गुजरात के डेडियापाडा में टीकाकरण की सफलता

गुजरात के डेडियापाडा में टीकाकरण की सफलता

घने जंगलों, नदियों और पहाडों से घिरा है गुजरात के नर्मदा जिले का डेडियापाडा तालुका। देखने में यह जगह किसी दूसरी प्रसिद्ध पहाड़ी जगह का मुकाबला करती नजर आती है। जहां तक नजर जाती हैं बस सागौन के जंगल नजर आते हैं। जंगलों के बीच छोटे-छोटे आदिवासी गांव बसे हैं। धान के खेत जंगल के बीच किसी हरी चादर से बिछे नजर आते हैं। यहां कुछ दिन बिताने हों तो जगह स्वर्ग से कम नहीं लगती। लेकिन कुछ दिन रूकें तो सच्चाई से वास्ता पड़ने लगता है। ऐसी ही एक सच्चाई है बच्चों में टीकाकरण की कमी। इस इलाके की दुर्गम स्थिति और आदिवासियों में जागरूकता की कमी के कारण यहां बच्चों के टीकाकरण की दर करीब 50 फीसदी ही थी। इस दर को बढाने की खासा जरुरत थी। इलाके में टीकाकरण को सफल बनाने के लिए यूनिसेफ, स्वास्थ्य विभाग और स्वंयसेवी सस्थाओ को मिलाकर टीकाकरण बढ़ाने के अभियान की शुरूआत वर्ष 2013 में की गई। अभियान का मकसद ज्यादा से ज्यादा बच्चों को टीकाकरण की जद में लाने का था। आज 2017 में अभियान के चार साल पूरा होने पर इलाके में टीकाकरण करीब 97 फीसदी पर पहुंच गया है। इस आंकडों को देखकर वाकई खुशी होती है। देश के दूरदराज के इलाकों तक टीकाकरण कार्यक्रम को सफलता से लागू करना बहुत बडी उपलब्धि है। लेकिन यहां तक पहुचने का सफर इतना आसान नहीं था।

डेडियापाडा तालुका के 65 गांवों में यह अभियान शुरू किया गया। इन गांवों की आबादी करीब 65 हजार है। यहां काम कर रही संस्थाओं को समझ आया कि बिना स्थानीय लोगों की भागीदारी के टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं है। इसके लिए सरकार के स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं और यूनिसेफ ने मिल कर एक रणनीति बनाई । इसके तहत आदिवासी लोगों पर प्रभाव रखने वाले लोगों की पहचान की गई। इसमें स्थानीय जंगल समिति, पंचायत सदस्य, गांव प्रधान, भगत भुवा और फलिया स्वयंसेवकों को जोडकर एक नेटवर्क बनाया गया। इस नेटवर्क ने मिल कर टीककरण के लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास किया।

साभार- INRECA

टीकाकरण के सिपहसालार

1- जंगल समिति– डेडियापाडा के अंधिकाश इलाके में घने जंगल हैं। गांव सड़कों से दूर घने जंगलो और पहाडों पर बसे हैं। वन अभ्यारण्य का हिस्सा होने के कारण वन विभाग यहां काफी सक्रिय रहता है। ऐसे में स्थानीय जंगल समीति के लोगों को इस अभियान का हिस्सा बनाने का काफी फायदा मिला। वे लोग लगातार गांव वालों के संपर्क में रहते हैं। जिससे अभियान के मकसद को अंदरूनी इलाकों तक पहुचाने में मदद मिली।

2- पंचायत सदस्य– पंचायत सदस्य गांवों के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं। ऐसे में इन लोगों का गांव के हर व्यक्ति के साथ सीधा संपर्क होता है। पंचायत सदस्य असरदार तरीके से टीकाकरण के महत्व को लोगों तक पहुंचा सके।

3- भगत भुवा– ये लोग स्थानीय पंडित की तरह होते हैं। आदिवासी गांवों में भगत भुवा की बहुत मान्यता है। ये गांव के असरदार लोगों में से होते हैं। भगत भुवा के कहने का आदिवासियों पर काफी सकारात्मक असर दिखाई दिया।

भगत भुवाओं से चर्चा , फोटो साभार- INRECA

4- फलिया स्वयंसेवक – आदिवासी गांवों में कई छोटे टोले होते हैं। उन टोलों को फलिया कहा जाता है। उसी के नाम पर फलिया स्वंयसेवक बनाए गए। फलिया स्वसंसेवक गांव के लिए युवक युवतियां होते हैं। इन्हें टीकाकरण के प्रचार प्रसार का प्रशिक्षण दिया गया। स्थानीय होने के कारण गांव वाले इनकी बात आसानी से समझ जाते हैं। उसी टोले से होने के कारण इनकी पहुंच टोले के हर घर तक होती है। इसके साथ ही घर की महिलाओं को समझाना और उन्हें बच्चों के साथ टीकाकरण के लिए टीकाकरण केन्द्र तक लाना भी आसान हो। गया।

5- स्वंयसेवी संस्था– यूनिसेफ ने टीकाकरण के काम को आगे बढ़ाने के लिए स्वंयसेवी संस्थाओं का सहारा लिया। इस तरह की संस्थाओं को चुना गया जो इलाके में बेहतर काम कर रही हों। उनके पिछले कार्यों को जांच कर उन्हें टीकाकरण के काम के साथ जोड़ा गया। डेडियापाडा में आईएनआरईसीए ( INRECA) संस्था को यह काम दिया गया। संस्था ने टीकाकरण के प्रसार में लगे लोगों को प्रशिक्षण दिया और उन्हें जागरुक किया। उन्हें प्रचार प्रसार के तरीकों के बारे में सिखाया गया।

फोटो साभार- INRECA

डेडियापाडा तालुका में अधिकांश आदिवासी आबादी है। यहां के 65 गांवों में से 40 ऐसे हैं जिनसे बरसात के महीनों में संपर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। पहाड़ों और जंगलों में बसे ये गांव बरसाती नदियों से घिर जाते हैं। ऐसे में सभी के मिले जुले प्रयासों से ही इस इलाके में टीकाकरण की सफलता सुनिश्चित हो पाई। टीकाकरण का ही नतीजा है कि डेडियापाड़ा तालुका में शिशु और मातृमृत्यु दर में खासी कमी आई है। डेडियापाड़ा में प्रति हजार पर शिशु मृत्यु दर 28 है जबकि नर्मदा जिले की 36 और गुजरात राज्य की 33 है। डेडियापाड़ा की सफलता से साफ है कि अगर मिलजुल कर प्रयास किए जाएं तो किसी भी अभियान को सफल बनाया जा सकता है।

2 thoughts on “गुजरात के डेडियापाडा में टीकाकरण की सफलता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *