डे पर पता चला कि अब तो हिमाचल की साधारण बस सेवा में ही जाना होगा। लगभग तेरह घंटे की यात्रा थी लेकिन जाना तो था ही इसलिए बैठ गये ।

करीब नौ बजे हमारी बस चल पडी। दिल्ली से निकलते ही मौसम नें रंग बदलना शुरु कर दिया और तेज बरसात होने लगी। रात को करीब दो बजे हम लोग चंडीगढ पहुंच गये। चंडीगढ के बाद तो मुझे नींद आने लगी था जब आंख खुली तो पता चली कि हम हिमाचल में उना से आगे निकल चुके हैं। थोडी ही देर में पहाड भी शुरु हो गये। हांलाकि बरसात को रुक चुकी थी लेकिन पहाड अभी भी भीगे हुए थे।

बस से हरी भरी वादियों को देखना आखो को चैन दे रहा था। मन में खुशी हो रही थी कि एक बार फिर में दिल्ली की दौड भाग से दूर आ गया हूँ। रास्ते में नौ देवियों में से एक चिन्तपूर्णी देवी का मन्दिर भी पडा।
आखिर कार करीब सुबह के दस बजे हमारी बस धर्मशाला पहूँच ही गई। लेकिन हमारी मंजिल ये नहीं थी ब्लकि हमें तो बहां से दस किलोमीटर दूर मैक्लोडगंज जाना था । जहां दलाई लामा रहा करते हैं।

दरअसल धर्मशाला के दो हिस्से हैं एक है निचला धर्मशाला जो करीब तेरह सौ मीटर की उँचाई पर है और दूसरा है ऊपरी धर्मशाला जो करीब अठारह सौ मी़टर की ऊँचाई पर है। ऊपरी धर्मशाला में साठ के दशक में तिब्बत से निर्वासित तिब्बती लोग रहे है जो कि दलाई लामा के साथ भारत आ गये थे। ज्यादातर पर्यटक ऊपरी धर्मशाला में ही जाते हैं क्योकि वहां अलग तरह कि बौद्द संस्कृति देखन को मिलती है। इसी ऊपरी धर्मशाला को मैक्लोडगंज कहा जाता है।


तो हमे धर्मशाला के बस अड्डे से ही मैक्लोडगंज के लिए बस मिल गई। रास्ता बेहद ही खूबसूरत था पूरा इलाका ही देबदार और चीड के जंगलों से भरा पडा है। आधे ही घंटे में हम मैक्लोडगंज आ गये। हल्की हल्की बरसात भी होने लगी थी कुल मिलाकर पहाड पर मस्ती करन का पूरा माहौल था वहा पर।


सबसे पहले तो हमने होटल लेने की सोची। दिल्ली से ही हिमाचल पर्यटन के होटल भागसू के बारे में पता कर लिया था । इसलिए बस से उतरते ही होटल के लिए चल पडे को बस अ़ड्डे से पास ही था। होटल पहाड के एक किनारे पर देवदार के जंगल के बीच बना था इतनी शानदार जगह थी कि होटल के एरिया में घुसते ही मन खुश हो गया।


हमें एक कमरा भी वहां मिल ही गया एक ही खाली था। कमरा लेकर हम थोडी ही देर मे तैयार हो गये धर्मशाला को छानने के लिए। लेकिन तब तक इतनी तेज बरसात होने लगी कि बाहर निकलना मुश्किल हो गया । तो क्या करते बालकनी मे बैठकर ही निहारने लगा। खैर दो बजे तक बरसात हल्की होने लगी तो हम बाहर निकले।
होटल से पता किर लिया था कि आस पास क्या है देखने के लिए । बाहर आकर फिर से हम बस अड्डे पर आये ये यहा का मुख्य इलाका है जहां से घूमने के लिए टैक्सी या ओटो लिया जा सकता है। ये बहुत ही छोटी जगह है और पैदल भी घूमा जा सकता है। लेकिन बरसात के कारण हमने एक ओटो कर लिया । पहली बार किसी हिल स्टेशन पर मैं ओटो देख रहा था इसलिए ओटो ही कर लिया घूमने के लिए।

ओटो से घूमने के लिए तीन सौ और टैक्सी से करीब चार सौ रुपये लगते हैं। हम ओटो से निकल पडे मैक्लोडगंज की सैर पर , पहाड पर ओटो सो घूमने में अलग ही मजा आ रहा था। हरे भरे देवदार के जंगल के बीच से होते हुए हम सबसे पहले पहुँचे नडी गांव।ये गांव करीब दो किलोमीटर दुर है। अगर आप पैदल जाना चाहें तो जा सकते हैं।


उस गांव से उँचे पहाडों का सुन्दर नजारा देखने को मिलता है इसलिए पर्यटन विभाग गांव को विकसित कर रहा है। वाकई यहां से सामने के ऊंचे पहाडो का बढिया नजारा हमें देखन को मिला। हल्की बरसात में हम पास के जंगल की सैर पर निकल गये ।


थोडी देर तक नजारे लेकर हम चले अगली मंजिल डल लेक की तरफ ये एक छोटी सी झील है । झील छोटी जरुर है लेकिन चारो तरफ से देवदार के जंगल से घिरी है । झील के चारों तरफ घूमने के लिए रास्ता बनाया गया है। झील में आस पास के कई झरनो का पानी मिलता है। हल्की बरसात औऱ झील का किनारा माहौल को रोमांटिक बना रहा था।


झील को देखने के बाद हम चले सेंट जान चर्च को देखने के लिए। इस चर्च को अठारह सौ बावन में बनाया गया था। ये उत्तर भारत के सबसे पुराने चर्च में से एक हैं । छोटा सा चर्च बाकई देखने के लायक है । घने जंगल से घिरा है चर्च का पूरा इलाका।


चर्च बंद होने के कारण हम इसके अंदर नहीं जा सके लेकिन चर्च की खिडकियो में स्टेंड ग्लास की सुन्दर काम किया गया है। इसे देखन के लिए आप को रविवार को जाना होगा क्योकि रविवार को पूजा के लिए चर्च खुलता है।


चर्च में एक पुराना कब्रिस्तान भी है जिसकी खासियत ये है कि यहां भारत के वायसराय लार्ड एल्गिन को दफनाया गया है जिनकी अठारह सो तिरेसठ में घोडे से गिरकर मौत हो गई थी। ये चर्च धर्मशाला और मैक्लोडगंज के रास्ते के बीच में है।


अब हम चले भागसू नाग मन्दिर देखने के लिए जो कस्बे से एक किलोमीटर की दूरी पर है। भगवान शिव के इस मन्दिर की बहुत मान्यता है। मन्दिर के पास की झरना निकलता है जिसे पवित्र माना जाता है। मन्दिर से सामने की घाटी का सुन्दर नजारा देखने को मिलता है।


मन्दिर से करीब डेढ किलोमीटर की चढाई के बाद एक और झरना है। बरसात के मौसम में तेजी से गिरते पानी को देखना मन में रोमांच भर देता है। झरने के तेजी से गिरते पानी ने धुंध बना रखी थी। वहां पहुचते ही पानी में घुस कर फोटो खिंचवाये। झरने के पानी में भीगते भीगते ही फोटो खिचवाये और वापस चल पडे।


झरने को देखने के बाद हमारा अगला ठिकाना था नामग्याल मठ जिसे तिब्बत से आये लोगों ने बनाया है। इस मठ के साथ मैक्लोडगंज की जिंदगी का पूरा सफर अगली बार……….