अशोक का सारनाथ सिंह स्तंभ

अशोक का सारनाथ सिंह स्तंभ

अशोक स्तंभ
भारत के राजकीय चिन्ह सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ को देखने
की इच्छा ना जाने कब से मन में थी। मेरे वाराणसी जाने की एक वजह अशोक का सारनाथ स्तंभ
भी था। आखिरकार सारनाथ पहुंचने के साथ ही मेरी हसरत पूरी हुई।
अशोक के स्तंभों के मुख्यत दो हिस्से होते थे। ऊपरी हिस्से
में बने किसी पशु की आकृति और नीचे का सपाट स्तंभ।
सारनाथ के सिंह स्तंभ का ऊपरी हिस्सा या शीर्ष सारनाथ में
पुरात्तव विभाग के संग्राहलय में रखा हुआ है और उसका बाकी हिस्सा या स्तंभ संग्राहालय
के पास ही में सारनाथ स्तूप के पास रखा गया है। संग्राहलय के अंदर जाते ही पहली
नजर इसी सिंह स्तंभ पर पडी और नजर पडने के साथ ही जैसे इसी पर ठहर गयी। भारतीय कला
का अद्भुत नमुना आंखों के सामने था।
प्राचीन भारतीय विज्ञान और कला को बेजोड़ उदाहरण है यह सारनाथ
का सिंह शीर्ष ( lion- capitol) । इस की खासियत इस पर की गई चमकदार पालिश है जो करीब
2250 वर्षों के बाद भी जस की तस है। आज भी इस पर प्रकाश डालेंगें तो निकलने वाली
चमक से आखें चुंधिया जायेंगी। सारनाथ के करीब 70 किलोमीटर दूर चुनार की खदानों में
मिलने वाले बलुआ पत्थर से इसे बनाया गया है। इस पत्थर में काली चित्तियां हैं जो
साफ दिखाई देती हैं।  लेकिन इस पर यह चमक
कैसे लाई गई होगी इसका जवाब आज तक कोई नहीं ढूंढ पाया है। कुछ इतिहासकार इसे कला
को ईरान से आया मानते हैं और कुछ का मानना है कि पत्थर को चमकाने की कला भारत में
पहले से ही मौजूद थी। 

इतिहासकारों का मानना है कि मौर्य काल में चुनार पत्थर की कला का केन्द्र रहा होगा जिसे मौर्य दरबार के संरक्षण मिलता था। चुनार में ही अशोक के समय के लगभग ज्यादातर स्तभों को बनावाया गया था। चुनार के गंगा नदी के किनारे होने के कारण इन्हे यहां से ले जाना आसान था। स्तंभों की लंबाई 40 से 50 फुट तक है। अब तक अशोक के समय के 20 के करीब स्तंभ मिले हैं। सम्राट अशोक के बनवाये गये स्तंभों की खासियत यह है कि इन्हें एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है। इसलिए इन्हें एकाश्म ( Monolithic) स्तंभ कहा जाता है। ये स्तंभ से ऊपर से नीचे की ओर मोटे होते चले गये हैं। सारनाथ का स्तंभ अब कई हिस्सों में टूट चुका है। सारनाथ स्तंभ पर अशोक का ब्राह्मी लिपी में लिखा शासनादेश भी खुदा हुआ है। 

ब्राह्मी लिपी में खुदा शासनादेश

                                                         

                       









सिंह-शीर्ष ( lion- capitol)
सम्राट अशोक के बनवाये गये स्तंभों में सारनाथ के सिंह
शीर्ष वाले स्तंभ को सबसे बेहतर माना जाता है। इसमें सबसे ऊपर चारों दिशाओ में चार
सिंह बने हैं। लेकिन अपनी बनावट में यह सिंहों की आकृति बेहद सौम्य नजर आती है। शेरों
की मासंपेशियों, उनके बालों और शारीरिक बारिकियों के बेहद कुशलता के साथ पत्थर पर
उकेरा गया है। इन्हें सम्राट अशोक की शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है। इन सिंहों
के नीचे एक पट्टी पर चारों दिशाओं में चार चक्र बने हुए हैं जिनमें 32 तीलियां
हैं। इन चक्रों को धर्मचक्रप्रवर्तन का प्रतीक माना जाता है। भारत के झंडें के बीच
में अशोक चक्र का चिन्ह यहीं से लिया गया है। इसी पट्टी पर चार पशु, हाथी, घोड़ा, बैल
और सिंह बने हुए हैं। जो देखने में बेहद वास्तविक लगते हैं। इन चारों पशुओं को
क्या सोचकर बनाया गया इसके लेकर इतिहासकारों में बहुत से मत हैं। कुछ इसे भगवान
बुद्द से जोडतें हैं तो कुछ इसे प्राचीन हिन्दु धर्म से जुड़ा बताते हैं। कारण कुछ
भी रहा हो लेकिन इनकी कला लाजवाब है।
कैसे पहुंचें
 सारनाथ वाराणसी से
13 किलोमीटर दूर है। वाराणसी से यहां तक आने के लिए बस और टैक्सी आसानी से मिल
जाती हैं। वारणसी पूरे देश के बडें शहरों से रेल या हवाई मार्ग से जुड़ा है।
नोट- सिहं शीर्ष संग्राहलय में रखा है और उसकी तस्वीर
लेने  की इजाज़त नहीं हैं।

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